9/29/11

गुरुशरण जी को जसम की श्रद्धांजलि

  क्रांतिकारी नाट्यकर्मी और 
जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष गुरुशरण सिंह नहीं रहे  

28 सितम्बर ,2011. बुधवार. 


संस्कृति की दुनिया में शहीद भगत सिंह की विरासत के वाहक पंजाब के विख्यात रंगकर्मी गुरुशरण सिंह आज नहीं रहे. वे उम्र के 82 साल पूरे कर चुके थे. भगत सिंह उनके सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत थे और उनके जीवन और सन्देश को वे लगातार अपने नाटकों में जीवंत ढंग से प्रस्तुत करते रहे. ये भी अजब संयोग है क़ि उनका निधन आज 28 सितम्बर को हुआ जो शहीद-ए-आज़म का जन्मदिवस है. आज चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ और दोपहर बाद उनकी अंत्येष्टि संपन्न हुई. उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में आम नागरिक और संस्कृतिकर्मी शामिल थे. शोक सभा इतवार को होगी. परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियाँ हैं.

महज १६ साल की उम्र में गुरुशरण सिंह ने कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और ता-उम्र कम्यूनिस्ट उसूलों पर कायम रहे. आज फोन पर जन संस्कृति मंच के साथियों से बात करते हुए गुरुशरण जी की बड़ी बेटी ने गर्व के साथ कहा क़ि उन्हें इस बात का हमेशा गर्व रहेगा क़ि उनके पिता ने कभी भी किसी सरकार के साथ कोइ समझौता नहीं किया, अपने उसूलों से कभी पीछे नहीं हटे. रसायन शास्त्र से एम.एस.सी. करने के उपरांत वे पंजाब सरकार के सिंचाई विभाग में रिसर्च आफिसर के पद पर नियुक्त हुए. इस पद पर रहते हुए उन्होंने भाखड़ा नांगल बाँध और दूसरी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

यहीं काम करते हुए उन्होंने 1956 से अपनी क्रांतिकारी नाट्य-यात्रा शुरू की. जब वे नाटक करते तो उसमें बेटियों सहित उनका पूरा परिवार भाग लेता. देश-विदेश में उन्होंने हज़ारों प्रस्तुतियां कीं. बगैर साजो-सामान के जनता के बीच गावों, मुहल्लों, चौराहों और सडकों पर मामूली संसाधनों के साथ नाटक करना उनकी नाट्य-शैली का अभिन्न अंग था.सामंती शोषण, पूंजीवादी लूट और दमन तथा साम्राज्यवाद के विरोध में जन-जागरण इन नाटकों का मुख्य उद्देश्य होता. तमाम समसामयिक घटनाओं के सन्दर्भ भी मूलतः इन्हीं केन्द्रीय उद्देश्यों की पूर्ती के लिए उनके नाटकों में नियोजित रहते थे. 

गुरुशरण सिंह ने जनता के रंगमंच, आन्दोलनकारी और प्रयोगधर्मी थियेटर, ग्रामीण रंगमंच का पंजाब में उसी तरह विकास किया जैसा क़ि बादल सरकार ने बंगाल में. यह एक अखिल भारतीय प्रक्रिया थी जो देश में आमूलचूल बदलाव के लिए चल रहे जन-संघर्षों के साथ संस्कृतिकर्मियों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर चलने के संकल्प से उपजी थी. जिस तरह बादल सरकार मूल कर्मभूमि बंगाल होने के बावजूद कभी बंगाल तक सीमित नहीं रहे, वैसे ही गुरुशरण सिंह भी कभी पंजाब तक महदूद नहीं रहे. यही कारण था क़ि प्रधानतः हिंदी-उर्दू क्षेत्र के संगठन जन संस्कृति मंच के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वे दिल्ली में अक्टूबर 1985 में सम्पन्न हुए उसके स्थापना सम्मलेन में संस्थापक अध्यक्ष बनाए गए. क्रांतिकारी कवि गोरख पाण्डेय महासचिव चुने गए. 

गुरुशरण सिंह और अवतार सिंह 'पाश' ऐसे क्रांतिकारी संस्कृतिकर्मी थे जिन्होनें 1980 के दशक में अलगाववादी आन्दोलन में सुलगते पंजाब में पूरी निर्भीकता के साथ गाँव- गाँव जाकर भगत सिंह के सपनों , भारतीय क्रान्ति की ज़रुरत, समाजवाद की ज़रुरत, सामंती शोषण और साम्राज्यवाद के विरोध की आवाज़ को बुलंद किया. 'पाश' इसी प्रक्रिया में शहीद हुए.

गुरुशरण जी ने राजनीति में सक्रिय भूमिका से भी कभी गुरेज़ नहीं किया. 'पंजाब लोक सभ्याचार मंच' और 'इंकलाबी मंच ,पंजाब' के तो वे संस्थापक ही थे. इंडियन पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य रहे. भाकपा (माले) के बहुत करीबी हमदर्द रहे और लगातार उसके कार्यक्रमों में सरगर्मी से शिरकत करते रहे. वे सांस्कृतिक मोर्चे पर भी महज कलाकार नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण और समर्पित संस्कृतिकर्मी की भूमिका में रहे. अपने अभिन्न मित्र बलराज साहनी की याद में उन्होनें 'बलराज साहनी यादगार प्रकाशन' की स्थापना कर सैकड़ों छोटी-बड़ी किताबों का प्रकाशन किया जिनकी कीमत बहुत ही कम हुआ करती थी. इन किताबों को वे अक्सर खुद अपने झोले से निकाल कर बेचा भी करते थे. उनके लिए कोइ काम छोटा या बड़ा नहीं था.

लम्बे समय से बीमार रहने के बावजूद गुरुशरण जी सदैव राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सजग और अपने उद्देश्यों के लिए सचेष्ट रहे. पंजाबी और हिन्दी में उनके ढेरों नाटक जनता की स्मृति में अमर रहेंगे. 'इन्कलाब जिंदाबाद' या 'जन्गीराम की हवेली' जैसे उनके नाटक हिन्दी दर्शक भी कभी भूल नहीं सकते.

वे अपने सम्पूर्ण जीवन और संस्कृति-कर्म में जनवादी, खुशहाल और आज़ाद भारत के जिस सपने को साकार करने के लिए जूझते रहे, उसे ज़िंदा रखने और पूरा करने का संकल्प दोहराते हुए हम अपनी सांस्कृतिक धारा के जुझारू प्रतीक का. गुरुशरण सिंह को जन संस्कृति मंच की और से लाल सलाम पेश करते हैं.

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

9/27/11

संगीतकार और कवि- 2

  भीमसेन जोशी, अली अकबर खान और मंगलेश डबराल   


(4 फरवरी , 1922 - 24, जनवरी  2011)



















वैसे तो कलाओं के आपसी समबन्धों पर बात करने वाले  आलिमों की कोई कमी नहीं, पर कभी आपको मौक़ा मिले तो इनको महसूस करिए. ये एक अद्भुत दुनिया है, जहां दो अपने-अपने फन के माहिर लोग एक दूसरे के गहरे रियाज, समझ और श्रम को सलाम पेश करते हैं. इस लिहाज से संगीत और कविता का अजुगत-अद्भुत नाता है.  शास्त्रीय संगीत से लेकर ग़ज़ल और कव्वाली गायकी तक ये सिलसिला पसरा है. इस श्रृंखला में मैं अपनी पसंद के कुछ फनकारों की आवाजाही को सामने रखने का जतन करूंगा. 

संगीतकार और कवि श्रृंखला में आज पेश है पंडित भीमसेन जोशी का गाया हुआ राग दुर्गा. इसको सुनते हुए हमारे समय के अद्भुत कवि मंगलेश जी ने एक कविता लिखी थी. कविता सिद्धांत के ब्लॉग बुद्धू-बक्सा पर दिखी तो याद आयी. सो आज वही कविता और जोशी जी की आवाज़ में राग दुर्गा. साथ ही सुनिए राग दुर्गा का एक नया रंग, उस्ताद अली अकबर खान के तारों से. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब ये दोनों उस्ताद सशरीर हमारे बीच होते थे. उनकी याद का भी एक सुर इस प्रस्तुति का भाग हो, सोच यही रहा हूँ...


   राग दुर्गा  
 (भीमसेन जोशी के गाये इस राग को सुनने की एक स्मृति) 

  मंगलेश डबराल 

एक रास्ता उस सभ्यता तक जाता था
जगह-जगह चमकते दिखते थे उसके पत्थर
जंगल में घास काटती स्त्रियों के गीत पानी की तरह
बहकर आ रहे थे
किसी चट्टान के नीचे बैठी चिड़िया
अचानक अपनी आवाज़ से चौंका जाती थी
दूर कोई लड़का बांसुरी पर बजाता था वैसे ही स्वर
एक पेड़ कोने में सिहरता खड़ा था
कमरे में थे मेरे पिता
अपनी युवावस्था में गाते सखि मोरी रूम-झूम
कहते इसे गाने से जल्दी बढ़ती है घास

सरलता से व्यक्त होता रहा एक कठिन जीवन
वहाँ छोटे-छोटे आकार थे
बच्चों के बनाए हुए खेल-खिलौने घर-द्वार
आँखों जैसी खिड़कियाँ
मैंने उनके भीतर जाने की कोशिश की
देर तक उस संगीत में खोजता रहा कुछ
जैसे वह संगीत भी कुछ खोजता था अपने से बाहर
किसी को पुकारता किसी आलिंगन के लिए बढ़ता
बीच-बीच में घुमड़ता उठता था हारमोनियम
तबले के भीतर से आती थी पृथ्वी की आवाज़

वह राग दुर्गा थे यह मुझे बाद में पता चला
जब सब कुछ कठोर था और सरलता नहीं थी
जब आखिरी पेड़ भी ओझल होने को था
और मैं जगह-जगह भटकता था सोचता हुआ वह क्या था
जिसकी याद नहीं आयी
जिसके न होने की पीड़ा नहीं हुई
तभी सुनाई दिया मुझे राग दुर्गा
सभ्यता के अवशेष की तरह तैरता हुआ
मैं बढ़ा उसकी ओर
उसका आरोह घास की तरह उठता जाता था
अवरोह बहता आता था पानी की तरह.


9/25/11

संतो ! सहज समाधि भली... प्रणय कृष्ण

सम्मान के बहाने अमरकांत जी के रचना-कर्म पर एक टीप -प्रणय कृष्ण 

 सादगी बड़ी कठिन साधना है. अमरकांत का व्यक्तित्व और कृतित्व, दोनों ही इसका प्रमाण है. अमरकांत के जीवन संघर्ष को कोइ अलग से न जाने, तो उनके सहज, आत्मीय और स्नेहिल व्यवहार से शायद ही कभी समझ पाए की इस सहजता को कितने अभावों, बीमारियों, उपेक्षाओं और दगाबाजियों के बीच साधा गया है. आत्मसम्मान हो तो आत्मसम्मोहन, आत्मश्लाघा और आत्मप्रदर्शन की ज़रुरत नहीं पड़ती. मुझे लगता है की 16 साल की उम्र में बलिया के जिस बालक ने कालेज छोड़ जे. पी.- लोहिया- नरेन्द्रदेव के नेतृत्व वाले 'भारत छोडो आन्दोलन' में कूद पड़ने का निर्णय लिया था, वह बालक अभी भी अमरकांत में ज़िंदा है.

जिस रचनाकार की 2-3 कहानियां भी दुनिया के किसी भी महान कथाकार के समकक्ष उसे खडा करने में समर्थ हैं, ('दोपहर का भोजन', 'डिप्टी कलक्टरी ', ज़िन्दगी और जोंक' या कोई चाहे तो अन्य कहानियां भी चुन सकता है), उसे उपेक्षा की मार पड़ती ही रही. ये उनके छोटे बेटे अरविन्द और बहू रीता का ही बूता था कि अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी छोड़ उन्होंने हिन्दी समाज के इस अप्रतिम कथाकार को हमारे बीच भौतिक रूप से बनाए और बचाए रखा है. अमरकांत भारतीय जीवन की विदूपताओं, उसकी घृणास्पद तफसीलों में बगैर किसी अमूर्तन का सहारा लिए अपनी ठेठ निगाह जितनी देर तक टिका सकते हैं, उतना शायद ही कोइ अन्य प्रेमचंदोत्तर कथाकार कर पाया हो. उनका कथाकार भीषण रूप से अमानवीय होती गयी स्वातंत्र्योत्तर भारत की परिस्थितियों के बीच बगैर भावुक हुए, बगैर किसी हाहाकार का हिस्सा बने पशुवत जीवन जीने को अभिशप्त किरदारों के भीतर भी इंसानियत की चमक को उभार देता है. अमरकांत साबित कर देते हैं कि इसके लिए किन्ही बड़े आदर्शों का चक्कर लगाना ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन खुद ऐसा ही है. जीवन से ज़्यादा विश्वसनीय कुछ और नहीं. 

'ज़िंदगी और जोंक' का रजुआ एक असंभव सा पात्र है लेकिन पूरी तरह विश्वसनीय. हम आप भी रजुआ को जीवन में देखे हुए हैं, लेकिन उसके जीवन और चरित्र की जटिलताओं में जब हम अमरकांत की लेखनी की मार्फ़त प्रवेश करते हैं, तब हमारे सामने एक असंभव सा जीवन प्रत्यक्ष होता है, मानवता के सीमान्त पर बसर की जा रही ज़िंदगी सहसा हमारे बोध में दाखिल होती है. विश्वनाथ त्रिपाठी ने ठीक ही लिखा है कि अमरकांत 'कफ़न' की परम्परा के रचनाकार हैं. 'ज़िंदगी और जोंक' के रजुआ का 'करुण काइयांपन' घीसू-माधो के काइएपन की ही तरह उसकी असहायता की उपज है. ये कहानी उस अर्द्ध औपनिवेशिक और मज़बूत सामंती अवशेषों वाले भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था पर चोट है जिसने गरीब आदमी को पशुता के स्तर पर जीने को मजबूर कर रखा है, जिसका ज़िंदा बचा रहना ही उसकी उपलब्धि है, जिसकी जिजीविषा ने ही उसे थेथर बना दिया है, जिसका इस समाज में होना ही व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी है और उसकी अमानवीयता का सूचकांक भी.

अमरकांत विडम्बनाओं और विसंगतियों को जिस भेदक व्यंग्य के साथ प्रकट करते हैं, वह दुर्लभ है. वे जिस बहुविध द्वंद्वों से घिरे समाज के कथाकार हैं, उसकी जटिल टकराहटों में निर्मित किरदारों और जीवन व्यापार को वे ऐसी सहजता से पेश करते हैं कि कोइ धोखा खा जाए.पशु-बिम्बों में अंकित अनगिनत मानवीय भंगिमाएँ, कहानियों की निरायास प्रतीकात्मकता, माहौल को सीधे संवेद्य बनाने वाली बिलकुल सामान्य जीवन-व्यवहार से ली गईं नित नूतन उपमाएं, जनपदीय मुहावरों और कथन -भंगिमाओं से भरी, सहज और खरी चलती हुई ज़बान, अद्भुत सामाजिक संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक गहराई से बुने गए तमाम दमित तबकों से खड़े किए गए उनके अविस्मर्णीय चरित्र, समाज और दुनिया को आगे ले जानेवाली बातों और भाव-संरचनाओं का गहरा विवेक उनके कथाकार की विशेषता है. रजुआ, मुनरी, मूस, सकलदीप बाबू , 'इन्हीं हथियारों से' की बाल-वेश्या ढेला, सुन्नर पांडे की पतोह, 'हत्यारे ' कहानी के दो नौजवान, बऊरईया कोदो खानेवाला गदहा जैसे अनगिनत अविस्मर्णीय और विश्वसनीय किरदारों के ज़रिए अमरकांत ने हमारे समाज की हजारहा विडंबनाओं को जिस तरह मूर्त किया है, वह सरलता के जटिल सौन्दर्यशास्त्र का प्रतिमान है. उत्तरवादी और अन्तवादी घोषणाओं के नव-साम्राज्यवादी दौर में भी अमरकांत के यथार्थवाद को विकल्पहीनता कभी क्षतिग्रस्त न कर सकी. इसका प्रमाण है 2003 में प्रकाशित उनका उपन्यास 'इन्हीं हथियारों से' जो सन 1942  के 'भारत छोडो आन्दोलन' की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है.

प्रगतिशील आन्दोलन के 75 वें साल में अमरकांत को यह सम्मान मिलना एक सुखद संयोग है. ज्ञानपीठ से सम्मानित हिंदी के अन्य मूर्धन्य साहित्यकारों का प्रगतिशील आन्दोलन से वैसा जीवन भर का सम्बन्ध नहीं रहा जैसा की अमरकांत का. अमरकांत को जितने सम्मान, पुरस्कार मिले हैं, उनकी कुल राशि से ज़्यादा उनके जैसे व्यापक रूप से पढ़े जाने वाले लेखक की रायल्टी बनती थी, जिसे देना उनके प्रकाशकों को गवारा न हुआ. पिछले 15 सालों से हमने अमरकांत को कम से कम तीन किराए के मकानों में देखा है. दो कमरों से ज़्यादा का घर शायद ही उन्हें मयस्सर हुआ हो.

'इन्ही हथियारों से' का एक अदना सा पात्र कहता है," बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्धान्त सिर्फ व्यवहार से ही सार्थक और सहज हो सकते हैं, जिसके बिना जीवन से ही रस खींचकर गढ़े हुए सिद्धान्त,जीवन से अलग होकर बौने और नाकाम हो जाते हैं." अमरकांत का जीवन और रचना-कर्म खुद इस की तस्दीक करता है. काश ! हिन्दी के प्रतिष्ठान चलाने लोग अमरकांत होने के इस अर्थ को समझ पाते !

9/22/11

संगीतकार और कवि- 1

  कुमार गन्धर्व और सर्वेश्वर  

पंडित कुमार गन्धर्व की गायकी हमेशा ही एक अद्भुत बेचैनी से पुर होती है. ग़ालिब याद आ गए कि 'पुर हूँ शिकवे से, राग से जैसे बाजा'. ये 'शिकवा' कुमार साहब के यहाँ उनके प्रिय कवि कबीर से सुर मिलाता आता है. यह कोई आसान काम नहीं, इसकी शर्त है 'दुनिया से यारी' वा 'दुनियादारी' का त्याग. माने यह कहने का साहस कि 'हमन है इश्क मस्ताना, हमन दुनिया से यारी क्या'.

विष्णु चिंचालकर द्वारा बनाया भावचित्र, आभार- श्री सुनील मुखी 




















कुमार साहब के गायन में डूबने के लिए
आइये एक कविता की साखी लेते चलें.
कविता सर्वेश्वर की है.

  सु रों के स हा रे-२  
  कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए  

दूर-दूर तक
सोई पडी थीं पहाड़ियां
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे.

एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में
बदल गया.

शांत धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवंडर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरस कर शांत हो गए.

तभी किसी
बांस के बन में आग लग गयी
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गयीं.

पूरा वन असंख्य बांसुरियों में बज उठा,
पत्तियाँ नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन कर उड़ गयीं.

लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फंसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारहसिंहा.

सारा जंगल कांपता हिलता रहा

लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनंत तक फैला हुआ है.


1. राग भैरव -रवि के करम है रे  
2. राग  शिवमत भैरव -अरी ए री माल  
3. राग  भावमत भैरव- कंथा रे  जानू रे  जानू   

9/21/11

पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर- तीन राग

  पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर- तीन कम सुने राग  

पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर (1910–1992)













पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर का गायन भारतीय संगीत परम्परा के अद्भुत अप्रतिम नमूना है. पूरी शुद्धता और अनूठेपन के साथ कठिन से कठिन रागों का पल्लवन उनकी अपनी कठिन कमाई का हासिल था.  उनकी बहुतेरी विशिष्टताओं में से एक है- कम सुने और गाये जाने वाले रागों का चयन. आज सुनिए उनके गाये तीन राग, जिनमें से दो, सुघराई और कुकुभ बिलावल तो दुर्लभ ही हैं.

 राग सुघराई 
 राग कुकुभ बिलावल 
 राग वसंती कान्हड़ा विलंबित तीन ताल 



9/20/11

सारंगी, सरोद और तबला

संगीत में स्वर के समानांतर भी वाद्य हमेशा रहे आये हैं. वे शब्दों के साथ भी रहे,  पर  कभी उनके   मुहताज बन कर  नहीं रहे. यहाँ तक कि प्राचीन मिथकों में भी वाद्य अपनी अलग पहचान के साथ खड़े हैं. मुरलीधर कृष्ण आदि अनेक रूप इस  बात की पुष्टि करते हैं. शब्दों से अलग यह  ध्वनियाँ आदि-ध्वनियों को विकसित करती, संवारती चली आयी है.

आइये आज सुनिए अपने-अपने  इलाके के सिरमौर तीन बड़े उस्तादों से-

सारंगी, सरोद और तबला   























सारंगी
पंडित रामनारायन  
(राग मारूं बिहाग, तीन ताल)
सरोद 
उस्ताद अमजद अली खान 
(राग जिला काफी)
तबला
पंडित समता प्रसाद  
(झपताल)

9/13/11

रमाशंकर यादव 'विद्रोही' की तीन कवितायें

मकबूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग, शीर्षक- रेप ऑफ़ इंडिया
















 


औरतें

कुछ औरतों ने
अपनी इच्छा से
कुएं में कूदकर जान दी थी,
ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है।
और कुछ औरतें
चिता में जलकर मरी थीं,
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है।

मैं कवि हूं,
कर्ता हूं,
क्या जल्दी है,
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित,
दोनों को एक ही साथ
औरतों की अदालत में तलब करूंगा,
और बीच की सारी अदालतों को
मंसूख कर दूंगा।

मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा,
जिन्हें श्रीमानों ने
औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किया है।
मैं उन डिग्रियों को निरस्त कर दूंगा,
जिन्हें लेकर फौजें और तुलबा चलते हैं।
मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा,
जिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम किया हुआ है।

मैं उन औरतों को जो
कुएं में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं,
फिर से जिंदा करूंगा,
और उनके बयानों को
दुबारा कलमबंद करूंगा,
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया!
कि कहीं कुछ बाकी तो नहीं रह गया!
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई!

क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने एक बित्ते के आंगन में
अपनी सात बित्ते की देह को
ता-जिंदगी समोए रही और
कभी भूलकर बाहर की तरफ झांका भी नहीं।
और जब वह बाहर निकली तो
औरत नहीं, उसकी लाश निकली।
जो खुले में पसर गयी है,
या मेदिनी की तरह।

एक औरत की लाश धरती माता
की तरह होती है दोस्तों!
जे खुले में फैल जाती है,
थानों से लेकर अदालतों तक।
मैं देख रहा हूं कि
जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है।
चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित,
और तमगों से लैस सीनों को फुलाए हुए सैनिक,
महाराज की जय बोल रहे हैं।
वे महाराज की जय बोल रहे हैं।
वे महाराज जो मर चुके हैं,
और महारानियां सती होने की तैयारियां कर रही हैं।
और जब महारानियां नहीं रहेंगी,
तो नौकरानियां क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियां कर रही हैं।

मुझे महारानियों से ज्यादा चिंता
नौकरानियों की होती है,
जिनके पति जिंदा हैं और
बेचारे रो रहे हैं।
कितना खराब लगता है एक औरत को
अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना,
जबकि मर्दों को
रोती हुई औरतों को मारना भी
खराब नहीं लगता।
औरतें रोती जाती हैं,
मरद मारते जाते हैं।
औरतें और जोर से रोती हैं,
मरद और जोर से मारते हैं।
औरतें खूब जोर से रोती हैं,
मरद इतने जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं।

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी,
जिसे सबसे पहले जलाया गया,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी रही होगी,
मेरी मां रही होगी।
लेकिन मेरी चिंता यह है कि
भविष्य में वह आखिरी औरत कौन होगी,
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी होगी
मेरी बेटी होगी,
और मैं ये नहीं होने दूंगा।





















नानी

कविता नहीं कहानी है,
और ये दुनिया सबकी नानी है,
और नानी के आगे ननिहाल का वर्णन अच्छा नहीं लगता।

मुझे अपने ननिहाल की बड़ी याद आती है,
आपको भी आती होगी!
एक अंधेरी कोठी में
एक गोरी सी बूढ़ी औरत,
रातो-दिन जलती रहती है चिराग की तरह,
मेरे खयालों में।
मेरे जेहन में मेरी नानी की तसवीर कुछ इस तरह से उभरती है
जैसे कि बाजरे के बाल पर गौरैया बैठी हो।
और मेरी नानी की आंखे...
उमड़ते हुए समंदर सी लहराती हुई उन आंखों में,
आज भी आपाद मस्तक डूब जाता हूं आधी रात को दोस्तों!

और उन आंखों की कोर पर लगा हुआ काजल,
लगता था कि जैसे क्षितिज छोर पर बादल घुमड़ रहे हों।
और मेरी नानी की नाक,
नाक नहीं पीसा की मीनार थी,
और मुंह, मुंह की मत पूछो,
मुंह की तारे थी मेरी नानी,
और जब चीख कर डांटती थीं,
तो जमीन इंजन की तरह हांफने लगती थी।
जिसकी आंच में आसमान का लोहा पिघलता था,
सूरज की देह गरमाती थी,
दिन धूप लगती थी,
और रात को जूड़ी आती थी।

और गला, द्वितीया के चंद्रमा की तरह,
मेरी नानी का गला पता ही नहीं चलता था,
कि हंसुली में फंसा है या हसुली गले में फंसी है।
लगता था कि गला, गला नहीं,
विधाता ने समंदर में सेतु बांध दिया है।

और मेरी नानी की देह, देह नहीं आर्मीनिया की गांठ थी,
पामीर के पठार की तरह समतल पीठ वाली मेरी नानी,
जब कोई चीज उठाने के लिए जमीन पर झुकती थीं,
तो लगता था जैसे बाल्कन झील में काकेसस की पहाड़ी झुक गई हो!
बिलकुल इस्कीमों बालक की तह लगती थी मेरी नानी।
और जब घर से निकलती थीं,
तो लगता था जैसे हिमालय से गंगा निकल रही हो!

एक आदिम निरंतरता
जे अनादि से अनंत की और उन्मुख हो।
सिर पर दही की डलिया उठाये,
जब दोनों हाथों को झुलाती हुई चलती थी,
तो लगता था जैसे सिर पर दुनिया उठाये हुए जा रही हो।
जिसमें मेरे पुरखों का भविष्य छिपा हो,
और मेरा जी करे कि मैं पूछूं,
कि ओ री बुढि़या, तू क्या है,
आदमी कि आदमी का पेड़!

पेड़ थी दोस्तों, मेरी नानी आदमियत की,
जिसका कि मैं एक पत्ता हूं।
मेरी नानी मरी नहीं है,
वह मोहनजोदड़ो के तालाब में स्नान को गई है,
और अपनी धोती को उसकी आखिरी सीढ़ी पर सुखा रही है।
उसकी कुंजी यहीं कहीं खो गई है,
और वह उसे बड़ी बेसब्री के साथ खोज रही है।
मैं देखता हूं कि मेरी नानी हिमालय पर मूंग दल रही है,
और अपनी गाय को एवरेस्ट के खूंटे से बांधे हुए है।
मैं खुशी में तालियां बजाना चाहता हूं,
लेकिन यह क्या!!
मेरी हथेलियों पर सरसों उग आई है,
मैं उसे पुकारना चाहता हूं,
लेकिन मेरे होठों पर दही जम गई है,
मैं पाता हूं
कि मेरी नानी दही की नदी में बही जा रही है।
मैं उसे पकड़ना चाहता हूं,
पकड़ नहीं पाता हूं,
मैं उसे बुलाना चाहता हूँ,
लेकिन बुला नहीं पाता हूं,
और मेरी देह, मेरी समूची देह,
एक पत्ते की तरह थर-थर कांपने लगती है,
जो कि अब गिरा कि तब गिरा।
























 गुलाम

1.
वो तो देवयानी का ही मर्तबा था,
कि सह लिया सांच की आंच,
वरना बहुत लंबी नाक थी ययाति की।
नाक में नासूर है और नाक की फुफकार है,
नाक विद्रोही की भी शमशीर है, तलवार है।
जज़्बात कुछ ऐसा, कि बस सातों समंदर पार है,
ये सर नहीं गुंबद है कोई, पीसा की मीनार है।
और ये गिरे तो आदमीयत का मकीदा गिर पड़ेगा,
ये गिरा तो बलंदियों का पेंदा गिर पड़ेगा,
ये गिरा तो मोहब्बत का घरौंदा गिर पड़ेगा,
इश्क  और हुश्न  का दोनों की दीदा गिर पड़ेगा।
इसलिए रहता हूं जिंदा
वरना कबका मर चुका हूं,
मैं सिर्फ काशी में ही नहीं रूमान में भी बिक चुका हूं।

हर जगह ऐसी ही जिल्लत,
हर जगह ऐसी ही जहालत,
हर जगह पर है पुलिस,
और हर जगह है अदालत।
हर जगह पर है पुरोहित,
हर जगह नरमेध है,
हर जगह कमजोर मारा जा रहा है, खेद है।
सूलियां ही हर जगह हैं, निज़ामों की निशान,
हर जगह पर फांसियां लटकाये जाते हैं गुलाम।
हर जगह औरतों को मारा-पीटा जा रहा है,
जिंदा जलाया जा रहा है,
खोदा-गाड़ा जा रहा है।
हर जगह पर खून है और हर जगह आंसू बिछे हैं,
ये कलम है, सरहदों के पार भी नगमे लिखे हैं।

2.
आपको बतलाऊं मैं इतिहास की शुरुआत को,
और किसलिए बारात दरवाजे पर आई रात को,
और ले गई दुल्हन उठाकर
और मंडप को गिराकर,
एक दुल्हन के लिए आये कई दूल्हे मिलाकर।
और जंग कुछ ऐसा मचाया कि तंग दुनिया हो गई,
और मरने वाले की चिता पर जिंदा औरत सो गई।
और तब बजे घडि़याल,
पड़े शंख-घंटे घनघनाये,
फौजों ने भोंपू बजाये, पुलिस भी तुरही बजाये।
मंत्रोच्चारण यूं हुआ कि मंगल में औरत रचती हो,
जीते जी जलती रहे जिस भी औरत के पति हो।

3.
तब बने बाज़ार और बाज़ार में सामान आये,
और बाद में सामान की गिनती में खुल्ला बिकते थे गुलाम,
सीरिया और काहिरा में पट्टा होते थे गुलाम,
वेतलहम-येरूशलम में गिरवी होते थे गुलाम,
रोम में और कापुआ में रेहन होते थे गुलाम,
मंचूरिया-शंघाई में नीलाम होते थे गुलाम,
मगध-कोशल-काशी में बेनामी होते थे गुलाम,
और सारी दुनिया में किराए पर उठते गुलाम,
पर वाह रे मेरा जमाना और वाह रे भगवा हुकूमत!
अब सरे बाजार में ख़ैरात बंटते हैं गुलाम।

लोग कहते हैं कि लोगों पहले ऐसा न था,
पर मैं तो कहता हूं कि लोगों कब, कहां, कैसा न था ?
दुनिया के बाजार में सबसे पहले क्या बिका था ?
तो सबसे पहले दोस्तों .... बंदर का बच्चा बिका था।
और बाद में तो डार्विन ने सिद्ध बिल्कुल कर दिया,
वो जो था बंदर का बच्चा,
बंदर नहीं वो आदमी था।

9/3/11

क्या हम जनता से मुखातिब हैं?- कविता कृष्णन


जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर है-
क्या हम उनसे मुखातिब हैं?
कविता कृष्णन

समकालीन जनमत से साभार. 
जनमत के बारे में जानने और मंगाने के लिए दाहिने कोने पर नज़र डालें. 


'मैं अन्ना हूं' या 'वन्दे मातरम्' बोलने वाले सभी लोग न तो संघी हैं, न ही कारपोरेट समर्थक. वे हमारी वे सब बातें सुनने के लिए खुला रुख रखते हैं जो हमें कारपोरेट भ्रष्टाचार या उदारीकरण की नीतियों के बारे में उनसे कहनी हैं. सवाल यह है क़ि क्या हम इतने अहंकारी, श्रेष्ठ और पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो चले हैं क़ि हम उनसे बात भी न कर सकें?

सारी गरमी भर आल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन (आइसा) तथा इंकलाबी नौजवान सभा  (आरवाईए) के कार्यकर्ता इसी कष्टप्रद कार्य में महीनों लगे रहे. उन्होंने सारे देश में अभियान चलाया- ऐसे मुहल्लों, गाँवों, बाज़ारों में जहां वामपंथ की कोई प्रत्यक्ष उपस्थिति नहीं थी. ऐसा नहीं है क़ि ये इलाके 'बड़े लोगों' की बहुलता वाले इलाके थे. अधिकांशतः ये इलाके ऐसे थे जिनमें मध्य और निम्न मध्यम वर्ग, मजदूर तबके के लोग तथा कैम्पसों के नजदीक छात्रों की बसावट वाले इलाके थे. अधिकांश जगह  इन कार्यकर्ताओं को देख लोग यह मानने से शुरू करते थे क़ि वे अन्ना हजारे का अभियान लेकर उनके बीच आये हैं. जब ये छात्र कार्यकर्ता नौ अगस्त के संसद जाम करने के अपने आह्वान के बारे में बताते तो उनसे पूछा जाता था- 'जब अन्ना एक अभियान चला ही रहे हैं तो उससे अलग किसी अभियान की क्या जरूरत है?' तब वे उन्हें यह बताते क़ि वे एक प्रभावी भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून के लिए इस आन्दोलन का समर्थन करते हैं, ताकि भ्रष्टाचारी दण्डित होने से बच न पायें. लेकिन इस तरह के क़ानून बनने मात्र से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा क्योंकि यह भ्रष्टाचार उन नीतियों का परिणाम है जो क़ि जल-जंगल-जमीन, खनिज, स्पेक्ट्रम, बीज आदि की कारपोरेट लूट को बढ़ावा देती है. कार्यकर्ताओं ने बिना लफ्फाजी के लोगों के साथ संवाद बनाना सीखा. बातचीत के दौरान वे उस राज्य से कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के उदाहरण देते, जिस राज्य में वे अभियान को लेकर थे. वे लोगों को राडिया टेपों, पूंजी घरानों, सत्ताधारी कांग्रेस, विपक्षी भाजपा तथा मीडिया की भ्रष्टाचार में भूमिका के बारे में बताते थे.

बगैर अपवाद के उन्हें कहीं भी लोगों के शत्रुतापूर्ण रवैय्ये का सामना नहीं करना पड़ा. यह भी स्पष्ट था क़ि अन्ना के अभियान ने भ्रष्टाचार के सवाल पर लोगों में गहरी दिलचस्पी जगा दी थी, साथ ही सरकार के खिलाफ जमीनी कार्यवाही के प्रति भारी समर्थन भी भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को जमीन और संसाधनों की कारपोरेट लूट, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा के निजीकरण, बेरोजगारी और महंगाई, ए एफ एस पी ए और ग्रीन हंट जैसी दमनकारी नीतियों के खिलाफ चल रहे संघर्षों के साथ जोड़ना, बहस-मुबाहिसे के दौरान आसान हो चला था.

हाँ, कैम्पसों और दूसरे इलाकों में विद्यार्थी परिषद् और संघ कार्यकर्ताओं ने अन्ना टोपी लगाकर 'अराजनीतिक' भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का समर्थक होने का मुखौटा लगाए जरूर दिखे और उन्होंने आइसा और दूसरे जन संगठनों को अपने बैनर और नारों के साथ स्वतन्त्र भ्रष्टाचार विरोधी प्रतिरोध से हरचंद रोकने की कोशिश की. हमने उनका जवाब देते हुए उनसे मांग की क़ि येदुरप्पा और बेल्लारी पर, नितीश सरकार के अधीन BIADA जमीन घोटाले, जिसके चलते फारबिसगंज में गोली चली, पर वे अपना रुख स्पष्ट करें. ऐसा करते ही उनका आवरण तार-तार हो जाता था और उन्हें आन्दोलन के आम समर्थकों से अलगा देना संभव होता था. आन्दोलन में शामिल गैर-संघी लोगों के लिए हमारा नारा 'कांग्रेस-भाजपा दोनों यार, देश बेचने को तैयार!' लोकप्रिय हो जाता था और संघी तत्व अलगाव में पड़ जाते थे.

ऐसे में हम सभी जो इस बात से चिंतित हैं क़ि संघ कहीं अन्ना के आन्दोलन पर सवार होकर आन्दोलन को फासीवादी दिशा न दे दे, उन्हें क्या करना चाहिए? क्या हमें इस बात की सुविधा है क़ि हम सुरक्षित रास्ता लें, पुस्तकालय में घुस जाएँ, उच्च आसन से आंदोलन का विश्लेषण करें, कयामत के दिन की भविष्यवाणी करें ताकि बाद को कह सकें क़ि हमने कहा था न! क्या हमें इसके गुजर जाने का इंतज़ार करना चाहिए? क्या हमें मैदान संघ परिवार के लिए खुला और निर्विरोध छोड़ कर हट जाना चाहिए? या क़ि हमें संघर्ष के मैदान में जाकर आम स्त्री-पुरुषों के साथ सड़कों पर कंधे से कंधा मिलाकर भ्रष्टाचार से लड़ते हुए अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए भ्रष्टाचार विरोधी विमर्श को राजनीतिक बनाने की ओर बढना चाहिए?

बाबा रामदेव की औकात बता दी गई और यह संघ के लिए बड़ा भारी झटका था. संघ, अन्ना के नेतृत्व वाले आन्दोलन का फ़ायदा उठाने के लिए ढंके-छिपे तौर तरीकों से प्रयासरत है क्योंकि उन्हें मालूम है क़ि अपनी पहचान के साथ सामने आने पर उन्हें भाजपा के खुद के भ्रष्टाचार- चाहे वह कर्नाटक में हो या गुजरात में या पैसा लेकर सवाल पूछने का मामला हो, इन सब का जवाब देना होगा. प्रगतिशील ताकतों के लिए लोगों के बीच अपनी पहुँच को बढाने का भी यह मौक़ा है, जब लोगों को बेल्लारी और बस्तर की याद दिलाई जा सकती है. मोदी के गढ़ गुजरात में आइसा का अनुभव सबक लेने लायक है. मोदी यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और दमन के खिलाफ अन्ना के समर्थन में बढ़-चढ़ कर बोलते रहे. आइसा और इंकलाबी नौजवान सभा ने सात सौ छात्रों का भावनगर में एक जुलूस निकाला जिसमें उन्होंने न केवल केंद्र सर्कार बल्कि गुजरात में भ्रष्टाचार, कारपोरेट लूट, फर्जी मुठभेड़ तथा साम्प्रदायिक हिंसा पर पर्दा डालने की मोदी सरकार की कोशिशों के खिलाफ नारे लगाए. मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के साथ होने के दावे को तार-तार करते हुए पुलिस ने जुलूस पर लाठी-चार्ज किया तथा नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं युनुस जकारिया, जिगनाब राना, सोनल चौहान और फरीदा जकारिया को जेल भेज दिया. अगले ही दिन इन गिरफ्तारियों के खिलाफ भावनगर के इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेगों सहित तमाम कालेजों ने आइसा और इंकलाबी नौजवान सभा के आह्वान पर हड़ताल की. पांच हज़ार छात्रों ने स्थानीय प्रशासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर गिरफ्तार किये गए कार्यकर्ताओं की रिहाई को मजबूर किया. वामपंथी छात्र-युवा संगठनों ने अपने ही झंडे तले पहलकदमी अपने हाथ में ली, जिसके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार विरोधी गुस्से को उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ मोड़ दिया. 

यह कांग्रेस थी जिसने पहले-पहल अन्ना के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन पर अनशन के द्वारा संसद को 'ब्लैकमेल' करने, संघ समर्थित, फासीवादी, संविधान विरोधी, लोकतंत्र के लिए खतरनाक होने के आरोप मढ़े. अब इन आरोपों की प्रतिध्वनि न केवल कांग्रेस के समर्थकों में बल्कि कुछ दूसरे असम्भाव्य से लगने वाले हलकों में भी सुनाई पड़ रही है. दो गंभीर व्याख्याकारों  ने हाल ही में इस विषय पर तफसील से अपने विचार प्रकट किये हैं. एक हैं प्रभात पटनायक (जो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं) तथा दूसरी हैं अरुंधति राय.

प्रभात पटनायक ने अन्ना के अनशन पर 'संसद पर बंदूक तानने' का आरोप लगाया है. सवाल है क़ि कोई भी अनशन किस बिंदु पर जाकर लोकतांत्रिक नहीं रह जाता? क्या इरोम शर्मिला का अनशन 'ब्लैकमेल' है? या क़ि मजदूरों और छात्रों के आन्दोलनों में समय समय पर किये जाने वाले अनशन 'ब्लैकमेल' हैं? क्या मजदूरों की हडतालों को अनगिनत बार 'ब्लैकमेल' नहीं कहा जाता रहा है? ऐसा क्यों है क़ि अनशन तभी 'ब्लैकमेल' करार दिए जाते हैं जब उन्हें जन समर्थन मिलने लगता है या जब सरकार उनका दबाव महसूस करने को विवश होती है?

प्रभात पटनायक का कहना है क़ि लोगों को विरोध का अधिकार है ताकि वे 'चुने हुए प्रतिनिधियों को अपनी भावना से अवगत करा सकें'. उनका कहना है क़ि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी होती है लेकिन कोई भी अकेली भावना सब पर भारी नहीं पड़ने दी जाती और सब कुछ बहस-मुबाहिसे से तय होता है. क्या सचमुच ऐसा होता है?  क्या सेज का क़ानून जोकि भूमि हड़प का दस्तावेज है, संसद में बगैर किसी बहस या आपत्ति के पारित नहीं हो गया? राडिया टेपों ने दिखलाया क़ि किस तरह संसद में क़ानून बनाए जाते हैं और नीतियाँ तय की जाती हैं. कैसे मंत्री, सांसद, विपक्ष के नेता, मुकेश अंबानी या रतन टाटा के हितों की सुरक्षा के लिए काम करते हैं. क्या यह सब निर्णय बहस-मुबाहिसे से लिए जाते हैं? सोचकर बड़ी हंसी आती है.

क्या किसानों, मजदूरों और आदिवासियों को 'संसदीय सर्वोच्चता' के आगे सर झुका देना चाहिए, जब संसद उनके अधिकारों को छीन लेने वाले क़ानून बनाती है? क्या उन्होंने अनेक मौकों पर ऐसे कानूनों की अवज्ञा नहीं की है? क्या जनता के संघर्षों को इतना ही अधिकार है क़ि वे संसद को अपनी 'भावना से अवगत कराएं'? क्या उन्हें यह अधिकार नहीं क़ि वे आवश्यक प्रभावकारी दबाव निर्मित करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके क़ि संसद ऐसे सवालों पर उनकी भावनाओं का सम्मान करे जो उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गए हैं? एक ऐसी परिस्थिति में जब क़ि चुने हुए प्रतिनिधियों और उन्हें चुनने वाली जनता के बीच गहरे तौर पर एक गैर-बराबरी का रिश्ता है, क्या हम अनशन या हड़ताल जैसे तरीकों को 'अलोकतांत्रिक' करार दे सकते हैं?

प्रभात पटनायक कहते हैं क़ि जनता को महज अन्ना की जयजयकार करने वालों तथा समर्थक मात्र बने रहने वालों तक सीमित कर दिया गया है. इसी तरह अरुंधति राय की दलील है क़ि लोग 'खुद को भूखा मार देने की धमकी दे रहे' एक बूढ़े आदमी का नज़ारा देखने वाले 'दर्शक' मात्र रह गए हैं. हममें से कई लोग जंतर-मंतर पर अनशन कर रही मेधा पाटेकर के साथ शामिल हो गए थे. क्या हम भी महज दर्शक थे? क्या यह कहना अहंकार नहीं है कि 'हम जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं, हम प्रबुद्ध हैं, लेकिन ये लोग जो सड़कों पर अभी निकले हुए हैं, वे महज वर्ल्ड कप की ताली बजाऊ भीड़ हैं, मीडिया की पैदा की हुई भेड़ियाधसान हैं जिसे एक गुप्त एजेंडा के हित में बरगलाया गया है'. हमें इस बात से सावधान रहना चाहिए क़ि मीडिया इस आन्दोलन के साथ वही बर्ताव न कर सके जो वह दूसरे अधिकांश आन्दोलनों के साथ करती है. वामपंथी रैलियों में जुटी भारी भीड़ को 'किराए की भीड़' या सिखा-पढ़ा कर जुटाई गई भीड़ कहना अथवा माओवादियों पर भोले-भाले आदिवासियों और किसानों को बरगलाने का आरोप मढना मीडिया की ऐसी ही भंगिमाएं हैं. हमें इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि आम लीगों की भारी संख्या एक भ्रष्ट और दमनकारी सरकार को चुनौती देने और उसका सामना करने में एक नया आत्मविश्वास महसूस कर रही है. जनता की इस लामबंदी की प्रेरक शक्ति अन्ना के प्रति कोई अतार्किक श्रद्धा नहीं है. यह प्रेरक शक्ति सरकार के भ्रष्ट और तानाशाह होने, सरकारी लोकपाल के मसौदे के वाहियात होने में लोगों का दृढ विश्वास है. अधिकांश मीडिया भाले ही जनता को 'जयजयकार' करने वालों के रूप में प्रस्तुत कर रहा हो, हमें अवश्य ही जनता को उसके खुद के मूल्यांकन के आधार पर समझना होगा. पर्चा बांटने, जुलूस निकालने, सत्याग्रह आयोजित कराने, सांसदों और पुलिस बल का सामना करने, गिरफ्तारी देने में जो जनता की पहलकदमी खुली है, हमें उसका आदर करना चाहिए. आन्दोलन में शामिल युवाओं के एक बड़े तबके के लिए यह किसी भी जन कार्यवाही में भाग लेने का पहला अनुभव है. हमें उनके साथ संवाद का रिश्ता कायम करना चाहिए.

प्रभात पटनायक की दलील है कि अन्ना का 'मसीहापन' बुनियादी तौर पर अलोकतांत्रिक है. क्या गांधी द्वारा अपनाई गई रणनीति में मसीहापन के मजबूत तत्व नहीं थे? निस्संदेह 'महात्मा' के रूप में नेता का विचार अपने चरित्र में मसीहाई है. क्या इससे स्वाधीनता संग्राम जिसमें गांधी ने नेतृत्वकारी भूमिका निभाई, 'अलोकतांत्रिक' हो गया? इस तरह की रणनीति की आलोचना करना, यह कहना कि आन्दोलनों को और अधिक लोकतांत्रिक होना चाहिए, कि कोई भी एक नेता पवित्र गाय नहीं है, पूजा की वस्तु नहीं है, यह अलग बात है लेकिन यह कहना कि आन्दोलन लोकतंत्र के लिए खतरा है, अतिशयोक्ति है.

कोई यह याद कर ही सकता है कि नंदीग्राम के सवाल पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे कोलकाता के बुद्धिजीवियों पर भी प्रभात पटनायक ने 'मसीहाई नैतिकतावाद' का आरोप मढ़ा था. ये बुद्धिजीवी एक समय माकपा के कट्टर समर्थक थे, लेकिन उन्होंने जमीन हड़पने के खिलाफ आंदोलनरत गरीब किसानों पर पुलिस फायरिंग के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया था. पश्चिम बंगाल में कोई अन्ना नहीं था. तब वहां 'मसीहा' कौन था- नंदीग्राम या सिंगूर के किसान?

माकपा पोलितब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा है कि 'अन्ना की दलीलें  संघ परिवार और भाजपा द्वारा इस्तेमाल की गई दलीलों के समतुल्य हैं जिनके अनुसार उनका कहना था कि भारत की अस्सी फीसदी जनता (हिन्दू जनता) विवादात्मक बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाना चाहती है... क्या संसद को इस मांग के आगे झुक जाना चाहिए?' क्या इस तरह की तुलना जायज है? फासीवाद किसी मांग की राजनीतिक अंतर्वस्तु में निहित होता है या कि हम किसी भी ऐसे आन्दोलन को फासीवादी कह सकते हैं जो संसद पर दबाव डालता हो? आईये इस सवाल को एक भिन्न तरीके से देखें- मान लीजिये कि भाजपा का संसद में पूर्ण बहुमत होता, और वह उसके बल पर अयोध्या में मंदिर निर्माण को बढ़ती. क्या इसे 'संवैधानिक' या 'लोकतांत्रिक'  इस लिए कह दिया जाता कि संसद की ऐसी मंशा थी? स्पष्ट है कि मस्जिद गिराया जना और मंदिर अभियान असंवैधानिक थे- इसलिए नहीं कि वे संसद पर गैर-संसदीय दबाव डाल रहे थे, बल्कि इसलिए कि वे बहुसंख्यकवादी वर्चस्व तथा अल्पसंख्यकों के स्वातंत्र्य और अधिकारों को कुचलने की कोशिश कर रहे थे. जन लोकपाल बिल के मसौदे में ऐसा कुछ भी नहीं है जोकि संविधान या अल्पसंख्यकों के अधिकारों को चुनौती देता हो.

सड़क पर उतरे हुए लोग एक कानून की मांग कर रहे हैं जो कि पिछले बयालीस सालों से संसद की सूची में दर्ज है. जनता यह मांग कर रही है कि सरकारी लोकपाल बिल को जनमत द्वारा खारिज किये जाने का संसद आदर करे, और ऐसा कानून पारित करे जोकि जन भावनाओं के अनुरूप एक प्रभावी भ्रष्टाचार विरोधी संस्था का निर्माण करे.

प्रभात पटनायक यह मान कर चले हैं कि जो जनता विरोध में उतरी है, उसे सरकारी बिल और जन लोकपाल बिल के बीच फर्क की बारीकियां पता नहीं हैं. उनका कहना है कि आन्दोलन एक मसीहा पर निर्भर है और उसने तथ्यों के बारे में लोगों को शिक्षित नहीं किया. मेरा मानना है कि तथ्य कुछ और ही कहते हैं. सच तो यह है कि लम्बे समय के बाद पहली बार सामान्य जनता एक कानून के मसौदे की तफसीलों पर इतनी शिद्दत के साथ बहस कर रही है. आन्दोलन के नेताओं ने दोनों बिलों के बीच फर्क की बारीकियों को लोगों तक पहुंचाने के लिए काफी मेहनत की. रामलीला मैदान पर सवाल-जवाब के सत्रों के माध्यम से तथा देश भर में अनेक अन्य आयोजनों के जरिये, वीडियो और इंटरनेट के जरिये उन्होंने यह काम किया है. जन लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वालों से पूछे गए सवालों के जवाब धैर्यपूर्वक दिए गए हैं और कुछ आलोचनाओं को भी स्वीकार किया गया है. जरूरी नहीं कि हम जन लोकपाल बिल के हर प्रावधान से सहमत हों, या उसके बारे में बढ़े-चढ़े दावों से, लेकिन यह बहुत बड़ी बात होगी यदि संसद में लाये जाने वाले हरेक विधेयक को इसी तरह जन-निरीक्षण और बहस-मुबाहिसे की प्रक्रिया से गुजरा जाय, जैसा कि लोकपाल विधेयक के मसले में हो रहा है. इन कानून के मसौदों को न केवल राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् और उदारवादी अभिजनों के बीच निरीक्षण और बहस के लिए रखा जाना चाहिए बल्कि आम जनता के बीच भी.

अनेकशः अन्ना द्वारा संसद के सामने समय सीमा रखने के 'अलोकतांत्रिक' व्यवहार की आलोचना की गई किन्तु तथ्य यह है क़ि हमारे अधिकांश सांसदों को अमेरिका द्वारा निश्चित की गई 'समय-सीमा' का पालन करने से कोई गुरेज नहीं था. उदाहरण के लिए परमाण्विक समझौते के मसले पर.

अरुंधति राय ने जन लोकपाल के आन्दोलन की तुलना माओवादी आन्दोलन से करते हुए फरमाया कि उसका उद्देश्य 'भारतीय राजसत्ता को उखाड़ फेंकना' है. आश्चर्य है कि सरकार भी ऐसी ही तुलना करती आयी है. अंतर महज यह है कि अरुंधति के अनुसार सरकार 'खुद अपने आपको उखाड़ फेंकने' की मुहिम में शामिल है.

अगर सरकार वास्तव में इस खेल में शामिल है, अगर अवह खुद को उखाड़ फेंकने में सहयोग कर रहही है, अगर जन लोकपाल उसके कारपोरेट समर्थक एजेंडा और विश्व-बैंक निर्देशित सुधारों के कार्यक्रमों के अनुकूल है, तो क्यों नहीं उसने शुरू में ही जन लोकपाल के मसौदे को स्वीकार कर लिया? अन्ना हजारे को सार्वजनिक रूप से गालियाँ देकर और बाद में गिरफ्तार कर क्यों अपनी हुज्ज़त कराई? क्यों भाजपा भी इस मसौदे का समर्थन करने से अब तक मुंह चुराती रही? क्या जन लोकपाल का अभियान राजसत्ता को उखाड़ फेंकने का अभियान है? या तथ्यतः यह राजसत्ता के प्रति विश्वास की कमी को रोकने का प्रयास है? एक समय था जब न्यायपालिका, राजसत्ता की विश्वसनीयता को बहाल करने वाली संस्था मानी जाती थी. आज यह संस्था लोकपाल है. 

अन्ना के अधिकांश आलोचक इस बात पर सहमत हैं कि लोकपाल का सरकारी मसौदा नख-दांत विहीन और कमजोर है. क्या एक प्रभावकारी और स्वतन्त्र लोकपाल का प्रावधान करने वाला कोई भी विधेयक दमनकारी है?  क्या टीम अन्ना द्वारा बनाया जन लोकपाल बिल 'सुपर पुलिस'  और 'कुलीनतंत्र' के समतुल्य है, जैसा कि उसे अनेकशः बताया जा रहा है? मुझे तो लगता है कि जन लोकपाल के अधिकारों के दायरे में पटवारी और चपरासी से प्रधानमंत्री तक, भ्रष्टाचार के सभी मामलों में जांच करने, निगरानी रखने और  दण्डित करने के जो प्रावधान हैं, वे सी बी आई को पहले से ही प्राप्त हैं. दोनों के बीच बड़ा अंतर यह है कि लोकपाल के चयन और क्रिया-कलाप सरकार से अपेक्षया अधिक स्वतन्त्र होगा, और चयन की प्रक्रिया जनता की भागीदारी या हस्तक्षेप की भी इसमें कुछ न कुछ गुंजाईश है. जन लोकपाल के मसौदे में किन्हीं ख़ास धाराओं को हटाने या उनमें परिवर्तन करने अथवा उसके अधिकारों में नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली की मांग करना एक बात है लेकिन पूरे मसौदे को ही दमनकारी बताना एकदम दूसरी बात है.

निस्संदेह हमें यह मांग करनी चाहिए कि कारपोरेट जगत, मीडिया, बड़ी फंडिंग वाले एनजीओ और राजनीतिक पार्टियां भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों के दायरे में लाये जाने चाहिए. क्या एक जन लोकपाल अकेले ही भ्रष्टाचार से निपट पायेगा? आज अधिकांश भ्रष्टाचार सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की सह-भागेदारी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) के दायरे का है. लिहाजा वे उपाय जो सार्वजनिक क्षेत्र के भ्रष्टाचार की रोक-थाम के लिए किये जायेंगें, वे सिर्फ आंशिक रूप से प्रभावकारी होंगें. जैसा कि प्रशांत भूषण अक्सर कहा करते हैं कि इस तरह का कानून भ्रष्टाचार के 'आपूर्ति पक्ष' (सप्लाई साइड) को ही संबोधित कर सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार का 'मांग पक्ष' (डिमांड साइड) तब भी बना रहेगा, जब तक कि प्राकृतिक संसाधनों और सेवाओं के निजीकरण की नीतियां बनी रहती हैं. एक कानून जो कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वालों के भ्रष्टाचार पर ही केन्द्रित है वह इस समस्या का महज आंशिक समाधान ही करता है. वह रामबाण नहीं है. लेकिन क्या यह बात उसे दमनकारी और कारपोरेट हितो के लिए फायदेमंद बनाती है? मुझे ऐसा नहीं लगता. आखिर 'निजी' लुटेरों को 'सार्वजनिक' लुटेरों की जरूरत होती है- टाटा और अंबानी को ए राजा की जरूरत होती है, जिंदल, एस्सार, रियो टिंटो को मधु कोड़ा जैसों की जरूरत होती है. एक कानून जो राजाओं और कोडाओं से निपटने के लिए बने,  वह भ्रष्टाचार के रोग के लिए रामबाण भले ही न हो, लेकिन एक अत्यंत आवश्यक उपाय जरूर है.

कुछ अखबार भ्रष्टाचार का इलाज उदारीकरण की बढ़ी हुई खुराक से करने का सुझाव अवश्य ही दे रहे हैं, जैसा क़ि कारपोरेट सेक्टर के विभिन्न स्वर. क्या इसका मतलब यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में जो लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं, वे सब उसी शिद्दत के साथ अधिक उदारीकरण की मांग करने लग जायेंगें, जिस शिद्दत से वे जन लोकपाल की मांग कर रहे हैं? संभवतः नहीं. हाल-फिलहाल तक मीडिया ने भावी पीढी को उदारीकरण के उत्साही समर्थकों के बतौर प्रस्तुत किया था. क्या इस आन्दोलन में युवाओं की भागीदारी महंगी शिक्षा और असुरक्षित रोजगार की परिस्थिति में उदारीकरण के वायदों के खिलाफ इनके बढ़ते हुए मोहभंग को सूचित नहीं करती? क्या इस बात के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं क़ि सडको पर उतरे हुए लोगों का गुस्सा महज भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं बल्कि महंगाई और  बेरोजगारी के खिलाफ भी है? उनमें से एक बहुत बड़ी संख्या ऊर्जा के निजीकरण के चलते उनके बिजली के बिलों में बढ़ोत्तरी की शिकायत कर रही है, वे महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ शिकायत दर्ज करा रहे हैं. यदि नव-उदारवादी विचारक और कारपोरेट मीडिया रोग को ही निदान बता रहे हैं तब निश्चय ही ज्यादा रेडिकल राजनीतिक ताकतों को इस क्षण आन्दोलन में उतरे लोगों के साथ संवाद बनाने की और भी ज्यादा जरूरत है ताकि भ्रष्टाचार और उदारीकरण के बीच गहरे संबंध को उजागर किया जा सके, ताकि जल-जंगल-जमीन, बिजली, खनिज, स्पेक्ट्रम, गैस, शिक्षा, सड़क, हाईवे, एयरपोर्ट आदि के निजीकरण के जरिये कारपोरेट लूट का भंडाफोड़ किया जा सके.

टीवी चैनल अधिकांशतः आन्दोलन को तो चढ़ा रहे हैं, पर उसमें निहित मुद्दों को दबा रहे हैं. लेकिन इससे पहले कि हम कांस्पिरेसी या षडयंत्र  के निष्कर्ष तक पहुंचे, हमें याद रखना चाहिए कि अधिकांश अखबारों ने  आन्दोलन के समर्थन की जगह निर्णय लेने की प्रक्रिया में 'संसदीय सर्वोच्चता' को ही अपने सम्पादकीयों में स्थापित किया है. कुछ अपवादों को छोड़कर मीडिया की भूमिका और कवरेज समस्याग्रस्त और चुनिंदा चीजों को ही रेखांकित करने वाली है. उसने कारपोरेट भ्रष्टाचार पर किसी बहस-मुबाहिसे को शायद ही सतह पर आने दिया हो. लेकिन बड़े पैमाने पर जनता की लामबंदी को मीडिया के भड़कावे का परिणाम मानना पूरी तौर पर गलत है. अप्रैल के महीने में कई लोगों ने भविष्यवाणी की, 'पुलिस दमन और गिरफ्तारियों की संभावना का इन्तजार कीजिये, ये भीड़ मिनटों में छंट जायेगी.' इसके उलट अगस्त में लोगों ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां दीं. अब कुछ संशयात्मा लोग कह रहे हैं, 'टीवी कैमरे हटा लीजिये, और देखिये कि लोग कैसे छूमंतर हो जाते हैं.' मुझे ऐसा नहीं लगता.

अनिवार्यतः अन्ना के राजनीतिक दर्शन और उनकी सामाजिक दृष्टि को लेकर अनेक सवाल बहस तलब हैं. राजनीतिक और लोकतांत्रिक सवालों- मसलन जाति, साम्प्रदायिकता, राज्य दमन, आर्थिक नीतियां, आदि पर सुसंगतता की मांग हर आन्दोलन से की ही जानी चाहिए. अन्ना के पंद्रह अगस्त के भाषण ने जमीन की कारपोरेट लूट और पुलिस फायरिंग जैसे ज्वलंत सवालों को स्पर्श किया. लेकिन येदुरप्पा और बेल्लारी पर उनकी चुप्पी ज्यादा प्रकट थी. एक भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से निश्चय ही यह अपेक्षा की जाती है कि किसी सवाल पर अगर किसी मुख्यमंत्री को गद्दी छोड़नी पड़ी हो वह भी उस रिपोर्ट के आधार पर जिसे जन लोकपाल बिल बनाने वालों में से एक जस्टिस हेगड़े ने तैयार किया हो तो वह उसका जरूर ही स्वागत करे. भाषण दर भाषण येदुरप्पा और बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं पर चुप्पी और राजा, सिब्बल और कलमाडी जैसों के खिलाफ मुखर होना राजनीतिक अवसरवाद है.

राजनीतिक ताकतों के प्रति ही अन्ना के नेतृत्व वाले समूह का रवैया विरोधाभाषी है. काफी पहले मार्च 2011 में उन्होंने सभी राजनीतिक पार्टियों को आन्दोलन का समर्थन करने के लिए आमंत्रित किया था. लेकिन राजनीतिक कार्यकर्ता उनके मंचों पर हूट किये जाते हैं- भ्रष्टाचार पर उनके रवैय्ये के कारण नहीं, बल्कि सिर्फ उनकी राजनीतिक पहचान के चलते. समाजवादी विचारधारा के एक दल के कार्यकर्ताओं को रामलीला मैदान में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओं द्वारा एक पुस्तिका के वितरण से रोक दिया गया जिसमें भ्रष्टाचार की परिघटना का विश्लेषण किया गया था. विडम्बना यह है कि इस पुस्तिका का लोकार्पण प्रशांत भूषण ने किया था. दूसरी ओर तमाम तरह के दक्षिणपंथी समूह न केवल खुले तौर पर अपना साहित्य वितरित कर रहे हैं बल्कि उन्हें मंच पर भी जगह मिल रही है- अनेक प्रकार के गैर-राजनीतिक आवरण  'राजनीति धोखा है' जैसी अराजनीतिक विचारधारा पर अन्ना का एकाधिकार नहीं है. दूसरे अनेक समूह हैं जो 'जन आन्दोलनों' को अराजनीतिक बताते हैं. हम इस परभाषा को स्वीकार नहीं कर सकते लेकिन सड़कों पर जनता के बीच उतरे बगैर हम इस विचार से  प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते, और न इसे चुनौती दे सकते हैं.

हममें से तमाम लोग, जिनके पास भ्रष्टाचार या संगठित राजनीतिक आन्दोलन का  राजनीतिक विश्लेषण है, उनके लिए अन्ना आन्दोलन ऐसा नहीं है जिसके साथ आसान, सुविधाजनक, निरपेक्ष एकजुटता या समर्थन संभव हो. एकता और संघर्ष, उसके भीतर कार्यरत अन्य राजनीतिक शक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा की जरूरत हैं, लेकिन क्या अधिकांश बड़े आन्दोलन आमतौर पर उबड़-खाबड़ और अस्त-व्यस्त नहीं होते? क्या उनमें एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती ताकतें नहीं होतीं? तहरीर चौक का आन्दोलन ऐसा ही था. जेपी आन्दोलन निश्चय ही ऐसा था. भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन भले ही तहरीर चौक या जेपी आन्दोलन (जिनका केन्द्रीय मुद्दा लोकतंत्र था) जितना महत्वपूर्ण न हो, लेकिन 'लोकपाल' के लिए आन्दोलन में उतरी जनता के लिए 'लोकतंत्र' का सवाल (जिसमें विरोध का अधिकार तथा जन आकांक्षाओं के मुताबिक़ संसद में कानून बनाने को सुनिश्चित करना शामिल है) प्रभावी हो चला है. हव्वा खड़ा करने की जगह हमें आन्दोलन के बीचो-बीच होना चाहिए और वास्तविक चुनौतियों और खतरों का मुकाबला करना चाहिए. हमें 'भ्रष्टाचार' और 'लोकतंत्र' की परिभाषाओं को विस्तारित करने की जरूरत है.

क्या भारतीय राजसत्ता के लिए संकट और उथल-पुथल का यह समय फासीवादी दिशा ले सकता है? निस्संदेह ऐसा हो सकता है. लेकिन क्या वामपंथी और प्रगतिशील ताकतें इस संकट के फासीवादी समाधान को अनिवार्य नियति के तौर पर स्वीकार करते हुए विरोध करने वाले लोगों को 'प्राक-आधुनिक' कहकर उनका अवमूल्यन कर सकती हैं? क्या हम विरोध कर रहे लोगों के बीच 'संसद की सर्वोच्चता' का प्रचार कर शासक वर्ग  के साथ बिरादराना कायम कर सकते हैं? क्या इसकी जगह हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की भावना और संकल्प का स्वागत नहीं करना चाहिए? ऐसा करते हुए क्या हमें शुद्ध कानूनी लड़ाई जो क़ि भ्रष्टाचार के नीतिगत आधारों पर चुप है, उसके आगे का रास्ता प्रशस्त नहीं करना चाहिए? अपने राजनीतिक झंडों को झुकाकर और 'अराजनीतिक' दिखने के दबाव के आगे घुटने टेकने की जगह, यह समय है क़ि हम साहसपूर्वक सड़कों पर उतरें और विरोध में उमड़ी जनता के साथ भ्रष्टाचार के बारे में अपनी राजनीतिक समझ के आधार पर संवाद कायम करें.

इधर अन्ना के अनशन को इरोम के अनशन से तुलना कर अलगाने का फैशन बढ़ चला है. समाचार लेकिन यह है कि इरोम ने अन्ना के साथी अखिल गोगोई के आमंतरण के जवाब में अन्ना के "आश्चर्यजनक धर्मयुद्ध" का गर्मजोशी से समर्थन किया है, इरोम ने  इंगित किया क़ि जहां अन्ना को अहिंसक तरीके से विरोध करने की स्वतंत्रता मिली, वाहें उन्हें यह स्वतंत्रता नहीं दी गई. इरोम ने अन्ना से अपनी रिहाई के लिए काम करने की अपील की और उन्हें मणिपुर की यात्रा का निमंत्रण दिया. क्या यह संभव नहीं कि हम इरोम की परिपक्वता से हम कोई सबक लें.




कविता कृष्णन, 
सीपीआई (एमएल) के अंगरेजी मुखपत्र
'लिबरेशन' के सम्पादक-मंडल में.
सीपीआई (एमएल) केन्द्रीय समिति की सदस्य.