10/25/11

जननेता ऐसे होते हैं...

 (कम्युनिस्ट आंदोलन के मशहूर नेता और सामाजिक बदलाव के नायक का. रामनरेश राम के निधन को एक साल पूरे होने को हैं. रामनरेश जी बिहार की राजनीति में गरीब-दलित तबकों की आवाज़ तो थे ही प्रतिरोध और संघर्ष की आप ही मिसाल थे. कल भाकपा-माले उनकी  याद में स्मृति-दिवस मना रही है. आइये, उनके जीवन और संघर्षों पर एक नज़र डालते हुए बदलाव की लड़ाई में हर संभव योग देने की जिद ठान लें. सुधीर सुमन के साथ राम नरेश जी के जीवन पर एक निगाह )

कॉमरेड राम नरेश राम को लाल सलाम !
सन् 1924 में सहार प्रखंड के एकवारी गांव में एक भूमिहीन दलित परिवार में जन्मे का. रामनरेश राम 18-19 साल की उम्र में ही 1942 के आंदोलन में शामिल हो गए थे। भगतसिंह और उनके साथियों के इंकलाबी विचारों और स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में चले किसान आंदोलन का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा था। 1947 में जो आजादी मिली, उससे बहुत सारे क्रांतिकारियों की तरह वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लग रहा था कि आजादी की घोषणा तो हो गई है, पर यह जमींदार और पूंजीपतियों की ही आजादी है और व्यवस्था के जनविरोधी स्वरूप में कोई बदलाव नहीं आया है। एक ओर कांग्रेसी सत्ता की बंदरबाट में लगे हुए थे, तो दूसरी ओर तेलंगाना किसान विद्रोह हो रहा था। 

का. रामनरेश राम तेलंगाना किसान आंदोलन के समर्थन में और क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के फांसी के खिलाफ कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हुए और देश के करोड़ों शोषित-वंचित-मेहनतकश लोगों के लिए असली आजादी और वास्तविक लोकतंत्र की लड़ाई में आगे बढ़ चले। जनकवि रमाकांत द्विवेदी 'रमता' समेत उस दौर के कई ईमानदार स्वाधीनता सेनानी उनके साथ थे। जब कम्युनिस्ट पार्टी प्रतिबंधित थी, तब का. रामनरेश राम उसमें शामिल हुए और शाहाबाद जिला कमेटी के सदस्य बनाए गए। उन्हें किसान सभा की जिम्मेवारी मिली। 1954 में उन्होंने सोन नहर में पटवन का टैक्स बढ़ा देने के खिलाफ जबर्दस्त आंदोलन संगठित किया।

का. रामनरेश राम के लिए राजनीति जनता के संसाधनों को लूटकर घर भरने का माध्यम नहीं थी। उन्होंने गरीब-मेहनतकश लोगों की आजादी और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए राजनीति की और उसमें अपना पूरा जीवन लगा दिया। जनता के बुनियादी संघर्षों से वे कभी अलग नहीं हुए। उनकी राजनीति की दिशा गरीब, भूमिहीन खेत मजदूर और मेहनतकश किसानों के बुनियादी जनसंघर्षों के अनुसार तय होती रही। 1965 में वे भूस्वामियों के विरोध और साजिशों को धता बताते हुए एक बड़ी जनवादी गोलबंदी के जरिए एकवारी पंचायत के मुखिया बने। भारत के नए लोकतंत्र का हाल यह था कि उनका मुखिया बनना भूस्वामी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। जब 1967 में उन्होंने सीपीएम के उम्मीदवार के बतौर सहार विधानसभा का चुनाव लड़ा तो उन्होंने उनके चुनाव एजेंट जगदीश मास्टर पर जानलेवा हमला किया। 

तब तक नक्सलबाड़ी विद्रोह हो चुका था। चारु मजुमदार के नेतृत्व में  भाकपा (माले) का निर्माण हो चुका था। लेकिन पश्चिम बंगाल में भीषण दमन और बिखराव के कारण पार्टी धक्के का शिकार थी, लेकिन जैसे ही उस विद्रोह की चिंगारी एकवारी पहुंची तो एक शक्तिशाली सामंतवाद विरोधी आंदोलन फूट पड़ा। 1974 में पार्टी का पुनर्गठन हुआ। 1975 तक जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव, शीला, अग्नि, लहरी, बूटन मुसहर और भाकपा (माले) के दूसरे महासचिव का. सुब्रत दत्त भी शहीद हो गए। रामनरेश राम को पुलिस सूंघती फिरती रही और हर मुठभेड़ के बाद उनकी मौत की खामख्याली पालती रही। लेकिन भूमिगत स्थिति में ही भाकपा (माले) को व्यापक जनाधार वाली पार्टी बनाने का उनका अभियान जारी रहा। उन्हीं के नेतृत्व में माले ने खुले मोर्चे आईपीएफ के जरिए चुनाव में शिरकत की शुरुआत की। उस वक्त उन्होंने कम्युनिस्टों की चुनाव में भागीदारी के सवाल पर एक पुस्तिका भी लिखी। इसके पहले ‘भोजपुर के समतल की लड़ाई’ नाम की एक पुस्तिका भी उन्होंने लिखी थी।
का. रामनरेश राम हमेशा संघर्ष के सारे रूपों को मिलाते हुए जनता के संघर्ष को संचालित करते रहे। उनकी राजनीति कभी भी हथियारों या धन की आश्रित नहीं रही, हमेशा उसके केंद्र में जनता और उसकी पहलकदमी रही। जातीय दायरे को तोड़ते हुए उन्होंने गरीबों, खेत-मजदूरों, किसानों, नौजवानों और लोकतंत्रपसंद-न्यायपसंद लोगों का एक व्यापक मोर्चा बनाने की कोशिश की। का. रामनरेश राम ने एक दलित परिवार में जन्म लिया, पर कभी भी दलित-पिछड़ों के नाम पर शासकवर्ग द्वारा संचालित जातिवादी राजनीतिक धाराओं के साथ नहीं गए। उन्होंने जीवन में वर्ग-संघर्ष की राह पकड़ी और हमेशा उस पर कायम रहे। उन्होंने अपने संघर्षों के जरिए बताया कि दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक लोगों की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति वर्ग-संघर्ष के ही रास्ते संभव है, उसी के भीतर से निकलकर कुछ लोगों के शासकवर्ग में शामिल हो जाने से मुक्ति संभव नहीं है।

उन्होंने चुनाव को वर्ग-संघर्ष के तौर पर ही लिया। जब 1995 में वे सहार से चुनाव जीत गए, तभी प्रतिक्रिया में शासकवर्ग ने अपने संरक्षण में रणवीर सेना को जन्म दिया। उस वक्त भी अपने अनुभवों को आधार पर उन्होंने कहा कि यह सेना किसी जाति का भी भला नहीं कर सकती, बल्कि जिस जाति के नाम पर बनी है, उसके लिए ही भस्मासुर हो जाएगी। रणवीर सेना ने महिलाओं, बच्चों और वृद्धों तक की हत्या की और भाकपा (माले) को खत्म करने की कोशिश की। लेकिन का. रामनरेश राम के कुशल राजनीतिक निर्देशन में जो चौतरफा लड़ाई लड़ी गई उससे न केवल रणवीर सेना खत्म हुई, बल्कि जिस जाति के नाम पर वह सेना बनी थी, उससे भी वह अलगाव में पड़ गई।

जातीय समीकरण की राजनीति की आड़ में भूस्वामियों, पूंजीपतियों, दबंगों और अपराधियों का हित साधने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए का. रामनरेश राम हमेशा एक चुनौती बने रहे। जब वे अपार जनसमर्थन से विधायक बने तो सत्ता ने उन्हें भूमिगत जमाने से भी ज्यादा खतरनाक समझा। कांग्रेसी राज के पुलिस रिकार्ड में वे मृत घोषित किए जा चुके थे। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ने उन पर लादे गए सारे फर्जी मुकदमों को खत्म करने का ऐलान किया था। लेकिन लालू-राबड़ी राज में भी वे मुकदमे खत्म नहीं किए गए, बल्कि नए-नए फर्जी मुकदमे लाद दिए गए। ऐसा ही एक मुकदमा नितीश राज में उनके निधन तक कायम रहा, जबकि पुलिस द्वारा उन्हें उग्रवादी कहे जाने के खिलाफ पूरा विपक्ष उबल पड़ा था। पुलिस ने उन्हें कई बार गिरफ्तार करने की कोशिश की, पर वे कभी उनके हाथ नहीं आए। जैसा माओ ने कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के बारे में कहा था कि जनता के साथ उनका रिश्ता पानी और मछली की तरह होना चाहिए, तो वैसा ही रिश्ता का. रामनरेश राम का भोजपुर की जनता के साथ था। इसी गहरे जुड़ाव के कारण ही उनके खिलाफ की जाने वाली सत्ता और प्रशासन की साजिशें कभी सफल नहीं हो पाईं।

जनता के व्यापक लोकतांत्रिक मुद्दों पर उनके नेतृत्व में भाकपा (माले) ने हमेशा हस्तक्षेप किया। यहां तक कि जब आपातकाल में दूसरी पार्टियों के नेता दमन और गिरफ्तारी से बचने के लिए नेपाल की ओर रुख कर रहे थे, तब सर पर भारी ईनाम के बावजूद वे भोजपुर के गांवों में थे और आपातकाल के खिलाफ उनके साथी गांव-गांव पोस्टर लगा रहे थे। कार्यकर्ता बताते हैं कि उन्होंने शिक्षा और वैचारिक अध्ययन पर भी हमेशा जोर दिया। चुने हुए जनप्रतिनिधि के तौर पर उन्होंने जो भूमिका निभाई, वह किसी भी ईमानदार और जनपक्षधर जनप्रतिनिधि के लिए प्रेरणास्रोत का काम करेगा। आज जबकि मुखिया तक के चुनाव में लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी उनके नेतृत्व में एक मुखिया से भी कम खर्च में उनकी पार्टी पूरे जिले में विधान सभा या लोकसभा का चुनाव लड़ती रही। 

जनता का मुखिया या जनता का विधायक कैसा होना चाहिए, का. रामनरेश राम इसके मिसाल थे। विकास योजनाओं में पारदर्शिता और उस पर जननियंत्रण की परंपरा वे हमें दे गए हैं। उन पर कमीशनखोरी या फंड के गबन का आरोप कभी नहीं लगा। उन्होंने सहार विधानसभा के हर गरीब टोले में सामुदायिक भवन और चबूतरे बनवाए। शायद इसके पीछे भी उनकी मंशा सामुदायिकता को मजबूत करना ही था। अनेक ऐसे गांव जो मुख्य सड़कों से कटे हुए उन गावों को मुख्य सड़कों से जोड़ने का काम आजादी के बाद पहली बार उन्होंने किया। विधायक होते हुए भी जनांदोलनों को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। उनके नेतृत्व में सहार की जनता ने सड़क और सोन नद में पुल को लेकर पंद्रह दिनों तक प्रखंड कार्यालय पर अनवरत घेरेबंदी की थी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सिंचाई की व्यवस्था को दुरुस्त करने पर खास ध्यान दिया। अपने इलाके में सांप्रदायिक सद्भाव कायम करने में भी उनकी अहम भूमिका रही। केंद्रीय कमेटी और पोलित ब्यरो सदस्य समेत वे भाकपा (माले) की कई उच्चतर जिम्मवारियों में रहे। वे अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के संस्थापक अध्यक्ष थे। वे माले विधायक दल के नेता भी थे।

सदियों में हासिल जनता के सामूहिक ज्ञान और न्याय के लिए होने वाले संघर्षों और परंपराओं के प्रति उनके भीतर बेहद सम्मान था। उन्होंने 1942 में लसाढ़ी में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन के दौरान शहीद हुए किसानों की स्मृति में भव्य स्मारक बनवाया। कुंवर सिंह समेत 1857 के महासंग्राम के शहीदों की याद जगदीशपुर में आयोजित ‘बलिदान को सलाम’ कार्य़क्रम के मुख्य उत्प्रेरक वही थे। भगतसिंह की जन्मशती पर आयोजित समारोह में स्वाधीनता सेनानी और भोजपुर किसान आंदोलन के साथी जनकवि रमाकांत रमता द्विवेदी के साथ वे शामिल हुए थे। का. रामनरेश राम सर्वहारा वर्ग की दृढ़ता और उसकी परिवर्तनकारी शक्ति के प्रति आस्था का नाम हैं। भ्रष्टाचार, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, कृषि की बदहाली, किसानों की आत्महत्या, मजदूरों की भुखमरी, महंगाई और बेरोजगारी की वाहक पतनशील राजनीति के इस दौर में वे एक ऐसी क्रांतिकारी जनराजनीतिक परंपरा हमें दे गए हैं, जिन पर भोजपुर ही नहीं, पूरे देश की जनता गर्व कर सकती है और उस राह पर चलते हुए परिवर्तन और इंकलाब की उम्मीदों को नई ऊंचाई दे सकती है।

10/10/11

जगजीत के ग़ालिब

















जगजीत सिंह नहीं रहे.

लोग-बाग़ उन्हें बेहतरीन कलाकार मानते हैं. खासकर यह कहते हुए कि उन्होंने ग़ज़ल सुनने वाला एक श्रोता-वर्ग तैयार किया. पर कुछ तो मेरी सुनने की समझ और कुछ उनके बेकार बयानात के चलते वे मेरे पसंदीदा कलाकार न थे. (मैं गलत हो सकता हूँ.) पर 'मिर्ज़ा ग़ालिब' की उनकी गायकी बेहतरीन है. श्रद्धांजलिस्वरूप सुनिए इसी अल्बम से कुछ चुनिन्दा गज़लें-