10/6/12

भोजपुरी के रंग, गिरिजा जी के संग

...तोहे ले के संवरिया निकल चलबे... 



     गिरिजा जी अप्रतिम गायिका हैं, नाज़ से भरी हुई, जिसे भोजपुरी में 'ठसक' कहते हैं. ठसक में निरा अभिमान नहीं है, न ही रुक जाने का बोध. यह अपने पर भरोसा करने वाले लिए कहा गया सबसे सुन्दर शब्द है. कभी आप गिरिजा जी को सामने बैठकर सुनिए, आपको इस शब्द के सभी मायने मूर्तिमान होते दिखने लगेंगें. यह ठसक अव्वल तो उनकी सुरसिद्धता से आती है, दूसरे खालिस बनारसीपने से. अपनी बोली-बानी के परिचित गीतों में जब वे शास्त्रीयता को घुला देती हैं तो रस अपने आप उनके गायन का पिछलग्गू बन जाता है. 

     एक दोस्त से बातचीत में इलहाम सा हुआ कि भोजपुरी में स्त्रियों के दुःख कहने की एक अद्भुत सामर्थ्य है. आज इसी सामर्थ्य को दर्ज करता राग मिश्र पीलू में गिरिजा जी का गाया यह दादरा सुनिए-

3 comments:

Arvind Mishra said...

आह वाह

सिद्धान्त said...

ये ठसक वाली बात बिलकुल सही जोड़े हैं भईया.

सिद्धान्त said...

पिछला कमेन्ट निहायत जल्दबाज़ी में पोस्ट हो गया. मुझे बाक़ायदे याद नहीं आ रहा है या हो सकता है यह मेरा निपट भ्रम भी हो, लेकिन क्या किसी फ़िल्म में भी ये गया गया था? इसका एक अपभ्रंश तो याद है मुझे, जो ऋचा शर्मा और सोनू निगम ने गाया था.

आपकी आत्मा तक इसके चलन से डर जाती है, इसका इल्म होना बहुत ही मुश्किल है कि आप सुन रहे हैं कि जी रहे हैं. इसे फ़िर-फ़िर याद दिलाने का बेहद शुक्रिया.