11/7/12

अकारी जी की याद-2

वे गोरख पाण्डेय, रमता जी, विजेन्द्र अनिल की धारा की एक कड़ी थे-  बलभद्र 


भोजपुरी के जनकवि दुर्गेन्द्र अकारी नहीं रहे। ये इन दिनों में अस्वस्थ चल रहे थे। 05 नवम्बर 2012 को इनका निधन हुआ। ये बिहार के भोजपुरी जिला के अकिलनगर एड़ौरा गाँव के थे। अकारी जी का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ नाम से प्रकाशित है। इनके गीतों में भोजपुर और बिहार के क्रांतिकारी किसान संघर्षों की अनुगूँजें हैं। ये अत्यंत गरीब परिवार के थे और जीवन-यापन के लिए इन्होंने कुछ दिनों तक गाँव में ‘बनिहारी’ (मजदूरी) भी की थी। दो सेर अनाज उस समय मजदूरी के रुप में मिलता था। दो सेर सवा किलो के बराबर होता है। अपने उन अनुभवों को अकारी जी ने अपने कई गीतों में आकार दिया है। अपने अनुभवों को सहज-सशक्त आकार देने के चलते ही इन्हें ‘अकारी’ नाम से लोग पुकारने लगे। इस नाम के पीछे एक रोचक प्रसंग भी है, जिसकी चर्चा बाद में की जाएगी। अकारी जी अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं-‘मत करऽ भाई बनिहारी तू सपन में’ (सपने में भी बनिहारी मत करो)। कवि ने फरियादी स्वर में एक गीत लिखा है-‘चढ़ते अषाढ़वा हरवा चलवलीं,/चउरा के बन हम कबहूँ ना पवलीं/जउवे आ खेंसारी से पिरीतिया ए हाकिम/कतना ले कहीं हम बिपतिया ए हाकिम।’ (अषाढ़ के शुरू होते ही हल चलाया। मेहनताना के रुप में चावल कभी नहीं पाया। जौ और खेंसारी ही मयस्सर हुआ। कहाँ तक अपनी विपत्तियाँ सुनाएँ।) अकारी जी का एक लोकप्रिय गीत है-‘बढ़ई लोहार धोबी रोपले बा आलू कोबी/ पेड़-पाता खड़ा ओकर फलवे नापाता/बतावऽ काका कहँवा के चोर घुसि जाता।’ (बढई, लोहार, धोबी ने आलू-गोभी की खेती की। ये गांव के अत्यन्त गरीब, पिछड़े व अल्पसंख्यक हैं। खेतों में पेड़-पत्ते तो ख़ड़े हैं पर फल गायब हैं। इन खेतों में कहाँ के चोर घुस जाते हैं।)
यह गीत इतना लोकप्रिय रहा कि गांवों में नाच-नौटंकी वाले भी इसे गाते थे और कई नाटक टीम के कलाकारों ने भी इसे अपने-अपने ढंग से जरूरत के मुताबिक गाया। देश में जो लूट-खसोट है बड़े पैमाने पर, सत्ता-प्रतिष्ठानों में जो भ्रष्टाचार है और शासक वर्ग द्वारा बार-बार यह झूठ प्रचारित किया जा रहा है निरंतर, कि सब सुरक्षित है, यह गीत इस लूट-खसोट, भ्रष्टाचार और झूठ को उजागर करता है। साथ ही साथ भारत की जो जटित जाति-संरचना है, जातियों के जो चरित्र और अंतर्विरोध हैं, उसकी भी इसमे शिनाख्त है और इस सिस्टम पर करारा व्यंग्य है।

अकारी जी का सम्बन्ध राजनीतिक रूप से भाकपा (माले) से रहा है। ये उसके सांस्कृतिक योद्धा थे। भोजपुर और बिहार के किसान- आन्दोलन के विभिन्न पड़ावों, प्रसंगों, घटनाओं और चरित्रों पर इनके गीत हैं। इनके गीतों में किसान-संघर्षों का इतिहास दर्ज है। इन्हें जेल भी जाना पड़ा है और जेल जीवन के अनुभवों को भी इन्होंने गीतों में उतारा है। इस तरह कि लोग बार- बार उनके मुँह से सुनना चाहते थे।
अक्षर-ज्ञान भर ही शिक्षा थी। गीतों में देखने में आता है कि हिन्दी और भोजपुरी के शब्दों और वाक्यों के प्रयोग से ये कहीं परहेज नहीं करते। भिखारी ठाकुर की तरह किसी-किसी गीत में दो लाइन हिन्दी में है और पूरा गीत भोजपुरी में। यह नौटंकी का शिल्प है। अकारी जी का संघर्ष समझौताहीन संघर्ष रहा। इनको और इनके संघर्ष को सलाम।

मैंने उनको बार-बार गाते हुए देखा- सुना था। वे ‘आत्म-आलोचना’ में विश्वास करते थे। पार्टी की बैठकों में ‘आत्म-आलोचना’ की जगह रहती है। साहित्य की विधा ‘आलोचना’ से परिचित होते हुए भी इन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उनके गीतों पर कौन क्या सोचता-कहता है ? उन्हें तो जन संघर्षों के लिए जीना था और उसी के लिए गीत रचने थे।

जन संस्कृति मंच का तेरहवाँ राष्ट्रीय सम्मेलन 03-04 नवम्बर 2012 को गोरखपुर में चल रहा था। यहाँ ‘जनभाषा- समूह’ के प्रारूप और कार्य-योजना पेश करते हुए मैंने आरा में अकारी जी पर एक कार्यक्रम करने और उन्हें सम्मानित करने का प्रस्ताव रखा था। यह कार्यक्रम हमलोग शीघ्र करते। पर अफसोस कि अकारी जी हमारे बीच से चले गए। हम उन्हें याद करते हैं और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। प्रो. बलराज पाण्डेय, प्रो. सदानन्द शाही, प्रकाश उदय, बलभद्र, आसिफ रोहतासवी, संतोष कुमार चतुर्वेदी, कृपाशंकर प्रसाद, राजकुमार, सुरेश काँटक, राधा, सुमन कुमार सिंह, जितेन्द्र कुमार, सुधीर सुमन, दुर्गा प्रसाद सिंह, आस्था सिंह आदि ने श्रद्धांजलि दी। 

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