11/1/12

भानु भारती का तुगलक़: नाटक के पीछे का नाटक


बिल्कुल इरादा नहीं था दिल्ली सरकार द्वारा सवा तीन करोड़ की खैरात से तैयार किए गए तुगलक नाटक की भव्य प्रस्तुति देखने का। आधी रात में दिल्ली लौटा था। दिन में आफिस में कई अधूरे काम निबटा रहा था, तभी एक लेखक मित्र का फोन आया- ‘चले जाओ तुगलक देखने, मेरे पास एक टिकट है, कुछ जरूरी काम है जिसके कारण मैं नहीं जा रहा हूं।’ तो अपन भी गए तुगलक देखने। गेट पर ही टिकट रख लिया गया कि किसने टिकट जारी किया है, जरा चेक करना है। खैर, मेहरबानी उनकी कि मुझे ससम्मान अंदर जाने दिया। अंदर जिस तरह के दर्शक वर्ग से टकराया, उन्हें देखकर यही लगा कि इन्हें कंटेंट से कम मतलब है, भव्य तमाशे का इन्हें ज्यादा इंतजार है। बगल में बैठे एक बुजुर्ग दर्शक ने दिलचस्पी से ब्रोशर में मुझे झांकते देख, उसे मुझे दे दिया। काफी कीमती और चमकदार ब्रोशर है, जिसमें दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का संदेश छपा है कि कामनवेल्थ की आशातीत सफलता के बाद चारों ओर से यह मांग थी कि दिल्ली के नागरिकों और आगंतुकों-अतिथियों के लिए दिल्ली उत्सव की परिकल्पना को जारी रखा जाए। 

मेरे सामने मुख्यतः तीन हिस्से में बंटा भव्य रंगमंच था, जिसे देखकर 1989 में आरा में मंचित 20 दिनों में तैयार और इससे कई-कई गुना कम लागत से तैयार नाटक ‘कामरेड का कोट’ का याद हो आई। बेशक ‘कामरेड का कोट’ की प्रस्तुति में इतनी लाइटें, कास्ट्यूम और साउंड सिस्टम का इस्तेमाल संभव न था। जितना धन दिल्ली सरकार ने एक नाटक के लिए दिया है, उतने में हमारी टीमें कई साल तक नाटक कर सकती हैं। खैर, इतने पैसे में भानु भारती ने जो चमत्कार दिखाया, मुझे नहीं लगता कि चमत्कार देखने गए लोग अगर किसी और के निर्देशन में भी इसे देखते तो उन्हें निराशा होती। बहुत सारे नौजवान निर्देशक हैं, जो कुछ ज्यादा ही चमत्कार दिखा सकते थे। 

निर्देशक ने जिसे ‘अतीत की वर्तमानता’ कहा है, अगर उसे इस तरीके से समझें कि तुगलक के सारे घोषित आदर्श और उसकी क्रूरताएं- दोनों राजसत्ता की रक्षा के लिए हैं, तो क्या आज के तुगलकों की भी इसमें तस्वीर नहीं है? मुझे तो इसमें हमारे देश के भविष्य का भी एक सुल्तान तुगलक बार-बार प्रतिबिंबित होता नजर आ रहा था। खैर, मेरे लिए अहम सवाल यह है कि जो वर्तमान के तुगलक हैं, वे ‘तुगलक’ के मंचन के लिए सवा तीन करोड़ रुपये देने की मेहरबानी क्यों कर रहे हैं? इतना ही नहीं, आरटीआई की जरिए इस पूरी प्रक्रिया की बारे में जानकारी की मांग करने वाले मेरे एक रंगकर्मी मित्र ने बताया कि इस सवा तीन करोड़ के अतिरिक्त प्रचार और बाहर से आने वाले कुछ दूसरे कलाकारों पर भी काफी धन खर्च किया गया है। यह सब तब है, जब कि इस देश में अब छोटे से छोटे कस्बे में एक नाटक मंचित कर पाना कलाकारों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। हाल और तमाम संसाधनों की कीमत बढ़ गई है। बेशक नाटक में एकाध जगह पर निर्देशक ने कलाकार के प्रतिरोध के लिए भी जगह निकाली है, बल्कि इसे उनकी अपनी पोजिशन का जस्टिफिकेशन भी कहा जा सकता है, इसके उपयुक्त पात्र अजीज धोबी हैं, जो धन और सत्ता को हासिल करने के लिए तरह-तरह का वेश बनाते हैं, डकैती और कत्ल भी करते हैं। उनके मुंह से यह सुनकर दर्शक तालियां भी बजाते हैं कि ‘खुल्लम खुल्ला लूट करो और लोग कहें कि हुकूमत है।’ 

क्या हम तुगलकों के प्रति संवेदनशील हो जाएं कि वे तो आदर्श राज्य ही कायम करना चाहते हैं, पर राजसत्ता की मजबूरियां उन्हें क्रूर या आज के संदर्भ में कहें कि भ्रष्ट बनाती हैं? क्या तुगलक जिस तरह अपने विरोधियों को सत्ता में हिस्सेदार बनाकर या उन्हें मारने के बाद उन्हें शहीद बनाकर जिस तरह अपनी छवि बनाने की कोशिश करता है, तुगलक का मंचन भी उसी तरह की एक कोशिश का परिणाम नहीं है? कहिए खुल्लम खुल्ला लूट करने वालों को हुकूमत, यही हुकूमत तो यह कहने के लिए अवसर दे रही है। ‘उत्सव की बेला है यह!’- मेरे शब्द नहीं हैं ये, शीला दीक्षित के संदेश की आखिरी पंक्ति हैं यह।


फिरोजशाह कोटला मैदान से बाहर निकलते ही यहां से हजार मील दूर बैठे एक रंगकर्मी से बातचीत होती है, जो जनता के लिए नाटक कैसे किया जाए, कैसे एक ऐसी रिपेटरी बने, जो सरकारी खैरातों के बल पर चलने को विवश न हो, इसके बारे में सोच रहे हैं। बस से जिस चौराहे पर उतरता हूं, वहां एक बच्चा और मजदूर से दिखने वाले दंपत्ति अचानक मेरे करीब याचक की मुद्रा में आ खड़े होते हैं। पुरुष बताता है कि पुणे से आया है, आनंदविहार के किसी ठेकदार ने बुलाया था, पर वह मिला ही नहीं, धोखा दे दिया, खाने के लिए पैसे नहीं हैं, मुझे लग रहा है कि यह जाल भी हो सकता है, पर उन्हें पैसे दे देता हूं। कहां सवा तीन करोड़ कहां सौ रुपये! कमरे में पहुंचता हूं, किसी टीवी चैनल से आवाज आ रही है, देश के सबसे बड़े बैंक ने फिर से आर्थिक स्थिति खराब होने को लेकर चिंता जाहिर की है। 

क्या तुगलक सिर्फ एक नाटक है, क्या तुगलकों की कोई कमी है, क्या अपनी अपनी दिल्ली से दौलताबादों की ओर आज भी जनता को नहीं हांका जा रहा है?









(सुधीर सुमन, युवा आलोचक, संपादक समकालीन जनमत)

2 comments:

उत्‍तमराव क्षीरसागर Uttamrao Kshirsagar said...

अंतत: सार्थक प्रश्‍न....

Ek ziddi dhun said...

अंधा युग के बाद यह तमाशा। वैसे तो एनएसडी भी तमाशाघर ही है।