11/6/12

बतावऽ काका, कहवाँ से चोर घुसल जाता... के कवि की स्मृति

जन-कवि श्री दुर्गेंद्र अकारी को जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि 

जनकवि को लाल सलाम !
6 नवम्बर, 20112, कल 05 नवंबर तड़के 6 बजे भोजपुर के किसान संघर्षों से निकले, उत्तर और मध्य बिहार की गरीब, भूमिहीन और दलित जनता के अत्यंत लोकप्रिय और जुझारू कवि दुर्गेंद्र अकारी ने अंतिम साँसें लीं. वे खुद इसी तबके से आते थे. जनता उनका अंतिम दर्शन कर सके, इसके लिए उनके शरीर को कल दोपहर भाकपा (माले) के आरा आफिस पर लाया गया, जहां अच्छी-खासी तादाद में लोगों ने इकट्टा होकर अकारी जी को अंतिम विदाई दी. 

मुक्तिबोध की कवि-जीवन के आरम्भ से ही यह चिंता थी कि, "मैं उनका ही होता/ जिनसे रूप भाव पाए हैं". नागार्जुन लगातार उनके ही होते चले गए जिनसे जनता का कोई कवि रूप और भाव पाता है. भोजपुर के नाभिकेंद्र से उत्पन्न और पूरे मध्य बिहार में 1970 के बाद भभक कर फैले जिस क्रांतिकारी किसान संघर्ष ने का. जीउत, सहतो, मास्टर साहेब और पारस जी (का. रामनरेश राम) जैसे समाज के निम्नतम समझे जानेवाले तबकों से उन्नततम विचार के क्रांतिकारियों को पैदा किया, उसी ने अपने जनकवि रमता जी, विजेंद्र अनिल और अकारी जी जैसों की कविता को भी पैदा किया. भोजपुर की इसी धरती को केंद्र करके नागार्जुन ने लिखा था, 'देखो जनकवि भाग न जाना/ तुम्हे कसम है इस माटी की'. जन संस्कृति मंच के संस्थापक महासचिव जनकवि गोरख पाण्डेय की जिद थी कि हम कवि-लेखक जिन किसान-मजदूर तबकों के लिए लिखते हैं, उन्हें ही हमारे लिखे का प्राथमिक श्रोता/ पाठक होना चाहिए. इसे गोरख ने खुद चरितार्थ किया. इस निकष पर भोजपुर के जो साहित्यकार सौ फीसदी खरे उतरे, उनमें अकारी जी का नाम अमिट है. 

अकारी जी का जन्म 1943 में हुआ. वे भोजपुर जिले के गांव एड़ौरा के रहनेवाले थे. बचपन से ही पितृ-विहीन अकारी ने हलवाही और मजदूरी की. गीतों के कारण पुलिस और गुंडों के कठिन आघात झेले और जेल भी काटी. फिर भी वह संघर्ष की अगली कतार में ही रहे. दिए गए प्रलोभनों को उन्होंने सदा ही ठुकराया और गरीबी से उबरने की कोशिश न करके गरीबों को उबारने की कोशिश करते रहे .

अकारी जी 74 के आंदोलन के साथ रहे, लेकिन '74 आन्दोलन की जन-आकांक्षाओं से दगा करने वालों को अपने गीतों में बक्शा नहीं. '74 के आन्दोलन के कई नामचीन नेताओं और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से व्यक्तिगत स्तर पर मित्रता होने के बावजूद अकारी जी ने उसका कभी कोई लाभ नहीं उठाया. उलटे सामंती ताकतों और सत्ता के खिलाफ उनके अपार लोकप्रिय गीतों की रचना की राह से उनको भटकाने के जो भी प्रलोभन सत्ता द्वारा दिए गए, उन्हें हिकारत के साथ उन्होंने ठुकराया. 

नक्सलबाड़ी की चिंगारी भोजपुर में गिरी और उससे जुड़े सवाल और संघर्ष के मुद्दे इनके गीतों में आने लगे. वे सामंतों और सरकार के खिलाफ गीत लिखने लगे. उन्होंने चंवरी, बहुआरा, सोना टोला आदि गांवों में पुलिस-सीआरपीएफ से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बहादुराना प्रतिरोधों और उनकी शहादतों की घटना को अपने गीतों में पिरोया. अपने गीतों में उन्होंने बिहार के धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान को दर्ज किया. किसान संग्रामियों का शौर्य, जनता के प्रति अगाध विशवास और ममता, सामंती उत्पीडन के प्रति रोष तथा सत्ताधारियों का पर्दाफाश, इन विषयों को अपनी मातृभाषा भोजपुरी में उन्होंने लगातार गीत लिखे जो जनता को उद्वेलित करते थे, साहस देते थे, उनके सुख-दुःख में साथ देते थे. उनके गीतों में भोजपुरी के कई दुर्लभ शब्द हैं पिछले साल ही सुधीर सुमन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बनारस में एक रैली में 1800 की किताबें बिक जाने को अपने जीवन की किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह याद किया . जहां पैसा और सुविधएं ही जीवन की श्रेष्ठता का पैमाना बनती जा रही हों, वहां इस 1800 की कीमत जो समझेगा, शायद वही इसके प्रतिरोध में नए जीवन मूल्य गढ़ पाएगा.

हां, बेशक अकारी जी धारा के विरुद्ध चलते रहे, जब लालू चालीसा लिखा जा रहा था तो उन्होंने' लालू चार सौ बीसा' लिखा. लुटेरों और शोषकों को पहचानने में कभी नहीं चूके. गांव में विभिन्न जातियों के यहां चोरी की घटना पर ‘बताव काका कहवां के चोर घुस जाता’ से लेकर बोफोर्स घोटाले पर ‘चोर राजीव गांधी, घूसखोर राजीव गांधी’ जैसे गीत लिखे. जब छोटी रेलवे लाइन बंद हुई, तो उस पर बड़े प्यार से जो गीत उन्होंने लिखा- 'हमार छोटको देलू बड़ा दिकदारी तू', वह जनजीवन के प्रति गहरे लगाव का सूचक है. उनके गीतों में इंकलाब के प्रति एक धैर्य भरी उम्मीद है. उनके गीतों में जो लड़ने की जिद है, चाहे जान जाए, पर चोर को साध् कहने और साध् को चोर कहने वाली इस व्यवस्था को हटा देने का उनका संकल्प है. समय समय पर उनकी गीत पुस्तिकाओं के अलावा जसम की ओर से 1997 में उनके चुनिंदा गीतों का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ प्रकाशित हुआ था .

अकारी जी का जाना किसानों-मजूरों के संघर्ष की भारी क्षति है, भोजपुरी भाषा और साहित्य की भारी क्षति है.

हम जन संस्कृति मंच की ओर से अकारी जी की स्मृति को लाल सलाम पेश करते हैं!

प्रणय कृष्ण, 
महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी 

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