12/14/12

पं. रविशंकर को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि



12 दिसंबर, 2012 के दिन सैन फ्रांसिस्को, अमरीका में महान सितारवादक पं. रविशंकर (मूल नाम रबिन्द्र शंकर चौधुरी) ने आखिरी साँसें लीं। 7 अप्रैल, 1920 को जन्मे रविशंकर ने 10 साल की उम्र से ही अपने बड़े भाई उदयशंकर की नृत्य-मंडली के साथ सारी दुनिया का भ्रमण शुरू कर दिया। 17 साल की उम्र में उन्होंने नृत्य कला से हटकर संगीत के प्रति पूरे तौर पर समर्पण का निर्णय लिया। 18 की उम्र से बाबा अलाउद्दीन खान से सितार की तालीम लेनी शुरू की।

 1941 में अन्नपूर्णा देवी से उनका विवाह हुआ। अन्नपूर्णा बाबा अलाउद्दीन खान की पुत्री तथा विख्यात सरोदवादक अली अकबर खान की बहन ही नहीं, बल्कि खुद एक महान सुरबहार वादक और संगीतकार हैं तथा प्रसिद्ध बांसुरी वादक हरिप्रसाद चैरसिया और सितारवादक निखिल चक्रवर्ती की गुरु भी। 1942 में दोनों के पुत्र शुभेंदु का जन्म हुआ, लेकिन दोनों का साथ अधिक दिन नहीं चल सका। 1940 के दशक में ही रविशंकर इप्टा के नजदीक आए। इन्हीं दिनों उन्होंने मैक्सिम गोर्की की कृति ‘लोवर डेफ्थ्स’ पर आधारित चेतन आनंद की हिंदी फिल्म ‘नीचा नगर’ का संगीत दिया। ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल’ में भी रविशंकर ने संगीत दिया। बाद को हिंदी फिल्मों में उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी की ‘अनुराधा’, त्रिलोक जेटली निर्देशित ‘गोदान’ और गुलजार की ‘मीरा’ का भी संगीत दिया, लेकिन फिल्म संगीत में उनकी शोहरत का आधार ‘अपू त्रयी’ के नाम से विख्यात सत्यजित राय की तीन फिल्मों-‘पथेर पांचाली (1955)’, ‘अपराजितो’ तथा ‘अपूर संसार’ में दिया गया संगीत ही है। 1982 में उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की ‘गाँधी’ के लिए भी संगीत दिया। 1949 से 1956 तक उन्होंने आकाशवाणी में बतौर संगीत निर्देशक काम किया। 1952 में रविशंकर की मुलाकात दूसरे विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों के सैनिकों की हौसला-अफजाई के लिए संगीत के कार्यक्रम देनेवाले विश्विख्यात वायलिनवादक तथा आर्केस्ट्रा कंडक्टर यहूदी मेनुहिन से हुई जिनके बुलावे पर 1955 में न्यूयार्क में उन्होंने अपना कार्यक्रम दिया। दोनों का साझा अल्बम ‘वेस्ट मीट्स ईस्ट’ नाम से बाद को निकला जिसे 1967 में ग्रैमी अवार्ड मिला। 1964 से 1966 के बीच रविशंकर अमरीका में 60 के दशक के तमान व्यवस्था-विरोधी युवाओं की पीढ़ी से जुड़े राक और जैज संगीत के नामचीन प्रतिनिधियों जार्ज हैरिसन, जॉन काल्तरें, जिमी हेंड्रिक्स आदि के साथ भी संगीत कार्यक्रम देते देखे जाते रहे। पश्चिम और पूरब की संगीत परम्पराओं के सम्मिश्रण के जिस ‘फ्यूजन म्यूजिक’ के आगाज का श्रेय पं. रविशंकर को जाता है, उसमें पूरब और पश्चिम के भीतर भी अनेक अंतर्धाराओं का शुमार है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में वे बड़े आराम से कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों का उत्कृष्ट सम्मिश्रण उसी तरह कर सकते थे जिस तरह पश्चिम के क्लासिकीय और लोक संगीत का भारतीय संगीत के साथ। 

भारतीय संगीत के विश्व-प्रसार, संगीत की मार्फत दुनिया भर के इंसानों के बीच खडी सरहदों के अतिक्रमण के साथ ही साथ इप्टा से आरंभिक दिनों में जुड़ाव, बांग्लादेश के रिफ्यूजियों के सहायतार्थ 1971 में न्यूयार्क में बाब डिलन, एरिक क्लैपटन, जार्ज हैरिसन आदि के साथ मिलकर रॉक कंसर्ट आयोजित कर करोड़ों डालर इकट्ठा करने की पहल तथा भारत में 1990-92 में बाबरी-मस्जिद ढहाए जाने के बाद कलाकारों के सांप्रदायिकता-विरोधी मोर्चे में शिरकत करके उसे मजबूती देने तक, उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम थे। भारत की और भारतीय संगीत की जिस गंगा-जमुनी तहजीब के वाहक उनके गुरु बाबा अलाउद्दीन खान जैसे महान संगीतज्ञ थे, उसकी नुमाइंदगी वे विश्व-स्तर पर ताजिन्दगी करते रहे। विगत 4 नवंबर को उन्होंने आक्सीजन मास्क लगाकर अपनी आखिरी प्रस्तुति दी थी।

1967 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1986 में वे राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुए तथा 1999 में भारतरत्न सम्मान से नवाजे गए। वे ऐसे संगीतकार रहे, जिन्हें जीवन में तीन बार ग्रैमी पुरस्कार मिला। मरणोपरांत उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी अवार्ड देने की घोषणा हुई है। 

मानवीय संस्कृति अत्यंत प्राचीन काल से ही मिश्रित रही है, संकरता संस्कृति का प्राण है, उसकी गति है, जबकि विशुद्धता पर अधिक जोर उसे गतिरुद्ध करता है। पं. रविशंकर का 92 साल का अद्वितीय कलात्मक जीवन इसी सत्य को प्रखरता से स्थापित करता है। विश्व-संगीत के तसव्वुर को व्यावहारिक स्तर पर चरितार्थ करने में उनका महान प्रयास सदैव स्मरणीय रहेगा। 

उन्हें जन संस्कृति मंच की विनम्र श्रद्धांजलि! 


-सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, 
जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

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