12/15/12

जगदीश मास्टर की शहादत के चालीस साल

जननायक, जनांदोलन और साहित्य



दिल्ली देखे जरा

हम तुम्हारी कथा
ले जा रहे राजधानी
टूटे-फूटे साथियों के संग
नहीं कोई बेमिसाल ढंग।

जननायक,
हम तुम्हारे चारण
तुम्हारे उदास साथियों की
लड़ाकू जिजीविषा से खोज के
तुम्हारी आवाज के बीज
रोप देना चाहते हैं हर ओर।

देखे जरा 
यह बेरहम 
राजधानी भी।

सुनो दिल्ली

दिल्ली में बैठे तुम
नहीं जान पाओगे
सबकुछ खत्म करने का जोम
क्या होता है
और तुम
कभी फर्क नहीं कर पाओगे
हत्या और हत्या के बीच का फर्क।

यह नाटक बंद करो
अब भी है वक्त
सुनो जमीन की धमक
जो लगती है 
अविश्वसनीय तुम्हें

सुनो!
फिर-फिर सुनो।


9 अक्टूबर 1998 को ट्रेन में मैंने ये दो कविताएं लिखी थीं। उस रोज हम दिल्ली में जसम के सम्मेलन में ‘मास्टर साब’ का नाट्य मंचन करके लौट रहे थे। ज्ञानपीठ ने मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी के एक पुराने बांग्ला उपन्यास का अनुवाद ‘मास्टर साब’ छापा था। इसके पहले जनवरी में हमलोग आरा में इस उपन्यास का तीन दिवसीय मंचन कर चुके थे, जिसमें दर्शकों की भारी मौजूदगी थी। चित्रकार राकेश दिवाकर ने नाटक के प्रचार के लिए बड़ी-बड़ी वाल पेंटिंग बनाई थी। लगभग तीस कलाकारों ने उस नाटक को किसी आंदोलनात्मक अभियान की तरह तैयार किया था।

उन दिनों बिहार में सत्ता के संरक्षण में जातीय-सांप्रदायिक घृणा से भरी एक निजी सेना गरीब-मेहनतकशों का जनसंहार कर रही थी। उसका सरगना मासूम बच्चों और बेगुनाह औरतों की हत्या को भी जायज ठहरा रहा था और जिनका जातिवादी-सामंती व्यवस्था और सत्ता के साथ रिश्ता था, वे साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनीतिकर्मी, समाजसेवी और नागरिक लोग आंदोलन करने वाले गरीबों और उनकी पार्टी पर ही अत्याचार करने का आरोप लगा रहे थे। बथानी टोला में दलित-मुस्लिम महिलाओं और बच्चों का नृशंस जनसंहार हुए डेढ़ साल बीत चुके थे। हम देख रहे थे कि साहित्य में सतही मध्यवर्गीय स्त्री-दलित विमर्श चलाने वाले किस तरह उस सरकार से पुरस्कार ग्रहण कर रहे थे, जो हत्यारों को खुलेआम संरक्षण दे रही थी। हम यह भी महसूस कर रहे थे कि किस तरह गरीबों का आंदोलन किसी अंधहिंसात्मक प्रतिक्रिया में न चला जाए, इसकी सचेत कोशिशें उसके नेतृत्व द्वारा चलाई जा रही हैं।

‘मास्टर साब’ का मंचन उसी दौर में हुआ और वह अपने आप में मानो गरीबों के आंदोलन पर किए जा रहे हमले का एक मजबूत वैचारिक-सांस्कृतिक जवाब था। 

मास्टर साहब के बारे में कब मैंने पहली बार जाना आज याद नहीं है। शायद किशोर उम्र में पहली बार मेरे एक मामा ने बताया था कि मधुकर सिंह ने ‘अर्जुन जिंदा है’ नाम का जो उपन्यास लिखा है, वह जगदीश मास्टर की जिंदगी पर आधारित है, कि उस उपन्यास को छिपाकर रखा जाता है, कि मास्टर जगदीश नक्सलाइट थे, कि उन्होंने सामंती उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव और महिलाओं पर किए जाने वाले अत्याचार का विरोध किया था। बाद में मैंने जब मधुकर सिंह की कहानियां पढ़ीं, तो कई कहानियों में जगदीश मास्टर के जीवन की छवि दिखाई पड़ी। जगदीश मास्टर उनके साथ ही आरा के जैन स्कूल में साइंस के शिक्षक थे। मुझे जगदीश मास्टर के एकाध शिष्य जो मिले, उन्होंने बताया कि वे छात्रों में बहुत लोकप्रिय थे। 

मास्टर साहब एक ऐसे बुद्धिजीवी थे, जिनका अपना लिखा हुआ हमारे पास कुछ नहीं है, हालांकि मधुकर सिंह बताते हैं कि वे अपनी डायरी में कविताएं लिखा करते थे। उनके बारे में जो दूसरों ने लिखा, वही आज हमारे पास है। आखिर वह क्या बात है कि शहादत के चालीस साल बाद भी मास्टर जगदीश हमें याद आते हैं और उनके द्वारा शुरू किया गया आंदोलन हमें अपनी ओर आकर्षित करता है? क्या यह सच नहीं है कि विचार जब जीवन में उतरता है, तभी वह ऊर्जावान होता है? और कलम का भी रिश्ता उस जीवन से जब बनता है तब उसमें भी ताकत आती है?

यह एक अद्भुत संयोग है कि मास्टर साहब के जन्म और शहादत की तारीख एक ही है। 10 दिसंबर 1935 को उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिले के एक गांव एकवारी में हुआ था। उनकी उम्र जब बारह साल हुई तो कहा गया कि देश आजाद हो गया। लेकिन जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई, उन्हें लगा कि गरीब खेतिहर मजदूरों और मेहनतकश किसानों को तो कहीं कोई आजादी और बराबरी हासिल ही नहीं है। उस सामंती माहौल में संघर्ष करते हुए वे शिक्षक तो बन गए, पर उन्हें लग रहा था कि समाज में बहुत बदलाव नहीं हुआ है, शोषण-उत्पीड़न उसी तरह बरकरार है। उन्होंने उस दौर में कई चेतनशील युवाओं के साथ आरा शहर में दलितों को संगठित किया। उनके साथियों में विभिन्न जातियों के नौजवान थे। इन लोगों ने हरिजनिस्तान की मांग के साथ एक बड़ी रैली की। लेकिन उन्हें बहुत जल्दी यह लग गया कि सामंतवाद इस रास्ते से खत्म नहीं होगा। वे रास्ते की तलाश में थे। इस बीच कम्युनिस्ट नेता रामनरेश राम सामंतों के धनबल को चुनौती देते हुए एकवारी के मुखिया बन गए थे। 1967 में जब वे सीपीआई-एम के उम्मीदवार के बतौर सहार विधानसभा से चुनाव लड़े तो उनके चुनाव एजेंट की जिम्मेवारी मास्टर जगदीश ने संभाली और उसी चुनाव में अपने ही गांव में सामंती शक्तियों द्वारा फर्जी वोटिंग का विरोध करने पर उन पर जानलेवा हमला हुआ, सामंती शक्तियों ने अपने जानते उन्हें मार ही दिया, लेकिन कई माह तक जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष में जिंदगी की जीत हुई। समाज को बदलने के लिए वे गांव लौटे। इस बीच नक्सलबाड़ी विद्रोह हो चुका था और उसकी चिंगारी संघर्ष का रास्ता तलाश रहे इन नौजवानों तक पहुंची और फिर उसके बाद जो समर शुरू हुआ, वह देश का सामंतवादविरोधी किसान संघर्ष और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास का एक शानदार अध्याय बन गया। जगदीश मास्टर, रामनरेश राम और रामेश्वर यादव की त्रयी के नेतृत्व में जो संघर्ष शुरू हुआ, वह भोजपुर आंदोलन के रूप में चर्चित हुआ और जनकवि नागार्जुन समेत अनेक साहित्यकारों ने इसका आह्लाद के साथ स्वागत किया। सत्तर के दशक में शासकीय दमन में मास्टर जगदीश के कई साथी शहीद हुए, यहां तक पुनर्गठित कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा-माले के महासचिव सुब्रत दत्त उर्फ जौहर भी पुलिस की गोलियों से भोजपुर में ही शहीद हुए। मास्टर साहब के साथी रामनरेश राम भूमिगत होकर उस संघर्ष को चलाते रहे, आंदोलन विभिन्न परिस्थितियों में अपने संघर्ष के तौर-तरीके बदलता रहा, पर गरीबों की राजनीतिक-सामाजिक दावेदारी का संघर्ष कभी थमा नहीं, यहां तक कि उसी सहार से रामनरेश राम 28 साल बाद जनता के प्रतिनिधि बने और जब तक जीवित रहे, कभी पराजित नहीं हुए। 

महाश्वेता देवी का उपन्यास चूंकि मास्टर साहब की जिंदगी पर केंद्रित है, इस कारण उसमें बाद के संघर्षों का जिक्र नहीं है, लेकिन बाद के संघर्षों में वह किताब भी किसी न किसी रूप में शामिल है। इस किताब की जब भी मैंने कोई प्रति ली, कोई न कोई इसे हमेशा के लिए लेकर चला गया और मुझे इससे खुशी होती रही। दिनेश मिश्र उस वक्त ज्ञानपीठ के निदेशक थे। दिल्ली आया तो उनसे कई बार मुलाकात हुई। अचानक एक दिन किताब पलटते वक्त उनका नाम देखा और उन्हें मैंने उन्हें बधाई दी ज्ञानपीठ से इस किताब के प्रकाशन के लिए। कौन कहता है कि किताबों का प्रभाव नहीं होता? मेरे सारे साथी इस किताब से प्रभावित रहे हैं। इसका जब मंचन हुआ, तो मास्टर साहब की भूमिका मुझे ही निभाने का मौका मिला और इस नाते भी उनके आंदोलन के गहरे असर में आज भी हूं। मास्टर साहब तो अपने एक साथी रामायण राम के साथ 10 दिसंबर 1972 को ही शहीद हो गए। लेकिन वे संघर्षशील जनता के लिए हमेशा लीजेंड बने रहे, जनता ने उन्हें कभी विस्मृत नहीं किया। शासकीय हिंसा का प्रतिरोध और उसकी हर रणनीति का माकूल जवाब देने के लिए संघर्ष के उपयुक्त तरीके को अपनाना भोजपुर आंदोलन की खासियत रही है। 

‘मास्टर साहब’ और ‘अर्जुन जिंदा है’ ही नहीं, बल्कि कई अन्य उपन्यास और कहानियां जगदीश मास्टर की जिंदगी से प्रभावित रही हैं। हमने एक साल उनकी शहादत के मौके पर ‘साहित्य में जननायक’ विषय पर विचारगोष्ठी की थी, जिसमें इस तरह की कई रचनाओं की चर्चा हुई थी। बाद में उनके जीवन पर केंद्रित सुरेश कांटक का महाकाव्य ‘रक्तिम तारा’ प्रकाशित हुआ, तो उसके लोकार्पण के अवसर पर भी हमने साहित्य, जनांदोलन और जननायकों के रिश्ते पर बातचीत की। 

इस बार 10 दिसंबर 1972 को मास्टर साहब की शहादत की 41वीं वर्षगांठ के अवसर पर दो घटनाएं हुईं। एक तो आरा शहर में वर्षों से प्रतीक्षित मास्टर जगदीश स्मृति भवन के निर्माण का काम शुरू हुआ, जो भोजपुर आंदोलन से जुड़े इतिहास और दस्तावेजों का एक अर्काइव भी होगा, इसके निर्माण का काम जनसहयोग से ही आगे बढ़ रहा है, दूसरे भोजपुर जिला के बिहिया नामक प्रखंड के मुसहर समुदाय के उसी टोले में मास्टर जगदीश और रामायण राम के स्मारक का शिलान्यास किया गया, जहां गलतफहमी में गरीबों ने उनकी हत्या कर दी थी। हुआ यह था कि 40 साल पहले वे उस इलाके के एक जालिम सामंत का अंत करके लौट रहे थे और उस सामंत के हितैषी चोर और डाकू का शोर मचा रहे थे। पार्टी के उसूल के अनुसार गरीब जनता पर गोली चलाने का निर्देश नहीं था। रामायण राम ने मास्टर जगदीश को निकल जाने के लिए कहा, पर वे उन्हें अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए। मुसहर लोगों को अपना वे परिचय दे पाते, उसके पहले ही उनकी लाठियों से उनकी मौत हो गई। बाद में जब उन लोगों को पता चला तो वे गहरे शोक में डूब गए। हालांकि शासकीय दमन में बहुत सारे नेतृत्वकारियों की शहादत के बावजूद आंदोलन अगर फिर से उभरा, और बार-बार पुनर्नवा होता रहा, तो उसकी नींव में ये गरीब ही रहे। फिर भी एक कसक तो इस समुदाय के भीतर रहती ही थी कि उन्हीं के हाथों मास्टर साहब की हत्या हो गई थी। 
40 साल बाद उसी समुदाय के दिनेश मुसहर ने जैसे उस कलंक को मिटा दिया। उन्होंने अपनी जमीन उनके स्मारक के लिए दी। स्मारक के शिलान्यास के मौके पर दिनेश मुसहर और उनकी पत्नी का चेहरा गर्व से भरा हुआ था। लगभग डेढ़ दशक पहले भी स्मारक बनाने की कोशिश की गई थी, जिसे पुलिस ने कामयाब नहीं होने दिया था। लेकिन इस बार न केवल स्मारक का शिलान्यास हुआ, बल्कि वहां जनसभा भी हुई। 

महाश्वेता देवी के उपन्यास के अंत में बूढ़ी दादी जो कथा सुना रही है, उसका अंत नहीं हुआ है, वह दास्तान अभी जारी है। हालांकि मरघट की शांति कायम करने की कई बार कोशिश की गई, पर जीवन है कि कभी हार नहीं मानता; बराबरी, इंसाफ और आजादी के सपने हैं कि जो हर दमन, झांसे और प्रलोभन को पार कर अपना वजूद बनाए रखते हैं। 

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