12/21/12

यह स्त्री के अस्तित्व पर हमला है: प्रो. मैनेजर पांडेय

पूरी दुनिया में हमारे देश और समाज की बेहद शर्मनाक स्थिति होती जा रही है: 
प्रो. मैनेजर पांडेय

जन संस्कृति मंच, नई दिल्ली: 19 दिसंबर 2012


जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय ने दिल्ली में गैंगरेप की बर्बर घटना पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि सरकार और समाज दोनों को गंभीरता से यह सोचना होगा कि वे कैसे इस तरह के कुकृत्य को खत्म करेंगे. इस देश में स्त्रियों के विरुद्ध अत्याचार, हिंसा और बलात्कार की घटनाएं पहले से भी अधिक बढ़ती जा रही हैं। खुद सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में अत्याचार और बलात्कार की सबसे ज्यादा घटनाएं घट रही हैं। प्रशासन और सरकार उन्हें सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल हैं। समाज के हर तबके और हर वर्ग की स्त्रियों और बच्चों के प्रति ज्यादती और नृशंसता की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी हैं। जबकि किसी भी देश या समाज की सभ्यता का पैमाना यह है कि वहां स्त्रियों और बच्चों के साथ किस तरह का व्यवहार होता है, इस पैमाने पर पूरी दुनिया में हमारे समाज और देश की बेहद शर्मनाक स्थिति होती जा रही है।

उन्होंने कहा है कि गैंगरेप के दोषियों को तो सख्त सजा होनी ही चाहिए, लेकिन साथ ही बलात्कार, उत्पीड़न और हिंसा की तमाम घटनाओं के दोषी किस तरह दंडित किए जाएं, कानून और पुलिस प्रशासन की गड़बडि़यों या सामाजिक-राजनीतिक संरक्षण के कारण उनके बच निकलने की घटनाओं पर अंकुश कैसे लगाया जाए, इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, क्योंकि दोषियों के बच निकलने से भी इस तरह की मानसिकता वालों का मनोबल बढ़ता है।

रविवार 16 दिसंबर को फिजियोथेरपी की छात्रा के साथ उस प्राइवेट बस में जिस बर्बरता के साथ गैंगरेप किया गया और उसके यौनांगों में लोहे के रॉड से हमला किया गया, उसके विवरण काफी दिल दहलाने वाले और चिंतित करने वाले हैं। यह सिर्फ बलात्कार नहीं, बल्कि आजादी और बराबरी के साथ जीने की आकांक्षा रखने और अपने सम्मान के लिए प्रतिरोध करने वाली स्त्री के अस्तित्व पर ही वहशियाना हमला है। इसे किसी भी कीमत पर बर्दास्त नहीं किया जा सकता। इस वहशियाना कृत्य के बाद युवक-युवतियों, छात्र-छात्राओं, विभिन्न वर्गों और तबकों के लोगों का जो गुस्सा सड़कों पर उभरा है, उस गुस्से को उस बेहतर समाज के निर्माण की ओर मोड़ना होगा, जहां कोई भी स्त्री किसी भी वक्त अपनी इच्छा से किसी के साथ कहीं भी आ जा सके, जहां उसे मौजमस्ती का वस्तु समझकर कोई उत्पीडि़त या दमित न करे, जहां उसकी स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय और समानता के अधिकार पर कोई हमला न हो। जो पुलिस अधिकारी, नौकरशाह, राजनीतिक पार्टी, राजनेता या सरकार स्त्रियों की इन अधिकारों का समर्थन नहीं करते और उल्टे उन्हें ही सामंती-पूंजीवादी पितृसत्तात्मक समाज की कोढ़ से पैदा हो रहे अपराधियों से बच कर रहने की नसीहत दे रहे हैं, जो यह उपदेश दे रहे हैं कि वे किस तरह का कपड़ा पहने, किस वक्त कहां आएं-जाएं, उन्हें भी उनके पद से हटाया जाना चाहिए।

प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा है कि बलात्कार और उत्पीड़न को झेलने वाली स्त्री को ही जब गलत बताया जाता है, तो उससे बलात्कारियों का मनोबल बढ़ता है। एक बलत्कृत को क्यों अपनी इज्जत को लेकर अपराधबोध पालना चाहिए, बल्कि उस समाज को अपनी इज्जत के बारे में सोचना चाहिए कि क्या वह खुद किसी इज्जत लायक है, जहां इस तरह की घटनाएं घटती हैं। उस समाज को खुद को बदलने के बारे में सोचना ही होगा, जहां एक ओर खाप पंचायतें इज्जत के नाम पर अपना जीवनसाथी चुनने वाले लड़कियों और लड़कों की हत्या करती हैं और जहां दूसरी ओर देश की राजधानी दिल्ली में स्त्रियों के आखेट में घुमते लोग लगातार रेप, हिंसा और हत्या को अंजाम देते रहते हैं। प्रो. पांडेय ने कहा है कि पुलिस, न्यायपालिका और विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं में बैठे स्त्री विरोधी लोगों के विरुद्ध भी संघर्ष करना वक्त की जरूरत है। यह अजीब है कि बलात्कार की घटनाएं जिस दौर में बढ़ती जा रही है उसी दौर में न्यायालयों से इन मामलों में दोषियों को दंडित करने की दर पहले से लगभग आधी हो गई है। बलात्कार की परिभाषा में भी खोट है, लोहे के रॉड, बोतल या किसी अन्य वस्तु से यौनांगों पर किए गए प्रहार को बलात्कार नहीं माना जाता, जबकि इसके लिए तो और भी कठोर सजा होनी चाहिए। बलात्कार की परिभाषा में बदलाव, चिकित्सीय जांच के प्रति तत्परता और पुलिस की जवाबदेही को सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

प्रो. पांडेय ने कहा कि वे संसद में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज्य के इस कथन से कतई सहमत नहीं हैं कि जिस लड़की का गैंगरेप हुआ, अगर वह बच भी गई तो जीवन भर जिंदा लाश बनकर रह जाएगी। सवाल यह है कि क्यों वह जीवन भर जिंदा लाश बनकर रहेगी? उसका गुनाह क्या है? जीवन भर जिंदा लाश बनकर अपराधियों को क्यों नहीं रहना चाहिए? वह बहादुर लड़की है, उसने तो जान पर खेलकर वहशियों का प्रतिरोध किया है, इस तरह के प्रतिरोध और समाज में पूरी स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जीने के स्त्री के अधिकार का तो खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। उसके जीवन की रक्षा हो और पूरे स्वाभिमान के साथ वह इस समाज में रहे, इसकी हरसंभव कोशिश और कामना करनी चाहिए।


सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

No comments: