12/15/12

जहरीली शराब कांड: पीने वाले दोषी हैं या बेचने वाले


(आज 15 दिसंबर को बिहार में अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा और  भाकपा-माले की ओर से शराबबंदी की मांग को लेकर चक्का जाम आंदोलन हो रहा है और शाहाबाद बंद का आह्वान किया गया है। हिंदकेशरी यादव, देवेन्द्र यादव सरीखे समाजवादी  धारा के कुछ नेता इस आन्दोलन में शामिल हैं. अन्य वामपंथी दलों ने भी इसका समर्थन किया है.  6 से 10 दिसंबर को शाहाबाद क्षेत्र के भोजपुर जिला मुख्यालय आरा में तीस से अधिक लोग जहरीली शराब से असमय मौत के शिकार हो गए। इसके पहले इसी साल के शुरू में शाहाबाद क्षेत्र के ही भाकपा-माले के रोहतास जिला सचिव भैयाराम यादव की हत्या सत्ता संरक्षित अपराधियों ने कर दी थी। उन्होंने शराब भट्ठियों के खिलाफ जनांदोलन का नेतृत्व किया था। पिछले कुछ महीनों में बिहार में विभिन्न जगहों से शराब की व्यापक बिक्र्री के खिलाफ जनप्रतिवाद की घटनाएं सामने आने लगी हैं। आरा के बाद गया में हुई जहरीली शराब से मौतों के बाद शराबबंदी को लेकर फिर से बहस शुरू हो गई है। लेकिन इस बीच मुख्यमंत्री का जो बयान आया उसमें मृतकों के प्रति शोक संवेदना के बजाए कारोबार के तर्क केंद्र में थे। कल मुझे पता चला कि जिला प्रशासन संस्कृतिकर्मियों को लेकर गरीबों के बीच शराब न पीने के लिए जागरूकता अभियान चला रहा है यानी गांव-गांव तक फैले शराब बिक्री के नेटवर्क को खत्म करने के बजाए ये सुधार कार्यक्रम के जरिए स्थिति पर काबू पाना चाहते हैं। यहां पेश है जनमत, दिसंबर में प्रकाशित हो रही एक लंबी टिप्पणी का अंश।)


न भोजपुर में यह पहली घटना है न बिहार में, जब जहरीली शराब पीने से गरीब मजदूर लोग मरे हैं। इसके पहले भी इसी साल अरवल, छपरा और मुजफ्फरपुर जिलों में इस तरह की मौतें हो चुकी हैं। ३-४ मौतों पर पर्दा डाल देना तो प्रशासन के लिए बहुत आसान होता है। कुछ लोग आरा की घटना को शराब के सरकारी डिपो के बंद होने से जोड़ रहे हैं कि इसी कारण अवैध शराब के कारोबारियों को मौका मिला। कुछ सुधारवादी लोग मृतकों को ही दोषी ठहरा रहे हैं कि उन्होंने शराब क्यों पीया। एक युवक ने बताया कि जो गरीब-मेहनतकशों के इलाके हैं वहीं शराब की भट्ठियां और दुकानें ज्यादा मौजूद हैं। उदाहरण के लिए उसने कुछ इलाकों का जिक्र भी किया। लेकिन असल मामला यह नहीं है कि सरकारी डिपो बंद होने के कारण अवैध कारोबारियों को आरा में मौका मिल गया, बल्कि जिस तरह नितीश कुमार की सरकार और प्रशासन ने शराब बेचने की खुली छूट दे रखी है, उससे बिक्री के बहुत बड़े हिस्से पर अवैध कारोबारियों का कब्जा बना है। जाहिर है इस कमाई में सबका अपना अपना हिस्सा होता होगा। बिहार में शराब की खपत इसलिए नहीं बढ़ी कि अचानक उसकी मांग बढ़ गई थी, बल्कि उसे सर्वसुलभ बनाकर दैनिक जरूरत की तरह बनाया गया है। उसे एक ऐसे जबर्दस्त मुनाफे के धंधे की तरह विकसित किया गया है, जिसमें गांव और मुहल्लों के जनप्रतिनिधि और दबंग तक शामिल हैं।

यह शासकवर्गीय ट्रैप है, जिसमें गरीब धनपिशाचों की स्वार्थलिप्सा की भेंट चढ़ रहे हैं। अखबारों में प्रकाशित आंकड़ों का यकीन करें तो जितनी सरकारी शराब की खपत है उससे 8 गुना अधिक शराब लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल है कि बाकी शराब की आपूर्ति कौन कर रहा है? कुछ साल पहले सरकार के ही एक मंत्री जमशेद अशरफ ने जब उत्पाद विभाग पर माफियाओं के कब्जे और राजस्व के भारी नुकसान की बात की थी, तो उन्हें अपने मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था। बिल्कुल साफ है कि अवैध शराब के कारोबार से जुड़े माफियाओं के हाथ कितने लंबे हैं। अभी हाल में एक बुजुर्ग नेता और पूर्व मंत्री हिंदकेशरी यादव पर इसी तरह जहरीली शराब से हुई दस लोगों की मौत और इस कारोबार को मिल रहे पुलिसिया संरक्षण के विरोध के कारण मुजफ्फरपुर के आयुक्त कार्यालय के हाते में शराब माफियाओं ने जानलेवा हमला किया था। यह सब उनके बढ़े हुए मनोबल को ही दर्शाता है।

शर्मनाक यह है कि एक ओर गरीब, महादलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं की मौत हो रही थी और दूसरी ओर सुशासन का दावेदार हुकूमत के नशे में डूबा हुआ था। छह दिसंबर की रात से नौ दिसंबर की रात तक लोग दम तोड़ते रहे, पर नीतीश कुमार चुप्पी साधे रहे। जब उनकी चुप्पी टूटी, तब भी उनकी जुबान पर मृतकों के प्र्रति शोक संवेदना के बजाए कारोबार के तर्क थे। वे बता रहे थे कि व्यक्तिगत तौर पर वे शराबबंदी के पक्षधर हैं, पर शराबबंदी व्यावहारिक नहीं है। वे शराबबंदी वाले राज्यों का हाल देखने का सुझाव दे रहे थे। गरीबों के प्रति उदासीनता, निर्ममता और माफियाओं के प्रति यारी के तौर पर इस बयान को क्यों न देखा जाए? जिस वाकये पर एक राज्य के मुखिया को शर्मिंदा होना चाहिए था, वह उसे नजरअंदाज करके यह दावे कर रहा था कि उसके शासन में शराब से कितना राजस्व बढ़ गया है। वे शान से कह रहे हैं कि पहले तीन सौ करोड़ राजस्व आता था और अब दो हजार करोड़ आता है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि पीने वालों की संख्या नहीं बढ़ी है। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि पहले से ही लोग शराब के आदी रहे हैं, वे उन तक ही शराब पहुंचा रहे हैं, क्या उपकार का भाव है! वे उपकार भी इसलिए कर रहे हैं कि उन्हें मालूम है कि पीने वाला पिएगा ही और चूंकि उनकी माने तो चैकसी के बाद भी अवैध शराब बनती ही है, तो बेहतर है लोग सरकारी शराब पीएं। इस तरह पूरी शातिरपन के साथ वे यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि शराब की जो खपत बढ़ी है, उसमें उनके शासन या नीति का कोई दोष नहीं है। यह सही है कि दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल और शराबबंदी वाले राज्य गुजरात में भी पिछले वर्षों में जहरीली शराब से मौतें हुई हैं। लेकिन किसी भी राज्य में शराब बेचने की वैसी वकालत नहीं की गई है, जैसी बिहार में नीतीश कुमार करते रहे हैं। अगर अवैध सरकार की बिक्री होती है और लोग उससे मरते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि इसे स्वाभाविक चीज मान लिया जाए। 

अभी कुछ माह पहले की ही बात है जब उन्होंने मंच से बोला कि शराब के पैसे से ही वे साइकिल बांट रहे हैं, हालांकि यह भी झूठ ही था, तब मुजफ्फपुर की लड़कियांे ने जिलाधिकारी के समक्ष प्रदर्शन किया था कि हमें शराब के पैसे से साइकिल नहीं चााहिए। सवाल यह है कि जिस राज्य का मुख्यमंत्री इस तरह शराब बेचने को जायज ठहराता हो, राजस्व बढ़ाने का तर्क देता हो, वहां शराब बेचने वालों का मनोबल क्यों नहीं बढ़ेगा! गंभीर सवाल यह भी है कि क्या अन्य दूूसरे नशीले पदार्थों को बेचने से राजस्व बढ़ेगा तो उसे भी कोई सरकार राजस्व बढ़ाने के तर्क से बेचेगी? तब तो हिरोइन, गांजा, ब्राउन सुगर, अफीम- सबकी बिक्री करवानी चाहिए और उनके निषेध के लिए एक विभाग भी बना देना चाहिए! आखिर उनका अवैध कारोबार भी तो बंद नहीं हुआ है। उनका सेवन करने वाले भी तो इस समाज में हैं। 

सच जो है वह साफ-साफ दिख रहा है कि शराब बिहार के शहरों में ही नहीं, गांवों में भी धड़ल्ले से बिक रही है। पहले से ज्यादा दूकानें खुल गई हैं। नीतीश कुमार के शासन में उसकी सहज उपलब्धता के कारण ही शराब का सेवन बढ़ा है। ठीक से पड़ताल की जाए तो जो वैध शराब के अड्डे बताए जा रहे हैं, वहीं से अवैध कारोबार भी चलता है। बात-बात में कानून के राज का जुमला इस्तेमाल करने वाले नीतीश कुमार को यह मालूम होना चाहिए कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में सुनाए गए एक फैसले में कहा था कि केंद्र और राज्यों की सरकारें संविधान के 47 वें अनुच्छेद पर अमल करें और जिसमें शराब की खपत को धीरे-धीरे घटाना सरकार का कर्तव्य बताया गया है। लेकिन नीतीश बाबू को सर्वोच्च न्यायालय के किसी फैसले की क्यों परवाह होगी? वे न्याय के साथ विकास जो कर रहे हैं!

कोई जरा पड़ताल तो करे कि समाज में वे कौन सी मानसिक और आर्थिक परिस्थितियां सरकारों ने पैदा की है, जिसके कारण लोग जानलेवा तरीके से शराब का सेवन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अपराध शराब पीने वाले कर रहे हैं या उन्हें शराब के आदी बनाने और उन्हें मौत की ओर धकेलने वाले? यह किससे राजस्व वसूल कर रहे हैं नीतीश कुमार? 200 एमएल के एक पाउच की कीमत सत्रह रुपये है, जो सरकारी आंकड़े के अनुसार सत्तर प्रतिशत भारतीयों के औसत दैनिक आय के आसपास है। यह तो एक तरह खून पसीने से कमाई गए पैसे को लूटने का खेल है, यह तो गरीबों के रक्त चूसने की तरह है। आज तो वे जहरीली शराब पीकर मर गए, पर अगर नहीं भी मरते तो धीरे-धीरे उनका रक्त तो चूसा ही जाता। सामान्य मौत से पहले तो वे मर ही रहे हैं, जिसका कोई आंकड़ा और सर्वेक्षण कहीं नहीं है, आंकड़ा है तो बढ़ते राजस्व का। 

दिलचस्प यह है कि अवैध शराब का बड़े कारोबारी जिनके वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन और दूसरी शासकवर्गीय पार्टियों से गहरे रिश्ते हैं, उन्होंने महादलित और दलित बस्तियों को ही अपने कारोबार का केंद्र बना रखा है। क्या महादलित या दलित बस्तियों को मदिरामुक्त करने का अभियान अंततः उन्हीं राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ नहीं होगा, जिनको कहा जा रहा है कि वे विकासवादी हो गई हैं और शराब की बिक्री जिनके विकास का बहुत बड़ा आधार बना हुआ है। भोजपुर के बगल के जिले रोहतास में भाकपा-माले के जिला सचिव भैयाराम यादव, जिनकी जद-यू से जुड़े अपराधियों ने इस साल के शुरू में हत्या कर दी थी, उन्होंने शराब भट्ठियों के खिलाफ आंदोलन का भी नेतृत्व किया था। हिंदकेशरी यादव पर हमला हाल का मामला है। 

आरा के बाद गया की दो भूंईटोलियों में भी 10 लोगों की जहरीली शराब से पीने की खबर आई। शराब भट्टियों के खिलाफ पिछले महीनों में धीरे-धीरे लोगों का आक्रोश सामने आने लगा है। कई जगह भट्ठियां तोड़ी गई हैं। महिलाओं की ओर से शराब के कारोबार का विरोध हो रहा है। 11 दिसंबर को आरा में महिला संगठन ऐपवा के बैनर तले महिलाओं ने जिलाधिकारी के समक्ष प्रदर्शन किया और जब उनके कर्मचारियों ने झूठ बोला कि जिलाधिकारी नहीं हैं, तो महिलाएं समाहरणालय का गेट तोड़कर उनके चंेबर तक पहुंच गईं और जिलाधिकारी प्रतिमा वर्मा को उनकी मांगों को सुनना पड़ा। आरा रेलवे स्टेशन के पास झोपड़पट्टी में भी महिलाओं के क्षोभ और गुस्से को महसूस करते हुए भी मुझे लगा था कि वे नीतीश बाबू के राजस्व बढ़ाने के तर्क से सहमत नहीं हैं, वे शराब की धड़ल्ले से हो रही बिक्री को बंद कराना चाहती हैं। 

भाकपा-माले पोलित ब्यूरो सदस्य स्वदेश भट्टाचार्य ने ठीक ही कहा कि बिहार की बर्बादी के आधार पर बिहार का राजस्व बढ़ाने की बात जनता के साथ धोखा और गरीबों के प्रति बेरूखीपन है। जनता को यह हक है कि वह जरूरी समझे तो सरकारी लाइसेंस वाली दूकानों को भी बंद करवा दे। इस सरकार में गांव-गांव में सामंती, माफिया, अपराधी और दबंग ताकतों को बढ़ावा दिया गया है, उन्हीं के जरिए शराब का कारोबार भी चल रहा है। कुछ भी करने का लाइसेंस तो सरकार ने शराब माफियाओं और भूमाफियाओं को ही दे रखा है। बिहार का विकास खेती और उद्योग के विकास से होगा, यहां के लोगों की मानसिक-शारीरिक क्षमता के उचित उपयोग से होगा, न कि शराब से।

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