10/26/12

कुबेर दत्त स्मृति समारोह की रपट


 कुबेर दत्त मीडियाकर्मी और लेखक की भूमिकाओं को  अलग-अलग नहीं मानते थे   


गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में 20 अक्टूबर को कवि, चित्रकार और दूरदर्शन के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की याद में जन संस्कृति मंच की ओर से एक आयोजन किया गया। पिछले साल 2 अक्टूबर को कुबेर दत्त का आकस्मिक निधन हो गया था। काल काल आपात, कविता की रंगशाला, केरल प्रवास, धरती ने कहा फिर..., अंतिम शीर्षक उनके प्रकाशित कविता संग्रह हैं। जीवन के आखिरी दस वर्षों में उन्होंने अनेक पेंटिंग भी बनाए, जिनमें से कई पत्रिकाओं और किताबों के कवर पर भी छपीं। कुबेर दत्त ने दूरदर्शन के माध्यम से आम अवाम को न केवल अपने देश के श्रेष्ठ जनपक्षीय साहित्य और कलात्मक सृजन से अवगत कराया, बल्कि दुनिया के महान साहित्यकारों और कलाकारों से भी परिचित कराया।

आयोजन की शुरुआत कुबेर जी की जीवनसाथी कमलिनी दत्त द्वारा उनके   जीवन और रचनाकर्म पर केंद्रित वीडियो की प्रस्तुति से हुई। कुबेर दत्त और कमलिनी दत्त की जोड़ी साहित्य, कला और प्रसारण की दुनिया की मशहूर जोड़ी रही है। कुबेर दत्त ने तो कमलिनी जी के बारे में कई जगह लिखा है, पर कमलिनी जी ने पहली बार इस आयोजन में कुबेर जी के बारे में अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि कुबेर के बारे में बोलना मेरे लिए सबसे ज्यादा मुश्किल है, उतना ही जितना एक तूफान को मुट्ठी में बंद करना। कुबेर मेरे लिए क्या थे, मैं क्या बताऊं, जीवनसाथी, अंतरंग सखा, आपत् स्तंभ, एक सच्चा कामरेड! कुबेर मितभाषी थे- रूपवान थे- लेकिन जिस गुण ने मुझे प्रभावित किया वह था उनका जीवन और सृष्टि के प्रति समरसता का बोध। जीवन और जीव में फरक न करना, इनसान चाहे परिचित हो, अपरिचित हो, चपरासी हो, पानवाला, चायवाला, कार्यालय के साथी, कलाकार, साहित्यकर्मी, सबसे एक जैसा मधुर व्यवहार। अपने उच्चाधिकारी के प्रति सम्मान रखते हुए भी सीधा स्पष्ट दो टूक व्यवहार उन्हें कभी-कभी अप्रिय भी बनाता था। कार्यक्षेत्र में सामंतवाद किस कदर व्याप्त है आप सब जानते हैं। मैं  अपने शुरू के कार्यकाल में अत्यंत भीरु थी। कुबेर ने धीरे-धीरे मुझे निडर बनाया। मेरी नववर्ष की डायरी में लिखा- संघर्ष ही जीवन है, विवशताओं से घबराना कायरता है। यह मेरे जीवन का सूत्र वाक्य बन गया। कुबेर की विचारधारा के प्रति निष्ठा उनके सभी कार्यकलापों का दिशानिर्देश करती थी। वे इस हद तक निडर थे जिस हद तक किसी सरकारी कर्मचारी के लिए होना संभव नहीं था। आपातकाल के दौरान सरकारी नीतियों के विरुद्ध अपने कार्यक्रमों में लिखते थे और स्वयं बोलते भी थे। वरवर राव, गदर जैसे क्रांतिकारियों के साथ बातचीत प्रसारित करने से भी कुबेर डरे नहीं। वे इस संबंध में स्पष्ट विचार रखते थे कि कार्यक्रम दर्शकों के लिए बनता है, सरकार या अधिकारियों के लिए नहीं। 

कमलिनी दत्त द्वारा प्रस्तुत वीडियो में अपने गांव से कुबेर दत्त का लगाव, उनका बिल्ली प्रेम, उनके जीवन के कई दुर्लभ फोटोग्राफ्स और प्रेमचंद, महादेवी, किशोरीदास वाजपेयी पर बनाए गए कार्यक्रमों के अंश दर्शकों को देखने को मिले। कुबेर दत्त चित्र बनाते और कविताएं पढ़ते हुए भी नजर आए। 

जन संस्कृति मंच ने कुबेर दत्त के निधन के बाद आयोजित शोकसभा में उनकी स्मृति में हर साल साहित्य, संस्कृति और मीडिया से संबंधित विषय पर व्याख्यान आयोजित करने का निर्णय लिया था। इसी सिलसिले में साहित्य और जनमाध्यमविषय पर प्रथम कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि आज मीडिया का भूमंडलीकरण हो गया है, इसने अमेरिकीकरण को अच्छा मान लिया है। आज जैसा बड़ा मध्यवर्ग भारत में पहले कभी नहीं था। पश्चिम को संबोधित इस मध्यवर्ग का अपने समाज से कोई संबंध नहीं रह गया है। आज सूचनाओं की बमबारी ज्यादा हो रही है, संवाद कम हो रहा है। दैनिक अखबार भी उत्पाद में बदल गए हैं और टीवी की नकल कर रहे हैं। टीवी का मूल स्वभाव मनोरंजन हो गया है। राजनीति भी यहां मनोरंजन बन जाती है। मीडिया ने उपभोक्तावाद के आगे समर्पण कर दिया है। अब गरीबी हटाओ की जगह अमीरी बढ़ाओ उसका नया नारा हो गया है। मंगलेश डबराल ने कहा कि अभी भी भारतीय साहित्य का लेखक ज्यादातर निम्नमध्यवर्ग से आता है, उसकी टीवी चैनल में मौजूदगी नहीं है, अखबार में अब साहित्य हाशिए पर है। भावपूर्ण भाषा और विचारों की जगह विज्ञापनों की भाषा का जोर है। जिस तरह दिनमान जैसी पत्रिकाओं ने अच्छी फिल्म, कला और साहित्य के संस्कार दिए, आज वैसा नहीं है। भूमंडलीकरण से साहित्य और पत्रकारिता के बीच दूरी बढ़ी है। आज मास मीडिया क्षणिक शोहरत का एक उद्योग बन चुका है। ऐसे में सिर्फ साहित्य को समर्पित कोई चैनल हो, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। कुबेर दत्त द्वारा दूरदर्शन में साहित्य को लेकर किए गए काम को उन्होंने बेमिसाल बताया।

आयोजन के तीसरे खंड में कुबेर की दुनियापर बोलते हुए प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हिंदी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हमें कुबेर दत्त और कमलिनी दत्त दोनों की कला साधना पर विचार करना चाहिए। उनके जीवन के संकटों और संघर्षों पर भी ध्यान देना चाहिए। संस्कृति की दुनिया में ऐसा कोई दूसरा दंपत्ति दिखाई नहीं देता। कुबेर केवल चमचमाते हुए स्टार राइटरों के ही आत्मीय नहीं थे, बल्कि त्रिलोकपुरी और सादतपुर के साहित्यकारों से भी उनके गहरे आत्मीय संपर्क थे। कुबेर ने अपने काम के जरिए यह दिखाया कि एक प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी के लिए काम करने का स्पेस हर जगह है। 

जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि कुबेर दत्त दूरदर्शन मेे केवल वेतनभोगी कर्मचारी की तरह काम नहीं कर रहे थे। दूरदर्शन को उन्होंने जनवादी विचार और साहित्य-संस्कृति का माध्यम बनाया। केदारनाथ अग्रवाल की कविता पंक्तियों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मैंने उसको जब-जब देखा, गोली जैसा चलता देखा। उन्होंने खास तौर पर दो प्रसंगों को याद किया, कि किस तरह जब उन्होंने एक सभा में यह कहा कि लेखक जनता की आजादी के लिए लड़ता है, लेखक अगर किसानों की स्वतंत्रता के लिए नहीं लड़ता तो वह लेखक नहीं, तो भाषण के बाद कुबेर ने उन्हें गले से लगा लिया। इसी तरह जनाधिकार पर लिखी गईं कविताओं के एक कार्यक्रम में इमरजेंसी और इंदिरा गांधी के खिलाफ जो भी उन्होंने बोला, कुबेर ने उन्हें ज्यों का त्यों प्रसारित किया। उन्होंने कहा कि कुबेर कई कला विधाओं के संगम भी थे। 

अपने पिता को अत्यंत मर्मस्पर्शी ढंग से याद करते हुए युवा नृत्यांगना पुरवा धनश्री ने कहा कि उन्होंने सिखाया कि हर इंसान चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, प्रांत, भाषा, संस्कृति से हो, यूनिक है और इंसानियत, प्यार, श्रद्धा सबसे बड़ा धर्म है। बाकी अन्य पिताओं की तरह वे नार्मलपिता नहीं थे। उन्होंने अपनी कला के जरिए ही अपनी बेटी से ज्यादा संपर्क किया। यही उनका तरीका था। मैं उनका हाथ पकड़ना चाहती थी, उनके कंधे पर सर रखना चाहती थी, पर इसका स्पेस मुझे कम मिला। अक्सर मैंने उन्हें रातों में रोते हुए देखा। वे कहते थे कि मैं बुरा आदमी नहीं हूं, मुझे समझो। शायद उनके घाव मेरे घावों से ज्यादा गहरे थे। हर शाम वे घर आकर चंद लम्हें हमारे संग बांटते और फिर अपने कविखाने में चले जाते। फिर थोड़ी देर बाद अपनी कृति सुनाते या कोई चित्र दिखाते। उन शब्दों में मैं अपने पिता को ढूंढती और थक जाती ढूंढते-ढूंढते। पर आज मैं उन्हें महसूस करती हूं खुद में। 

अलाव पत्रिका के संपादक कवि राम कुमार कृषक ने कहा कि कुबेर दत्त का काम बहुआयामी है। वे प्रगतिशील जनवादी मूल्यों के समर्थक थे। कबीर से लेकर भगतसिंह तक भारतीयता की जो परंपरा बनती है, वे खुद को उससे जोड़ते थे। उपेक्षित और अभावग्रस्त लोगों की तकलीफों को लेकर वे बेहद संवेदित रहते थे। वे एक बड़े और जरूरी इंसान थे। 

कवि मदन कश्यप ने कहा कि कुबेर की दुनिया एक बड़ी दुनिया थी, वह एक साथ सृजन, विचार और प्रसारण की दुनिया थी। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह प्रतिरोध की दुनिया थी। सिर्फ अपनी ही नहीं, बल्कि सामूहिक सृजनात्मकता और विचार के लिए उन्होंने कैरियर को हमेशा दांव पर रखा। उनकी चिंताएं बड़ी थीं। एक वक्त में जब जनप्रतिरोध के विरुद्ध लोग एकताबद्ध हो रहे थे, तब कुबेर दत्त उन थोड़े लोगों में थे, जिन्होंने शासकवर्ग की अनुकूल धारा में बहने से इनकार किया, सरकारी माध्यम में रहते हुए भी प्रतिरोध की परंपरा के साथ खड़े रहे। मदन कश्यप ने जोर देकर कहा कि बहुत सारे ऐसे कवि लेखक हैं, जो कुबेर जी के कारण ही दूरदर्शन पर आ पाए, उनके वहां से जाने के बाद वे कभी नहीं बुलाए गए और भविष्य में भी उन्हें बुलाए जाने की कोई गारंटी नहीं है। 


चित्रकार हरिपाल त्यागी ने उनसे अपने लंबे जुड़ाव का जिक्र करते हुए कहा कि किसी को याद करना दरअसल उसे दुबारा खोजना होता है। जिस उम्र में लोग चित्रकला बंद कर देते हैं, उस उम्र में कुबेर ने चित्रकला शुरू किया। उन्होंने कहा कि कुबेर शहराती कभी नहीं बन पाए, गांव को वे कभी नहीं भूले, शायद यह भी एक कारण था जो उन्हें सादतपुर के साहित्यकारों से जोड़ता था। हरिपाल त्यागी ने यह भी बताया कि उन्हें राजनैतिक गतिविधियों के सिलसिले मंे कुबेर के गांव जाने का भी अवसर मिला था। 

कवि चंद्रभूषण ने नौजवानों से सहजता के साथ घुल जाने वाले उनके स्वभाव को याद करते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व तरल पारे की तरह था। उनको पकड़ना आसान नहीं है। वे नौजवानों की तरह निश्छल और निष्कवच थे। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है, जैसे कोई बहुत ही गहरी बात है, जिसे वे कहना चाहते हैं। उन्हीं की कविता के हवाले से कहा जाए तो भारत का जो जनसमुद्र है, उसकी सांस हैं उनकी कविताएं, जो उसकी तकलीफ को झेलते हुए लिखी गई हैं। 

कवि श्याम सुशील ने कहा कि कुबेर दत्त मीडियाकर्मी और लेखक की भूमिकाओं को अलग-अलग नहीं मानते थे। दोनों ही भूमिकाओं में उन्हें सृजन का आनंद मिलता था। उन्होंने हजारों चित्र बनाए और कविताएं लिखीं, जो कुछ सामने रहा, उसी पर चित्र बना डाला या कविताएं लिख दी। एक कागज के टुकड़े पर लिखी गई एक छोटी सी कविता को उन्होंने सुनाया-

पत्थर पत्थर मेरा
दिल है
पानी पानी तेरा दिल
पानी-पत्थर
जैसे मिलते
ऐसे ही तू मुझसे मिल।

श्याम सुशील ने कहा कि इस तरह की तमन्ना रखने वाले निश्छल हृदय कुबेर जी की कविताओं को पढ़ना, उनकी पेंटिंग और अन्य रचनाओं के बारे में सोचना या चर्चा करना उन्हें अपने आसपास महसूस करने जैसा है- इसलिए वे आज भी हमारे साथ हैं और अपनी रचनाओं के माध्यम से हमेशा रहेंगे। श्याम सुशील ने रमेश आजाद द्वारा कुबेर दत्त पर लिखित कविता- कुबेर दत्त की रंगशाला सेका पाठ भी किया। 

कुबेर दत्त के छोटे भाई सोमदत्त शर्मा ने उन पर केंद्रित अपनी कविता के जरिए उन्हें बड़े भावविह्वल अंदाज में याद किया। 

आयोजन के संचालक सुधीर सुमन ने कहा कि कुबेर स्मृति व्याख्यान का सिलसिला हर वर्ष जारी रहेगा। कुबेर दत्त हमारे लिए इस बात की मिसाल हैं कि जनपक्षधर होने की लड़ाई हर स्तर से लड़ी जानी चाहिए। वे अंधेरे के भीतर जिस रोशनी की आहट सुनने की बात करते थे, उन आहटों को सुनना, उन्हें अपनी रचनाओं में दर्ज करना और बेहिचक दमनकारी शासक संस्कृति व राजनीति के खिलाफ खड़ा होना आज भी बेहद जरूरी है। आज हत्याएं बहुत अनदेखे और अदृश्य तरीके से भी हो रही हैं, पर जैसा कि कुबेर जी ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में एक कविता में लिखा था- ....मेरे दिमाग में सुरक्षित विचारों ने मुझे मरने नहीं दिया था/ हत्यारा मेरे विचारों को नहीं मार पाया था, तो उन विचारों को मजबूत बनाने का संघर्ष और उसके प्रति यकीन बनाए रखना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनकी अप्रकाशित कविताओं और उनके रचनाकर्म के मूल्यांकन और उनसे संबंधित संस्मरणों पर आधारित पुस्तकों के प्रकाशन की भी योजना है, जिनके लिए लेख और टिप्पणियां   kamalinidutt@yahoo.com  पर भेजी जा सकती हैं।
सभागार में कुबेर दत्त की कविता और पेंटिंग से बनाए गए पोस्टर भी लगाए गए थे। ग्राफिक डिजाइनर रामनिवास द्वारा डिजाइन किए गए ये पोस्टर कुबेर दत्त की खूबसूरत लिखावट, कविता में मौजूद वैचारिक फिक्र और प्रभावपूर्ण चित्रकारी की बानगी थे।
प्रो. चमनलाल, रेखा अवस्थी, बलदेव वंशी, अशोक भौमिक, अचला शर्मा, प्रणय कृष्ण, आशुतोष, रंजीत वर्मा, शैलेंद्र चैहान, भगवानदास मोरवाल, सतीश सागर, भूपेन, रोहित जोशी, रमेश आजाद, कुमार मुकुल, स्वतंत्र मिश्र, प्रभात कुमार, मीरा जी, अवधेश, क्वीनी ठाकुर, पुरुषोत्तम नारायण सिंह, ब्रजमोहन शर्मा, गोपाल गुप्ता, रामनरेश राम, अशोक प्रियदर्शी, मार्तण्ड, कमला श्रीनिवासन, वासुदेवन अयंगार, रोहित कौशिक, सुरुचि, रविप्रकाश, सौरभ, दिनेश और नीरज आदि कई साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, मीडियाकर्मी, राजनैतिक कार्यकर्ता और छात्र इस आयोजन में मौजूद थे।




                                                                        
   
-श्याम सुशील
ए-13, दैनिक जनयुग अपार्टमेंट्स,
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