11/20/12

शाहीन और रेनू की गिरफ्तारी की निंदा- जन संस्कृति मंच


20 नवम्बर। शाहीन और रेनू, मुंबई की इन दो छात्राओं को मुंबई पुलिस ने कल इसलिए गिरफ्तार किया कि फेसबुक पर शाहीन ने यह सवाल उठाया कि बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद और अंतिम संस्कार के दिन मुंबई क्यों बंद रही। फेसबुक पर इस पोस्ट को रेनू ने 'लाइक' किया था। इसके बाद शिव-सैनिकों ने शाहीन के चाचा की क्लीनिक को ध्वस्त किया। 

बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार से लेकर फेसबुक पर एक बिलकुल ही सामान्य टिप्पणी पर की गई गिरफ्तारी तक, ऐसा लग रहा है मानो सरकार खुद शिवसेना ही चला रही है। पुलिस बल के भीतर शिवसेना की घुसपैठ पहले से ही एक जाना माना तथ्य है। लेकिन पृथ्वीराज चौहान की सरकार ने इस प्रकरण में अब तक जो कुछ भी किया है, वह भी एक जाना-माना तथ्य है। यह तथ्य और कुछ नहीं, बल्कि 1970 के दशक में वामपंथी ट्रेड यूनियनों को ख़त्म करने के लिए शिवसेना को खड़ा करने में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका से लेकर , लगातार उसकी कारगुजारियों को बर्दाश्त करने, अल्पसंख्यकों पर लगातार पुलिस दमन के सिलसिले को जारी रखने और कुल मिलाकर देश भर में तमाम नाज़ुक मौकों पर साम्प्रदायिक ताकतों के साथ सांठ- गाँठ है जो कि कांगेसी सरकारों के चरित्र का हिस्सा है। इस मौके पर शिव-सेना के सामने पृथ्वीराज चौहान की सरकार का दंडवत समर्पण न केवल शर्मनाक , बल्कि खतरनाक भी है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। 

जन संस्कृति मंच शाहीन और रेनू की असंवैधानिक गिरफ्तारी के लिए ज़िम्मेदार पुलिस-कर्मियों को दण्डित किए जाने की मांग करता है। शाहीन के चाचा अब्दुल धाढा के क्लीनिक को ध्वस्त किये जाने की घटना के लिए ज़िम्मेदार न केवल उपद्रवी शिवसैनिकों पर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, बल्कि इन दोनों छात्राओं के परिवारों को पुलिसिया कार्रवाई करके सरकार ने जिस तरह असुरक्षित बनाया है, उसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए सरकार को अब्दुल धाढा के क्लीनिक को हुए नुक्सान की भरपाई करनी चाहिए। नागरिक समाज से हम अपील करेंगे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस तरह के सरकार समर्थित हमलों के खिलाफ पुरजोर आवाज़ बुलंद करे।
(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

11/7/12

अकारी जी की याद-2

वे गोरख पाण्डेय, रमता जी, विजेन्द्र अनिल की धारा की एक कड़ी थे-  बलभद्र 


भोजपुरी के जनकवि दुर्गेन्द्र अकारी नहीं रहे। ये इन दिनों में अस्वस्थ चल रहे थे। 05 नवम्बर 2012 को इनका निधन हुआ। ये बिहार के भोजपुरी जिला के अकिलनगर एड़ौरा गाँव के थे। अकारी जी का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ नाम से प्रकाशित है। इनके गीतों में भोजपुर और बिहार के क्रांतिकारी किसान संघर्षों की अनुगूँजें हैं। ये अत्यंत गरीब परिवार के थे और जीवन-यापन के लिए इन्होंने कुछ दिनों तक गाँव में ‘बनिहारी’ (मजदूरी) भी की थी। दो सेर अनाज उस समय मजदूरी के रुप में मिलता था। दो सेर सवा किलो के बराबर होता है। अपने उन अनुभवों को अकारी जी ने अपने कई गीतों में आकार दिया है। अपने अनुभवों को सहज-सशक्त आकार देने के चलते ही इन्हें ‘अकारी’ नाम से लोग पुकारने लगे। इस नाम के पीछे एक रोचक प्रसंग भी है, जिसकी चर्चा बाद में की जाएगी। अकारी जी अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं-‘मत करऽ भाई बनिहारी तू सपन में’ (सपने में भी बनिहारी मत करो)। कवि ने फरियादी स्वर में एक गीत लिखा है-‘चढ़ते अषाढ़वा हरवा चलवलीं,/चउरा के बन हम कबहूँ ना पवलीं/जउवे आ खेंसारी से पिरीतिया ए हाकिम/कतना ले कहीं हम बिपतिया ए हाकिम।’ (अषाढ़ के शुरू होते ही हल चलाया। मेहनताना के रुप में चावल कभी नहीं पाया। जौ और खेंसारी ही मयस्सर हुआ। कहाँ तक अपनी विपत्तियाँ सुनाएँ।) अकारी जी का एक लोकप्रिय गीत है-‘बढ़ई लोहार धोबी रोपले बा आलू कोबी/ पेड़-पाता खड़ा ओकर फलवे नापाता/बतावऽ काका कहँवा के चोर घुसि जाता।’ (बढई, लोहार, धोबी ने आलू-गोभी की खेती की। ये गांव के अत्यन्त गरीब, पिछड़े व अल्पसंख्यक हैं। खेतों में पेड़-पत्ते तो ख़ड़े हैं पर फल गायब हैं। इन खेतों में कहाँ के चोर घुस जाते हैं।)
यह गीत इतना लोकप्रिय रहा कि गांवों में नाच-नौटंकी वाले भी इसे गाते थे और कई नाटक टीम के कलाकारों ने भी इसे अपने-अपने ढंग से जरूरत के मुताबिक गाया। देश में जो लूट-खसोट है बड़े पैमाने पर, सत्ता-प्रतिष्ठानों में जो भ्रष्टाचार है और शासक वर्ग द्वारा बार-बार यह झूठ प्रचारित किया जा रहा है निरंतर, कि सब सुरक्षित है, यह गीत इस लूट-खसोट, भ्रष्टाचार और झूठ को उजागर करता है। साथ ही साथ भारत की जो जटित जाति-संरचना है, जातियों के जो चरित्र और अंतर्विरोध हैं, उसकी भी इसमे शिनाख्त है और इस सिस्टम पर करारा व्यंग्य है।

अकारी जी का सम्बन्ध राजनीतिक रूप से भाकपा (माले) से रहा है। ये उसके सांस्कृतिक योद्धा थे। भोजपुर और बिहार के किसान- आन्दोलन के विभिन्न पड़ावों, प्रसंगों, घटनाओं और चरित्रों पर इनके गीत हैं। इनके गीतों में किसान-संघर्षों का इतिहास दर्ज है। इन्हें जेल भी जाना पड़ा है और जेल जीवन के अनुभवों को भी इन्होंने गीतों में उतारा है। इस तरह कि लोग बार- बार उनके मुँह से सुनना चाहते थे।
अक्षर-ज्ञान भर ही शिक्षा थी। गीतों में देखने में आता है कि हिन्दी और भोजपुरी के शब्दों और वाक्यों के प्रयोग से ये कहीं परहेज नहीं करते। भिखारी ठाकुर की तरह किसी-किसी गीत में दो लाइन हिन्दी में है और पूरा गीत भोजपुरी में। यह नौटंकी का शिल्प है। अकारी जी का संघर्ष समझौताहीन संघर्ष रहा। इनको और इनके संघर्ष को सलाम।

मैंने उनको बार-बार गाते हुए देखा- सुना था। वे ‘आत्म-आलोचना’ में विश्वास करते थे। पार्टी की बैठकों में ‘आत्म-आलोचना’ की जगह रहती है। साहित्य की विधा ‘आलोचना’ से परिचित होते हुए भी इन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उनके गीतों पर कौन क्या सोचता-कहता है ? उन्हें तो जन संघर्षों के लिए जीना था और उसी के लिए गीत रचने थे।

जन संस्कृति मंच का तेरहवाँ राष्ट्रीय सम्मेलन 03-04 नवम्बर 2012 को गोरखपुर में चल रहा था। यहाँ ‘जनभाषा- समूह’ के प्रारूप और कार्य-योजना पेश करते हुए मैंने आरा में अकारी जी पर एक कार्यक्रम करने और उन्हें सम्मानित करने का प्रस्ताव रखा था। यह कार्यक्रम हमलोग शीघ्र करते। पर अफसोस कि अकारी जी हमारे बीच से चले गए। हम उन्हें याद करते हैं और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। प्रो. बलराज पाण्डेय, प्रो. सदानन्द शाही, प्रकाश उदय, बलभद्र, आसिफ रोहतासवी, संतोष कुमार चतुर्वेदी, कृपाशंकर प्रसाद, राजकुमार, सुरेश काँटक, राधा, सुमन कुमार सिंह, जितेन्द्र कुमार, सुधीर सुमन, दुर्गा प्रसाद सिंह, आस्था सिंह आदि ने श्रद्धांजलि दी। 

11/6/12

बतावऽ काका, कहवाँ से चोर घुसल जाता... के कवि की स्मृति

जन-कवि श्री दुर्गेंद्र अकारी को जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि 

जनकवि को लाल सलाम !
6 नवम्बर, 20112, कल 05 नवंबर तड़के 6 बजे भोजपुर के किसान संघर्षों से निकले, उत्तर और मध्य बिहार की गरीब, भूमिहीन और दलित जनता के अत्यंत लोकप्रिय और जुझारू कवि दुर्गेंद्र अकारी ने अंतिम साँसें लीं. वे खुद इसी तबके से आते थे. जनता उनका अंतिम दर्शन कर सके, इसके लिए उनके शरीर को कल दोपहर भाकपा (माले) के आरा आफिस पर लाया गया, जहां अच्छी-खासी तादाद में लोगों ने इकट्टा होकर अकारी जी को अंतिम विदाई दी. 

मुक्तिबोध की कवि-जीवन के आरम्भ से ही यह चिंता थी कि, "मैं उनका ही होता/ जिनसे रूप भाव पाए हैं". नागार्जुन लगातार उनके ही होते चले गए जिनसे जनता का कोई कवि रूप और भाव पाता है. भोजपुर के नाभिकेंद्र से उत्पन्न और पूरे मध्य बिहार में 1970 के बाद भभक कर फैले जिस क्रांतिकारी किसान संघर्ष ने का. जीउत, सहतो, मास्टर साहेब और पारस जी (का. रामनरेश राम) जैसे समाज के निम्नतम समझे जानेवाले तबकों से उन्नततम विचार के क्रांतिकारियों को पैदा किया, उसी ने अपने जनकवि रमता जी, विजेंद्र अनिल और अकारी जी जैसों की कविता को भी पैदा किया. भोजपुर की इसी धरती को केंद्र करके नागार्जुन ने लिखा था, 'देखो जनकवि भाग न जाना/ तुम्हे कसम है इस माटी की'. जन संस्कृति मंच के संस्थापक महासचिव जनकवि गोरख पाण्डेय की जिद थी कि हम कवि-लेखक जिन किसान-मजदूर तबकों के लिए लिखते हैं, उन्हें ही हमारे लिखे का प्राथमिक श्रोता/ पाठक होना चाहिए. इसे गोरख ने खुद चरितार्थ किया. इस निकष पर भोजपुर के जो साहित्यकार सौ फीसदी खरे उतरे, उनमें अकारी जी का नाम अमिट है. 

अकारी जी का जन्म 1943 में हुआ. वे भोजपुर जिले के गांव एड़ौरा के रहनेवाले थे. बचपन से ही पितृ-विहीन अकारी ने हलवाही और मजदूरी की. गीतों के कारण पुलिस और गुंडों के कठिन आघात झेले और जेल भी काटी. फिर भी वह संघर्ष की अगली कतार में ही रहे. दिए गए प्रलोभनों को उन्होंने सदा ही ठुकराया और गरीबी से उबरने की कोशिश न करके गरीबों को उबारने की कोशिश करते रहे .

अकारी जी 74 के आंदोलन के साथ रहे, लेकिन '74 आन्दोलन की जन-आकांक्षाओं से दगा करने वालों को अपने गीतों में बक्शा नहीं. '74 के आन्दोलन के कई नामचीन नेताओं और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से व्यक्तिगत स्तर पर मित्रता होने के बावजूद अकारी जी ने उसका कभी कोई लाभ नहीं उठाया. उलटे सामंती ताकतों और सत्ता के खिलाफ उनके अपार लोकप्रिय गीतों की रचना की राह से उनको भटकाने के जो भी प्रलोभन सत्ता द्वारा दिए गए, उन्हें हिकारत के साथ उन्होंने ठुकराया. 

नक्सलबाड़ी की चिंगारी भोजपुर में गिरी और उससे जुड़े सवाल और संघर्ष के मुद्दे इनके गीतों में आने लगे. वे सामंतों और सरकार के खिलाफ गीत लिखने लगे. उन्होंने चंवरी, बहुआरा, सोना टोला आदि गांवों में पुलिस-सीआरपीएफ से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बहादुराना प्रतिरोधों और उनकी शहादतों की घटना को अपने गीतों में पिरोया. अपने गीतों में उन्होंने बिहार के धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान को दर्ज किया. किसान संग्रामियों का शौर्य, जनता के प्रति अगाध विशवास और ममता, सामंती उत्पीडन के प्रति रोष तथा सत्ताधारियों का पर्दाफाश, इन विषयों को अपनी मातृभाषा भोजपुरी में उन्होंने लगातार गीत लिखे जो जनता को उद्वेलित करते थे, साहस देते थे, उनके सुख-दुःख में साथ देते थे. उनके गीतों में भोजपुरी के कई दुर्लभ शब्द हैं पिछले साल ही सुधीर सुमन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बनारस में एक रैली में 1800 की किताबें बिक जाने को अपने जीवन की किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह याद किया . जहां पैसा और सुविधएं ही जीवन की श्रेष्ठता का पैमाना बनती जा रही हों, वहां इस 1800 की कीमत जो समझेगा, शायद वही इसके प्रतिरोध में नए जीवन मूल्य गढ़ पाएगा.

हां, बेशक अकारी जी धारा के विरुद्ध चलते रहे, जब लालू चालीसा लिखा जा रहा था तो उन्होंने' लालू चार सौ बीसा' लिखा. लुटेरों और शोषकों को पहचानने में कभी नहीं चूके. गांव में विभिन्न जातियों के यहां चोरी की घटना पर ‘बताव काका कहवां के चोर घुस जाता’ से लेकर बोफोर्स घोटाले पर ‘चोर राजीव गांधी, घूसखोर राजीव गांधी’ जैसे गीत लिखे. जब छोटी रेलवे लाइन बंद हुई, तो उस पर बड़े प्यार से जो गीत उन्होंने लिखा- 'हमार छोटको देलू बड़ा दिकदारी तू', वह जनजीवन के प्रति गहरे लगाव का सूचक है. उनके गीतों में इंकलाब के प्रति एक धैर्य भरी उम्मीद है. उनके गीतों में जो लड़ने की जिद है, चाहे जान जाए, पर चोर को साध् कहने और साध् को चोर कहने वाली इस व्यवस्था को हटा देने का उनका संकल्प है. समय समय पर उनकी गीत पुस्तिकाओं के अलावा जसम की ओर से 1997 में उनके चुनिंदा गीतों का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ प्रकाशित हुआ था .

अकारी जी का जाना किसानों-मजूरों के संघर्ष की भारी क्षति है, भोजपुरी भाषा और साहित्य की भारी क्षति है.

हम जन संस्कृति मंच की ओर से अकारी जी की स्मृति को लाल सलाम पेश करते हैं!

प्रणय कृष्ण, 
महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी 

जनता के कवि दुर्गेंद्र अकारी की स्मृति में

(कवि, साथी दुर्गेंद्र अकारी नहीं रहे। कविता के लिए जिन्होंने सब कुछ किया, पूरी जिन्दगी उसे दी, जनता ने उसे पाला पोसा, अपना बनाया और सर आँखों पर रखा। अविश्वसनीय लगती इस बात के प्रमाण थे दुर्गेन्द्र अकारी। उनकी जिंदगी और कविता हिन्दी कविता को लोकतांत्रिक और बराबरी वाली जगह में बदलती है बल्कि समाज में कवि के हस्तक्षेप का रास्ता भी बनाती है। अकारी जी को याद करते हुए इसी ब्लॉग की एक पुरानी पोस्ट- ) 

पिछली गर्मियों में आरा पहुँचने पर मालूम हुआ कि जनकवि दुर्गेंद्र अकारी जी की तबीयत आजकल कुछ ठीक नहीं रह रही है। साथी सुनील से बात की, तो वे झट बोले कि उनके गांव चला जाए। उनकी बाइक से हम जून माह की बेहद तीखी धूप में अकारी जी के गांव पहुंचे। लोगों से पूछकर झोपड़ीनुमा दलान में हम पहुंचे, जिसकी दीवारें मिट्टी की थीं और छप्पर बांस-पुआल और फूस से बना था। एक हिस्से में दो भैंसे बंधी हुई थीं। दूसरे हिस्से में एक खूंटी पर अकारी जी का झोला टंगा था। एक रस्सी पर मच्छरदानी और कुछ कपड़े झूल रहे थे। दीवार से लगकर दो साइकिलें खड़ी थीं और बीच में एक खाली खाट, लेकिन अकारी जी गायब। हम थोड़े निराश हुए कि लगता है कहीं चले गए। फिर एक बुजर्ग शख्स आए। मालूम हुआ कि वे उनके भाई हैं। उन्होंने बताया कि अकारी गांव में ही हैं। खैर, तब तक एक नौजवान उन्हें पड़ोस से बुलाकर ले आया। उसके बाद उनसे हमने एक लंबी बातचीत की, जिसके दौरान हमें भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की झलक तो नजर आई ही, एक सीधे स्वाभिमानी गरीब नौजवान का संघर्षशील जनता का कवि बनने की दास्तान से भी हम रूबरू हुए।

जसम की ओर से 1997 में उनके चुनिंदा गीतों का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ प्रकाशित हुआ था। उसकी भूमिका सुप्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी, कम्युनिस्ट और जनकवि रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ ने लिखा था कि बचपन के पितृ-विहीन अकारी ने हलवाही और मजदूरी की है, गीतों के कारण पुलिस और गुंडों के कठिन आघात झेले हैं और जेल भी काटी है। फिर भी वह संघर्ष की अगली कतार में ही हैं। प्रलोभनों को उन्होंने सदा ही ठुकराया है और गरीबी से उबरने की कोशिश न करके गरीबों को उबारने की कोशिश करते रहे हैं। सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान धोती कुर्ता पहने, कंधे में झोला टांगे ठेठ मेहनतकश किसान लगने वाले अकारी जी को गीत गाते तो हमने कई बार सुना-देखा : उनके गीतों की खास लय, जिसमें मौजूद करुणा, आह्वान और धैर्य के मिले-जुले भाव के हम कायल रहे.

‘मत कर भाई, तू बनिहारी सपन में’- इस गीत से उन्होंने अपने बारे में बताने की शुरुआत की। इस गीत को उन्होंने अपने ही गांव में एक रूपक की तरह मंच से प्रस्तुत किया था, जिसे सुनने के बाद हलवाहों ने हल जोतने से मना कर दिया था। चूंकि बनिहारों की पीड़ा को उस गीत में उन्होंने बड़ी प्रभावशाली तरीके से आकार दिया था, इसी कारण उनके नाम के साथ अकारी शब्द जुड़ गया। गीत का असर देखकर नौजवान अकारी का मन उसी में रमने लगा। इसी बीच नक्सलबाड़ी की चिंगारी भोजपुर में गिरी और उससे जुड़े सवाल और संघर्ष के मुद्दे इनके गीतों में आने लगे। वे सामंतों और सरकार के खिलाफ गीत लिखने लगे। उन्होंने चंवरी, बहुआरा, सोना टोला आदि गांवों में पुलिस-सीआरपीएफ से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बहादुराना प्रतिरोधों और उनकी शहादतों की घटना को अपने गीतों में पिरोया। उनकी पहली किताब का नाम था - जनजागरण। यह बताते हुए वे गर्व से भर उठे कि उनके गीतों को सुनकर लोगों का उत्साह बढ़ता था। जिस समय नक्सल का नाम सुनकर कोई अपने ओरी, छप्पर के किनारे भी नहीं ठहरने देता था, वैसी हालत में उन पर उन्होंने गीत लिखा।

हमने सवाल किया कि गीत लिखने के अलावा और क्या करते थे? उन्होंने कहा कि उनके लिए भी बड़ा गंभीर सवाल था कि जीविका के लिए क्या करें। किसी का नौकर बनके रहना उन्हें मंजूर न था। उसी दौरान उन्हें एक विचार आया कि मड़ई कवि की तरह किताब छपवाकर वे भी बेच सकते हैं। लेकिन मड़ई कवि से उन्होंने सिर्फ तरीका ही लिया, विषय नहीं लिया। मड़ई कवि सरकारी योजनाओं के प्रचार में गीत गाकर सुनाते थे, जबकि अकारी गीतों के जरिए सरकार की पोल खोलने लगे।

अकारी जी 74 के आंदोलन के साथ रहे। उन्होंने बताया- ‘जब इमरजेंसी लगा तो सब नेता करीब-करीब अलोपित हो गए। कुछ नेपाल की तराई में चले गए। हमको लगा कि इस तरह तो कहां क्या हो रहा है, इस बारे में कोई बातचीत ही नहीं हो पाएगी। तो उसी दौर में किताब छपवा के बेचने लगे ट्रेन में।’ उस वक्त का इनका एक मशहूर गीत था- 'बे बछरू के गइया भोंकरे, ओइसे भोंकरे मइया, बिहार तू त सून कइलू इंदिरा'। अपने गीतों के जरिए जनता पार्टी को वोट देने की अपील भी उन्होंने की और 74 के आंदोलन की जनभावना से गद्दारी करने वालों पर व्यंग्य भी किया-

'जनता जनता शोर भइल, जनता ह गोल भंटा हो
हाथ ही से तूरी ल, ना मारे पड़ी डंटा हो।'

अपनी पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर अकारी जी ने बताया कि वे स्कूल नहीं गए। बुढ़वा पाठशाला में गए, पर वहां कुछ सीख नहीं पाए। एक दिन दलान पर लड़के पढ़ रहे थे तो उन्हीं से कहा कि भाई हमें भी कुछ पढ़ा दो। उन सबों ने एक टूटी स्लेट दी और उस दिन उन्होंने 'क' वर्ग के सारे अक्षर रात भर मे याद किए। इस तरह पांच-छह दिन में सारे अक्षरों को लिखना सीख गए। हमने पूछा कि अब तो किताब धड़ल्ले से पढ़ लेते होंगे, तो हंसते हुए बोले- पढ़ लेता हूं, पर ह्रस्व-इ और दीर्घ-ई अब भी समझ में नहीं आता।

शिक्षा के अभाव या शब्दों और भाषा के स्कूली ज्ञान के अभाव का जो सच था उसे भी उन्होंने एक तरह का ढाल बना लिया और अपने नाम के साथ एल एल पी पी लिखने लगे-दुर्गेंद्र अकारी, एल एल पी पी। उनके गीतों के पुराने संग्रहों में आज भी यही लिखा मिलता है। तो इस एल एल पी पी से जुड़ा एक किस्सा उन्होंने सुनाया कि एक बार जीआरपी वालों ने उन्हें पकड़ लिया। एक ने पूछा कि एल एल पी पी किसने लिखा है? अकारी बोले- हमने। उसने सवाल किया- इसका मतलब? अकारी- आप लोग पढ़े लिखे आदमी हैं अब हम क्या सिखाएं आपलोगों को। तो उसने कहा- इसका मतलब तो लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर होता है। अकारी बोले - वही है सर। उसने पूछा- गीत कैसे लिखते हो? अकारी के पास जवाब तैयार- क ख ग किसी तरह जोड़ के। फेयर किसी दूसरे से कराते हैं। उसमें से किसी ने कहा कि सिर्फ क ख ग के ज्ञान से इतना लिख पाना संभव नहीं है। उनमें एक बड़ा बाबू था, कुछ समझदार, उसने इनके इंदिरा विरोधी कुछ गीतों को सुना और कहा- समुद्र में बांध् बनाया जा सकता है, लेकिन कवियों के विचारों को बांध नहीं जा सकता। उसने यह भी कहा कि गीत तो आपका अच्छा है, पर यहां हमलोगों की जिम्मेवारी है। हमलोगों की बदनामी होगी। यहां मत गाइए-बजाइए। तो अकारी बोले- कहां जाएं, भाई? कचहरी पर जाते हैं, तो आप ही लोग हैं। बाजार में जाते हैं तो आप ही लोग हैं। यहां स्टेशन पर आते हैं, तो आप ही लोग हैं। हम मैदान में गाने के लिए गीत तो बनाए नहीं है। बड़ा बाबू बोला- नहीं मानिएगा, तो विदाउट टिकट में आपको पकड़ लेंगे।
विदाउट टिकट में तो अकारी जी नहीं पकड़े गए। लेकिन प्रलोभन और धमकी के जरिए उन्हें गीत लिखने से रोकने की कोशिश जरूर की गए। एक दिन वे आरा रेलवे स्टेशन पर किताब लेके पहुंचे तो वहां असनी गांव के कामेश्वर सिंह से मुलाकात हुई। अकारी ने बताया कि कामेश्वर सिंह उस तपेश्वर सिंह के भाई थे, जिन्हें सत्ता और प्रशासन के लोग बिहार के सहकारिता आंदोलन का नायक बताते हैं और आम लोग को-आपरेटिव माफिया। कामेश्वर सिंह ने अकारी से कहा कि वे किताब बेचना छोड़ दें। वे उनको नौकरी दिला देंगे। अकारी बोले- नौकरी तो नौकरी ही होती है। नौकर की तरह ही रहना होगा। लेकिन हमने जो किताब छपवाई है वह नौकर बनकर नहीं छपवाई है। इससे कम या ज्यादा पैसा भी आ रहा है। कामेश्वर सिंह ने कहा कि कुछ हो जाएगा तब? कोई घटना घट जाएगी तब? अकारी के पास सटीक जवाब था- होगा तो होगा, किसी भी काम में कुछ हो सकता है। कामेश्वर सिंह चिढ़कर बोले- तुम चंदबरदाई नहीं हो न! अकारी कहां चुप रहने वाले थे,पलट कर जवाब दिया- एक चंदबरदाई हुए तो आप गिन रहे हैं, यहां इस धरती ने आदमी आदमी को चंदबरदाई बनाके पैदा किया है। कामेश्वर सिंह थोड़े सख्त हुए- इसका मतलब कि तुम किताब बेचना नहीं छोड़ोगे? तो इसका परिणाम तुम्हें पता चलेगा? अकारी- ठीक है हम जान-समझ लेंगे।

उसके दो चार दिन बाद ही जब आरा स्टेशन पर एक चाय की दूकान के पास लोगों की फरमाइश पर अकारी 'चंवरी कांड' पर लिखा अपना गीत सुना रहे थे, तभी कामेश्वर सिंह का भेजा हुआ एक बदमाश साइकिल से वहां पहुंचा। वह दारु पिए हुए था। आते ही बोला- भागो यहां से। अकारी बोले- क्या बात है भाई। बदमाश उन पर चढ़ बैठा- पूछता है कि क्या बात है? यहां से जाओ। अकारी ने शांति से काम लिया- हम ठहरने के लिए नहीं आए हैं, दो-चार मिनट में हम खुद ही चले जाएंगे। तब तक वह उनके बगल में आ गया। अकारी ने चौकी पर से उतर कर उससे पूछा कि यह रोड आपका है? उसने कहा- हां, है। अकारी बोले- नहीं, जितना आपका हक़ है, उतना ही हमारा भी हक़ है, उतना ही सबका है। इस पर उसने उन्हें धकेल दिया। वे पीछे रखी साइकिलों पर गिरे। इस बीच वह जनसंघ समर्थक एक गुमटी वाले से हंटर मांगने गया, उसने हंटर के बदले फरसा दे दिया। फरसा लेकर वह आया और सीधे अकारी पर वार कर दिया। अपना सर बचाने की कोशिश में उन्होंने अपने हाथ उठाए। इसी बीच उसी चौकी पर बैठा एक साधु अचानक उठा और उसने अपनी कुल्हाड़ी पर फरसे के वार को रोक लिया। तब तक दूसरे लोग भी बीच बचाव में आ गए। जनता ने कहा कि कवि जी आप यहां से हट जाइए, वह गुंडा है। इस पर अकारी गरम हो गए, बोले कि वह गुंडा नहीं है, यही उसका रोजगार है, जिसका खाया है उसकी ड्यूटी में आया है। खैर, गुंडा गुंडई कर रहा हो, इंसान बेइज्जत हो रहा हो, पब्लिक देख रही हो, तो गलती किसकी है? यह सुनना था कि लोग उसे पकड़ने के लिए उठ खड़े हुए। लोगों का मूड बदलता देख, वह साइकिल पर सवार होके वहां से भाग गया। अकारी उसके बाद लगातार एक माह तक वहां जाते रहे, ताकि उसे यह न लगे कि वे डर गए, लेकिन वह फिर उन्हें नजर नहीं आया।

अकारी जी ने बताया कि वे नक्सल आंदोलन के पक्ष में गीत लिखते थे, कार्यकर्ता उनको पहचानते थे, लेकिन उनसे अपना राज खोलना नहीं चाहते थे। एक कारण यह भी था कि वे लोकदल के एक स्थानीय नेता राम अवधेश सिंह के साथ थे। राम अवधेश सिंह के साथ होमगार्ड, दफादार-चैकीदार के आंदोलन में जेल भी गए। लेकिन बाद में लोकदल उन्होंने छोड़ दिया। हुआ यह कि सेमेरांव नामक एक गांव में लड़कों का एक मैच हो रहा था। अकारी जी वहां पहुंचे तो लड़कों ने किताब के लिए भीड़ लगा दी। वहीं एक पुलिस कैंप था। वहां से एक सिपाही आया और एक किताब मांगकर चलता बना। इन्होंने पैसा मांगा तो उसने कहा- आके ले जाओ। ये पुलिस कैंप में गए तो सिपाहियों ने कहा- एक और किताब दो। इन्होंने एक और किताब दे दी। उसके बाद उन सबों ने कहा- जाओ भागो। इन्होंने कहा- क्यों भाई, पइसा दीजिए या किताब लौटाइए। एक सिपाही ने कहा कि भागोगे कि करोगे बदमाशी। नहीं माने तो पुलिस ने मारकर इनका पैर तोड़ दिया। उस वक्त इनकी उम्र करीब 25-30 के आसपास थी। चूंकि राम अवधेश सिंह को चुनाव में जिताने के लिए इन्होंने बहुत काम किया था इसलिए उनको खबर भेजी ,लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। राम अवधेश सिंह का तर्क था कि इन्होंने बयान नहीं लिखवाया इसीलिए कुछ नहीं हुआ। अकारी जी का कवि अपनी जिद पर अड़ा रहा कि बयान क्या होता है, उस पर एक गीत लिखा था - 'टूटल टंगरी अकारी देखावे, ई तोड़ी निदर्दी आरक्षी कहावे', कहा वही बयान है। उसके बाद रामअवधेश सिंह ने कहा कि वे कर्पूरी ठाकुर से इस बारे में बात करेंगे। अकारी ने मना कर दिया कि कर्पूरी ठाकुर के पास उनके लिए वे न जाएं, वे खुद चले जाएंगे। खैर, कर्पूरी ठाकुर से जब मिले तो उन्होंने पूछा कि क्या हुआ कवि जी? कवि जी ने अपने ऊपर जुल्म की दास्तान कह सुनाई और उलाहना दे डाला कि आपकी सरकार में पुलिस ने पैर तोड़ दिया, केस नहीं हुआ तो क्या उसे कोई सजा नहीं होगी? आखिरकार कार्रवाई हुई और दो पुलिसकर्मी मुअत्तल हुए। लेकिन अकारी लोकदल में नहीं लौटे। रामअवधेश सिंह ने भी नौकरी का प्रलोभन भी दिया। लेकिन अब तो वे अपने गीतों के नायकों की राजनीतिक राह पर खुद ही चल पड़े थे।

लोकदल छोड़कर वे एक माह घर बैठे रहे। उसी दौरान भाकपा माले के कामरेडों ने उनसे संपर्क किया। इसके बारे में भी उन्होंने एक रोचक घटना सुनाई कि कामरेडों का आना-जाना मुखिया और सामंतों की निगाह से छुपा न रहा। मुखिया ने दलपति को समझाने भेजा कि यह खराब काम हो रहा है। दलपति से इन्होंने सवाल किया कि क्या खराब काम हो रहा है? उसने कहा- नक्सलाइट आ रहे हैं। अकारी बोले- तुम्हारे यहां कोई आता है कि नहीं? दलपति ने कहा- आते हैं, पर वे दूसरे आदमी होते हैं। अकारी कहां चुप रहने वाले थे, बोले- बताओ उनलोगों ने कौन सा खराब काम किया है, मुझे भी तो जरा पता चले? इसपर दलपति चीढ़कर बोला- तो भाई नहीं मानिएगा, तो हम गिरफ्तार करवा देंगे। अकारी ने चुनौती दे दी कि उसको गिरफ्तार कराना है, करा ले, लेकिन यह जान ले कि उसके साथ उन्हें भी जो करना होगा, कर देंगे। यह चेतावनी मुखिया तक पहुंची और मुखिया से थाना के दारोगा तक। दारोगा ने एक पट्टीदार से जमीन के एक मामले में एक केस करवा दिया और चैकीदार से इनको थाने पर बुलवाया। बाद में दारोगा खुद आया और उसने लोगों से कहा- हम इसको बुलाते हैं तो यह मुझे ही बुलाता है। अकारी निर्भीकता के साथ बोले- आपको जरूरत है तो आपको आना ही चाहिए। खैर, केस गलत था, सो थाने से ही मामला खत्म हो गया।

वैसे आंदोलनों में तो थाना, केस, जेल का चक्कर लगा ही रहता है। लेकिन 2009 में तो अकारी जी को 43 दिन बिना केस के जेल में रहना पड़ा। कारण यह था कि पुलिस गांव में किसी और को पकड़ने आई थीं। इनसे दरवाजा खोलवाने लगी। इन्होंने चोर-चोर का हल्ला मचा दिया। हल्ला से हुआ यह कि जिन लोगों को पकड़ने पुलिस आई थी वे भाग गए। उसके बाद गुस्से में पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। इन्हें समझ में नहीं आया कि किस केस में जेल में डाला गया है। कोई वारंट और बेलटूटी भी नहीं थी। आखिरकार 43 दिन बाद जज ने रिलीज भेजा। जेलर बेल बांड मांगने लगा। अकारी जी बोले- जब केस ही नहीं पता तो बेल कैसे फाइल करते। बाद में जज के रिलीज आर्डर पर इन्हें छोड़ा गया। हमने यहीं उनसे जेल जीवन की कठिनाइयों पर लिखे गए उनके लोकप्रिय गीत को सुनाने का आग्रह किया। उन्होंने सुनाया-

हितवा दाल रोटी प हमनी के भरमवले बा
आगे डेट बढ़वले बा ना।

जाने कब तक ले बिलमायी, हितवा देवे ना बिदाई
बिदा रोक रोक के नाहक में बुढ़ववले बा। आगे डेट...

बीते चाहता जवानी, हितवा एको बात ना मानी
बहुते कहे सुने से गेट प भेट करवले बा। आगे डेट...

बात करहु ना पाई देता तुरूते हटाई
माया मोह देखा के डहकवले बा। आगे डेट...

देवे नास्ता में गुड़ चना, जरल कच्चा रोटी खाना
बोरा टाट बिछाके धरती प सुतवले बा। आगे डेट...

गिनती बार बार मिलवावे, ओसहीं मच्छड़ से कटवावे
भोरे भरल बंद पैखाना प बैठवले बा। आगे डेट...

एको वस्त्रा ना देवे साबुन, कउनो बात के बा ना लागुन
नाई धोबी के बिना भूत के रूप बनवले बा। आगे डेट...

कवि दुर्गेंद्र अकारी, गइलें हितवा के दुआरी
हितवा बहुत दिन प महल माठा खिअइले बा। आगे डेट....

हमने उनसे पूछा कि इतने लंबे अरसे से वे जनता के लिए गीत लिखते रहे, अब उम्र के इस मुकाम पर क्या महसूस होता है? उन्होंने इसे लेकर फ़िक्र जाहिर की कि आंदोलन हुए, उससे लोग लाभान्वित भी हुए, संघर्ष किए, कुछ मिला। लेकिन फिर उन्हें परेशानी होने लगी। परेशानी से बचने के लिए लोग किसी तरह जीने-खाने की कोशिश करने लगे हैं। यही जीने का ढंग बनने लगा है। जो ठीक नहीं है। हमने कहा कि संघर्ष भी तो हमेशा एक गति से और एक तरीके से नहीं चलता। आज जनता का आंदोलन कैसे मजबूत होगा, संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले क्या करें? संस्कृति में तो ऊर्जा आंदोलन से ही मिलती है। आंदोलन जितना जनहित में होगा, उतनी संस्कृति भी जनहित में बढ़ेगी, क्रांतिकारी रूप में बढ़ेगी। हमने सवाल किया कि कवि भी तो कई बार आंदोलन को ऊर्जा देते हैं। जब आंदोलन में उभार न हो, उस वक्त कवि क्या करे, क्या आंदोलन का इंतजार करे? अकारी बोले- नहीं, कवि कभी-कभी माहौल को देखते हुए कुछ ऐसा निकालता है कि जिससे माहौल बदल जाता है।

हमने पूछा कि उनके राजनीतिक-सांस्कृतिक सफर में कौन से ऐसे साथी थे, जिनकी उन्हें बहुत याद आती है। इस पर उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। कहा कि जितने साथी लगे थे या आज भी लगे हैं सब अपनी ऊर्जा लेके लगे हैं, जिनसे जितना हुआ उसने जनता के लिए उतना काम किया और आज भी कर रहे हैं। हमने कहा कि सारी पार्टियां अपने को गरीबों का हितैषी कहती हैं, लेकिन गरीबों की ताकत को बांटने की साजिश में ही लगी रहती हैं। आज के दौर में गरीब के पक्ष में कोई राजनीति या संस्कृति किस तरह काम करे कि उसकी एकजुटता बढ़े। उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें तो यही समझ में आया कि सारी पार्टियां वर्ग की पार्टी होती हैं। वे अपने अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। गरीब के पक्ष में बोलने वाली बाकी पार्टी सिर्फ अपना मतलब साधने के लए गरीब का नाम लेती है। सिर्फ माले है जिसके लिए गरीब मतलब साधने की चीज नहीं, बल्कि गरीबों की पक्षधरता उसका सिद्धांत ही है। जबकि कांग्रेस सामंत-पूंजीपति की पार्टी है और भाजपा इस मामले में उससे भी आगे है, ज्यादा उद्दंड है।

उस वक्त बिहार में चुनाव हुए नहीं थे। हमने उनसे नीतीश के सरकार के बारे में पूछा और सड़कों की हालत में सुधार के दावे पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही। उन्होंने बड़ी दिलचस्प प्रतिक्रिया दी- गरीब आदमी के हित में सड़क थोड़े है। गरीब आदमी को कभी कभार कहीं जाना होता है, तो वह गाड़ी से जाए या पैदल जाए, उसके लिए बहुत फर्क तो पड़ता नहीं। हां, बड़ा-बड़ा पूंजीपति का कारोबार चले, इसके लिए तो सड़कें जरूरी हैं ही। बंटाईदारी के बारे में पूछने पर बोले कि यह भूमि सुधर से जुड़ा सवाल है। हमने कहा कि इसे लेकर बहुत कन्फ्यूजन फैलाया गया है, एकदम छोटे किसानों को भी शासकवर्गीय पार्टियां डरा रही हैं कि उनकी जमीन छीन जाएगी। हमने पूछा कि इस मुद्दे पर आंदोलन की कोई संभावना लगती है आपको? अकारी बोले कि भूमि सुधार तो तभी पूरी तरह से हो पाएगा, जब बिहार में वामपंथ का शासन आएगा। क्या यह संभव है? क्या जीवन का लंबा समय गरीबों की मुक्ति और गरीबों का राज कायम करने के संघर्षों में लगा देने के बाद उम्र के आखिरी दौर में कोई उम्मीद लगती है या निराश हैं कुछ- यह सवाल करने पर अकारी थोड़ी देर चुप रहे और बड़ी गंभीरता से बोले कि अभी दो-चार चुनाव और लगेगा। हमने फिर सवाल दागा कि क्या फिर लालू, रामविलास या नीतीश जैसे लोग नहीं आ जाएंगे? इस पर अकारी बोले- आएंगे, लेकिन विक्षोभ पैदा हो रहा है। इनमें कोई भी जनहित में काम करने वाला नहीं है, ये सब अंततः सामंत और पूंजीपति का हित ही साधेंगे।

वापस लौटते वक्त सुनील की बाइक का टायर पंक्चर हो गया था। सुनील टायर ठीक करवाने आगे बढ़ गए थे। झुलसाती धूप में मैं उस राह पर चल रहा था, अकारी जी के बारे में सोचते हुए। उन्होंने बताया कि उनकी किताबें खूब बिकती थीं। बनारस में एक रैली में 1800 की किताबें बिक जाने को वे अपने जीवन की किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह याद रखे हुए हैं। जहां पैसा और सुविधएं ही जीवन की श्रेष्ठता का पैमाना बनती जा रही हों, वहां इस 1800 की कीमत जो समझेगा, शायद वही इसके प्रतिरोध में नए जीवन मूल्य गढ़ पाएगा। हां, बेशक अकारी जी धरा के खिलाफ चलते रहे हैं, जब लालू चालीसा लिखा जा रहा था तो उन्होंने लालू चार सौ बीसा लिखा। प्रलोभनों को ठुकराया और लुटेरों और शोषकों को पहचानने में कभी नहीं चूके। गांव में विभिन्न जातियों के यहां चोरी की घटना पर ‘बताव काका कहवां के चोर घुस जाता’ से लेकर बोफोर्स घोटाले पर ‘चोर राजीव गांधी, घूसखोर राजीव गांधी’ जैसे गीत लिखे। जब छोटी रेलवे लाइन बंद हुई, तो उस पर बड़े प्यार से जो गीत उन्होंने लिखा- 'हमार छोटको देलू बड़ा दिकदारी तू' वह जनजीवन के प्रति गहरे लगाव का सूचक है। उनके गीत कहत ‘अकारी बिहार मजदूर पर, सहत बाड़ ए भइया कवना कसूर पर’ की गूंज तो देश के बाहर भी गई। अकारी जी हमारे बीच हैं, यह बड़ी बात है। उनके गीतों में भोजपुरी के कई दुलर्भ शब्द हैं और इंकलाब के प्रति एक धैर्य भरी उम्मीद है। उनके गीतों में जो लड़ने की जिद है, चाहे जान जाए, पर चोर को साध् कहने और साध् को चोर कहने वाली इस व्यवस्था को बदल देने का जो उनका संकल्प है, उसे सलाम!



(सुधीर सुमन, युवा आलोचक, कथा आलोचना में गहरी दिलचस्पी, समकालीन जनमत के सम्पादक मंडल में, फिलहाल में दिल्ली में रहते हैं.)

11/2/12

जसम का 13 वां राष्ट्रीय सम्मेलन गोरखपुर में

साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट है सम्मेलन का विषय 
कवि सम्मेलन और फिल्म प्रदर्शन का आयोजन


नई दिल्ली, 2 अक्टूबर 2012 

जन संस्कृति मंच का 13 वां राष्ट्रीय सम्मेलन 3 और 4 नवम्बर को सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि भवन में होगा। सम्मेलन में ‘साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट’ पर गहन विचार-विमर्श होगा और अगले दो वर्ष के लिए संगठन की नई कार्यकारिणी व राष्ट्रीय परिषद का गठन होगा। सम्मेलन का उद्घाटन प्रो रविभूषण करेंगे।

सम्मेलन की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, जिसका उद्घाटन करने के लिए प्रसिद्ध आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय आज गोरखपुर के लिए रवाना हो रहे हैं। सम्मेलन का उद्घाटन 3 अक्टूबर को अपराह्न 4 बजे होगा। सम्मेलन में एक दर्जन से अधिक राज्यों के 300 प्रतिनिधि भाग लेंगे। दिल्ली से जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के नौजवान साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के अतिरिक्त प्रो. राजेंद्र कुमार, प्रो. रविभूषण, कवि मंगलेश डबराल, मदन कश्यप, चित्रकार अशोक भौमिक, कवि रंजीत वर्मा, युवा आलोचक आशुतोष कुमार, गोपाल प्रधान, अवधेश, रंगकर्मी कपिल शर्मा, छायाकार विजय समेत जसम के तमाम राष्ट्रीय पार्षद तथा संगवारी नाट्य गु्रप के सदस्य आज गोरखपुर के लिए प्रस्थान कर रहे हैं। जसम के इस सम्मेलन में कविता, कहानी, नाटक, चित्रकला और फिल्म आदि विधाओं में सक्रिय समूहों के निर्माण की योजना को भी ठोस आकार मिलेगा। हिंदी-उर्दू के बीच के रिश्ते तथा लोकभाषाओं और लोककलाओं के लेकर भी जन संस्कृति मंच की जो योजनाएं हैं, उन पर भी विचार विमर्श होगा।
  
सम्मेलन में जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ‘साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट’ पर पर्चा प्रस्तुत करेंगे। उद्घाटन सत्र के बाद शाम छह बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारम्भ होंगे जिसमें गोरखपुर की संस्था अलख कला मंच, पटना की हिरावल, बलिया की संकल्प द्वारा जनगीत व भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति की जाएगी। झारखण्ड की जन संस्कृति मंच की इकाई द्वारा झारखण्डी नृत्य व गीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाएगा। शाम सात बजे से कवि सम्मेलन होगा जिसमें विभिन्न स्थानों से आए कवियों, कवयित्रियों के अलावा स्थानीय कवि व शायर अपनी रचनाओं का पाठ करेंगे। 

सम्मेलन के दूसरे दिन सुबह दस बजे से चार बजे तक सांगठनिक सत्र चलेगा। इसमें महासचिव द्वारा प्रस्तुत किए गए पर्चे पर विचार-विमर्श होगा। इसके अलावा जसम के पिछले दो वर्षों के गतिविधियों की रिपोर्ट रखी जाएगी और उस पर चर्चा होगी। इसके बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी व राष्ट्रीय परिषद का चुनाव होेगा। शाम पांच बजे से फिल्म शो का आयोजन किया गया है। इसमें गोरखपुर-महराजगंज जिले के जंगलों में रहने वाले वनटांगिया लोगों के संघर्ष पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘बिटवीन द ट्रीज’ का प्रदर्शन होगा। इस मौके पर इस डाक्यूमेंटरी के निर्माता आशीष कुमार सिंह भी उपस्थित रहेंगे। इसके बाद प्रसिद्ध फिल्मकार आनंद पटवर्धन की बहुचर्चित फिल्म ‘जय भीम कामरेड’ दिखाई जाएगी। हिंदी सिनेमा के 100 साल तथा जिन कवियों की जन्मशताब्दी है, उनकी कविताओं पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी भी सम्मेलन का आकर्षण होगी। सम्मेलन स्थल पर पुस्तकों का स्टाल भी होगा।


सुधीर सुमन
राष्ट्रीय कार्यकारिणी, 
जन संस्कृति मंच की ओर से

11/1/12

भानु भारती का तुगलक़: नाटक के पीछे का नाटक


बिल्कुल इरादा नहीं था दिल्ली सरकार द्वारा सवा तीन करोड़ की खैरात से तैयार किए गए तुगलक नाटक की भव्य प्रस्तुति देखने का। आधी रात में दिल्ली लौटा था। दिन में आफिस में कई अधूरे काम निबटा रहा था, तभी एक लेखक मित्र का फोन आया- ‘चले जाओ तुगलक देखने, मेरे पास एक टिकट है, कुछ जरूरी काम है जिसके कारण मैं नहीं जा रहा हूं।’ तो अपन भी गए तुगलक देखने। गेट पर ही टिकट रख लिया गया कि किसने टिकट जारी किया है, जरा चेक करना है। खैर, मेहरबानी उनकी कि मुझे ससम्मान अंदर जाने दिया। अंदर जिस तरह के दर्शक वर्ग से टकराया, उन्हें देखकर यही लगा कि इन्हें कंटेंट से कम मतलब है, भव्य तमाशे का इन्हें ज्यादा इंतजार है। बगल में बैठे एक बुजुर्ग दर्शक ने दिलचस्पी से ब्रोशर में मुझे झांकते देख, उसे मुझे दे दिया। काफी कीमती और चमकदार ब्रोशर है, जिसमें दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का संदेश छपा है कि कामनवेल्थ की आशातीत सफलता के बाद चारों ओर से यह मांग थी कि दिल्ली के नागरिकों और आगंतुकों-अतिथियों के लिए दिल्ली उत्सव की परिकल्पना को जारी रखा जाए। 

मेरे सामने मुख्यतः तीन हिस्से में बंटा भव्य रंगमंच था, जिसे देखकर 1989 में आरा में मंचित 20 दिनों में तैयार और इससे कई-कई गुना कम लागत से तैयार नाटक ‘कामरेड का कोट’ का याद हो आई। बेशक ‘कामरेड का कोट’ की प्रस्तुति में इतनी लाइटें, कास्ट्यूम और साउंड सिस्टम का इस्तेमाल संभव न था। जितना धन दिल्ली सरकार ने एक नाटक के लिए दिया है, उतने में हमारी टीमें कई साल तक नाटक कर सकती हैं। खैर, इतने पैसे में भानु भारती ने जो चमत्कार दिखाया, मुझे नहीं लगता कि चमत्कार देखने गए लोग अगर किसी और के निर्देशन में भी इसे देखते तो उन्हें निराशा होती। बहुत सारे नौजवान निर्देशक हैं, जो कुछ ज्यादा ही चमत्कार दिखा सकते थे। 

निर्देशक ने जिसे ‘अतीत की वर्तमानता’ कहा है, अगर उसे इस तरीके से समझें कि तुगलक के सारे घोषित आदर्श और उसकी क्रूरताएं- दोनों राजसत्ता की रक्षा के लिए हैं, तो क्या आज के तुगलकों की भी इसमें तस्वीर नहीं है? मुझे तो इसमें हमारे देश के भविष्य का भी एक सुल्तान तुगलक बार-बार प्रतिबिंबित होता नजर आ रहा था। खैर, मेरे लिए अहम सवाल यह है कि जो वर्तमान के तुगलक हैं, वे ‘तुगलक’ के मंचन के लिए सवा तीन करोड़ रुपये देने की मेहरबानी क्यों कर रहे हैं? इतना ही नहीं, आरटीआई की जरिए इस पूरी प्रक्रिया की बारे में जानकारी की मांग करने वाले मेरे एक रंगकर्मी मित्र ने बताया कि इस सवा तीन करोड़ के अतिरिक्त प्रचार और बाहर से आने वाले कुछ दूसरे कलाकारों पर भी काफी धन खर्च किया गया है। यह सब तब है, जब कि इस देश में अब छोटे से छोटे कस्बे में एक नाटक मंचित कर पाना कलाकारों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। हाल और तमाम संसाधनों की कीमत बढ़ गई है। बेशक नाटक में एकाध जगह पर निर्देशक ने कलाकार के प्रतिरोध के लिए भी जगह निकाली है, बल्कि इसे उनकी अपनी पोजिशन का जस्टिफिकेशन भी कहा जा सकता है, इसके उपयुक्त पात्र अजीज धोबी हैं, जो धन और सत्ता को हासिल करने के लिए तरह-तरह का वेश बनाते हैं, डकैती और कत्ल भी करते हैं। उनके मुंह से यह सुनकर दर्शक तालियां भी बजाते हैं कि ‘खुल्लम खुल्ला लूट करो और लोग कहें कि हुकूमत है।’ 

क्या हम तुगलकों के प्रति संवेदनशील हो जाएं कि वे तो आदर्श राज्य ही कायम करना चाहते हैं, पर राजसत्ता की मजबूरियां उन्हें क्रूर या आज के संदर्भ में कहें कि भ्रष्ट बनाती हैं? क्या तुगलक जिस तरह अपने विरोधियों को सत्ता में हिस्सेदार बनाकर या उन्हें मारने के बाद उन्हें शहीद बनाकर जिस तरह अपनी छवि बनाने की कोशिश करता है, तुगलक का मंचन भी उसी तरह की एक कोशिश का परिणाम नहीं है? कहिए खुल्लम खुल्ला लूट करने वालों को हुकूमत, यही हुकूमत तो यह कहने के लिए अवसर दे रही है। ‘उत्सव की बेला है यह!’- मेरे शब्द नहीं हैं ये, शीला दीक्षित के संदेश की आखिरी पंक्ति हैं यह।


फिरोजशाह कोटला मैदान से बाहर निकलते ही यहां से हजार मील दूर बैठे एक रंगकर्मी से बातचीत होती है, जो जनता के लिए नाटक कैसे किया जाए, कैसे एक ऐसी रिपेटरी बने, जो सरकारी खैरातों के बल पर चलने को विवश न हो, इसके बारे में सोच रहे हैं। बस से जिस चौराहे पर उतरता हूं, वहां एक बच्चा और मजदूर से दिखने वाले दंपत्ति अचानक मेरे करीब याचक की मुद्रा में आ खड़े होते हैं। पुरुष बताता है कि पुणे से आया है, आनंदविहार के किसी ठेकदार ने बुलाया था, पर वह मिला ही नहीं, धोखा दे दिया, खाने के लिए पैसे नहीं हैं, मुझे लग रहा है कि यह जाल भी हो सकता है, पर उन्हें पैसे दे देता हूं। कहां सवा तीन करोड़ कहां सौ रुपये! कमरे में पहुंचता हूं, किसी टीवी चैनल से आवाज आ रही है, देश के सबसे बड़े बैंक ने फिर से आर्थिक स्थिति खराब होने को लेकर चिंता जाहिर की है। 

क्या तुगलक सिर्फ एक नाटक है, क्या तुगलकों की कोई कमी है, क्या अपनी अपनी दिल्ली से दौलताबादों की ओर आज भी जनता को नहीं हांका जा रहा है?









(सुधीर सुमन, युवा आलोचक, संपादक समकालीन जनमत)