12/29/12

साँसों ने विराम ले लिया, लेकिन उसका संघर्ष अविराम है- प्रणय कृष्ण

द हिन्दू से साभार, छायाकार वी.वी. कृष्णन

16 दिसंबर को वह छः दरिंदों से अकेले ही 31 किलोमीटर तक दिल्ली की सडकों पर घूमती 'यादव ट्रैवेल' की व्हाईट-लाइन बस में लड़ती और जूझती रही. उसके दोस्त को वे पहले ही बुरी तरह घायल कर चुके थे. अगले 13 दिनों तक उसने अस्पताल में अपना बहादुराना संघर्ष जारी रखा. इन सारे दिनों में उसके इस बहादुराना संघर्ष ने भारत के लाखों-करोड़ों लड़कियों- लड़कों और आम लोगों को पहली बार औरतों के खिलाफ अन्याय और हिंसा के सभी रूपों के विरुद्ध इतने बड़े पैमाने पर सडकों पर उतार दिया. हुक्मरानों को जितना भय उसकी लड़ाकू ज़िंदगी से था, उससे भी ज़्यादा उसकी संभावित मौत से था. उन्होंने उसे गुपचुप इलाज के नाम पर वतन-बदर कर दिया, जहां आज सुबह 2.15 पर सिंगापुर के अस्पताल में उसकी साँसों ने विराम ले लिया, लेकिन उसका संघर्ष अविराम है.

21 वीं सदी के 12 वें साल के आखिरी महीने में इंडिया- गेट को तहरीर स्क्वायर में तब्दील करने को आतुर भारत की हज़ारों युवतियों-युवकों ने बैरिकेडों पर भीषण ठण्ड में लाठियों और पानी की बौछारों से लड़ते हुए एक नई लड़ाकू अस्मिता पाई, बिना यह जाने कि जिस बहादुर लड़की के बलात्कार के खिलाफ संघर्ष से वे प्रेरित हैं, उसका नाम क्या है, गाँव क्या है, जाति क्या है, धर्म क्या है. इस प्रक्रिया में वे खुद अपनी जाति, क्षेत्र, भाषा, धर्म के ऊपर उठ कर भारत में औरत की आज़ादी और इन्साफ के लिए एक अपराधिक सत्ता-व्यवस्था से टकरा गए. वे इतना ही जानते थे कि वह 21 वीं सदी के भारत की 23 साल की ऐसी युवती थी जिसने एक दुर्निवार सवाल के हल के लिए आर-पार की लड़ाई छेड़ रखी है.

गर्भ में भ्रूण के रूप में क़त्ल की जाती, जातीय और साम्प्रदायिक हिंसा में बलात्कार कर मौत के घाट उतारी जाती, घरों में पीटी जाती, रिश्तेदारी में ही यौन-उत्पीडन का शिकार होती, धर्म और जाति के ठेकेदारों के फरमानों से मौत की सज़ा पाती, दहेज के लिए जलाई जाती, अपहरण कर बाज़ार में बिकने को लाई जाती असंख्य, अनाम भारतीय औरतों के लिए न्याय के संघर्ष का प्रतीक बन गई 'एक जुझारू युवती '. पुलिस, क़ानून में आमूलचूल बदलाव और सता तथा समाज के स्त्री के प्रति नज़रिए में भारी परिवर्तन की अपरिहार्यता को वह अपनी लड़ाकू ज़िंदगी और मौत के ज़रिए बड़े-बड़े अक्षरों में लिख गई.

कश्मीर के शोपियां में हो, चाहे छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी अथवा मणिपुर की मनोरमा, पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा आए दिन होने वाले यौन-बर्बरताएं, घरों-खेतों-खलिहानों-दफ्तरों-बसों-सडकों-स्कूलों-कालेजों में हर दिन अपमान सहने को विवश की जाती भारत की स्त्री-शक्ति के सामंती और पूँजीवादी जघन्यताओं के खिलाफ संघर्ष ने नए रूप अख्तियार किए हैं, नया आवेग है यह अन्याय के खिलाफ.

शरीर के खत्म हो जाने के बाद भी वह इसी नई चेतना, नए संघर्ष और अथक संघर्ष की 'प्रेरणा' बनकर हम सबके दिलों में, युवा भारत की लोकतांत्रिक चेतना में सदा जीती रहेगी.

 जन संस्कृति मंच की ओर से राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा श्रद्धांजलि 

12/23/12

न्याय के साथ आजादी भी चाहिए : एपवा, आइसा, इनौस, एक्टू, जसम

आंदोलनकारियों का दमन सरकार और पुलिस के स्त्री विरोधी रवैये का नमूना है
महिला, छात्र-युवा, श्रमिक संगठनों और सांस्कृतिक संगठन ने मनाया राष्ट्रीय शर्म दिवस
एपवा, आइसा, इनौस, एक्टू, जसम ने इंडिया गेट पर किया प्रदर्शन

प्रेस विज्ञप्ति, नर्इ दिल्ली : 23 दिसंबर

एपवा, आइसा-इनौस, एक्टू और जन संस्कृति मंच ने आज बलात्कार और दमन के खिलाफ राष्ट्रीय शर्म दिवस मनाया। प्रदर्शनकारियों को इंडिया गेट न पहुंचने देने की तमाम कोशिशों के बावजूद निजामुददीन गोलंबर से जुलूस निकालकर वे बैरिकेट को तोड़ते हुए इंडिया गेट पहुंचे और वहां सभा की। यह प्रदर्शन बिल्कुल शांतिपूर्ण था और महिलाओं की आजादी और सुरक्षा की मांग कर रहा था। विवाह, परिवार, जाति, संप्रदाय की आड़ में किए जाने वाले बलात्कार और सुरक्षा बलों द्वारा किए जा रहे बलात्कार और इज्जत के नाम पर की जाने वाली हत्याओं के खिलाफ संसद का विशेष सत्र बुलाकर एक प्रभावी कानून बनाने की भी मांग की गर्इ। बलात्कार के मामलों में सजा की दर कम होने पर भी सवाल उठाया गया तथा सभी दोषियों की सजा सुनिशिचत करने की मांग की गर्इ। आदिवासी सोनी सोढ़ी के गुप्तांग में पत्थर भरने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवार्इ की मांग की गर्इ। देश में सामंती-जातिवादी और सांप्रदायिक शकितयों द्वारा किए जाने वाले बलात्कार के दोषियों को भी सजा की गारंटी हो, इस पर जोर दिया गया।

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर इंडिया गेट पर आज के प्रदर्शन को बर्बरता से कुचलने का आरोप लगाया है और कहा है कि सरकार ने एक तरह से अघोषित इमरजेंसी लागू कर दी है। लोग इंडिया गेट न पहुंच न पाएं, इसके लिए उसने हरसंभव कोशिश की। इसके बावजूद जो लोग वहां पहुंचकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, उनके खिलाफ पुलिस लगातार उकसावे की कार्रवार्इ करती रही। बिना किसी उग्र प्रदर्शन के उसने आंसू गैस छोड़ने की शुरुआत की। पुलिस ने जिस तरह उपद्रवियों का बहाना बनाकर महिलाओं और निहत्थे लोगों तक पर लाठियां बरसार्इ हैं, पानी की बौछार की है, लगातार आंसू गैस के गोले छोड़े हैं, वह सरकार के तानाशाहीपूर्ण और अलोकतांत्रिक रवैये का उदाहरण है। पुलिस ने साजिशपूर्ण तरीके से शांतिपूर्ण आंदोलन के दमन का बहाना बनाया है, जिसकी जांच होनी चाहिए। आज जिस तरह प्रदर्शनकारियों और आम जनता पर बर्बर हमला किया गया, जिस तरह पुलिस ने लड़कियों के साथ बदसलूकी की, पत्रकारों तक को नहीं बख्सा, वह बेहद शर्मनाक है। इससे स्त्री अधिकार से जुड़े सवालों और आम स्त्री के प्रति पुलिस और यूपीए सरकार की संवेदनहीनता का ही पता चलता है।

पुलिस का यह कहना कि हम गैंगरेप के आरोपियों के खिलाफ कार्रवार्इ कर रहे हैं, तो फिर आंदोलन क्यों किया जा रहा है, इस बात की ओर इशारा करता है कि सरकार और प्रशासन चाहती है कि मामला इसी घटना तक ही सीमित रहे। लेकिन लोगों का गुस्सा इसलिए भी उमड़ रहा है कि अभी भी लगातार बलात्कार, छेड़छाड़ और उत्पीड़न की घटनाएं जारी हैं। समाचार पत्र ऐसी खबरों से भरे पड़े हैं। एपवा, आइसा, इनौस, एक्टू और जसम का प्रदर्शन संपूर्ण स्त्री विरोधी तंत्र को बदलने की मांग को लेकर था, जिसमें सक्षम कानून बनाने से लेकर बलात्कार और हिंसा के मामले में न्यायपालिका, पुलिस, चिकित्सा तमाम क्षेत्रों में आमूल चूल बदलाव की मांग शामिल थी। यौन हिंसा की तमाम प्रवृतितयों को औचित्य प्रदान करने वाली प्रवृतितयों और संस्कृति के अंत की मांग भी प्रदर्शनकारी कर रहे थे।

प्रदर्शन के दौरान सभाओं को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि इस गैंगरेप और बलात्कार, यौन हिंसा, उत्पीड़न के तमाम मामलों में तो न्याय चाहिए ही, कहीं भी किसी वक्त आने-जाने, अपने पसंद के कपड़े पहनने, जीवन के तमाम क्षेत्रों में बराबरी के अवसर और जीवन साथी को चुनने की आजादी भी होनी चाहिए। एपवा की ओर से कविता कृष्णन और आइसा की ओर सुचेता डे ने सभा को संबोधित किया। जसम की ओर से कवि मदन कश्यप, पत्रकार आनंद प्रधान, आशुतोष, सुधीर सुमन, मार्तंड, रवि प्रकाश, कपिल शर्मा, अखिलेश, उदय शंकर, खालिद भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए। आइसा के ओम प्रसाद, अनमोल, फरहान, इनौस के असलम, एक्टू के संतोष राय, वीके एस गौतम, मथुरा पासवान समेत कर्इ नेताओं ने प्रदर्शन का नेतृत्व किया।

-Kavita 9560756628, Sucheta- 09868383692, Om Prasad 9013596196, Anmol Ratan 9013219020, Farhan Ahmed 9540124091, Akbar 9013898178, Sudhir suman 09868990959

12/21/12

यह स्त्री के अस्तित्व पर हमला है: प्रो. मैनेजर पांडेय

पूरी दुनिया में हमारे देश और समाज की बेहद शर्मनाक स्थिति होती जा रही है: 
प्रो. मैनेजर पांडेय

जन संस्कृति मंच, नई दिल्ली: 19 दिसंबर 2012


जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय ने दिल्ली में गैंगरेप की बर्बर घटना पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि सरकार और समाज दोनों को गंभीरता से यह सोचना होगा कि वे कैसे इस तरह के कुकृत्य को खत्म करेंगे. इस देश में स्त्रियों के विरुद्ध अत्याचार, हिंसा और बलात्कार की घटनाएं पहले से भी अधिक बढ़ती जा रही हैं। खुद सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में अत्याचार और बलात्कार की सबसे ज्यादा घटनाएं घट रही हैं। प्रशासन और सरकार उन्हें सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल हैं। समाज के हर तबके और हर वर्ग की स्त्रियों और बच्चों के प्रति ज्यादती और नृशंसता की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी हैं। जबकि किसी भी देश या समाज की सभ्यता का पैमाना यह है कि वहां स्त्रियों और बच्चों के साथ किस तरह का व्यवहार होता है, इस पैमाने पर पूरी दुनिया में हमारे समाज और देश की बेहद शर्मनाक स्थिति होती जा रही है।

उन्होंने कहा है कि गैंगरेप के दोषियों को तो सख्त सजा होनी ही चाहिए, लेकिन साथ ही बलात्कार, उत्पीड़न और हिंसा की तमाम घटनाओं के दोषी किस तरह दंडित किए जाएं, कानून और पुलिस प्रशासन की गड़बडि़यों या सामाजिक-राजनीतिक संरक्षण के कारण उनके बच निकलने की घटनाओं पर अंकुश कैसे लगाया जाए, इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, क्योंकि दोषियों के बच निकलने से भी इस तरह की मानसिकता वालों का मनोबल बढ़ता है।

रविवार 16 दिसंबर को फिजियोथेरपी की छात्रा के साथ उस प्राइवेट बस में जिस बर्बरता के साथ गैंगरेप किया गया और उसके यौनांगों में लोहे के रॉड से हमला किया गया, उसके विवरण काफी दिल दहलाने वाले और चिंतित करने वाले हैं। यह सिर्फ बलात्कार नहीं, बल्कि आजादी और बराबरी के साथ जीने की आकांक्षा रखने और अपने सम्मान के लिए प्रतिरोध करने वाली स्त्री के अस्तित्व पर ही वहशियाना हमला है। इसे किसी भी कीमत पर बर्दास्त नहीं किया जा सकता। इस वहशियाना कृत्य के बाद युवक-युवतियों, छात्र-छात्राओं, विभिन्न वर्गों और तबकों के लोगों का जो गुस्सा सड़कों पर उभरा है, उस गुस्से को उस बेहतर समाज के निर्माण की ओर मोड़ना होगा, जहां कोई भी स्त्री किसी भी वक्त अपनी इच्छा से किसी के साथ कहीं भी आ जा सके, जहां उसे मौजमस्ती का वस्तु समझकर कोई उत्पीडि़त या दमित न करे, जहां उसकी स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय और समानता के अधिकार पर कोई हमला न हो। जो पुलिस अधिकारी, नौकरशाह, राजनीतिक पार्टी, राजनेता या सरकार स्त्रियों की इन अधिकारों का समर्थन नहीं करते और उल्टे उन्हें ही सामंती-पूंजीवादी पितृसत्तात्मक समाज की कोढ़ से पैदा हो रहे अपराधियों से बच कर रहने की नसीहत दे रहे हैं, जो यह उपदेश दे रहे हैं कि वे किस तरह का कपड़ा पहने, किस वक्त कहां आएं-जाएं, उन्हें भी उनके पद से हटाया जाना चाहिए।

प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा है कि बलात्कार और उत्पीड़न को झेलने वाली स्त्री को ही जब गलत बताया जाता है, तो उससे बलात्कारियों का मनोबल बढ़ता है। एक बलत्कृत को क्यों अपनी इज्जत को लेकर अपराधबोध पालना चाहिए, बल्कि उस समाज को अपनी इज्जत के बारे में सोचना चाहिए कि क्या वह खुद किसी इज्जत लायक है, जहां इस तरह की घटनाएं घटती हैं। उस समाज को खुद को बदलने के बारे में सोचना ही होगा, जहां एक ओर खाप पंचायतें इज्जत के नाम पर अपना जीवनसाथी चुनने वाले लड़कियों और लड़कों की हत्या करती हैं और जहां दूसरी ओर देश की राजधानी दिल्ली में स्त्रियों के आखेट में घुमते लोग लगातार रेप, हिंसा और हत्या को अंजाम देते रहते हैं। प्रो. पांडेय ने कहा है कि पुलिस, न्यायपालिका और विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं में बैठे स्त्री विरोधी लोगों के विरुद्ध भी संघर्ष करना वक्त की जरूरत है। यह अजीब है कि बलात्कार की घटनाएं जिस दौर में बढ़ती जा रही है उसी दौर में न्यायालयों से इन मामलों में दोषियों को दंडित करने की दर पहले से लगभग आधी हो गई है। बलात्कार की परिभाषा में भी खोट है, लोहे के रॉड, बोतल या किसी अन्य वस्तु से यौनांगों पर किए गए प्रहार को बलात्कार नहीं माना जाता, जबकि इसके लिए तो और भी कठोर सजा होनी चाहिए। बलात्कार की परिभाषा में बदलाव, चिकित्सीय जांच के प्रति तत्परता और पुलिस की जवाबदेही को सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

प्रो. पांडेय ने कहा कि वे संसद में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज्य के इस कथन से कतई सहमत नहीं हैं कि जिस लड़की का गैंगरेप हुआ, अगर वह बच भी गई तो जीवन भर जिंदा लाश बनकर रह जाएगी। सवाल यह है कि क्यों वह जीवन भर जिंदा लाश बनकर रहेगी? उसका गुनाह क्या है? जीवन भर जिंदा लाश बनकर अपराधियों को क्यों नहीं रहना चाहिए? वह बहादुर लड़की है, उसने तो जान पर खेलकर वहशियों का प्रतिरोध किया है, इस तरह के प्रतिरोध और समाज में पूरी स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जीने के स्त्री के अधिकार का तो खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। उसके जीवन की रक्षा हो और पूरे स्वाभिमान के साथ वह इस समाज में रहे, इसकी हरसंभव कोशिश और कामना करनी चाहिए।


सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

12/15/12

जहरीली शराब कांड: पीने वाले दोषी हैं या बेचने वाले


(आज 15 दिसंबर को बिहार में अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा और  भाकपा-माले की ओर से शराबबंदी की मांग को लेकर चक्का जाम आंदोलन हो रहा है और शाहाबाद बंद का आह्वान किया गया है। हिंदकेशरी यादव, देवेन्द्र यादव सरीखे समाजवादी  धारा के कुछ नेता इस आन्दोलन में शामिल हैं. अन्य वामपंथी दलों ने भी इसका समर्थन किया है.  6 से 10 दिसंबर को शाहाबाद क्षेत्र के भोजपुर जिला मुख्यालय आरा में तीस से अधिक लोग जहरीली शराब से असमय मौत के शिकार हो गए। इसके पहले इसी साल के शुरू में शाहाबाद क्षेत्र के ही भाकपा-माले के रोहतास जिला सचिव भैयाराम यादव की हत्या सत्ता संरक्षित अपराधियों ने कर दी थी। उन्होंने शराब भट्ठियों के खिलाफ जनांदोलन का नेतृत्व किया था। पिछले कुछ महीनों में बिहार में विभिन्न जगहों से शराब की व्यापक बिक्र्री के खिलाफ जनप्रतिवाद की घटनाएं सामने आने लगी हैं। आरा के बाद गया में हुई जहरीली शराब से मौतों के बाद शराबबंदी को लेकर फिर से बहस शुरू हो गई है। लेकिन इस बीच मुख्यमंत्री का जो बयान आया उसमें मृतकों के प्रति शोक संवेदना के बजाए कारोबार के तर्क केंद्र में थे। कल मुझे पता चला कि जिला प्रशासन संस्कृतिकर्मियों को लेकर गरीबों के बीच शराब न पीने के लिए जागरूकता अभियान चला रहा है यानी गांव-गांव तक फैले शराब बिक्री के नेटवर्क को खत्म करने के बजाए ये सुधार कार्यक्रम के जरिए स्थिति पर काबू पाना चाहते हैं। यहां पेश है जनमत, दिसंबर में प्रकाशित हो रही एक लंबी टिप्पणी का अंश।)


न भोजपुर में यह पहली घटना है न बिहार में, जब जहरीली शराब पीने से गरीब मजदूर लोग मरे हैं। इसके पहले भी इसी साल अरवल, छपरा और मुजफ्फरपुर जिलों में इस तरह की मौतें हो चुकी हैं। ३-४ मौतों पर पर्दा डाल देना तो प्रशासन के लिए बहुत आसान होता है। कुछ लोग आरा की घटना को शराब के सरकारी डिपो के बंद होने से जोड़ रहे हैं कि इसी कारण अवैध शराब के कारोबारियों को मौका मिला। कुछ सुधारवादी लोग मृतकों को ही दोषी ठहरा रहे हैं कि उन्होंने शराब क्यों पीया। एक युवक ने बताया कि जो गरीब-मेहनतकशों के इलाके हैं वहीं शराब की भट्ठियां और दुकानें ज्यादा मौजूद हैं। उदाहरण के लिए उसने कुछ इलाकों का जिक्र भी किया। लेकिन असल मामला यह नहीं है कि सरकारी डिपो बंद होने के कारण अवैध कारोबारियों को आरा में मौका मिल गया, बल्कि जिस तरह नितीश कुमार की सरकार और प्रशासन ने शराब बेचने की खुली छूट दे रखी है, उससे बिक्री के बहुत बड़े हिस्से पर अवैध कारोबारियों का कब्जा बना है। जाहिर है इस कमाई में सबका अपना अपना हिस्सा होता होगा। बिहार में शराब की खपत इसलिए नहीं बढ़ी कि अचानक उसकी मांग बढ़ गई थी, बल्कि उसे सर्वसुलभ बनाकर दैनिक जरूरत की तरह बनाया गया है। उसे एक ऐसे जबर्दस्त मुनाफे के धंधे की तरह विकसित किया गया है, जिसमें गांव और मुहल्लों के जनप्रतिनिधि और दबंग तक शामिल हैं।

यह शासकवर्गीय ट्रैप है, जिसमें गरीब धनपिशाचों की स्वार्थलिप्सा की भेंट चढ़ रहे हैं। अखबारों में प्रकाशित आंकड़ों का यकीन करें तो जितनी सरकारी शराब की खपत है उससे 8 गुना अधिक शराब लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल है कि बाकी शराब की आपूर्ति कौन कर रहा है? कुछ साल पहले सरकार के ही एक मंत्री जमशेद अशरफ ने जब उत्पाद विभाग पर माफियाओं के कब्जे और राजस्व के भारी नुकसान की बात की थी, तो उन्हें अपने मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था। बिल्कुल साफ है कि अवैध शराब के कारोबार से जुड़े माफियाओं के हाथ कितने लंबे हैं। अभी हाल में एक बुजुर्ग नेता और पूर्व मंत्री हिंदकेशरी यादव पर इसी तरह जहरीली शराब से हुई दस लोगों की मौत और इस कारोबार को मिल रहे पुलिसिया संरक्षण के विरोध के कारण मुजफ्फरपुर के आयुक्त कार्यालय के हाते में शराब माफियाओं ने जानलेवा हमला किया था। यह सब उनके बढ़े हुए मनोबल को ही दर्शाता है।

शर्मनाक यह है कि एक ओर गरीब, महादलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं की मौत हो रही थी और दूसरी ओर सुशासन का दावेदार हुकूमत के नशे में डूबा हुआ था। छह दिसंबर की रात से नौ दिसंबर की रात तक लोग दम तोड़ते रहे, पर नीतीश कुमार चुप्पी साधे रहे। जब उनकी चुप्पी टूटी, तब भी उनकी जुबान पर मृतकों के प्र्रति शोक संवेदना के बजाए कारोबार के तर्क थे। वे बता रहे थे कि व्यक्तिगत तौर पर वे शराबबंदी के पक्षधर हैं, पर शराबबंदी व्यावहारिक नहीं है। वे शराबबंदी वाले राज्यों का हाल देखने का सुझाव दे रहे थे। गरीबों के प्रति उदासीनता, निर्ममता और माफियाओं के प्रति यारी के तौर पर इस बयान को क्यों न देखा जाए? जिस वाकये पर एक राज्य के मुखिया को शर्मिंदा होना चाहिए था, वह उसे नजरअंदाज करके यह दावे कर रहा था कि उसके शासन में शराब से कितना राजस्व बढ़ गया है। वे शान से कह रहे हैं कि पहले तीन सौ करोड़ राजस्व आता था और अब दो हजार करोड़ आता है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि पीने वालों की संख्या नहीं बढ़ी है। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि पहले से ही लोग शराब के आदी रहे हैं, वे उन तक ही शराब पहुंचा रहे हैं, क्या उपकार का भाव है! वे उपकार भी इसलिए कर रहे हैं कि उन्हें मालूम है कि पीने वाला पिएगा ही और चूंकि उनकी माने तो चैकसी के बाद भी अवैध शराब बनती ही है, तो बेहतर है लोग सरकारी शराब पीएं। इस तरह पूरी शातिरपन के साथ वे यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि शराब की जो खपत बढ़ी है, उसमें उनके शासन या नीति का कोई दोष नहीं है। यह सही है कि दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल और शराबबंदी वाले राज्य गुजरात में भी पिछले वर्षों में जहरीली शराब से मौतें हुई हैं। लेकिन किसी भी राज्य में शराब बेचने की वैसी वकालत नहीं की गई है, जैसी बिहार में नीतीश कुमार करते रहे हैं। अगर अवैध सरकार की बिक्री होती है और लोग उससे मरते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि इसे स्वाभाविक चीज मान लिया जाए। 

अभी कुछ माह पहले की ही बात है जब उन्होंने मंच से बोला कि शराब के पैसे से ही वे साइकिल बांट रहे हैं, हालांकि यह भी झूठ ही था, तब मुजफ्फपुर की लड़कियांे ने जिलाधिकारी के समक्ष प्रदर्शन किया था कि हमें शराब के पैसे से साइकिल नहीं चााहिए। सवाल यह है कि जिस राज्य का मुख्यमंत्री इस तरह शराब बेचने को जायज ठहराता हो, राजस्व बढ़ाने का तर्क देता हो, वहां शराब बेचने वालों का मनोबल क्यों नहीं बढ़ेगा! गंभीर सवाल यह भी है कि क्या अन्य दूूसरे नशीले पदार्थों को बेचने से राजस्व बढ़ेगा तो उसे भी कोई सरकार राजस्व बढ़ाने के तर्क से बेचेगी? तब तो हिरोइन, गांजा, ब्राउन सुगर, अफीम- सबकी बिक्री करवानी चाहिए और उनके निषेध के लिए एक विभाग भी बना देना चाहिए! आखिर उनका अवैध कारोबार भी तो बंद नहीं हुआ है। उनका सेवन करने वाले भी तो इस समाज में हैं। 

सच जो है वह साफ-साफ दिख रहा है कि शराब बिहार के शहरों में ही नहीं, गांवों में भी धड़ल्ले से बिक रही है। पहले से ज्यादा दूकानें खुल गई हैं। नीतीश कुमार के शासन में उसकी सहज उपलब्धता के कारण ही शराब का सेवन बढ़ा है। ठीक से पड़ताल की जाए तो जो वैध शराब के अड्डे बताए जा रहे हैं, वहीं से अवैध कारोबार भी चलता है। बात-बात में कानून के राज का जुमला इस्तेमाल करने वाले नीतीश कुमार को यह मालूम होना चाहिए कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में सुनाए गए एक फैसले में कहा था कि केंद्र और राज्यों की सरकारें संविधान के 47 वें अनुच्छेद पर अमल करें और जिसमें शराब की खपत को धीरे-धीरे घटाना सरकार का कर्तव्य बताया गया है। लेकिन नीतीश बाबू को सर्वोच्च न्यायालय के किसी फैसले की क्यों परवाह होगी? वे न्याय के साथ विकास जो कर रहे हैं!

कोई जरा पड़ताल तो करे कि समाज में वे कौन सी मानसिक और आर्थिक परिस्थितियां सरकारों ने पैदा की है, जिसके कारण लोग जानलेवा तरीके से शराब का सेवन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अपराध शराब पीने वाले कर रहे हैं या उन्हें शराब के आदी बनाने और उन्हें मौत की ओर धकेलने वाले? यह किससे राजस्व वसूल कर रहे हैं नीतीश कुमार? 200 एमएल के एक पाउच की कीमत सत्रह रुपये है, जो सरकारी आंकड़े के अनुसार सत्तर प्रतिशत भारतीयों के औसत दैनिक आय के आसपास है। यह तो एक तरह खून पसीने से कमाई गए पैसे को लूटने का खेल है, यह तो गरीबों के रक्त चूसने की तरह है। आज तो वे जहरीली शराब पीकर मर गए, पर अगर नहीं भी मरते तो धीरे-धीरे उनका रक्त तो चूसा ही जाता। सामान्य मौत से पहले तो वे मर ही रहे हैं, जिसका कोई आंकड़ा और सर्वेक्षण कहीं नहीं है, आंकड़ा है तो बढ़ते राजस्व का। 

दिलचस्प यह है कि अवैध शराब का बड़े कारोबारी जिनके वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन और दूसरी शासकवर्गीय पार्टियों से गहरे रिश्ते हैं, उन्होंने महादलित और दलित बस्तियों को ही अपने कारोबार का केंद्र बना रखा है। क्या महादलित या दलित बस्तियों को मदिरामुक्त करने का अभियान अंततः उन्हीं राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ नहीं होगा, जिनको कहा जा रहा है कि वे विकासवादी हो गई हैं और शराब की बिक्री जिनके विकास का बहुत बड़ा आधार बना हुआ है। भोजपुर के बगल के जिले रोहतास में भाकपा-माले के जिला सचिव भैयाराम यादव, जिनकी जद-यू से जुड़े अपराधियों ने इस साल के शुरू में हत्या कर दी थी, उन्होंने शराब भट्ठियों के खिलाफ आंदोलन का भी नेतृत्व किया था। हिंदकेशरी यादव पर हमला हाल का मामला है। 

आरा के बाद गया की दो भूंईटोलियों में भी 10 लोगों की जहरीली शराब से पीने की खबर आई। शराब भट्टियों के खिलाफ पिछले महीनों में धीरे-धीरे लोगों का आक्रोश सामने आने लगा है। कई जगह भट्ठियां तोड़ी गई हैं। महिलाओं की ओर से शराब के कारोबार का विरोध हो रहा है। 11 दिसंबर को आरा में महिला संगठन ऐपवा के बैनर तले महिलाओं ने जिलाधिकारी के समक्ष प्रदर्शन किया और जब उनके कर्मचारियों ने झूठ बोला कि जिलाधिकारी नहीं हैं, तो महिलाएं समाहरणालय का गेट तोड़कर उनके चंेबर तक पहुंच गईं और जिलाधिकारी प्रतिमा वर्मा को उनकी मांगों को सुनना पड़ा। आरा रेलवे स्टेशन के पास झोपड़पट्टी में भी महिलाओं के क्षोभ और गुस्से को महसूस करते हुए भी मुझे लगा था कि वे नीतीश बाबू के राजस्व बढ़ाने के तर्क से सहमत नहीं हैं, वे शराब की धड़ल्ले से हो रही बिक्री को बंद कराना चाहती हैं। 

भाकपा-माले पोलित ब्यूरो सदस्य स्वदेश भट्टाचार्य ने ठीक ही कहा कि बिहार की बर्बादी के आधार पर बिहार का राजस्व बढ़ाने की बात जनता के साथ धोखा और गरीबों के प्रति बेरूखीपन है। जनता को यह हक है कि वह जरूरी समझे तो सरकारी लाइसेंस वाली दूकानों को भी बंद करवा दे। इस सरकार में गांव-गांव में सामंती, माफिया, अपराधी और दबंग ताकतों को बढ़ावा दिया गया है, उन्हीं के जरिए शराब का कारोबार भी चल रहा है। कुछ भी करने का लाइसेंस तो सरकार ने शराब माफियाओं और भूमाफियाओं को ही दे रखा है। बिहार का विकास खेती और उद्योग के विकास से होगा, यहां के लोगों की मानसिक-शारीरिक क्षमता के उचित उपयोग से होगा, न कि शराब से।

जगदीश मास्टर की शहादत के चालीस साल

जननायक, जनांदोलन और साहित्य



दिल्ली देखे जरा

हम तुम्हारी कथा
ले जा रहे राजधानी
टूटे-फूटे साथियों के संग
नहीं कोई बेमिसाल ढंग।

जननायक,
हम तुम्हारे चारण
तुम्हारे उदास साथियों की
लड़ाकू जिजीविषा से खोज के
तुम्हारी आवाज के बीज
रोप देना चाहते हैं हर ओर।

देखे जरा 
यह बेरहम 
राजधानी भी।

सुनो दिल्ली

दिल्ली में बैठे तुम
नहीं जान पाओगे
सबकुछ खत्म करने का जोम
क्या होता है
और तुम
कभी फर्क नहीं कर पाओगे
हत्या और हत्या के बीच का फर्क।

यह नाटक बंद करो
अब भी है वक्त
सुनो जमीन की धमक
जो लगती है 
अविश्वसनीय तुम्हें

सुनो!
फिर-फिर सुनो।


9 अक्टूबर 1998 को ट्रेन में मैंने ये दो कविताएं लिखी थीं। उस रोज हम दिल्ली में जसम के सम्मेलन में ‘मास्टर साब’ का नाट्य मंचन करके लौट रहे थे। ज्ञानपीठ ने मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी के एक पुराने बांग्ला उपन्यास का अनुवाद ‘मास्टर साब’ छापा था। इसके पहले जनवरी में हमलोग आरा में इस उपन्यास का तीन दिवसीय मंचन कर चुके थे, जिसमें दर्शकों की भारी मौजूदगी थी। चित्रकार राकेश दिवाकर ने नाटक के प्रचार के लिए बड़ी-बड़ी वाल पेंटिंग बनाई थी। लगभग तीस कलाकारों ने उस नाटक को किसी आंदोलनात्मक अभियान की तरह तैयार किया था।

उन दिनों बिहार में सत्ता के संरक्षण में जातीय-सांप्रदायिक घृणा से भरी एक निजी सेना गरीब-मेहनतकशों का जनसंहार कर रही थी। उसका सरगना मासूम बच्चों और बेगुनाह औरतों की हत्या को भी जायज ठहरा रहा था और जिनका जातिवादी-सामंती व्यवस्था और सत्ता के साथ रिश्ता था, वे साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनीतिकर्मी, समाजसेवी और नागरिक लोग आंदोलन करने वाले गरीबों और उनकी पार्टी पर ही अत्याचार करने का आरोप लगा रहे थे। बथानी टोला में दलित-मुस्लिम महिलाओं और बच्चों का नृशंस जनसंहार हुए डेढ़ साल बीत चुके थे। हम देख रहे थे कि साहित्य में सतही मध्यवर्गीय स्त्री-दलित विमर्श चलाने वाले किस तरह उस सरकार से पुरस्कार ग्रहण कर रहे थे, जो हत्यारों को खुलेआम संरक्षण दे रही थी। हम यह भी महसूस कर रहे थे कि किस तरह गरीबों का आंदोलन किसी अंधहिंसात्मक प्रतिक्रिया में न चला जाए, इसकी सचेत कोशिशें उसके नेतृत्व द्वारा चलाई जा रही हैं।

‘मास्टर साब’ का मंचन उसी दौर में हुआ और वह अपने आप में मानो गरीबों के आंदोलन पर किए जा रहे हमले का एक मजबूत वैचारिक-सांस्कृतिक जवाब था। 

मास्टर साहब के बारे में कब मैंने पहली बार जाना आज याद नहीं है। शायद किशोर उम्र में पहली बार मेरे एक मामा ने बताया था कि मधुकर सिंह ने ‘अर्जुन जिंदा है’ नाम का जो उपन्यास लिखा है, वह जगदीश मास्टर की जिंदगी पर आधारित है, कि उस उपन्यास को छिपाकर रखा जाता है, कि मास्टर जगदीश नक्सलाइट थे, कि उन्होंने सामंती उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव और महिलाओं पर किए जाने वाले अत्याचार का विरोध किया था। बाद में मैंने जब मधुकर सिंह की कहानियां पढ़ीं, तो कई कहानियों में जगदीश मास्टर के जीवन की छवि दिखाई पड़ी। जगदीश मास्टर उनके साथ ही आरा के जैन स्कूल में साइंस के शिक्षक थे। मुझे जगदीश मास्टर के एकाध शिष्य जो मिले, उन्होंने बताया कि वे छात्रों में बहुत लोकप्रिय थे। 

मास्टर साहब एक ऐसे बुद्धिजीवी थे, जिनका अपना लिखा हुआ हमारे पास कुछ नहीं है, हालांकि मधुकर सिंह बताते हैं कि वे अपनी डायरी में कविताएं लिखा करते थे। उनके बारे में जो दूसरों ने लिखा, वही आज हमारे पास है। आखिर वह क्या बात है कि शहादत के चालीस साल बाद भी मास्टर जगदीश हमें याद आते हैं और उनके द्वारा शुरू किया गया आंदोलन हमें अपनी ओर आकर्षित करता है? क्या यह सच नहीं है कि विचार जब जीवन में उतरता है, तभी वह ऊर्जावान होता है? और कलम का भी रिश्ता उस जीवन से जब बनता है तब उसमें भी ताकत आती है?

यह एक अद्भुत संयोग है कि मास्टर साहब के जन्म और शहादत की तारीख एक ही है। 10 दिसंबर 1935 को उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिले के एक गांव एकवारी में हुआ था। उनकी उम्र जब बारह साल हुई तो कहा गया कि देश आजाद हो गया। लेकिन जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई, उन्हें लगा कि गरीब खेतिहर मजदूरों और मेहनतकश किसानों को तो कहीं कोई आजादी और बराबरी हासिल ही नहीं है। उस सामंती माहौल में संघर्ष करते हुए वे शिक्षक तो बन गए, पर उन्हें लग रहा था कि समाज में बहुत बदलाव नहीं हुआ है, शोषण-उत्पीड़न उसी तरह बरकरार है। उन्होंने उस दौर में कई चेतनशील युवाओं के साथ आरा शहर में दलितों को संगठित किया। उनके साथियों में विभिन्न जातियों के नौजवान थे। इन लोगों ने हरिजनिस्तान की मांग के साथ एक बड़ी रैली की। लेकिन उन्हें बहुत जल्दी यह लग गया कि सामंतवाद इस रास्ते से खत्म नहीं होगा। वे रास्ते की तलाश में थे। इस बीच कम्युनिस्ट नेता रामनरेश राम सामंतों के धनबल को चुनौती देते हुए एकवारी के मुखिया बन गए थे। 1967 में जब वे सीपीआई-एम के उम्मीदवार के बतौर सहार विधानसभा से चुनाव लड़े तो उनके चुनाव एजेंट की जिम्मेवारी मास्टर जगदीश ने संभाली और उसी चुनाव में अपने ही गांव में सामंती शक्तियों द्वारा फर्जी वोटिंग का विरोध करने पर उन पर जानलेवा हमला हुआ, सामंती शक्तियों ने अपने जानते उन्हें मार ही दिया, लेकिन कई माह तक जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष में जिंदगी की जीत हुई। समाज को बदलने के लिए वे गांव लौटे। इस बीच नक्सलबाड़ी विद्रोह हो चुका था और उसकी चिंगारी संघर्ष का रास्ता तलाश रहे इन नौजवानों तक पहुंची और फिर उसके बाद जो समर शुरू हुआ, वह देश का सामंतवादविरोधी किसान संघर्ष और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास का एक शानदार अध्याय बन गया। जगदीश मास्टर, रामनरेश राम और रामेश्वर यादव की त्रयी के नेतृत्व में जो संघर्ष शुरू हुआ, वह भोजपुर आंदोलन के रूप में चर्चित हुआ और जनकवि नागार्जुन समेत अनेक साहित्यकारों ने इसका आह्लाद के साथ स्वागत किया। सत्तर के दशक में शासकीय दमन में मास्टर जगदीश के कई साथी शहीद हुए, यहां तक पुनर्गठित कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा-माले के महासचिव सुब्रत दत्त उर्फ जौहर भी पुलिस की गोलियों से भोजपुर में ही शहीद हुए। मास्टर साहब के साथी रामनरेश राम भूमिगत होकर उस संघर्ष को चलाते रहे, आंदोलन विभिन्न परिस्थितियों में अपने संघर्ष के तौर-तरीके बदलता रहा, पर गरीबों की राजनीतिक-सामाजिक दावेदारी का संघर्ष कभी थमा नहीं, यहां तक कि उसी सहार से रामनरेश राम 28 साल बाद जनता के प्रतिनिधि बने और जब तक जीवित रहे, कभी पराजित नहीं हुए। 

महाश्वेता देवी का उपन्यास चूंकि मास्टर साहब की जिंदगी पर केंद्रित है, इस कारण उसमें बाद के संघर्षों का जिक्र नहीं है, लेकिन बाद के संघर्षों में वह किताब भी किसी न किसी रूप में शामिल है। इस किताब की जब भी मैंने कोई प्रति ली, कोई न कोई इसे हमेशा के लिए लेकर चला गया और मुझे इससे खुशी होती रही। दिनेश मिश्र उस वक्त ज्ञानपीठ के निदेशक थे। दिल्ली आया तो उनसे कई बार मुलाकात हुई। अचानक एक दिन किताब पलटते वक्त उनका नाम देखा और उन्हें मैंने उन्हें बधाई दी ज्ञानपीठ से इस किताब के प्रकाशन के लिए। कौन कहता है कि किताबों का प्रभाव नहीं होता? मेरे सारे साथी इस किताब से प्रभावित रहे हैं। इसका जब मंचन हुआ, तो मास्टर साहब की भूमिका मुझे ही निभाने का मौका मिला और इस नाते भी उनके आंदोलन के गहरे असर में आज भी हूं। मास्टर साहब तो अपने एक साथी रामायण राम के साथ 10 दिसंबर 1972 को ही शहीद हो गए। लेकिन वे संघर्षशील जनता के लिए हमेशा लीजेंड बने रहे, जनता ने उन्हें कभी विस्मृत नहीं किया। शासकीय हिंसा का प्रतिरोध और उसकी हर रणनीति का माकूल जवाब देने के लिए संघर्ष के उपयुक्त तरीके को अपनाना भोजपुर आंदोलन की खासियत रही है। 

‘मास्टर साहब’ और ‘अर्जुन जिंदा है’ ही नहीं, बल्कि कई अन्य उपन्यास और कहानियां जगदीश मास्टर की जिंदगी से प्रभावित रही हैं। हमने एक साल उनकी शहादत के मौके पर ‘साहित्य में जननायक’ विषय पर विचारगोष्ठी की थी, जिसमें इस तरह की कई रचनाओं की चर्चा हुई थी। बाद में उनके जीवन पर केंद्रित सुरेश कांटक का महाकाव्य ‘रक्तिम तारा’ प्रकाशित हुआ, तो उसके लोकार्पण के अवसर पर भी हमने साहित्य, जनांदोलन और जननायकों के रिश्ते पर बातचीत की। 

इस बार 10 दिसंबर 1972 को मास्टर साहब की शहादत की 41वीं वर्षगांठ के अवसर पर दो घटनाएं हुईं। एक तो आरा शहर में वर्षों से प्रतीक्षित मास्टर जगदीश स्मृति भवन के निर्माण का काम शुरू हुआ, जो भोजपुर आंदोलन से जुड़े इतिहास और दस्तावेजों का एक अर्काइव भी होगा, इसके निर्माण का काम जनसहयोग से ही आगे बढ़ रहा है, दूसरे भोजपुर जिला के बिहिया नामक प्रखंड के मुसहर समुदाय के उसी टोले में मास्टर जगदीश और रामायण राम के स्मारक का शिलान्यास किया गया, जहां गलतफहमी में गरीबों ने उनकी हत्या कर दी थी। हुआ यह था कि 40 साल पहले वे उस इलाके के एक जालिम सामंत का अंत करके लौट रहे थे और उस सामंत के हितैषी चोर और डाकू का शोर मचा रहे थे। पार्टी के उसूल के अनुसार गरीब जनता पर गोली चलाने का निर्देश नहीं था। रामायण राम ने मास्टर जगदीश को निकल जाने के लिए कहा, पर वे उन्हें अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए। मुसहर लोगों को अपना वे परिचय दे पाते, उसके पहले ही उनकी लाठियों से उनकी मौत हो गई। बाद में जब उन लोगों को पता चला तो वे गहरे शोक में डूब गए। हालांकि शासकीय दमन में बहुत सारे नेतृत्वकारियों की शहादत के बावजूद आंदोलन अगर फिर से उभरा, और बार-बार पुनर्नवा होता रहा, तो उसकी नींव में ये गरीब ही रहे। फिर भी एक कसक तो इस समुदाय के भीतर रहती ही थी कि उन्हीं के हाथों मास्टर साहब की हत्या हो गई थी। 
40 साल बाद उसी समुदाय के दिनेश मुसहर ने जैसे उस कलंक को मिटा दिया। उन्होंने अपनी जमीन उनके स्मारक के लिए दी। स्मारक के शिलान्यास के मौके पर दिनेश मुसहर और उनकी पत्नी का चेहरा गर्व से भरा हुआ था। लगभग डेढ़ दशक पहले भी स्मारक बनाने की कोशिश की गई थी, जिसे पुलिस ने कामयाब नहीं होने दिया था। लेकिन इस बार न केवल स्मारक का शिलान्यास हुआ, बल्कि वहां जनसभा भी हुई। 

महाश्वेता देवी के उपन्यास के अंत में बूढ़ी दादी जो कथा सुना रही है, उसका अंत नहीं हुआ है, वह दास्तान अभी जारी है। हालांकि मरघट की शांति कायम करने की कई बार कोशिश की गई, पर जीवन है कि कभी हार नहीं मानता; बराबरी, इंसाफ और आजादी के सपने हैं कि जो हर दमन, झांसे और प्रलोभन को पार कर अपना वजूद बनाए रखते हैं। 

12/14/12

पं. रविशंकर को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि



12 दिसंबर, 2012 के दिन सैन फ्रांसिस्को, अमरीका में महान सितारवादक पं. रविशंकर (मूल नाम रबिन्द्र शंकर चौधुरी) ने आखिरी साँसें लीं। 7 अप्रैल, 1920 को जन्मे रविशंकर ने 10 साल की उम्र से ही अपने बड़े भाई उदयशंकर की नृत्य-मंडली के साथ सारी दुनिया का भ्रमण शुरू कर दिया। 17 साल की उम्र में उन्होंने नृत्य कला से हटकर संगीत के प्रति पूरे तौर पर समर्पण का निर्णय लिया। 18 की उम्र से बाबा अलाउद्दीन खान से सितार की तालीम लेनी शुरू की।

 1941 में अन्नपूर्णा देवी से उनका विवाह हुआ। अन्नपूर्णा बाबा अलाउद्दीन खान की पुत्री तथा विख्यात सरोदवादक अली अकबर खान की बहन ही नहीं, बल्कि खुद एक महान सुरबहार वादक और संगीतकार हैं तथा प्रसिद्ध बांसुरी वादक हरिप्रसाद चैरसिया और सितारवादक निखिल चक्रवर्ती की गुरु भी। 1942 में दोनों के पुत्र शुभेंदु का जन्म हुआ, लेकिन दोनों का साथ अधिक दिन नहीं चल सका। 1940 के दशक में ही रविशंकर इप्टा के नजदीक आए। इन्हीं दिनों उन्होंने मैक्सिम गोर्की की कृति ‘लोवर डेफ्थ्स’ पर आधारित चेतन आनंद की हिंदी फिल्म ‘नीचा नगर’ का संगीत दिया। ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल’ में भी रविशंकर ने संगीत दिया। बाद को हिंदी फिल्मों में उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी की ‘अनुराधा’, त्रिलोक जेटली निर्देशित ‘गोदान’ और गुलजार की ‘मीरा’ का भी संगीत दिया, लेकिन फिल्म संगीत में उनकी शोहरत का आधार ‘अपू त्रयी’ के नाम से विख्यात सत्यजित राय की तीन फिल्मों-‘पथेर पांचाली (1955)’, ‘अपराजितो’ तथा ‘अपूर संसार’ में दिया गया संगीत ही है। 1982 में उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की ‘गाँधी’ के लिए भी संगीत दिया। 1949 से 1956 तक उन्होंने आकाशवाणी में बतौर संगीत निर्देशक काम किया। 1952 में रविशंकर की मुलाकात दूसरे विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों के सैनिकों की हौसला-अफजाई के लिए संगीत के कार्यक्रम देनेवाले विश्विख्यात वायलिनवादक तथा आर्केस्ट्रा कंडक्टर यहूदी मेनुहिन से हुई जिनके बुलावे पर 1955 में न्यूयार्क में उन्होंने अपना कार्यक्रम दिया। दोनों का साझा अल्बम ‘वेस्ट मीट्स ईस्ट’ नाम से बाद को निकला जिसे 1967 में ग्रैमी अवार्ड मिला। 1964 से 1966 के बीच रविशंकर अमरीका में 60 के दशक के तमान व्यवस्था-विरोधी युवाओं की पीढ़ी से जुड़े राक और जैज संगीत के नामचीन प्रतिनिधियों जार्ज हैरिसन, जॉन काल्तरें, जिमी हेंड्रिक्स आदि के साथ भी संगीत कार्यक्रम देते देखे जाते रहे। पश्चिम और पूरब की संगीत परम्पराओं के सम्मिश्रण के जिस ‘फ्यूजन म्यूजिक’ के आगाज का श्रेय पं. रविशंकर को जाता है, उसमें पूरब और पश्चिम के भीतर भी अनेक अंतर्धाराओं का शुमार है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में वे बड़े आराम से कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों का उत्कृष्ट सम्मिश्रण उसी तरह कर सकते थे जिस तरह पश्चिम के क्लासिकीय और लोक संगीत का भारतीय संगीत के साथ। 

भारतीय संगीत के विश्व-प्रसार, संगीत की मार्फत दुनिया भर के इंसानों के बीच खडी सरहदों के अतिक्रमण के साथ ही साथ इप्टा से आरंभिक दिनों में जुड़ाव, बांग्लादेश के रिफ्यूजियों के सहायतार्थ 1971 में न्यूयार्क में बाब डिलन, एरिक क्लैपटन, जार्ज हैरिसन आदि के साथ मिलकर रॉक कंसर्ट आयोजित कर करोड़ों डालर इकट्ठा करने की पहल तथा भारत में 1990-92 में बाबरी-मस्जिद ढहाए जाने के बाद कलाकारों के सांप्रदायिकता-विरोधी मोर्चे में शिरकत करके उसे मजबूती देने तक, उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम थे। भारत की और भारतीय संगीत की जिस गंगा-जमुनी तहजीब के वाहक उनके गुरु बाबा अलाउद्दीन खान जैसे महान संगीतज्ञ थे, उसकी नुमाइंदगी वे विश्व-स्तर पर ताजिन्दगी करते रहे। विगत 4 नवंबर को उन्होंने आक्सीजन मास्क लगाकर अपनी आखिरी प्रस्तुति दी थी।

1967 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1986 में वे राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुए तथा 1999 में भारतरत्न सम्मान से नवाजे गए। वे ऐसे संगीतकार रहे, जिन्हें जीवन में तीन बार ग्रैमी पुरस्कार मिला। मरणोपरांत उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी अवार्ड देने की घोषणा हुई है। 

मानवीय संस्कृति अत्यंत प्राचीन काल से ही मिश्रित रही है, संकरता संस्कृति का प्राण है, उसकी गति है, जबकि विशुद्धता पर अधिक जोर उसे गतिरुद्ध करता है। पं. रविशंकर का 92 साल का अद्वितीय कलात्मक जीवन इसी सत्य को प्रखरता से स्थापित करता है। विश्व-संगीत के तसव्वुर को व्यावहारिक स्तर पर चरितार्थ करने में उनका महान प्रयास सदैव स्मरणीय रहेगा। 

उन्हें जन संस्कृति मंच की विनम्र श्रद्धांजलि! 


-सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, 
जन संस्कृति मंच की ओर से जारी