1/14/13

अपनी ही पोल खोलते जनसत्ता संपादक- खालिद


(जनसत्ता के पन्नों पर संपादक ओम थानवी जी ने दो लेख लिखे हैं। पहला यह कहते हुए कि दिल्ली वाली बर्बर घटना के बाद उमड़े जनांदोलन में साहित्य संस्कृति के लोग न थे और यह कि लेखकों के संगठन क्या कर रहे थे। जब साहित्यिक संगठनों से तमाम साथियों ने इसका तथ्यपरक प्रतिवाद किया तो दूसरा लेख आया। दूसरे लेख में खासमखास जसम को निशाना बनाया गया। थानवी जी ने बड़े सवाल उठाने की झोंक में तमाम तथ्यों को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। बात मनमानेपन और चौधराहट की है। अगर आप के पास अखबार है तो क्या आप की झूठ बात भी सही मानी जाएगी? सो इस भ्रम को तोड़ना जरूरी है। वैकल्पिक मीडिया के इस जमाने में ऐसी चौधराहट प्रिंट की बची-खुची प्रासंगिकता को भी नाश कर कर डालेगी। युवा कवि खालिद की निम्न टिप्पणी इसी बावत है।)


अपनी ही पोल खोलते जनसत्ता संपादक ओम थानवी 

13 जनवरी को जनसत्ता में उसके संपादक ओम थानवी की एक टिप्पणी छपी है. पिछले हफ्ते भी उनका लेख जनसत्ता में देखा था. मुझे समझ में नहीं आया कि अचानक उनको लेखकों की भूमिका की याद कैसे आ गई, और जब याद आ ही गई तो जो लेखक दिल्ली से लेकर पूरे देश में गैंग रेप के खिलाफ सड़कों पर थे, वे उन्हें क्यों नहीं दिखे? खैर, आज की उनकी टिप्पणी पढ़ के लगा कि उनका मकसद कुछ और था, क्योंकि लेखक की भूमिका की अपेक्षा करने वाला वाला कोई बुद्धिजीवी उनका उपहास तो बिल्कुल नहीं उड़ाता, जो लगातार इस क्रूर घटना के खिलाफ सक्रिय थे.

ओम थानवी की टिप्पणी खुद ही अंतर्विरोध से भरी हुई है. एक ओर वे कुछ लेखकों का नाम गिनाते हैं, और दूसरी ओर कहते हैं कि लेखक संवेदनशील ही नहीं थे. उनकी आज की टिप्पणी के सन्दर्भ में कुछ बिन्दुओं पर मैंने अपनी बात कही है.

1. जनसत्ता सम्पादक की निगाह में आशुतोष कुमार, सुधीर सुमन, कपिल शर्मा, रविप्रकाश, मार्तण्ड, खालिद आदि जिनका नाम उन्होंने लिया है, (जसम की रिलीज़ के हवाले से) लेखक न भी हों और सिर्फ मदन जी को ही वे इस श्रेणी में रखते हों, तो भी वे संस्कृतिकर्मी तो हैं। फिर मदन कश्यप भी जन संस्कृति मंच के ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है, उनके हाथ में बैनर नहीं था, इसलिए बेचारे जनसत्ता सम्पादक को लगा कि वे किसी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे। हालाँकि लगता है कि उन्हें यह नजर नहीं आया कि मदन जी ने गोरख पाण्डेय की कविता का पोस्टर भी ले रखा था, जिसके नीचे जसम लिखा हुआ था. मैं वहां पहुंचा तो मैंने उनसे वह कविता पोस्टर ले लिया, जिस पर लिखा हुआ था- ये आंखे हैं/ तकलीफ का उमड़ता हुआ समुन्दर/ इस दुनिया को/ जितनी जल्दी हो/ बदल देना चाहिए. मैं, मदन जी, सुधीर सुमन उस वक्त एक ही साथ थे जब आंसू गैस का एक गोला वहां गिरा, जिसे मैंने अपने जूते से दूर फेंकने की कोशिश की, पर मेरी आँखों पर धुएं का असर हो गया. मैंने एक अपरिचित प्रदर्शनकारी से पानी का बोतल लेके अपनी आँखों को धोया. अब मैं तो बिल्कुल नया लेखक हूँ. मुझे प्रदर्शन में शामिल होना जरूरी लगा. ओम थानवी मुझे लेखक मानें न मानें इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं तो इसके बाद भी जसम के साथियों के साथ दूसरे प्रदर्शनों में शामिल हुआ.

2. मुझे 28 दिसंबर के जसम की विचारगोष्ठी की सूचना भी सुधीर सुमन के मेल और एसएमएस से मिली थी. उस गोष्ठी में सुधीर सुमन भी थे, और प्रोग्राम के नोट्स ले रहे थे, जिनकी मौजूदगी की सूचना लगता है ओम थानवी को नहीं मिली. खैर, अगर ओम थानवी के नजरिए को माने तो दिल्ली की जसम की गोष्ठी में शोभा सिंह भी जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नहीं, बल्कि जनसत्ता सम्पादक के दृष्टिकोण से सिर्फ अपना प्रतिनिधित्व कर रही होंगी। मुझे लगता है कि वे हाथ धो कर जसम के एक ही उपाध्यक्ष यानी मंगलेश डबराल को खोज रहे थे, वे मिले नहीं, लिहाजा उनके हिसाब से वहां जसम नहीं था. प्रलेस-जलेस को पहले ही वे खारिज कर चुके थे।

चलिए मान लिया जाए कि वही लोग लेखक/संस्कृतिकर्मी हैं, जो जनसत्ता सर्टिफाइड हैं, तो भी जनसत्ता का लखनऊ संस्करण (21 दिसंबर) जिनकी तस्वीर प्रदर्शन में भाग लेते हुए छाप रहा था (जसम के महासचिव और उपाध्यक्षों में से एक का), उन्हें वे इंडिया गेट पर क्यों तलाश रहे हैं? दिल्ली में बैठ कर आप गिन रहे हैं कि इंडिया गेट पर कौन-कौन था या नहीं था, दूसरी ओर हर प्रदेश की राजधानी में, तमाम छोटे शहरों में लेखक/ संस्कृतिकर्मी अपनी क्षमता अनुसार उतरे हुए हैं और रांची, पटना, लखनऊ, भागलपुर, बलिया, दरभंगा, बेगुसराय, मधुबनी, समस्तीपुर, इलाहाबाद, गोरखपुर तमाम जगहों पर अखबार उन्हें प्रमुखता से छाप रहे हैं। लेकिन बेचारे जनसत्ता सम्पादक बैनर तलाश रहे थे, इंडिया गेट पर। अब पटना में आलोकधन्वा न जलेस का बैनर लेकर उतरे, न अरुण कमल प्रलेस का और न संतोष झा जसम का। जनसत्ता सम्पादक ने उनके लिए बैनर सिलवाए ही नहीं! ज़ाहिर है कि न तो किसी ने नाम गिनवाया, न बैनर पेश किया, क्योंकि नाम गिनने का पुनीत कार्य थानवी साहेब के हाथों ही संपन्न किया जाना था। 

3. ओम थानवी ने सवाल किया है कि पीडिता ने बयान 21 दिसंबर को दिया तो जसम ने कैसे 19 दिसंबर को उसके विवरण के बारे में बयान दे दिया. लगता है कि वे दूसरे अखबार नहीं देखते या यह नहीं जानते कि किन स्रोतों से ख़बरें सरकारों की पाबंदियों के बावजूद आंदोलनकारियों तक पहुँच जाती है. सवाल यह है कि क्या जसम के बयान में दिए गए तथ्य गलत थे? अगर वह बयान सही हैं तो सवाल यह खड़ा होता है कि उस तथ्य के बारे में एक संपादक कैसे अनजान था?

18 दिसंबर के तमाम समाचार पत्रों में इस भीषण काण्ड की भयानकता की सचमुच 'रोंगटे खड़े कर देने वाली ' खबरें आ चुकी थीं. यहाँ मैं 18 दिसंबर के कुछ समाचारपत्रों के लिंक दे रहा हूँ जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि जसम के 19 दिसंबर के बयान में वे तथ्य कहाँ से आए. 


4. जसम की दिल्ली गोष्ठी का समाचार जनसत्ता को छापना इसलिए ज़रूरी नहीं लगा, क्योंकि इससे यह थ्योरी टिक नहीं पाती कि संगठन इस प्रतिरोध में शामिल नहीं थे। अब अचानक कहाँ से इस गोष्ठी की याद आ गई? सिर्फ यह दिखाने के लिए कि इसमें 2-3 लोग जिन पर आप हमला करना चाहते हैं, वे नहीं थे। ओह कितनी खराब बात है न कि उन्होंने जनसत्ता सम्पादक को सूचना देकर अपने न आने का कारण नहीं बताया, मानो यह मीटिंग जसम ने नहीं, जनसत्ता ने बुलाई हो! यानी मीटिंग अपने आप में जनसत्ता सम्पादक की निगाह में इतना महत्त्व भी नहीं रखती कि उसकी रिपोर्ट छापी जाए, लेकिन यह गिनाने के लिए कि कौन नहीं था इस मीटिंग में, उन्हें इसकी याद हो आई। 

5. ओम थानवी ने जसम के प्रेस रिलीज में प्रो. मैनेजर पाण्डेय की भाषा पर सवाल उठाया है. उस बयान में वही कहा गया है जो महिला आन्दोलन की प्रमुख मांगों में से है, उसकी भाषा तथ्यपरक ही हो सकती है, कोमल और सुन्दर नहीं। इस सन्दर्भ में मुझे यही कहना है कि जघन्य कृत्यों के खिलाफ लोगों का विवेक जगाना भाषा का काम है, मीठे वचन और सुभाषितों से उन्हें छिपाना नहीं, बकौल नागार्जुन 'लाएं मीठे वचन कहाँ से? आसाराम बापू भी कह रहे हैं कि बलात्कारी को मीठे वचन 'भाई' कह देने से बलात्कार बच जाता। सच तो यह है कि ये रिलीज़ जनसत्ता को मेल की गई थी। मेरी तरह बहुत से अन्य लोगों के पास भी वह मेल पहुँचा होगा, जिसमें जनसत्ता का मेल आई- डी दिख जाता है। न सम्पादक ने देखा, न छापा, और लिख बैठे कि किसी ने कुछ किया नहीं। जब लोगों ने ध्यान दिलाया, तो बचाव में आ गया भाषा का बहाना। एक झूठ बोलने के बाद कई झूठ बोलने के लिए अभिशप्त होता है आदमी, लेकिन अपने कहे से ही अपनी पोल खोलता रहता है। आइये देखें कि जस्टिस वर्मा आयोग के सामने विभिन्न स्त्री संगठनों ने जघन्यतम कृत्यों के मामले में क़ानून में सुधार के लिए क्या कहा और किस भाषा में कहा, ख़ास तौर पर जॉइंट मेमोरैंडम के सेक्शन III((7,8,9,10) में - 

III) Amendments to the Sexual Assault Sections of the Indian Penal Code

7. In the sections on aggravated penetrative and non-penetrative sexual assaults we further feel that sexual assault by personnel of the armed forces and by personnel of the para military and other allied forces, as also private armies engaged by the state, should be included.


8. Similarly, penetrative and non-penetrative sexual assault at the time of or together with other forms of communal or caste or sectarian violence should be categorized as an aggravated form of sexual assault.

9. In clause (b) of Section 376(2) sexual assault at the instigation of or with the consent or acquiescence of a public official or other persons acting in an official capacity should also be added as an aggravated form of sexual assault. This clause should also be added in the new section which should deal with aggravated forms of non-penetrative sexual assault.

10. In Section 375(a) of the 2012 Bill penetration of the mouth apart from the vagina etc of a person with any part of a body or an object of another person is defined as sexual assault. However, if an object or a part of the body, for example a finger, is inserted into the mouth it would be appropriate to equate this with penetrative sexual assault. Incidentally the Law Commission draft on which this clause seems to be based does not mention the mouth in Section 375 (b). It is only when the penis is forcibly introduced in the mouth that penetrative sexual assault occurs.


कृपया जनसत्ता सम्पादक साधु भाषा में इसका अनुवाद कर दें।

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