1/15/13

क्या आप भोला जी को जानते हैं ?


तोहरा नियर जिनगी में कोर्इ ना हमार बा

कवि भोला जी, आज सुबह नहीं रहे। आरा में उनका निधन हो गया। डाइबिटिज की बीमारी से उनका शरीर लगातार जूझता रहा, पर आज उनकी सांसें थम गर्इं।

भोला जी की कविताएं क्या हैं? आम जनता का दुख-दर्द ही तो है उनमें, जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार ही तो है उनकी कविताएं। उन्होंने किसी पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए तो लिखा नहीं। जिस तरह कबीर कपड़ा बुनते हुए, रैदास जूते बनाते हुए कवितार्इ करते रहे, उसी तरह भोला जी पान बेचते हुए कवितार्इ करते रहे। भोला आशु कवि थे यानी ऐसे कवि जो तुरत कुछ पंक्तियाँ गढ़कर आपको सुना दें। महान कवियों के इतिहास में शायद भोला का नाम दर्ज न हो पाए, पर जिस तरह इतिहास में बहुसंख्यक जनता का नाम भले नहीं होता, लेकिन वह बनता उन्हीं के जरिए है, उसी तरह भोला जी की कविताएं भी हैं। वे आरा के काव्य-जगत की अनिवार्य उपस्थिति रहे। जसम के पहले महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में हर साल होने वाले नुक्कड़ काव्यगोष्ठी 'कउड़ा' के आयोजन में भोला जी का उत्साह देखने लायक होता था। हमने देखा है कि जब भी उन्हें कार्यक्रमों में बोलने का मौका मिला, वे कम ही शब्दों में बोलते थे, पर हमेशा उनकी कोशिश यह रहती थी कि कुछ सारतत्व-सा सूत्रबद्ध करके रख दें। और ऐसे मौके पर अक्सर लोग उनकी कुछ ही पंक्तियों के वक्तव्य पर वाह-वाह कर उठते थे।

भोला जी को मैंने अपने बचपन से ही नवादा थाने के इर्द-गिर्द पान की गुमटी लगाते देखा। वहीं बैठकर वे गरीब-मेहनतकशों पर जुल्म ढाने वाले थाने और कोर्ट को उड़ाने और जलाने की बात करते रहे। बेशक व्यावहारिक तौर पर नहीं, जुबानी ही सही, पर इन संस्थाओं के प्रति जनता का जो गहरा गुस्सा है, वह तो इसके जरिए अभिव्यक्त होता ही रहा। कितनी बार उन्हें प्रशासन के 'अतिक्रमण हटाओ अभियान' के कारण वहां से हटना पड़ा, पर बार-बार वे वहीं आकर जम जाते रहे। उनकी पान की दुकान आरा में जनसंस्कृति और जनता की राजनीति से जुड़े लोगों के मेल-मिलाप का अड्डा थी। और वे खुद भी तो शहर में भाकपा-माले के हर आंदोलन और अभियान का अनिवार्य अंग थे। वे उन समझदार लोगों में नहीं थे, जो सिर्फ अपनी और अपने घर-परिवार की ही जिंदगी को बदलने में लगे रहते हैं, बल्कि वे उनकी कतार में शामिल थे, जो सबकी जिंदगी को बदलते हुए अपनी जिंदगी को बदलना चाहते हैं। भले व्यंग्य में कभी उन्होंने खुद पर बेवकूफ पान वाले का लेबल लगा लिया था, पर वे पढ़े-लिखे और अपने ही निजी स्वार्थ की दुनिया में खोये रहने वाले समझदारों में से नहीं, बल्कि उन समझदारों में से एक थे जिनके लिए रमता जी ने कहा था कि 'राजनीति सबके बूझे के बुझावे के पड़ी, देशवा फंसल बाटे जाल में छोड़ावे के पड़ी।' भोला जी शहर में माले और जसम की गतिविधियों मे शिरकत करते और पान की दूकान पर बैठे हुए कांग्रेस और गैर-कांग्रेस की तमाम सरकारों को आते-जाते देखते रहे और उन्होंने महसूस किया था कि गरीबों की पीड़ा खत्म ही नहीं हो रही है। आप इसी गीत को देख लीजिए-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

कांग्रेस के लंबे शासन के बाद लालू, जो ब्राहमणवाद और धार्मिक अंधविश्वास की आलोचना करते हुए सत्ता में आए थे, वे बहुत ही जल्दी उसी की शरण में चले गए, लेकिन भोला जी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि अपनी पान की दूकान पर बैठकर उनकी सरकार की भी आलोचना की। जिंदगी भर वे किराये के घर में रहे, बाल-बच्चों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना कर नहीं पाए, लेकिन वे अपनी मुश्किलों के हल के लिए किसी देवी-देवता के शरण में नहीं गए और न ही निराशा में डूबे। उनकी कविता में भी गरीब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सवाल पूछता है और यह सवाल पूछना ही उनकी कविता और व्यक्ति दोनों की ताकत है। मुझे जनमत के पुराने अंक में पढ़ी हुर्इ 'मैं आदमी हूं' शीर्षक की उनकी एक कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने मेहनतकश मनुष्यों की जुझारू शक्ति, शान और सौंदर्य के बारे में लिखा था। इतना ही नही, भोला ने जाने-अनजाने हमें यह सिखाया कि गरीब-मेहनतकश आदमी की निगाह से देखने से ही शासन-प्रशासन के दावों और समय का असली सच समझ में आ सकता है। 'पढ़निहार बुड़बक का जनिहें, का पढ़ावल जा रहल बा' कविता इसी की तो बानगी है, जिसमें वे अखबार की खबरों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि नीचा को ऊंचा और ऊंचा को नीचा बताया जा रहा है। जिन्हें शरीफ कहा जा रहा है, दरअसल लोगों की निगाह वे लुच्चे हैं। उसी कविता में आगे वे कहते हैं 'गरीबन के कइसे गारल जा रहल बा।' अपनी आवाज के जरिए वे बकायदा गारने ( कसकर निचोड़ने) की प्रक्रिया को भी व्यक्त करते हैं।

आज जबकि बिहार सरकार अपनी ही प्रायोजित रैलियों में जनता के करोड़ो रुपये लूट-फूंक रही है और जिस तरीके से जनता को बेवकूफ बनाने का खेल चल रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में मुझे जनमत में ही सितंबर 87 में छपी भोला जी की एक और कविता की याद आती है- 'जान जार्इ त जार्इ, ना छूटी कभी बा लड़ार्इ इ लामा, ना टूटी कभी' (जान जाए तो जाए, पर न छूटेगी कभी, है लंबी लड़ार्इ जो नहीं टूटेगी कभी)। और इस लंबी लड़ार्इ में यकीन के बल पर ही भोला जी दो टूक कहते हैं- जनता के खीस (गुस्सा), देखिंहे (देखेंगे) नीतीश। भोला जानते थे कि यह लड़ार्इ लंबी है और इस लंबी लड़ार्इ में दुश्मनों और दोस्तों की पहचान लगातार होनी है। जिस तरह गरीब जनता सरकार और प्रशासन के नस-नस को जानती है, उसी तरह भोला भी उन्हें जानते-समझते थे। उनके पैमाने से अफसर-मच्छर, हड्डा-गुंडा, नेता-कुत्ता एक ही हैं। अब नेता तो जनता के संघर्ष के भी होते हैं, पर उनके लिए उनका पैमाना अलग है, यहां तो नेता साथी होते हैं। तभी तो 1987 की कविता में उन्होंने लिखा कि 'साथ साथी के हमरा र्इ जबसे मिलल, नेह के र्इ लहरिया, ना सूखी कभी। और यह नेह कभी नहीं खत्म नहीं हुआ। बाद में भी उसी लगाव से उन्होने लिखा-

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा।

जिनिगी का मजबूत तार अब टूट गया है पर भोला का गोला यानी उनकी कविताओं की पुस्तिकाएँ सलामत रहेंगी। सलामत रहेगा उनका लाल झोला और उसमें रखा उनका हथौड़ा, जिसके बल पर वे जनता के दुश्मनों से फरिया लेने का हौसला रखते थे।

कवि भोला की तीन भोजपुरी रचनाएं 

1.
तोहरा नियर केहू ना हमार बा

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा

मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा

हेने आव नाया एगो दुनिया बसार्इं जा
जिनिगी के बाग आव फिर से खिलार्इं जा
देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा

दहशत में पड़ल बिया दुनिया र्इ सउंसे
लह-लह लहकत बिया दुनिया र्इ सउंसे
छोडि़ं जा दुनिया आव लागत र्इ आसार बा

2.

आज पूछता गरीबवा

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा

माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।


3.
जान जार्इ त जार्इ

जान जार्इ त जार्इ, ना छूटी कभी
बा लड़ार्इ र्इ लामा, ना टूटी कभी

रात-दिन र्इ करम हम त करबे करब
आर्इ त आर्इ, ना रुकी कभी

बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
दुख आर्इ त आर्इ, ना झूठी कभी

साथ साथी के हमरा र्इ जबसे मिलल
नेह के र्इ लहरिया, ना सूखी कभी

(05 सितंबर, 87, समकालीन जनमत में प्रकाशित)
. सुधीर सुमन

3 comments:

संजीव said...

मनुष्‍य की शाश्‍वत पीड़ा उसकी मातृभाषा ही स्‍पष्‍ट करती है, लोक भाषा के इस कवि को हमारा प्रणाम, विनम्र श्रद्धांजली.

Dr.Yogesh said...

Bisaare gaye Lok Kavi ko sraddhanjali..

Dr.Yogesh said...

Bisaare gaye Lok Kavi ko sraddhanjali..