1/16/13

जनसत्ता का जागरण- आशुतोष कुमार



क़ौम की बेहतरी का छोड़ ख़याल, फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल,
तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल, बेज़मीरी का और क्या हो मआल
अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल.... पत्रकारों के लिए हबीब जालिब

''जो विज्ञप्ति 19 दिसंबर को जसम अध्यक्ष मैनेजर पांडेय के हवाले से जारी हुई, उसकी भाषा देखिए: ‘‘... उसके यौनांगों में लोहे के रॉड से हमला किया गया, उसके विवरण काफी दिल दहलाने वाले ...’’; ‘‘...लोहे के रॉड, बोतल या किसी अन्य वस्तु से यौनांगों पर किए गए प्रहार ...’’। क्या यह मानवीय सरोकार रखने वाले किसी संवेदनशील साहित्यकार की भाषा हो सकती है? दूसरी बात, पीड़ित युवती ने पहला बयान अस्पताल में अपनी मां के समक्ष एसडीएम को 21 दिसंबर को दिया था। वहशी बलात्कार के ‘‘विवरण’’ जसम को 19 तारीख को कहां से मिल गए, 16 को बर्बर हादसा होने के सिर्फ तीन दिन बाद? ऐसी बयानबाजी को छापना न छापना दूसरी बात ठहरी, पर मुझे शक है कि मैनेजर पांडेय के नाम से यह विज्ञप्ति किसी और ने लिखी होगी।'' ( 13 जनवरी के जनसत्ता में 'अनंतर 'का अंश)। 

खालिद ने 18 तारीख के टाइम्स ऑफ इंडिया और फर्स्ट पोस्ट जैसे अखबारों/ वेब पत्रिकाओं की ओर ध्यान दिलाया है, जिन में बहादुर बच्ची को देख रहे डाक्टरों के हवाले से ये विवरण प्रकाशित हो चुके थे। प्रथम दृष्टया इन पर संदेह करने का कोई तर्कसंगत कारण न था। लेकिन जनसत्ता अखबार को एसडीएम के सामने दिए गए बच्ची के बयान का इंतज़ार था। हालांकि उस बयान में पुलिसिया हस्तक्षेप के, खुद दिल्ली सरकार द्वारा किये गए। गंभीर संदेह के बाद दूसरा बयान लेना पड़ा। देश भाग्यशाली था कि बहादुर बच्ची उस हालत में भी दुबारा बयान दे सकी। ऐसा न होता तो ? कल्पना कीजिए कि जनसत्ता जैसे ''जाग्रत'' अखबार उन विवरणों के लिए जसम जैसे संगठनों को किस भाषा में धिक्कार रहे होते। जब कि पहुंचाए जाने के बाद भी उस अखबार तक जसम की ''बयानबाजी'' की खबर इतनी देर से पहुँची कि 'संघर्ष की प्रेरणा देने वाले लेखक संगठनों के सोये रहने' को धिक्कारने का 'गैरमामूली' समय उसे फिर भी मिल गया।  

यौन हिंसा से जूझते हुए आहत होने वाली हर एक बच्ची को पुलिस में बयान लिखाने तक ज़िंदा रहने का सौभाग्य नहीं मिलता। ऐसी बहुत सारी बच्चियां उस दुधमुंही उम्र में शिकार बनायी जाती हैं, जब वे बयान देना तो दूर जुर्म को समझ पाने लायक भी नहीं होतीं। जो इस लायक होती हैं, उनमें से भी अधिकाँश ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। जो जुटा लेतीं हैं, उन्हें पुलिसिया, अदालती, मीडियाई और सियासी फ़ायदा वसूलने पर आमदा नेताशाही साजिशें एक ज़िंदा लाश में बदल देने में कोई कसर नहीं उठा रखतीं और फिर आठ -आठ आंसू बहाते हुए उसे ज़िंदा लाश घोषित कर देतीं हैं। जसम की इसी 'बयानबाजी' में लिखा है- प्रो. पांडेय ने कहा कि वे संसद में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज्य के इस कथन से कतई सहमत नहीं हैं कि जिस लड़की का गैंगरेप हुआ, अगर वह बच भी गई तो जीवन भर जिंदा लाश बनकर रह जाएगी। सवाल यह है कि क्यों वह जीवन भर जिंदा लाश बनकर रहेगी? उसका गुनाह क्या है? जीवन भर जिंदा लाश बनकर अपराधियों को क्यों नहीं रहना चाहिए? वह बहादुर लड़की है, उसने तो जान पर खेलकर वहशियों का प्रतिरोध किया है, इस तरह के प्रतिरोध और समाज में पूरी स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जीने के स्त्री के अधिकार का तो खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। उसके जीवन की रक्षा हो और पूरे स्वाभिमान के साथ वह इस समाज में रहे, इसकी हरसंभव कोशिश और कामना करनी चाहिए। 

मानना चाहिए कि अखबार की नाराजगी के पीछे 'बयानबाजी' के इस जैसे हिस्से नहीं रहे होंगे। लेकिन परिस्थितिगत सबूतों और दीगर भरोसेमंद स्रोतों से आ रहे विवरणों को एक पुलिसिया बयान के न होने तक संदेह की नज़र से देखना एक जागृत अखबार का तौर है या अपराध को जाहिर करने से ज़्यादा उसे ढांकने-तोपने पर आमदा संवेदनहीन पुलिस का ?

संवेदनशीलता और मानवीयता किस बात में होती है? यौन-हिंसा को उसकी वास्तविक शक्ल में, उसकी बर्बरता और वीभत्सता पर पर्दा डाले बगैर, उजागर करने में ? या कि उसे ढँक-तोप कर, यथासंभव सहनीय, शालीन और सुरुचिपूर्ण बना कर पेश करने में ? जसम के बयान के अखबार द्वारा उद्धृत अंश में बिना विशेषण बिना अलंकार एक तथ्य की सूचना दी गयी है। वह एक बर्बर वीभत्स तथ्य है, लेकिन है। और अपनी कोटि का अकेला नहीं है। छत्तीसगढ़ समेत देश के सभी हिस्सों में घट ऐसी सभी घटनाओं से अखबार पटे पड़े हैं। इन्हें तथ्यपरक भाषा में नहीं तो किस मौन- मधुर -मसृण भाषा में लिखा जाये ? भयानक खबर को किस तरह सुरुचिपूर्ण साहित्य में बदल दिया जाए ? माने पुलिस की जो करनी है, अपराध को छुपाना, उसे भाषा को सौंप दिया जाए ?

ऐसा करने से मानवीयता की रक्षा होगी या नहीं, पता नहीं, लेकिन न्याय और सत्य और पत्रकार की निष्ठा का गला जरूर घुट जाएगा। 

पारिवारिक हत्याओं जैसे सब से रुग्ण सामाजिक-अपराधों को भाषा के सुसज्जित आडम्बर के सहारे सांस्कृतिक समारोह के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले लेख कहाँ छपते हैं ?इन्हें छापने का हौसला हिंदी अखबारबाजी की दुनिया में अभूतपूर्व प्रसार संख्या का 'जागरण ' करने वाले तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का 'पांचजन्य ' फूंकने वाले भी नहीं कर पाते। हिन्दी में ऐसा करने वाला एक ही अखबार है। यही अपना जनसत्ता जिस के विगत सतीसमर्थक सम्पादकीय की प्रतिष्ठा अब तक धूमिल नहीं हुयी।  प्रसंग शंकर शरण के जिस लेख का है, वह बरसों पहले जिस अज्ञात ब्लॉग में छपा था, वहाँ भी अपना नाम देने की हिम्मत लेखक की न हुयी थी। फूहड़ कुतर्क से भरा हुआ वह लेख तो चलिए वैचारिक विविधता के नाम पर चल गया, लेकिन उस के पूर्वप्रकाशित होने की बाबत हम ने संपादक की यह घोषणा जरूर सुनी थी कि निजी स्तर से उसकी जांच की जा रही है और गफलत का पता चलने पर लेखक को काली सूची में डाल दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद संपादक ने पलट कर अब तक बताया नहीं कि जांच क्या हुयी, नतीजा क्या निकला, लेकिन वहाँ शंकर शरण के लेख छपने बदस्तूर जारी हैं। पितृसत्ता के खिलाफ जनसत्ता के अहर्निश जागरण का एक और संकेत।  

संघर्ष की प्रेरणा देने वाले सब लेखक संगठनों की खबर ले चुकने और तथ्य- संकलन की भारी गफलत के जगजाहिर हो जाने केबाद जागृत अखबार डूबते के तिनके की तरह जसम के तीन पदाधिकारियों की इंडियागेट की हाजिरी- बही तलब करने पर उतर आता है, लेकिन बदकिस्मती और भी भारी गफलत की शक्ल में उसका पीछा नहीं छोडती। उसी अखबार के लखनऊ संस्करण में छपी बीस दिसंबर की वह तस्वीर बरामद हो जाती है, जिस में जसम महासचिव साथी लेखकों के साथ इलाहाबाद में एक प्रतिरोध जुलूस में शामिल हैं।  जाहिर है, इस अखबार के संपादक इतने बिजी हैं कि उन्हें देश दुनिया के छोडिए, अपना ही अखबार देख पाने की मुहलत नहीं मिल पाती।  

लेकिन क्या कीजै कि ऐसी गफलतों को उजागर करने को ''अपना नाम उछालने की होड़'' कह कर रफादफा करते हुए उनके उठे हुये हाथोंमें एक अदद शमशेर सम्मान भी सजा हुआ बाजाप्ता देखा जा सकता है, जिस पर 'जागृत क्रांतिकारी वामपंथी लेखक'' की पट्टी लगी हुयी है। अब भी कोई संदेह होतो बताइये। 

इस बात में, कि यह जनसत्ता का 'जागरण' है !

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