2/14/13

स्त्री सवालों पर 'हिरावल' की नाट्य प्रस्तुति

हिरावल द्वारा ‘बेख़ौफ आज़ादी’ का मंचन  


महिलाओं पर बढ़ती हिंसा के खिलाफ देश भर में चल रहे जुझारू जन-आंदोलन की कड़ी के रूप में हिरावल के नुक्कड़ नाटक ‘बेखौफ आज़ादी’ का प्रथम मंचन 10 फरवरी 2013 को गांधी मैदान और 11 फरवरी 2013 को जे डी वीमेन्स कॉलेज, पटना में हुआ। दोनों ही मंचनों के दौरान भारी जन उपस्थिति देखी गई। शीर्षक के अनुरूप यह नाटक लड़कियों और महिलाओं के लिए बेखौफ और बिना शर्त आजादी की मांग को बड़े ही सशक्त तरीके से जनता के सामने प्रस्तुत करता है।


नाटक की शुरुआत गोरख पांडेय की कविता ‘बंद खिड़कियों से टकराकर’ से होती है। प्रथम दृश्य में दो बूढ़े, जो तमाम पितृसत्तामक विचारों से लैस हैं, आपस में बातें कर रहे हैं कि औरतें किस तरह की आजादी की मांग कर रही हैं, जबकि देश आजाद होने के साथ-साथ उन्हें भी तो आजादी मिली हुई है। लड़कियों के मुंह से ‘बेखौफ आजादी’ सुनना उन्हें नागवार गुजरता है और वे इसका मजाक उड़ाते हैं। उनका सामना सड़क पर चल रही लड़कियों से होता है, जो अपनी धुन में मस्त हैं और हंसते-गाते, कहकहे लगाती हुई चली जा रही हैं। दोनों बूढ़े, लड़कियों को जोर-जोर से हंसने के लिए मना करते हैं और औरत होने की हद न पार करने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि हम मर्द हैं और हम जितनी जोर से चाहें, हंस सकते हैं, हमें यह अधिकार है और तुम औरत हो, जिसे अपने दायरे में रहना चाहिए। वे उन्हें तमीज सीखने से लेकर मर्द और औरत का फर्क बताते हैं और परंपरा की दुहाई देते हैं। तब लड़कियां प्रतिरोध करती हैं और उस बूढ़े से सवाल-जवाब करती हैं। वे कहती हैं कि अब वे मर्द और औरत के फर्क को नहीं मानेंगी और ऐसी वाहियात परंपरा को नहीं चलने देंगीं। लड़कियों को अपने हक के लिए लड़ते देख एक बूढ़े का दिमाग ऐसा बौखलाता है कि वह बेहोश हो जाता है। 

दूसरे दृश्य में एक धर्मगुरु का रवैया दिखाया गया है। वह लड़कियों को उपदेश दे रहा है कि बलात्कार रोकने का एक ही तरीका है कि तुम बलात्कारी से अपनी इज्जत के लिए मिन्नतें करो, उसके सामने दीन-हीन बन कर गिड़गिड़ाओ और उसके सामने ‘भैया-भैया’ का मंत्रजाप करते हुए उसके चरणों में लोट जाओ। इस पर वहां बैठी लड़कियां उसकी अच्छे से मरम्मत कर देती हैं। धर्मगुरु का चेला उससे कहता है कि ‘बहन-बहन’ का मंत्रजाप औरतों के इस हमले से हमारी रक्षा कर सकता था।

तीसरा दृश्य यौन उत्पीड़न की शिकार लड़कियों के साथ पुलिस प्रशासन के बर्ताव को प्रस्तुत करता है, जहां थाना इंचार्ज रिपोर्ट लिखवाने आई लड़की से घटना का ब्योरा सिर्फ मजे लेने के लिए सुनना चाहता है। वह लड़की से फालतू के सवाल कर परेशान करता है और रिपोर्ट लिखने से मना कर देता है। जब लड़की केस दर्ज करने पर जोर देती है तो इंस्पेक्टर उसके साथ बलात्कार करने की धमकी देता है। इस पर लड़की प्रतिरोध करती है और उसके कुत्सित मंसूबों पर पानी फेर देती है। अंतिम दृश्य में यूपीए-एनडीए की महिला विरोधी लाइन को दिखाया गया है, जो दिल्ली गैंग रेप के बाद खुल कर सामने आई है। वे किसी का तर्क न सुनते हुए लगातार फांसी की मांग कर रहे हैं, जबकि केंद्र हो या राज्य सरकार, उन्हीं की है और दोषियों को दंडित भी उन्हें ही करना है।

दृश्यांतर में लगनेवाले नारे लड़कियों के लिए बेखौफ आजादी, प्रेम करने की आजादी, साथी चुनने की आजादी, पढ़ने की आजादी, कपड़े पहनने की आजादी, बस पर, रोड पर चलने की आजादी की मांग करते हैं। दोनों ही मंचनों के दौरान दर्शक दीर्घा में जबर्दस्त उत्साह और समर्थन देखा गया। पर दोनों जगहों के दर्शकों की प्रतिक्रिया में अंतर भी देखा गया। पहले मंचन में पुरुषों की संख्या अधिक थी। वे ऐसी जगह भी हंस रहे थे, जहां शायद उन्हें नहीं हंसना चाहिए। वहीं जे डी वीमेन्स में दर्शक के रूप में अधिकांश लड़कियां थीं। उनकी अलग प्रतिक्रिया थी। धर्मगुरु की बात पर गुस्सा और पुलिस की हरकत से परेशानी का भाव उनके चेहरे पर स्पष्ट देखा गया। पर महिलाओं द्वारा उन्हें पीटे जाने के दृश्य पर लड़कियों को खूब मजा आया। उन्हें नाटक बहुत पसंद आया और उन्होंने इसके कथ्य से खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया। नाटक के समापन के बाद उन्होंने बताया कि हम भी चाहते हैं कि ऐसा हो, हमें भी अपने मुताबिक जीने को मिलना चाहिए। नाटक के दौरान लगने वाले नारों में भी लड़कियों ने पूरा साथ दिया। गांधी मैदान में प्रदर्शन के बाद बहुत से लोग कलाकारों से मिलने आए। अभिषेक नाम के एक युवा दर्शक की प्रतिक्रिया थी - बढि़या नाटक था। वैसे बढि़या नाटक तो और भी होते रहते हैं, पर यह प्रभावशाली था और इसने अपना प्रभाव छोड़ा है लोगों पर, मुझ पर । इसकी विशेषता यह थी कि इसका नेतृत्व लड़कियां कर रही थीं। नाटक में दो लड़कियां, श्वेता और दीपिका, पहली बार अभिनय कर रही थीं। मंचन से पहले वे डर रही थीं कि कैसे इतनी भीड़ के सामने अभिनय करेंगी। लेकिन एक बार जब वे रंगस्थल पर उतरीं तो लगा ही नहीं कि वे पहली बार इतने सारे दर्शकों के सामने अभिनय कर रही हैं, वह भी नुक्कड़ पर। जे डी वीमेन्स की छात्राओं ने नाटक की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि लड़कियों की बेखौफ आजादी के विरोधी आम लोग, पुलिस, धर्मगुरुओं और सत्ता पक्ष-विपक्ष को करारा जवाब दिया जाना चाहिए।

30 मिनट की अवधि वाले इस नाटक में समाज में महिलाओं की स्थिति, उनकी सोच और उनके आंदोलन को दर्शाया गया है। संतोष झा द्वारा लिखित व निर्देशित इस नाटक में दिव्या गौतम, दीपिका, श्वेता, समता, रुनझुन, सुमन कुमार, राम कुमार, सोवित, राजन, यूसुफ, विक्रांत और संतोष झा ने अभिनय किया।

महिलाओं को अपनी सत्ता और मनचाहे तरीके से इस्तेमाल करने वाली वस्तु समझने वाले इस पितृसत्तात्मक समाज को जड़ से उखाड़ फेंकने का संदेश देने में हिरावल की यह कृति पूरी तरह से कामयाब हुई है।

.... समता / सपना

1 comment:

Anonymous said...

Keep on working, great job!

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