3/12/13

अपने हक के लिए बिहार के कैदियों ने छेड़ा आन्दोलन


दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी राम सिंह ने आत्महत्या की है या उसकी हत्या की गई है, इसे लेकर बहस शुरू हो गई है. लेकिन इस घटना ने फिर एक बार भारतीय जेलों में मौजूद अमानवीय माहौल को उजागर कर दिया है. जेलों में समय-समय पर कैदी अपने मानवीय अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहते है. खासकर बिहार में कई बार बंदियों द्वारा अपने हक के लिए आन्दोलन किया जाता रहा है. ऐसा ही एक आन्दोलन बिहार की राजधानी पटना में मौजूद बेउर आदर्श कारा के कैदियों ने शुरू किया, जो कई जेलों में फ़ैल गया. बंदियों का ज्ञापन और इस आन्दोलन पर एक टिप्पणी 'समकालीन लोकयुद्ध' (वर्ष२२, अंक १२) में प्रकाशित की गई है, जिसे हम यहाँ दे रहे हैं. 

बिहार में कारागारों की दुर्दशा की कहानियां समय-समय पर सामने आती रहती हैं और वामपंथी व जनवादी शक्तियों तथा मानवाधिकार संगठनों की ओर से इसके खिलाफ आवाज भी उठाई जाती रही है। कोई भी कारागार ऐसा नहीं जहां निर्धारित संख्या से दुगुने-तिगुने कैदी न हों. कानून की निगाह में अपराधी माने जाने वाले लोगों के अलावा खेत-खलिहानों व सड़कों पर अपने हक-हकूक के लिए आन्दोलन करनेवाले कार्यकर्ताओं की भी बड़ी तादाद इसमें शामिल है, जिन्हें राजनीतिक बंदियों का दर्जा व सुविधा मयस्सर नहीं होता. कैदियों की बड़ी संख्या ऐसी है जिनपर लगे मुकदमों की सुनवाई नहीं हो रही है अथवा काफी लंबे समय से सुनवाई चल रही है. एक तो जेल मैनुअल ही अंग्रेज जमाने के बने कायदे-कानूनों के अनुसार चल रहा है और फिर इसमें वर्णित बुनियादी सुविधाओं का भी घोर अभाव देखा जा रहा है- यहां तक कि शौचालयों व साफ-सफाई का भी उचित प्रबंध नहीं होता. कारागारों में कैदियों के साथ मारपीट व अन्य किस्म के दुर्व्यवहार तो रोजमर्रा के प्रचलन बन गए हैं. वृद्ध कैदी भी ये उत्पीड़न झेलने को विवश होते हैं. कुछ दिनों पहले भाकपा (माले) के वरिष्ठ व लोकप्रिय कार्यकर्ता शाह चांद, जिन्हें ‘टाडा’ के तहत आजीवन कारावास की सजा दी गई है, के नेतृत्व में बेउर आदर्श कारा के बंदियों ने जेल की प्रमुख समस्याओं को उठाते हुए चरणबद्ध आन्दोलन चलाया. शीघ्र ही यह आन्दोलन फुलवारीशरीफ, गया, जहानाबाद, सासाराम, मोतिहारी, औरंगाबाद, छपरा, सीतामढ़ी और बेगूसराय की जेलों में भी फैल गया. कैदियों ने 11 से 15 फरवरी तक जत्थेवार धरना, 16 से 20 फरवरी तक 12 घंटे का उपवास और 21-22 फरवरी को 48 घंटे का उपवास कार्यक्रम संचालित किया. आन्दोलन शुरू करने के पहले उन्होंने कैदियों का एक हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन भारत के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, भारत सरकार के गृह सचिव, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, बिहार के राज्यपाल, मुख्य मंत्री, गृह सचिव तथा राज्य मानवाधिकार आयोग के अलावा विभिन्न जनवादी संगठनों के पास भेजा था. उनके द्वारा प्रेषित ज्ञापन (भाषाई संशोधनों के साथ) इस प्रकार है, जो अपने आपमें कारागारों की दुर्दशाग्रस्त अमानवीय स्थितियों को उजागर करता है.

बेऊर जेल के बंदियों द्वारा भेजा गया ज्ञापन

अत्यंत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि राज्य के एकमात्र आदर्श केंद्रीय कारा बेऊर (पटना) में 24 मांगों के सवाल पर सहायक कारा महानिरीक्षक द्वारा कुछ समय के भीतर मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिए जाने के बावजूद आज तक प्रमुख समस्याएं यथावत बनी हुई हैं. कुछ सुधार होने के बाद स्थिति पुनः बिगड़ती जा रही है

कारागृह को सुधारगृह का पर्याय माना जाता है तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था के शुभचिंतक यह अपेक्षा रखते हैं कि कारा में बंद विचाराधीन बंदी का विवेक और सुसंस्कार विकसित हो. किंतु यहां कमजोर बंदियों को दमन-उत्पीड़न का शिकार बनाया जा रहा है. उन्हें स्वास्थ्यप्रद भोजन, समुचित इलाज और शौचालय सहित पूर्ण सफाई की बुनियादी सुविधा से भी वंचित रखा गया है. आज सबसे खराब स्थिति कारा अस्पताल की है. कारा प्रशासन की लापरवाही तथा डाक्टरों की गैर-जिम्मेदाराना भूमिका व उनकी अकुशलता के कारण बंदियों को प्रताडि़त किए जाने, डाक्टरों द्वारा सही इलाज न करने, गंभीर स्थिति आने से पहले ही मरीज को रेफर करने व जीवन रक्षक दवा तक उपलब्ध न हो पाने के कारण हर महीने बंदी मौत के शिकार हो रहे हैं. पूरे बिहार के सभी जेलों की तुलना में मरनेवालों की संख्या यहां सबसे ज्यादा है. सितंबर से अक्टूबर महीने में लगातार पांच बंदियों की मौत हो चुकी है. हालाँकि इस मौत के लिए न्यायिक विभाग व कार्यपालिका विभाग भी जिम्मेवार है. भ्रष्टाचार में लिप्त पूर्व चीफ मेडिकल ऑफिसर जेबी सिंह के खिलाफ लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं. जांच-पड़ताल में पकड़े जाने के बाद सजा के तौर पर केवल ट्रांसफर किया गया. प्रत्येक सप्ताह एक विशेषज्ञ डाक्टर का कारा अस्पताल में आना अनिवार्य था, पर अब इसमें भी विराम लग चुका है तथा उनकी मर्जी पर निर्भर करता है कि वे आएंगे या नहीं. प्रशिक्षित कंपाउंडर होने के बावजूद खून, पेशाब व एक्स-रे जांच के लिए बाहर से ठेके पर रखे गए व्यक्ति को सप्ताह में एक दिन कुछ घंटों के लिए बुलाया जाता है, तथा दूसरे सप्ताह में उसका रिपोर्ट प्राप्त होता है. इसमें भी सही जांच की गारंटी नहीं होती, ऐसा व्यवहार में साबित हो चुका है. इसमें भी भ्रष्टाचार का मामला है तथा इन सारी चीजों में कमीशन का मामला जुड़ा हुआ है. स्वास्थ्यप्रद भोजन (जेल मैनुअल के अनुसार) व स्वच्छ पेयजल का अभाव तथा शौचालय सहित पूर्ण साफ-सफाई में कमी रहने के कारण स्वस्थ बंदी भी बीमारियों का शिकार हो जाते हैं तथा बीमार बंदियों में तपेदिक (टीबी) के मरीज ज्यादा (80 प्रतिशत) पाए जाते हैं व अधिकतर मौत तपेदिक मरीजों की होती है. इसका खुलासा किसी और ने नहीं बल्कि खुद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने ही किया है. 2010 में रोटरी क्लब इंटरनेशनल, पटना (एनजीओ) द्वारा आइसीयू (गंभीर स्थिति में मरीजों के लिए आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था) के


निर्माण के लिए 2010 में पूर्व काराधीक्षक ओम प्रकाश गुप्ता व पूर्व मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी कांति मोहन सिंह की उपस्थिति में 55 लाख रुपये का अनुदान दिया गया था. लेकिन आज तक इसका निर्माण पूरा नहीं हुआ. यह भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है. ऐसी स्थिति रहने पर बाहर से कोई भी संस्था या एनजीओ मदद के लिए आगे नहीं आएंगे. कोई बंदी यदि गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए तथा चलने व खड़ा होने में भी वह असमर्थ हो, तब भी कोर्ट उपस्थापन में उन्हें जाना ही पड़ेगा, क्योंकि अब कोई डाक्टर व्यक्तिगत रूप से ‘सिक’ (बीमार होने की रिपोर्ट) नहीं दे सकता. ऐसी रिपोर्ट देने के लिए मेडिकल बोर्ड बैठाकर निर्णय लिया जाएगा- ऐसा कारा प्रशासन द्वारा अव्यवहारिक निर्णय लिया गया है. कारा प्रशासन, न्यायिक विभाग व डाक्टर की उपस्थिति में बंदी दरबार में छोटी-छोटी समस्याओं को हल करने का कार्य शुरू हुआ था, वह भी कारा प्रशासन की कमी व बेरुखी की वजह से बंद हो चुका है. किसी भी मामले में बंदियों के साथ बुरी तरह मार-पीट करना आम बात बन चुकी है. इस कुव्यवस्था व भ्रष्टाचार से बंदी त्रस्त हैं और अब उद्वेलित हैं. दोषी को सजा देने की बात तो कानूनन जायज है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को संदेह के आधार पर पकड़ना व उस पर बलपूर्वक दोष मढ़ना और कानून के समक्ष किसी मामले से मुक्ति पाने पर भी बार-बार दोष लगाकर कारा से मुक्त न होने देने की साजिश करना क्या कानूनन अधिकार है? झूठे केस में फंसाकर आजीवन जेल में रखने तथा जमानत पर जेल से बाहर निकलते ही पुलिस द्वारा पुनः झूठे आरोप लगाकर दुबारा जेल भेजने का अनैतिक व असंवैधानिक तरीका अपनाया जा रहा है. शोषण, लूट, अन्याय, अत्याचार के खिलाफ प्रतिवाद व संघर्ष करने वाली प्रगतिशील व क्रांतिकारी शक्तियों के साथ ऐसी घटनाएं बिहार सहित देश के विभिन्न राज्यों में हो रही हैं. बहुराष्ट्रीय व कारपोरेट घरानों के स्वार्थ में आर्थिक सुधार के नाम पर देश को गिरवी रखने, देश को खोखला करने, देश की संप्रभुता को खत्म करने, देश की खनिज संपदा को लूटने तथा शोषण-जुल्म के खिलाफ संघर्ष करने वाले प्रगतिशील, बुद्धिजीवियों व क्रांतिकारियों के साथ जेल में अपराधियों की तरह बर्ताव करने का हम विरोध करते हैं. हमारी मांग है कि राजनीतिक बंदियों के जो अधिकार हैं उससे उन्हें वंचित न रखकर उन्हें राजनीतिक बंदी का दर्जा दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का खुला उल्लंघन करते हुए निचली अदालत में पुलिस द्वारा हाथ में हथकड़ी व कई जगह कमर में रस्सी बांधकर उन्हें कोर्ट में पेश किया जा रहा है. अंग्रेजी हुकूमत द्वारा शोषण व लूट को अबाध रूप से जारी रखने तथा इसके खिलाफ आवाज उठाने व लड़ने वाले सच्चे देशभक्तों व क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए जन विरोधी व काला कानून बना कर फांसी पर चढ़ाने व आजीवन जेल में बंद रखने के उद्देश्य से 1860 में आइपीसी का निर्माण किया गया था. हम समझते हैं ये सभी काले कानून व जेल मैन्युअल जनविरोधी हैं तथा आज की स्थिति में गैरजनवादी व अप्रासंगिक भी हैं, तथा इन्हें अविलंब बदलना चाहिए. लोकतांत्रिक रूप से कानून के दायरे में रहकर हम निम्नलिखित 26 मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं जिन पर तत्काल विचार करने और यथाशीघ्र कार्रवाई करने की आवश्यकता है:

1. कोई भी व्यक्ति, जो किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य हो, अपराधी हो या सामान्य जन हो, गिरफ्तारी के बाद पुलिस हिरासत में या न्यायिक हिरासत में उसकी मृत्यु होती है, तो ऐसी स्थिति में गिरफ्तार करने वाले या जेल में रखने वाले जिम्मेवार पदाधिकारी अथवा न्यायिक अधिकारी को उसकी मौत का जिम्मेवार समझा जाना चाहिए तथा इससे जुड़े पदाधिकारियों पर विचार के लिए अदालत में मुकदमा अनिवार्यतः चलाया जाए.

2. कारागार में हुई मृत्यु को कारा-प्रशासन की लापरवाही एवं डाक्टर की गैर-जिम्मेदार भूमिका का नतीजा मानकर कारा प्रशासन व डाक्टर के खिलाफ हत्या का मुकदमा बनाया जाए.

3. जेलों में बंदी के जीवन की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य की रक्षा के लिए स्वास्थ्यप्रद भोजन, शुद्ध पेयजल, शौचालय सहित पूर्ण साफ-सफाई, मच्छरों से बचाव, आपरेशन सेवा व जीवन रक्षक दवाओं का समुचित प्रबंध किया जाए और इसके साथ ही मेडिकल विशेषज्ञ, व्यवहार कुशल डाक्टर, कंपाउंडर और नर्स की व्यवस्था अनिवार्य करें.

4. गिरफ्तार व्यक्ति की समुचित मेडिकल जांच कराकर ही उन्हें जेल भेजा जाए. अगर कोई बंदी गंभीर व जटिल बीमारी से ग्रस्त हो तो उसे कारागृह में न रखकर हॉस्पिटल भेजा जाए.

5. गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ लंबित सारे ( संज्ञेय-असंज्ञेय) मुकदमें एक निर्धारित समय सीमा के भीतर (60 दिन या 90 दिन) तय हो जाना चाहिए और तमाम मुकदमों में उपस्थापन भी इसी समय सीमा के अंदर हो जाना चाहिए, ताकि बंदी अपना पक्ष न्यायालय के सामने प्रस्तुत कर सके और विचारण की प्रक्रिया भी यथाशीघ्र पूरा करवा सके. इससे अधिक समय के बाद लगाए गए तमाम मुकदमों को पुलिस द्वारा पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानसिकता से बंदी को हैरान-परेशान व तबाह करने के लिये की गई कार्यवाही मानकर निरस्त किया जाना चाहिए.

6. जेल में या पुलिस हिरासत में मरने वाले व्यक्तियों के परिवार को दस लाख रुपये का मुआवजा अनिवार्य किया जाए.

7. 65 वर्ष की उम्र पार कर चुके तमाम सजायाफ्ता कैदियों को बिना शर्त रिहा किया जाए.

8. किसी बंदी द्वारा कारा में वास्तविक संसीमन की अवधि 14 वर्ष तथा परिहार सहित संसीमन की अवधि 20 वर्ष पूरी की जा चुकी है, उसके बावजूद अगर उसे किसी बहाने जेल में रखा जा रहा है तो अतिरिक्त समय के लिए प्रतिदिन 300 रु. के हिसाब से क्षतिपूर्ति जोड़कर मुआवजा दिलाने तथा उन्हें अविलंब कारा से मुक्त करने का प्रबंध किया जाए.

9. अगर किसी व्यक्ति को ट्रायल के नाम पर तीन साल से अधिक समय तक कारा में रखा गया है और न्याय प्रक्रिया तथा प्रशासनिक लापरवाही के कारण उसका विचारण पूरा नहीं हो सका हो, तो उसे अनिवार्य रूप से जमानत पर छोड़े जाने की गारंटी की जानी चाहिए.

10. जिन मुकदमों में सजा की अवधि पूरी हो जाती है और उस अवधि के भीतर उनका विचारण प्रशासनिक या न्यायिक लापरवाही से संपन्न नहीं किया जा सका हो, उन्हें प्रतिदिन तीन सौ रुपये की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था के साथ सम्मानपूर्वक दोष मुक्त किया जाए.

11. परिहार परिषद की बैठकों को सार्वजनिक किया जाए.

12. सरकार की जन-विरोधी नीतियों व काले कानून के खिलाफ आवाज उठानेवाले व संघर्ष करने वाले प्रगतिशील व राजनीतिक लोगों को राजनीतिक बंदी का दर्जा दिया जाए.

13. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो तथा बंदी के हाथ में हथकड़ी व कमर में रस्सी बांधकर कोर्ट में पेशी की अमानवीय प्रक्रिया को बंद किया जाए.

14. रिमांड के नाम पर बंदी को मानसिक व शारीरिक यातनाएं देने पर रोक लगाई जाए तथा कारा के अंदर बंदियों के साथ किसी भी मामले पर बुरी तरह पिटाई करने के अन्यायपूर्ण तरीके को अविलंब बंद किया जाए.

15. महीने में एक बार न्यायिक विभाग की उपस्थिति में बंदी दरबार के आयोजन को अनिवार्य किया जाए.

16. बंदी अपने मुकदमें से जुड़े मामलों पर वकील के साथ परामर्श व अपने व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने के लिए परिवार के साथ संपर्क बनाए रख सकें, इसके लिए जेलों में एसटीडी बूथ की सुविधा उपलब्ध कराई जाए.

17. बंदियों का आवेदन पत्र काराधीक्षक द्वारा गंतव्य स्थान पर सही समय पर भेजा जा सके, इसकी गारंटी की जाए व पावती रसीद आवेदक को देना सुनिश्चित किया जाए.

18. गंभीर रूप से बीमार व पीडि़त बंदियों को, और अचानक किसी के बीमार पड़ जाने अथवा चलने-फिरने में असमर्थता की स्थिति में उस बंदी को, मेडिकल बोर्ड की बैठक का इंतजार न करते हुए 'सिक' दिया जाए.

19. बंदियों के तमाम मुकदमों में उपस्थापन को आसान व सुलभ बनाने वाली 'वीडियो-कॉन्फ्रेसिंग' की प्रणाली को राज्य के भीतर व राज्य के बाहर अविलंब लागू किया जाए.

20. बंदी पंचायत चुनाव प्रत्येक माह या अधिक से अधिक तीन माह पर किया जाए.

21. जेल में जांच के लिए आने वाले पदाधिकारी द्वारा जेल प्रशासन की गैरमौजूदगी में बंदियों से प्रत्यक्ष मिलने और उनके पास शिकायत दर्ज कराने की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित किया जाए.

22. विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा लिखी गई दवाओं को जेल प्रबंधन द्वारा मनमाने ढंग से बदल दिए जाने या अपने मन की दवा दिए जाने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए और सही दवा को उसी दिन तत्काल मुहैया कराया जाए.

23. मुलाकाती पुर्जा सभी वार्डो में सही तरीके से ही भेजा जाए.

24. पोटा कानून में समीक्षा का जो प्रावधान है, उसी तरह टाडा कानून के आरोपी, सजाप्राप्त व विचाराधीन बंदी के ऊपर लगे आरोपों की समीक्षा का प्रावधान किया जाए.

25. जन विरोधी कानून पोटा व यूएपीए को निरस्त किया जाए तथा जेल मैन्युअल बदला जाए.

26. इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान एवं एम्स समेत सभी अस्पतालों में बंदियों का इलाज सुनिश्चित किया जाए. उपरोक्त मांगे, यों तो हम बिहार के आदर्श केंद्रीय कारा बेऊर से भेज रहे हैं. लेकिन यह समस्या न सिर्फ बेऊर जेल की है बल्कि प्रायः भारत के समस्त जेल बंदियों की यही समस्या है. अतएव यह मामला संविधान, दंडविधान, राजनीति, कानून और सामाजिक व्यवहार से जुड़ा हुआ है और पूरे देश में एक उत्तेजक स्थिति का सृजन कर रहा है. इसलिए ऐसे गंभीर मामले पर देश का कोई भी विवेकशील व्यक्ति चुपचाप नहीं बैठ सकता. ऐसी परिस्थिति में आपके द्वारा निर्मित व गठित तंत्रों द्वारा प्राप्त रिपोर्ट एकतरफा और सब कुछ अच्छा भी हो, तो भी हम बंदीगण ने आपके समक्ष जो स्थिति स्पष्ट की है और जो मागें रखी हैं, आशा ही नहीं बल्कि हमें यह पूर्ण विश्वास है कि आप उपरोक्त लोकतांत्रिक अधिकारों को सुनिश्चित कराने और न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बहाल कराने का पूर्ण प्रयास करेंगे. आपके द्वारा उपेक्षित किए जाने पर या आवेदन पत्र की निर्गत तिथि के 60 दिन बाद तक कोई आश्वासन सुनिश्चित न किए जाने की स्थिति में बंदीगण चरणबद्ध आंदोलन के लिए बाध्य होंगे इसके बारे में हम समयोपरांत सुनियोजित रूपरेखा तैयार करेंगे.

(खबर है कि धारावाहिक आन्दोलनों के बाद राज्य के जेल प्रशासन ने बंदियों की समस्याओं के समाधान के लिए कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं).

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