1/27/13

बी एच यू की घटना पर जसम का बयान

स्थानीय दबावों में विश्वविद्यालय प्रशासन काम नहीं करता
तो केंद्र सरकार तथा मानव संसाधन मंत्रालय को हस्तक्षेप करना चाहिए- जसम


प्रकाशनार्थ
दिल्ली : 27 जनवरी 2013 

आज देश में यौन हिंसा, लैंगिक भेदभाव, अन्याय और उत्पीड़न के सारे रूपों के खिलाफ महिलाओं की आजादी और बराबरी का आंदोलन चल रहा है और आम महिलाएं, छात्र-छात्राएं, युवक-युवतियां, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी इसमें शामिल हैं, लेकिन इसी दौर में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जैसे शिक्षण संस्थान में लगातार छात्राओं के साथ बदसलूकी की घटनाएं घटित होना अत्यंत विडंबनापूर्ण है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, जो एक से बढ़कर एक जनतांत्रिक और प्रगतिशील विद्वानों और अध्येताओं की कर्मस्थली रहा है, अनेक बड़े छात्र-आन्दोलनों का साक्षी रहा है, वहां छात्राओं के साथ बदसलूकी करने वालों और उन्हें धमकी देने वाले के खिलाफ कोई कारर्वाई न होना आश्चर्यजनक है। उल्टे विश्वविद्यालय प्रशासन सुरक्षा के नाम पर छात्राओं को सात बजे के बाद हॉस्टल में कैद कर देने का पक्षधर रहा है। लेकिन मामला महज सात बजे के बाद का ही नहीं है, मामला दिनदहाड़े छात्राओं से की जाने वाली बदसलूकियों का भी है। 

जैसा कि बनारस के लगभग सभी समाचारपत्रों ने रिपोर्ट किया है कि विगत 24 जनवरी को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के बिड़ला हॉस्टल के कुछ दबंग छात्रों ने उधर से गुजर रही तीन छात्राओं के साथ जिस तरह बदसलूकी की और एक प्राध्यापक के हस्तक्षेप के बाद भी वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आए, वह कैंपस में छात्राओं की सुरक्षा के प्रति गंभीर चिंताएं खड़ी करता है। सूचना यह है कि चीफ प्रोक्टर की मौजूदगी में छात्राओं के पक्ष में खड़े छात्रों और प्राध्यापकों को भी उनलोगों ने धमकी दी, जिसके बाद आक्रोशित होकर लगभग सौ-सवा सौ छात्राओं और छात्रों ने कुलपति का घेराव किया। करीब चार घंटे तक घेराव के बाद कुलपति उनसे मिले और महिला सेल गठन तथा दोषी छात्रों को दंडित करने का आश्वासन दिया। 

गणतंत्र दिवस के दिन महिला सेल गठन करने की घोषणा कुलपति ने कर दी है, पर दोषी छात्रों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यह भी आश्चर्यजनक है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे पुराने और केन्द्रीय विश्वविद्यालय में महिला सेल की स्थापना की घोषणा अब की गई है, जब कि अनेक विश्वविद्यालयों में यह संस्था कई वर्षों से काम कर रही है, यह दिखाता है कि अभी स्त्रियों के सम्मान और सुरक्षा के संघर्ष को कितनी विघ्न-बाधाओं से होकर गुजरना है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी न केवल उच्च शिक्षा का प्रतिष्ठित संस्थान है, बल्कि वह केन्द्रीय विश्वविद्यालय भी है। ऐसे में यदि स्थानीय दबावों में विश्वविद्यालय प्रशासन काम नहीं करता तो केंद्र सरकार तथा मानव संसाधन मंत्रालय को हस्तक्षेप करना चाहिए. छात्राओं ने दोषी छात्रों के बारे में नाम लेकर शिकायत की है. छेड़खानी करने और धमकी देने वाले वाले मुख्य दोषी छात्र की मौजूदा सरकार के एक मंत्री के साथ रिश्ते की सूचना भी अखबारों और सोशल मीडिया में आयी है. सवाल यह है कि बीएचयू प्रशासन आम छात्राओं का साथ देगा या नहीं? सत्ता संरक्षित दोषी छात्रों को दण्डित करेगा या नहीं?

छात्राओं के साथ दुव्यर्वहार करने वाले दोषी छात्रों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई न किए जाने की जन संस्कृति मंच घोर निंदा करता है और बीएचयू कैंपस में छात्राओं की सुरक्षा, सम्मान, समानता, न्याय व आजादी के लिए चल रहे छात्र-छात्राओं, बुद्धिजीवियों, साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के संघर्ष के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करता है। 

सुधीर सुमन 
राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

1/17/13

दिल्ली बलात्कार कांड पर प्रतिवाद का एक महीना - जन संस्कृति मंच


 दिल्ली बलात्कार कांड विरोधी आंदोलन: 
संस्कृतिकर्मियों की भूमिका और उसकी ज़रूरत

दिल्ली बलात्कार कांड के अब एक महीने हो गए। देशव्यापी आंदोलन का भी लगभग एक चरण पूरा हुआ। सरकार द्वारा आंदोलन के दबाव में जो वायदे किए गए, जो कमेटियां और आयोग गठित किए गए, उन पर जन-निगरानी रखना और आंदोलन को विविध रूप में जारी रखना वक्त का तकाजा है। यद्यपि की स्त्रियों पर बलात्कार सहित तमाम तरह की हिंसाएं अभी भी बदस्तूर जारी हैं, लेकिन पिछले दिनों चले आंदोलन ने मीडिया से लेकर आम नागरिकों की जागरूकता और संवेदनशीलता को झकझोरा है। सरकार और सुरक्षातंत्र की असंवेदनशीलता को परत-दर-परत बेनकाब किया है और स्त्रियों के प्रति पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के सभी रूपों पर नए सिरे से बहस शुरू कराई है। संघ प्रमुख भागवत और आसाराम बापू तथा कुछ राजनेताओं के बयानों पर जनाक्रोश इसी जागरूकता का परिणाम और प्रमाण है। सांस्कृतिक संगठन और लेखक बिरादरी ने भी यथासंभव नवयुवतियों और नौजवानों के इस आंदोलन में अपनी आवाज़ मिलाई, सड़कों पर उतरे।  ज़रूरत है कि सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव को और नए जागरण को एक सम्पूर्ण कार्यभार की तरह लेने के लिए नए तरह के आंदोलनकारी संस्कृतिकर्म के लिए हम तैयार हों। प्रस्तुत है एक झलक दिल्ली बलात्कार कांड विरोधी आंदोलन में संस्कृतिकर्मियों की शिरकत की। 

(जन संस्कृति मंच के बुलेटिन आर्काइव से साभार)


लखनऊ में जसम का विरोध-प्रदर्शन,
फोटो में राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य कौशल किशोर व ऐपवा नेता ताहिरा हसन

बलिया में 'संकल्प' के प्रतिरोध मार्च का नेतृत्व करते
जसम उ.प्र. राज्य कार्यकारिणी सदस्य आशीष त्रिवेदी

पटना के डाक बंगला चौराहे पर भाषण देते संतोष झा

बलिया में 'संकल्प' के आह्वान पर छात्राओं का विरोध-जुलूस

रांची में यू.पी.ए. सरकार का पुतला दहन
झारखंड जसम के राज्य सचिव अनिल अंशुमन- फोटो में दाएँ

पटना में प्रतिवाद मार्च, जसम राष्ट्रीय पार्षद समता राय- तस्वीर में दाएँ

बलिया में जसम से संबद्ध 'संकल्प ' संस्था का विरोध-मार्च

इंडिया गेट पर नारा देते कवि विद्रोही

दरभंगा में जसम का प्रतिवाद मार्च,
नेतृत्व करते बिहार राज्य सचिव सुरेन्द्र सुमन 

दिल्ली में वसंत विहार थाने पर प्रदर्शन,
जसम के राष्ट्रीय पार्षद व कवि विद्रोही

गोरखपुर में यौन-हिंसा के खिलाफ गोष्ठी
बोलते हुए असीम सत्यदेव, सञ्चालन करते मनोज सिंह

दिल्ली में संगोष्ठी- तस्वीर में जसम की दिल्ली सचिव भाषा सिंह, 
ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन, प्रो. विमल थोरात और कथाकार मैत्रेयी पुष्पा

गोरखपुर में प्रतिरोध मार्च, तस्वीर में जसम के राष्ट्रीय सचिव मनोज सिंह,
राष्ट्रीय पार्षद अशोक चौधरी तथा गोपाल ये व अन्य साथी

इलाहाबाद में विरोध मार्च में जसम महासचिव प्रणय कृष्ण तथा उपाध्यक्ष राम जी राय

1/16/13

जनसत्ता का जागरण- आशुतोष कुमार



क़ौम की बेहतरी का छोड़ ख़याल, फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल,
तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल, बेज़मीरी का और क्या हो मआल
अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल.... पत्रकारों के लिए हबीब जालिब

''जो विज्ञप्ति 19 दिसंबर को जसम अध्यक्ष मैनेजर पांडेय के हवाले से जारी हुई, उसकी भाषा देखिए: ‘‘... उसके यौनांगों में लोहे के रॉड से हमला किया गया, उसके विवरण काफी दिल दहलाने वाले ...’’; ‘‘...लोहे के रॉड, बोतल या किसी अन्य वस्तु से यौनांगों पर किए गए प्रहार ...’’। क्या यह मानवीय सरोकार रखने वाले किसी संवेदनशील साहित्यकार की भाषा हो सकती है? दूसरी बात, पीड़ित युवती ने पहला बयान अस्पताल में अपनी मां के समक्ष एसडीएम को 21 दिसंबर को दिया था। वहशी बलात्कार के ‘‘विवरण’’ जसम को 19 तारीख को कहां से मिल गए, 16 को बर्बर हादसा होने के सिर्फ तीन दिन बाद? ऐसी बयानबाजी को छापना न छापना दूसरी बात ठहरी, पर मुझे शक है कि मैनेजर पांडेय के नाम से यह विज्ञप्ति किसी और ने लिखी होगी।'' ( 13 जनवरी के जनसत्ता में 'अनंतर 'का अंश)। 

खालिद ने 18 तारीख के टाइम्स ऑफ इंडिया और फर्स्ट पोस्ट जैसे अखबारों/ वेब पत्रिकाओं की ओर ध्यान दिलाया है, जिन में बहादुर बच्ची को देख रहे डाक्टरों के हवाले से ये विवरण प्रकाशित हो चुके थे। प्रथम दृष्टया इन पर संदेह करने का कोई तर्कसंगत कारण न था। लेकिन जनसत्ता अखबार को एसडीएम के सामने दिए गए बच्ची के बयान का इंतज़ार था। हालांकि उस बयान में पुलिसिया हस्तक्षेप के, खुद दिल्ली सरकार द्वारा किये गए। गंभीर संदेह के बाद दूसरा बयान लेना पड़ा। देश भाग्यशाली था कि बहादुर बच्ची उस हालत में भी दुबारा बयान दे सकी। ऐसा न होता तो ? कल्पना कीजिए कि जनसत्ता जैसे ''जाग्रत'' अखबार उन विवरणों के लिए जसम जैसे संगठनों को किस भाषा में धिक्कार रहे होते। जब कि पहुंचाए जाने के बाद भी उस अखबार तक जसम की ''बयानबाजी'' की खबर इतनी देर से पहुँची कि 'संघर्ष की प्रेरणा देने वाले लेखक संगठनों के सोये रहने' को धिक्कारने का 'गैरमामूली' समय उसे फिर भी मिल गया।  

यौन हिंसा से जूझते हुए आहत होने वाली हर एक बच्ची को पुलिस में बयान लिखाने तक ज़िंदा रहने का सौभाग्य नहीं मिलता। ऐसी बहुत सारी बच्चियां उस दुधमुंही उम्र में शिकार बनायी जाती हैं, जब वे बयान देना तो दूर जुर्म को समझ पाने लायक भी नहीं होतीं। जो इस लायक होती हैं, उनमें से भी अधिकाँश ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। जो जुटा लेतीं हैं, उन्हें पुलिसिया, अदालती, मीडियाई और सियासी फ़ायदा वसूलने पर आमदा नेताशाही साजिशें एक ज़िंदा लाश में बदल देने में कोई कसर नहीं उठा रखतीं और फिर आठ -आठ आंसू बहाते हुए उसे ज़िंदा लाश घोषित कर देतीं हैं। जसम की इसी 'बयानबाजी' में लिखा है- प्रो. पांडेय ने कहा कि वे संसद में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज्य के इस कथन से कतई सहमत नहीं हैं कि जिस लड़की का गैंगरेप हुआ, अगर वह बच भी गई तो जीवन भर जिंदा लाश बनकर रह जाएगी। सवाल यह है कि क्यों वह जीवन भर जिंदा लाश बनकर रहेगी? उसका गुनाह क्या है? जीवन भर जिंदा लाश बनकर अपराधियों को क्यों नहीं रहना चाहिए? वह बहादुर लड़की है, उसने तो जान पर खेलकर वहशियों का प्रतिरोध किया है, इस तरह के प्रतिरोध और समाज में पूरी स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जीने के स्त्री के अधिकार का तो खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। उसके जीवन की रक्षा हो और पूरे स्वाभिमान के साथ वह इस समाज में रहे, इसकी हरसंभव कोशिश और कामना करनी चाहिए। 

मानना चाहिए कि अखबार की नाराजगी के पीछे 'बयानबाजी' के इस जैसे हिस्से नहीं रहे होंगे। लेकिन परिस्थितिगत सबूतों और दीगर भरोसेमंद स्रोतों से आ रहे विवरणों को एक पुलिसिया बयान के न होने तक संदेह की नज़र से देखना एक जागृत अखबार का तौर है या अपराध को जाहिर करने से ज़्यादा उसे ढांकने-तोपने पर आमदा संवेदनहीन पुलिस का ?

संवेदनशीलता और मानवीयता किस बात में होती है? यौन-हिंसा को उसकी वास्तविक शक्ल में, उसकी बर्बरता और वीभत्सता पर पर्दा डाले बगैर, उजागर करने में ? या कि उसे ढँक-तोप कर, यथासंभव सहनीय, शालीन और सुरुचिपूर्ण बना कर पेश करने में ? जसम के बयान के अखबार द्वारा उद्धृत अंश में बिना विशेषण बिना अलंकार एक तथ्य की सूचना दी गयी है। वह एक बर्बर वीभत्स तथ्य है, लेकिन है। और अपनी कोटि का अकेला नहीं है। छत्तीसगढ़ समेत देश के सभी हिस्सों में घट ऐसी सभी घटनाओं से अखबार पटे पड़े हैं। इन्हें तथ्यपरक भाषा में नहीं तो किस मौन- मधुर -मसृण भाषा में लिखा जाये ? भयानक खबर को किस तरह सुरुचिपूर्ण साहित्य में बदल दिया जाए ? माने पुलिस की जो करनी है, अपराध को छुपाना, उसे भाषा को सौंप दिया जाए ?

ऐसा करने से मानवीयता की रक्षा होगी या नहीं, पता नहीं, लेकिन न्याय और सत्य और पत्रकार की निष्ठा का गला जरूर घुट जाएगा। 

पारिवारिक हत्याओं जैसे सब से रुग्ण सामाजिक-अपराधों को भाषा के सुसज्जित आडम्बर के सहारे सांस्कृतिक समारोह के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले लेख कहाँ छपते हैं ?इन्हें छापने का हौसला हिंदी अखबारबाजी की दुनिया में अभूतपूर्व प्रसार संख्या का 'जागरण ' करने वाले तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का 'पांचजन्य ' फूंकने वाले भी नहीं कर पाते। हिन्दी में ऐसा करने वाला एक ही अखबार है। यही अपना जनसत्ता जिस के विगत सतीसमर्थक सम्पादकीय की प्रतिष्ठा अब तक धूमिल नहीं हुयी।  प्रसंग शंकर शरण के जिस लेख का है, वह बरसों पहले जिस अज्ञात ब्लॉग में छपा था, वहाँ भी अपना नाम देने की हिम्मत लेखक की न हुयी थी। फूहड़ कुतर्क से भरा हुआ वह लेख तो चलिए वैचारिक विविधता के नाम पर चल गया, लेकिन उस के पूर्वप्रकाशित होने की बाबत हम ने संपादक की यह घोषणा जरूर सुनी थी कि निजी स्तर से उसकी जांच की जा रही है और गफलत का पता चलने पर लेखक को काली सूची में डाल दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद संपादक ने पलट कर अब तक बताया नहीं कि जांच क्या हुयी, नतीजा क्या निकला, लेकिन वहाँ शंकर शरण के लेख छपने बदस्तूर जारी हैं। पितृसत्ता के खिलाफ जनसत्ता के अहर्निश जागरण का एक और संकेत।  

संघर्ष की प्रेरणा देने वाले सब लेखक संगठनों की खबर ले चुकने और तथ्य- संकलन की भारी गफलत के जगजाहिर हो जाने केबाद जागृत अखबार डूबते के तिनके की तरह जसम के तीन पदाधिकारियों की इंडियागेट की हाजिरी- बही तलब करने पर उतर आता है, लेकिन बदकिस्मती और भी भारी गफलत की शक्ल में उसका पीछा नहीं छोडती। उसी अखबार के लखनऊ संस्करण में छपी बीस दिसंबर की वह तस्वीर बरामद हो जाती है, जिस में जसम महासचिव साथी लेखकों के साथ इलाहाबाद में एक प्रतिरोध जुलूस में शामिल हैं।  जाहिर है, इस अखबार के संपादक इतने बिजी हैं कि उन्हें देश दुनिया के छोडिए, अपना ही अखबार देख पाने की मुहलत नहीं मिल पाती।  

लेकिन क्या कीजै कि ऐसी गफलतों को उजागर करने को ''अपना नाम उछालने की होड़'' कह कर रफादफा करते हुए उनके उठे हुये हाथोंमें एक अदद शमशेर सम्मान भी सजा हुआ बाजाप्ता देखा जा सकता है, जिस पर 'जागृत क्रांतिकारी वामपंथी लेखक'' की पट्टी लगी हुयी है। अब भी कोई संदेह होतो बताइये। 

इस बात में, कि यह जनसत्ता का 'जागरण' है !

1/15/13

क्या आप भोला जी को जानते हैं ?


तोहरा नियर जिनगी में कोर्इ ना हमार बा

कवि भोला जी, आज सुबह नहीं रहे। आरा में उनका निधन हो गया। डाइबिटिज की बीमारी से उनका शरीर लगातार जूझता रहा, पर आज उनकी सांसें थम गर्इं।

भोला जी की कविताएं क्या हैं? आम जनता का दुख-दर्द ही तो है उनमें, जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार ही तो है उनकी कविताएं। उन्होंने किसी पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए तो लिखा नहीं। जिस तरह कबीर कपड़ा बुनते हुए, रैदास जूते बनाते हुए कवितार्इ करते रहे, उसी तरह भोला जी पान बेचते हुए कवितार्इ करते रहे। भोला आशु कवि थे यानी ऐसे कवि जो तुरत कुछ पंक्तियाँ गढ़कर आपको सुना दें। महान कवियों के इतिहास में शायद भोला का नाम दर्ज न हो पाए, पर जिस तरह इतिहास में बहुसंख्यक जनता का नाम भले नहीं होता, लेकिन वह बनता उन्हीं के जरिए है, उसी तरह भोला जी की कविताएं भी हैं। वे आरा के काव्य-जगत की अनिवार्य उपस्थिति रहे। जसम के पहले महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में हर साल होने वाले नुक्कड़ काव्यगोष्ठी 'कउड़ा' के आयोजन में भोला जी का उत्साह देखने लायक होता था। हमने देखा है कि जब भी उन्हें कार्यक्रमों में बोलने का मौका मिला, वे कम ही शब्दों में बोलते थे, पर हमेशा उनकी कोशिश यह रहती थी कि कुछ सारतत्व-सा सूत्रबद्ध करके रख दें। और ऐसे मौके पर अक्सर लोग उनकी कुछ ही पंक्तियों के वक्तव्य पर वाह-वाह कर उठते थे।

भोला जी को मैंने अपने बचपन से ही नवादा थाने के इर्द-गिर्द पान की गुमटी लगाते देखा। वहीं बैठकर वे गरीब-मेहनतकशों पर जुल्म ढाने वाले थाने और कोर्ट को उड़ाने और जलाने की बात करते रहे। बेशक व्यावहारिक तौर पर नहीं, जुबानी ही सही, पर इन संस्थाओं के प्रति जनता का जो गहरा गुस्सा है, वह तो इसके जरिए अभिव्यक्त होता ही रहा। कितनी बार उन्हें प्रशासन के 'अतिक्रमण हटाओ अभियान' के कारण वहां से हटना पड़ा, पर बार-बार वे वहीं आकर जम जाते रहे। उनकी पान की दुकान आरा में जनसंस्कृति और जनता की राजनीति से जुड़े लोगों के मेल-मिलाप का अड्डा थी। और वे खुद भी तो शहर में भाकपा-माले के हर आंदोलन और अभियान का अनिवार्य अंग थे। वे उन समझदार लोगों में नहीं थे, जो सिर्फ अपनी और अपने घर-परिवार की ही जिंदगी को बदलने में लगे रहते हैं, बल्कि वे उनकी कतार में शामिल थे, जो सबकी जिंदगी को बदलते हुए अपनी जिंदगी को बदलना चाहते हैं। भले व्यंग्य में कभी उन्होंने खुद पर बेवकूफ पान वाले का लेबल लगा लिया था, पर वे पढ़े-लिखे और अपने ही निजी स्वार्थ की दुनिया में खोये रहने वाले समझदारों में से नहीं, बल्कि उन समझदारों में से एक थे जिनके लिए रमता जी ने कहा था कि 'राजनीति सबके बूझे के बुझावे के पड़ी, देशवा फंसल बाटे जाल में छोड़ावे के पड़ी।' भोला जी शहर में माले और जसम की गतिविधियों मे शिरकत करते और पान की दूकान पर बैठे हुए कांग्रेस और गैर-कांग्रेस की तमाम सरकारों को आते-जाते देखते रहे और उन्होंने महसूस किया था कि गरीबों की पीड़ा खत्म ही नहीं हो रही है। आप इसी गीत को देख लीजिए-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

कांग्रेस के लंबे शासन के बाद लालू, जो ब्राहमणवाद और धार्मिक अंधविश्वास की आलोचना करते हुए सत्ता में आए थे, वे बहुत ही जल्दी उसी की शरण में चले गए, लेकिन भोला जी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि अपनी पान की दूकान पर बैठकर उनकी सरकार की भी आलोचना की। जिंदगी भर वे किराये के घर में रहे, बाल-बच्चों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना कर नहीं पाए, लेकिन वे अपनी मुश्किलों के हल के लिए किसी देवी-देवता के शरण में नहीं गए और न ही निराशा में डूबे। उनकी कविता में भी गरीब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सवाल पूछता है और यह सवाल पूछना ही उनकी कविता और व्यक्ति दोनों की ताकत है। मुझे जनमत के पुराने अंक में पढ़ी हुर्इ 'मैं आदमी हूं' शीर्षक की उनकी एक कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने मेहनतकश मनुष्यों की जुझारू शक्ति, शान और सौंदर्य के बारे में लिखा था। इतना ही नही, भोला ने जाने-अनजाने हमें यह सिखाया कि गरीब-मेहनतकश आदमी की निगाह से देखने से ही शासन-प्रशासन के दावों और समय का असली सच समझ में आ सकता है। 'पढ़निहार बुड़बक का जनिहें, का पढ़ावल जा रहल बा' कविता इसी की तो बानगी है, जिसमें वे अखबार की खबरों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि नीचा को ऊंचा और ऊंचा को नीचा बताया जा रहा है। जिन्हें शरीफ कहा जा रहा है, दरअसल लोगों की निगाह वे लुच्चे हैं। उसी कविता में आगे वे कहते हैं 'गरीबन के कइसे गारल जा रहल बा।' अपनी आवाज के जरिए वे बकायदा गारने ( कसकर निचोड़ने) की प्रक्रिया को भी व्यक्त करते हैं।

आज जबकि बिहार सरकार अपनी ही प्रायोजित रैलियों में जनता के करोड़ो रुपये लूट-फूंक रही है और जिस तरीके से जनता को बेवकूफ बनाने का खेल चल रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में मुझे जनमत में ही सितंबर 87 में छपी भोला जी की एक और कविता की याद आती है- 'जान जार्इ त जार्इ, ना छूटी कभी बा लड़ार्इ इ लामा, ना टूटी कभी' (जान जाए तो जाए, पर न छूटेगी कभी, है लंबी लड़ार्इ जो नहीं टूटेगी कभी)। और इस लंबी लड़ार्इ में यकीन के बल पर ही भोला जी दो टूक कहते हैं- जनता के खीस (गुस्सा), देखिंहे (देखेंगे) नीतीश। भोला जानते थे कि यह लड़ार्इ लंबी है और इस लंबी लड़ार्इ में दुश्मनों और दोस्तों की पहचान लगातार होनी है। जिस तरह गरीब जनता सरकार और प्रशासन के नस-नस को जानती है, उसी तरह भोला भी उन्हें जानते-समझते थे। उनके पैमाने से अफसर-मच्छर, हड्डा-गुंडा, नेता-कुत्ता एक ही हैं। अब नेता तो जनता के संघर्ष के भी होते हैं, पर उनके लिए उनका पैमाना अलग है, यहां तो नेता साथी होते हैं। तभी तो 1987 की कविता में उन्होंने लिखा कि 'साथ साथी के हमरा र्इ जबसे मिलल, नेह के र्इ लहरिया, ना सूखी कभी। और यह नेह कभी नहीं खत्म नहीं हुआ। बाद में भी उसी लगाव से उन्होने लिखा-

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा।

जिनिगी का मजबूत तार अब टूट गया है पर भोला का गोला यानी उनकी कविताओं की पुस्तिकाएँ सलामत रहेंगी। सलामत रहेगा उनका लाल झोला और उसमें रखा उनका हथौड़ा, जिसके बल पर वे जनता के दुश्मनों से फरिया लेने का हौसला रखते थे।

कवि भोला की तीन भोजपुरी रचनाएं 

1.
तोहरा नियर केहू ना हमार बा

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा

मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा

हेने आव नाया एगो दुनिया बसार्इं जा
जिनिगी के बाग आव फिर से खिलार्इं जा
देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा

दहशत में पड़ल बिया दुनिया र्इ सउंसे
लह-लह लहकत बिया दुनिया र्इ सउंसे
छोडि़ं जा दुनिया आव लागत र्इ आसार बा

2.

आज पूछता गरीबवा

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा

माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।


3.
जान जार्इ त जार्इ

जान जार्इ त जार्इ, ना छूटी कभी
बा लड़ार्इ र्इ लामा, ना टूटी कभी

रात-दिन र्इ करम हम त करबे करब
आर्इ त आर्इ, ना रुकी कभी

बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
दुख आर्इ त आर्इ, ना झूठी कभी

साथ साथी के हमरा र्इ जबसे मिलल
नेह के र्इ लहरिया, ना सूखी कभी

(05 सितंबर, 87, समकालीन जनमत में प्रकाशित)
. सुधीर सुमन

1/14/13

अपनी ही पोल खोलते जनसत्ता संपादक- खालिद


(जनसत्ता के पन्नों पर संपादक ओम थानवी जी ने दो लेख लिखे हैं। पहला यह कहते हुए कि दिल्ली वाली बर्बर घटना के बाद उमड़े जनांदोलन में साहित्य संस्कृति के लोग न थे और यह कि लेखकों के संगठन क्या कर रहे थे। जब साहित्यिक संगठनों से तमाम साथियों ने इसका तथ्यपरक प्रतिवाद किया तो दूसरा लेख आया। दूसरे लेख में खासमखास जसम को निशाना बनाया गया। थानवी जी ने बड़े सवाल उठाने की झोंक में तमाम तथ्यों को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। बात मनमानेपन और चौधराहट की है। अगर आप के पास अखबार है तो क्या आप की झूठ बात भी सही मानी जाएगी? सो इस भ्रम को तोड़ना जरूरी है। वैकल्पिक मीडिया के इस जमाने में ऐसी चौधराहट प्रिंट की बची-खुची प्रासंगिकता को भी नाश कर कर डालेगी। युवा कवि खालिद की निम्न टिप्पणी इसी बावत है।)


अपनी ही पोल खोलते जनसत्ता संपादक ओम थानवी 

13 जनवरी को जनसत्ता में उसके संपादक ओम थानवी की एक टिप्पणी छपी है. पिछले हफ्ते भी उनका लेख जनसत्ता में देखा था. मुझे समझ में नहीं आया कि अचानक उनको लेखकों की भूमिका की याद कैसे आ गई, और जब याद आ ही गई तो जो लेखक दिल्ली से लेकर पूरे देश में गैंग रेप के खिलाफ सड़कों पर थे, वे उन्हें क्यों नहीं दिखे? खैर, आज की उनकी टिप्पणी पढ़ के लगा कि उनका मकसद कुछ और था, क्योंकि लेखक की भूमिका की अपेक्षा करने वाला वाला कोई बुद्धिजीवी उनका उपहास तो बिल्कुल नहीं उड़ाता, जो लगातार इस क्रूर घटना के खिलाफ सक्रिय थे.

ओम थानवी की टिप्पणी खुद ही अंतर्विरोध से भरी हुई है. एक ओर वे कुछ लेखकों का नाम गिनाते हैं, और दूसरी ओर कहते हैं कि लेखक संवेदनशील ही नहीं थे. उनकी आज की टिप्पणी के सन्दर्भ में कुछ बिन्दुओं पर मैंने अपनी बात कही है.

1. जनसत्ता सम्पादक की निगाह में आशुतोष कुमार, सुधीर सुमन, कपिल शर्मा, रविप्रकाश, मार्तण्ड, खालिद आदि जिनका नाम उन्होंने लिया है, (जसम की रिलीज़ के हवाले से) लेखक न भी हों और सिर्फ मदन जी को ही वे इस श्रेणी में रखते हों, तो भी वे संस्कृतिकर्मी तो हैं। फिर मदन कश्यप भी जन संस्कृति मंच के ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है, उनके हाथ में बैनर नहीं था, इसलिए बेचारे जनसत्ता सम्पादक को लगा कि वे किसी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे। हालाँकि लगता है कि उन्हें यह नजर नहीं आया कि मदन जी ने गोरख पाण्डेय की कविता का पोस्टर भी ले रखा था, जिसके नीचे जसम लिखा हुआ था. मैं वहां पहुंचा तो मैंने उनसे वह कविता पोस्टर ले लिया, जिस पर लिखा हुआ था- ये आंखे हैं/ तकलीफ का उमड़ता हुआ समुन्दर/ इस दुनिया को/ जितनी जल्दी हो/ बदल देना चाहिए. मैं, मदन जी, सुधीर सुमन उस वक्त एक ही साथ थे जब आंसू गैस का एक गोला वहां गिरा, जिसे मैंने अपने जूते से दूर फेंकने की कोशिश की, पर मेरी आँखों पर धुएं का असर हो गया. मैंने एक अपरिचित प्रदर्शनकारी से पानी का बोतल लेके अपनी आँखों को धोया. अब मैं तो बिल्कुल नया लेखक हूँ. मुझे प्रदर्शन में शामिल होना जरूरी लगा. ओम थानवी मुझे लेखक मानें न मानें इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं तो इसके बाद भी जसम के साथियों के साथ दूसरे प्रदर्शनों में शामिल हुआ.

2. मुझे 28 दिसंबर के जसम की विचारगोष्ठी की सूचना भी सुधीर सुमन के मेल और एसएमएस से मिली थी. उस गोष्ठी में सुधीर सुमन भी थे, और प्रोग्राम के नोट्स ले रहे थे, जिनकी मौजूदगी की सूचना लगता है ओम थानवी को नहीं मिली. खैर, अगर ओम थानवी के नजरिए को माने तो दिल्ली की जसम की गोष्ठी में शोभा सिंह भी जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नहीं, बल्कि जनसत्ता सम्पादक के दृष्टिकोण से सिर्फ अपना प्रतिनिधित्व कर रही होंगी। मुझे लगता है कि वे हाथ धो कर जसम के एक ही उपाध्यक्ष यानी मंगलेश डबराल को खोज रहे थे, वे मिले नहीं, लिहाजा उनके हिसाब से वहां जसम नहीं था. प्रलेस-जलेस को पहले ही वे खारिज कर चुके थे।

चलिए मान लिया जाए कि वही लोग लेखक/संस्कृतिकर्मी हैं, जो जनसत्ता सर्टिफाइड हैं, तो भी जनसत्ता का लखनऊ संस्करण (21 दिसंबर) जिनकी तस्वीर प्रदर्शन में भाग लेते हुए छाप रहा था (जसम के महासचिव और उपाध्यक्षों में से एक का), उन्हें वे इंडिया गेट पर क्यों तलाश रहे हैं? दिल्ली में बैठ कर आप गिन रहे हैं कि इंडिया गेट पर कौन-कौन था या नहीं था, दूसरी ओर हर प्रदेश की राजधानी में, तमाम छोटे शहरों में लेखक/ संस्कृतिकर्मी अपनी क्षमता अनुसार उतरे हुए हैं और रांची, पटना, लखनऊ, भागलपुर, बलिया, दरभंगा, बेगुसराय, मधुबनी, समस्तीपुर, इलाहाबाद, गोरखपुर तमाम जगहों पर अखबार उन्हें प्रमुखता से छाप रहे हैं। लेकिन बेचारे जनसत्ता सम्पादक बैनर तलाश रहे थे, इंडिया गेट पर। अब पटना में आलोकधन्वा न जलेस का बैनर लेकर उतरे, न अरुण कमल प्रलेस का और न संतोष झा जसम का। जनसत्ता सम्पादक ने उनके लिए बैनर सिलवाए ही नहीं! ज़ाहिर है कि न तो किसी ने नाम गिनवाया, न बैनर पेश किया, क्योंकि नाम गिनने का पुनीत कार्य थानवी साहेब के हाथों ही संपन्न किया जाना था। 

3. ओम थानवी ने सवाल किया है कि पीडिता ने बयान 21 दिसंबर को दिया तो जसम ने कैसे 19 दिसंबर को उसके विवरण के बारे में बयान दे दिया. लगता है कि वे दूसरे अखबार नहीं देखते या यह नहीं जानते कि किन स्रोतों से ख़बरें सरकारों की पाबंदियों के बावजूद आंदोलनकारियों तक पहुँच जाती है. सवाल यह है कि क्या जसम के बयान में दिए गए तथ्य गलत थे? अगर वह बयान सही हैं तो सवाल यह खड़ा होता है कि उस तथ्य के बारे में एक संपादक कैसे अनजान था?

18 दिसंबर के तमाम समाचार पत्रों में इस भीषण काण्ड की भयानकता की सचमुच 'रोंगटे खड़े कर देने वाली ' खबरें आ चुकी थीं. यहाँ मैं 18 दिसंबर के कुछ समाचारपत्रों के लिंक दे रहा हूँ जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि जसम के 19 दिसंबर के बयान में वे तथ्य कहाँ से आए. 


4. जसम की दिल्ली गोष्ठी का समाचार जनसत्ता को छापना इसलिए ज़रूरी नहीं लगा, क्योंकि इससे यह थ्योरी टिक नहीं पाती कि संगठन इस प्रतिरोध में शामिल नहीं थे। अब अचानक कहाँ से इस गोष्ठी की याद आ गई? सिर्फ यह दिखाने के लिए कि इसमें 2-3 लोग जिन पर आप हमला करना चाहते हैं, वे नहीं थे। ओह कितनी खराब बात है न कि उन्होंने जनसत्ता सम्पादक को सूचना देकर अपने न आने का कारण नहीं बताया, मानो यह मीटिंग जसम ने नहीं, जनसत्ता ने बुलाई हो! यानी मीटिंग अपने आप में जनसत्ता सम्पादक की निगाह में इतना महत्त्व भी नहीं रखती कि उसकी रिपोर्ट छापी जाए, लेकिन यह गिनाने के लिए कि कौन नहीं था इस मीटिंग में, उन्हें इसकी याद हो आई। 

5. ओम थानवी ने जसम के प्रेस रिलीज में प्रो. मैनेजर पाण्डेय की भाषा पर सवाल उठाया है. उस बयान में वही कहा गया है जो महिला आन्दोलन की प्रमुख मांगों में से है, उसकी भाषा तथ्यपरक ही हो सकती है, कोमल और सुन्दर नहीं। इस सन्दर्भ में मुझे यही कहना है कि जघन्य कृत्यों के खिलाफ लोगों का विवेक जगाना भाषा का काम है, मीठे वचन और सुभाषितों से उन्हें छिपाना नहीं, बकौल नागार्जुन 'लाएं मीठे वचन कहाँ से? आसाराम बापू भी कह रहे हैं कि बलात्कारी को मीठे वचन 'भाई' कह देने से बलात्कार बच जाता। सच तो यह है कि ये रिलीज़ जनसत्ता को मेल की गई थी। मेरी तरह बहुत से अन्य लोगों के पास भी वह मेल पहुँचा होगा, जिसमें जनसत्ता का मेल आई- डी दिख जाता है। न सम्पादक ने देखा, न छापा, और लिख बैठे कि किसी ने कुछ किया नहीं। जब लोगों ने ध्यान दिलाया, तो बचाव में आ गया भाषा का बहाना। एक झूठ बोलने के बाद कई झूठ बोलने के लिए अभिशप्त होता है आदमी, लेकिन अपने कहे से ही अपनी पोल खोलता रहता है। आइये देखें कि जस्टिस वर्मा आयोग के सामने विभिन्न स्त्री संगठनों ने जघन्यतम कृत्यों के मामले में क़ानून में सुधार के लिए क्या कहा और किस भाषा में कहा, ख़ास तौर पर जॉइंट मेमोरैंडम के सेक्शन III((7,8,9,10) में - 

III) Amendments to the Sexual Assault Sections of the Indian Penal Code

7. In the sections on aggravated penetrative and non-penetrative sexual assaults we further feel that sexual assault by personnel of the armed forces and by personnel of the para military and other allied forces, as also private armies engaged by the state, should be included.


8. Similarly, penetrative and non-penetrative sexual assault at the time of or together with other forms of communal or caste or sectarian violence should be categorized as an aggravated form of sexual assault.

9. In clause (b) of Section 376(2) sexual assault at the instigation of or with the consent or acquiescence of a public official or other persons acting in an official capacity should also be added as an aggravated form of sexual assault. This clause should also be added in the new section which should deal with aggravated forms of non-penetrative sexual assault.

10. In Section 375(a) of the 2012 Bill penetration of the mouth apart from the vagina etc of a person with any part of a body or an object of another person is defined as sexual assault. However, if an object or a part of the body, for example a finger, is inserted into the mouth it would be appropriate to equate this with penetrative sexual assault. Incidentally the Law Commission draft on which this clause seems to be based does not mention the mouth in Section 375 (b). It is only when the penis is forcibly introduced in the mouth that penetrative sexual assault occurs.


कृपया जनसत्ता सम्पादक साधु भाषा में इसका अनुवाद कर दें।