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कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को अविलंब रिहा करो ! : जन संस्कृति मंच


नई दिल्ली: 17 अप्रैल 2013, महाराष्ट्र में कबीर कला मंच (पुणे) के इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के खिलाफ लंबे समय से जारी राज्य दमन की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं और विगत 02 अप्रैल को महाराष्ट्र विधानसभा के समक्ष सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार किए जाने वाले चर्चित संस्कृतिकर्मी शीतल साठे और सचिन माली की अविलंब रिहाई की मांग करते हैं। गर्भवती शीतल साठे को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है और सचिन माली को एटीएस के हवाले कर दिया गया है। इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के साथ राज्य सत्ता का यह पूर्णरूपेण गैर-लोकतांत्रिक और आपराधिक व्यवहार है। अखबार जिसे नक्सल समर्थकों का आत्मसमर्पण कह रहे हैं, वह आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि फर्जी आरोपों के कारण भूमिगत होने के लिए मजबूर किए गए और आतंकवाद निरोधक दस्ता द्वारा निरंतर तलाशी की प्रतिक्रिया में उठाया गया लोकतांत्रिक प्रतिवाद है। जन संस्कृति मंच के हम साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकारों के साथ पूरी तरह एकजुटता जाहिर करते हैं और उनको राज्य मशीनरी द्वारा प्रताडि़त किए जाने तथा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रतिवाद की अपील करते हैं। जन संस्कृति मंच की सारी इकाइयां इस प्रतिवाद को संगठित करेंगी। 

शासकवर्ग की राज्य मशीनरी लगातार दलाल, गुलाम और समझौतापरस्त बनाने की जो सांस्कृतिक मुहिम चलाती रहती है, जिसकी चपेट में बुद्धिजीवियों और कलाकारों का भी अच्छा-खासा हिस्सा आ जाता है, उसके समानांतर अगर कोई जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए संस्कृतिकर्म को अपनी जिंदगी का मकसद बनाता है और सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न का विरोध करता है, तो वह अनुकरणीय है और उससे समाज में बेहतर परिवर्तन की उम्मीद बंधती है। कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों ने दलितों, कमजोर तबकों व मजदूरों के उत्पीड़न, शोषण और उनके हिंसक दमन के खिलाफ लोगों में चेतना फैलाने का बेमिसाल काम किया है। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी अपने गीतों और नाटकों के जरिए लोगों को संगठित करने का काम किया है। यह इस देश और इस देश की जनता के प्रति उनके असीम प्रेम को ही प्रदर्शित करता है। 

शीतल और सचिन ने एटीएस के आरोपों से इनकार किया है कि वे छिपकर नक्सलियों की बैठकों में शामिल होते हैं या आदिवासियों को नक्सली बनने के लिए प्रेरित करते हैं। दोनों का कहना है कि वे बाबा साहेब अंबेडकर, अण्णा भाऊ साठे और ज्योतिबा फुले के विचारों को लोकगीतों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते हैं। सवाल यह है कि क्या अंबेडकर या फुले के विचारों को लोगों तक पहुंचाना गुनाह है? क्या भगतसिंह के सपनों को साकार करने वाला गीत गाना गुनाह है? सवाल यह भी है कि अगर कोई संस्कृतिकर्मी माओवादी विचारों के जरिए ही इस देश और समाज की बेहतरी का सपना देखता है, तो उसे अपने विचारों के साथ एक लोकतंत्र में संस्कृतिकर्म करने दिया जाएगा या नहीं?

इसके पहले मई 2011 में एटीएस (आतंकवाद निरोधक दस्ता) ने कबीर कला मंच के सदस्य दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले को दमनकारी कानून यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया था। दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले पर आरोप लगाया गया कि वे माओवादी हैं और जाति उत्पीड़न और सामाजिक-आर्थिक विषमता के मुद्दे उठाते हैं। पिछले दो सालों में इस आरोप को साबित करने के लिए कुछ किताबें पेश किए गए और यह तथ्य पेश किया गया कि कबीर कला मंच के कलाकार समाज की खामियों को दर्शाते हैं और अपने गीत-संगीत और नाटकों के जरिए उसे बदलने की जरूरत बताते हैं। प्रशासन के इस रवैये के कारण कबीर कला मंच के अन्य सदस्यों को छुपने के लिए विवश होना पड़ा, जिन्हें राज्य ने ‘फरार’ घोषित कर दिया। राज्य के इस दमनकारी रुख के खिलाफ कबीर कला मंच के इन युवा कलाकारों के पक्ष में प्रगतिशील-लोकतांत्रिक लोगों की ओर से दबाव बनाने के बाद गिरफ्तार कलाकारों को जमानत मिली। जाहिर है उसी आरोप में शीतल साठे और सचिन को भी पकड़ा गया है।
  
हम सिर्फ जमानत से संतुष्ट नहीं है, बल्कि मांग करते हैं कि कबीर कला मंच के कलाकारों पर लादे गए फर्जी मुकदमे अविलंब खत्म किए जाएं और उन्हें तुरत रिहा किया जाए, संस्कृतिकर्मियों पर आतंकवादी या माओवादी होने का आरोप लगाकर उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बाधित न किया जाए तथा उनके परिजनों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाए।

सुधीर सुमन 
राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी