10/7/13

कुबेर दत्त स्मृति आयोजन की रपट

जनप्रतिरोध की सांस्कृतिक विरासत से 
 रूबरू हुए लोग कुबेर दत्त स्मृति आयोजन में
 
 


‘‘हमारा इतिहास आधा देवताओं और आधा राजा रानियों ने घेर रखा है, हमारी पंरपरा है कि हम चित्रण को देखने के आदी रहे हैं। धर्म ने अशिक्षित जनता तक पहुंचने के लिए चित्रकला का खूब सहारा लिया है। अगर धर्म चित्रकला के जरिए जनता तक पहुंच सकता है तो राजनीति भी इसके जरिए उस तक पहुंच सकती है, यह भारतीय चित्रकारों ने दिखाया है।’’- चित्रकार अशोक भौमिक ने 4 अक्टूबर को गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित स्मृति आयोजन में दूसरा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए यह कहा। ‘चित्रकला में प्रतिरोध’ विषय की शुरुआत उन्होंने विश्वप्रसिद्ध चित्रकारों गोया और पाब्लो पिकासो के चित्रों में मौजूद जनता के दमन और उसके प्रतिरोध के यथार्थ का जिक्र करते हुए किया और तेभागा, तेलंगाना, बंगाल का अकाल, नाविक विद्रोह, रेल हड़ताल, जनसंहार आदि से संबंधित चित्त प्रसाद, सोमनाथ होड़, देवव्रत मुखोपाध्याय, जैनुल आबदीन, कमरूल हसन सरीखे भारतीय चित्रकारों के चित्रों के जरिए इस कला की प्रतिरोधी पंरपरा से अवगत कराया। चित्रों के बारे में बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि निराशा या हार जाना एक ऐसा संदेश है जो आने वाली लड़ाई के लिए हमें सचेत करता है। जनता किन हथियारों से लड़ेगी यह उतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना कि आंदोलन करने की जरूरत महत्वपूर्ण होती है। प्रतिरोध के चित्र भी उस जरूरत के ही परिणाम हैं। इस मौके पर सांस्कृतिक संकुल (सांस), जसम की ओर से प्रकाशित कुबेर दत्त की कुछ अप्रकाशित और कुछ असंकलित कविताओं के संग्रह ‘इन्हीं शब्दों में’ का लोकार्पण आनंद प्रकाश, मदन कश्यप और कर्मेंदु शिशिर ने किया। पूर्वा धनश्री ने इस संग्रह से ‘स्त्री की जगह’ और ‘आंखों में रहना’, श्याम सुशील ने ‘शब्द’ और ‘मेरे हिस्से का पटना’ तथा सुधीर सुमन ने ‘जड़ों में’ शीर्षक कविताओं का पाठ किया।

लोकार्पित संग्रह पर बोलते हुए आनंद प्रकाश ने कहा कि इस संग्रह की कविताओं में उदासी और अवसाद बहुत है, जो कुबेर दत्त के व्यक्तित्व से अलग है। लेकिन अपने युग की निराशा को भी सशक्त वाणी देना किसी कवि का कर्तव्य होता है और यह काम कुबेर दत्त ने किया है। इसमें भाषा पर बहुत टिप्पणियां हैं, जिसको पढ़ते हुए लगता है कि उनके सामने बड़ा सवाल यह है कि भाषा का सही विकास कैसे किया जाए। आज की कविता में जो बड़बोलापन है वह कुबेर की कविताओं में नहीं है।

मदन कश्यप ने कहा कि कुबेर दत्त प्रचलित काव्य आस्वाद को बदलने की कोशिश करने वाले कवि हैं। जो समय की रूढि़यां हैं उनको तोड़े बगैर और उससे बाहर आए बगैर उनकी कविता को ठीक से समझा नहीं जा सकता। किसी भी चीज, घटना और परिस्थितियों पर बेहतरीन कविता लिखने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। उनके पास व्यापक जीवन अनुभव था। मीडिया के इस पतनशील दौर में भी प्रतिबद्धता को बचाए रखने की जिद उनमें थी और उस जिद को उनकी कविताओं में भी देखा जा सकता है। ये कविताएं पंरपरागत और मूल्यहीन जीवन के खिलाफ नए और प्रतिबद्ध जीवन की आकांक्षा के साथ रची गई हैं। भाषा की जड़ों में लौटने का मतलब ही है उसे अधिक से अधिक मूर्त, संवादधर्मी और संप्रेषणीय बनाना।

दूरदर्शन से संबद्ध रहे महेंद्र महर्षि ने कहा कि कुबेर दत्त चित्रों के खिलाड़ी थे। उनके चित्रों में हर आंख खुली हुई है। कुबेर दत्त के साथ गुजारे गए जीवन के 35 वर्षों को याद करते हुए दूरदर्शन अर्काइव की पूर्व निदेशक और सुप्रसिद्ध नृत्य निर्देशक कमलिनी दत्त ने कहा कि कुबेर दत्त समग्र रूप से एक ब्राडकास्टर थे। विषय चयन, स्क्रिप्ट लेखन, वायस ओवर और संगीत के चयन, हर चीज पर उनकी नजर रहती थी। उनकी कविता की भाषा और गद्य की भाषा अलग है और उनके स्क्रिप्ट की भाषा भी अलग है। उन्‍होंने दृश्य माध्यम की भाषा खुद विकसित की थी। उनके सारे वायस ओवर अद्भुत है। आज के इंटरव्यूअर जिस तरह एग्रेसिव होते हैं और खुद ही ज्यादा बोलते रहते हैं, ऐसा कुबेर नहीं करते थे। जिससे बात हो रही है, उससे वे बेहद सहज अंदाज में बात करते थे। कौशल्या रहबर जी से लिया गया उनका इंटरव्यू इसका बेहतरीन उदाहरण है।

आयोजन के आखिर में हंसराज रहबर की पत्नी कौशल्या रहबर जी से कुबेर दत्त की बातचीत का वीडियो दिखाया गया। भारत में इंकलाब की कोशिशों से आजीवन संबंद्ध और उसके प्रति वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध रहे रहबर जी के साथ कुबेर दत्त के बहुत आत्मीय और वैचारिक संबंध थे। भगतसिंह विचार मंच, जिसके रहबर अध्यक्ष थे, कुबेर दत्त उसके महासचिव थे। कौशल्या रहबर जी से बातचीत में रहबर जी के जीवन के कई अनछुए पहलू सामने आए। गांधी, नेहरू, गालिब जैसे बड़े बड़ों को बेनकाब करने वाले रहबर जी को खुद बेनकाब देखना अपने आप में विलक्षण अनुभव था। हंसराज रहबर की जन्मशती वर्ष में यह उनके प्रति श्रद्धांजलि भी थी। खास बात यह थी कि खुद कौशल्या रहबर और उनकी पुत्रवधुएं भी पूरे आयोजन में मौजूद थीं। वीडियो के अंत में रहबर जी द्वारा कुछ गजलों का पाठ भी देखने-सुनने को मिला।

सभागार में कुबेर दत्त के नए संग्रह की कविताओं और उनके चित्रों पर आधारित पोस्टर भी लगाए गए थे। संचालन सुधीर सुमन ने किया। इस मौके पर वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी, लेखक प्रेमपाल शर्मा, दिनेश मिश्र, कवि इब्बार रब्बी, धनंजय सिंह, नीलाभ, रंजीत वर्मा, सोमदत्त शर्मा, अच्युतानंद मिश्र, रोहित प्रकाश, इरेंद्र, अवधेश, क्रांतिबोध, कहानीकार महेश दर्पण, योगेंद्र आहूजा, संपादक हरिनारायण, प्रेम भारद्वाज, पत्रकार स्वतंत्र मिश्र, रंगकर्मी सुनील सरीन, रोहित कुमार, चित्रकार मुकेश बिजौले, महावीर वर्मा, हिम्मत सिंह, हिंदी के शोधार्थी रामनरेश राम, बृजेश, रूबीना सैफी, फिल्मकार संजय जोशी, सौरभ वर्मा, भूमिका, रविदत्त शर्मा, संजय वत्स, रामनिवास, रोहित कौशिक, संतोष प्रसाद, मित्ररंजन, वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता और मोहन सिंह समेत कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और साहित्य-कला प्रेमी जन मौजूद थे। - सुधीर सुमन