11/26/13

ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति सभा की रपट

मध्यवर्गीय व्यक्तिवाद के खिलाफ लगातार लड़ते रहे वाल्मीकि 


कबीर, नाभादास, अश्वघोष और बुद्ध की परंपरा से जोड़कर वाल्मीकि जी को देखना चाहिए: प्रो. मैनेजर पांडेय   
दलित साहित्य के लिए साहित्यिक मूल्य के बजाए जीवन मूल्य को   कसौटी बनाया वाल्मीकि ने: प्रो. तुलसी राम  
ईश्वर और आस्तिकता के घोर विरोधी थे वाल्मीकि जी: बजरंग  

नई दिल्ली, 25 नवंबर

गलदश्रु भावुकता और श्रद्धालुओं की फूल मालाओं से ख़बरदार रहकर ही ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचनात्मकता को समझा जा सकता है। मध्यवर्गीय अवसरवाद के खि़ला़फ उनकी कहानियों में जो प्रतिरोध दजऱ् हुआ है-उसे देखा जाना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रविवार को आयोजित संयुक्त
स्मृति सभा में ये विचार व्यक्त किये गए।

स्कूल आफ सोशल साइंसेज में दलित साहित्य कला केंद्र, प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित सभा में प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कबीर, नाभादास, अश्वघोष और बुद्ध को याद करते हुए प्रतिरोध की उस साहित्यिक परंपरा को रेखांकित किया जिसकी बुनियाद पर ओमप्रकाश वाल्मीकि और विशेष तौर पर दलित रचनात्मकता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। वाल्मीकि की भाषा को उन्होंने उल्लेखनीय बताया। सभा को कुल 11 वक्ताओं ने संबोधित किया। अध्यक्षता करते हुए प्रो. विमल थोराट ने वाल्मीकि जी के साथ अपनी सुदीर्घ वैचारिक निकटता को भावपूर्ण शब्दों में याद करते हुए कहा कि जाति व्यवस्था आज भी मौजूद है, अभी बहुत सारे सवाल सुलझे नहीं हैं, सामाजिक क्रांति चाहने वालों के लिए ओमप्रकाश एक जरूरी लेखक थे, उनका लेखन और उनके विचार आगे भी प्रासंगिक रहेंगे, उनसे आंदोलन को मजबूत बनाने का हौसला मिलता है। उन्होंने हर वर्ष वाल्मीकि जी के स्मृति दिवस पर स्मृति सम्मान देने की घोषणा भी की। 

इसके पहले बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि मिथकों की फिसलन भरी राह के प्रति वाल्मीकि जी की रचनात्मक सचेतनता बेहद महत्वपूर्ण है। ईश्वरवाद और आस्तिकता से उनका घोर विरोध था। वे उन्मादी राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के विरोधी थी। उन्होंने ओमप्रकाश जी की अप्रकाशित रचनाओं को एकत्र कर रचनावली प्रकाशित करने का प्रस्ताव दिया। ‘घुसपैठिए’ समेत वाल्मीकि की तीन कहानियों पर अपनी बात को केंद्रित करते हुए जेएनयू के शोध छात्र मार्तण्ड प्रगल्भ ने कहा कि मध्यवर्गीय दलित अधिकारी 'घुसपैठिए' के अंतर्द्वंद्व और मेडिकल के दलित छात्र की आत्महत्या के बीच इस कहानी को जिस तरह रचा गया है वह मध्यवर्गीय विरोध-वादी नैतिकता के खिलाफ लेखक के असंतोष की दास्तान बन जाती है। व्यक्ति और लेखक के विचार में अंतर भी हो सकता है और कई बार रचना का अर्थ लेखक की घोषित मंशा से ‘स्वतंत्र’ भी हो सकता है। मार्तण्ड के मुताबिक, वाल्मीकि की कहानियों को जातिगत उत्पीड़न के सिंगिल फ्रेम में रखकर देखने के बजाय हमें हिंदी की अपनी आलोचनात्मक दृष्टि का विकास करना चाहिए और ओमप्रकाश जी की उस कथात्मक अंतदृष्टि को पहचानना चाहिए जो मध्यवर्गीय दलित व्यक्तिवाद के खिलाफ निरंतर संघर्षरत रही है। प्रो. चमनलाल ने वाल्मीकि की कहानियों में अभिव्यक्त यथार्थ के स्वरूप की अर्थ गांभीर्य को रेखांकित करते हुए उन्हें सच्चा यथार्थवादी लेखक बताया।

प्रो. तुलसीराम ने कहा कि हिंदी की रचनाओं में दलित पात्रों के लुम्पेनाइजेशन के विरोध में वाल्मीकि ने जिस साहस से लगातार संघर्ष किया, वह स्मरणीय है। इस प्रसंग में उन्होंने प्रेमचंद की ‘कफन’ कहानी को याद किया। उन्होंने कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि मानते थे कि दलित साहित्य को साहित्यिक मूल्य के बजाय जीवन मूल्य की कसौटी पर देखना चाहिए। स्मृति सभा में डा. रामचंद्र ने कहा कि उन्होंने सिर्फ दलितों के लिए ही नहीं लिखा है, बल्कि पूरे समाज को बेहतर बनाने के लिए लिखा है। कवि-कथाकार अनीता भारती ने कहा कि उन्होंने समता और बंधुत्व के सपनों के साथ लिखा और अत्याचार व प्रताड़ना से लड़ने के लिए प्रेरित किया। 

चित्रकार सवि सावरकर ने कहा कि उन्हें सिर्फ अंबेडकर तक सीमित नहीं रखना चाहिए, उनकी परंपरा बुद्ध और अश्वघोष से जुड़ती है। कवि जयप्रकाश लीलवान, दिलीप कटारिया और प्रो. एसएन मालाकार ने भी सभा को संबोधित किया। सभा के अंत में एक मिनट का मौन रखा गया। 

ओमप्रकाश वाल्मीकि 










सुधीर सुमन की ओर से जारी

11/20/13

मुक्तिबोध के काव्य-संसार की यात्रा-3 :कॉ. रामजी राय

सोवियत संघ के पतन के बाद तो जैसे मार्क्सवाद-समाजवाद की मृत्यु का सोहर गाया जाने लगा। एकमात्र सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के रूप में पूंजीवाद के विजय के साथ इतिहास के अंत की घोषणा की जा चुकी थी। पूंजीवादी उत्पादन-अतिरेक के संकट की मार्क्स के भविष्यवाणी दफना देने का फतवा जारी कर दिया गया था। पूंजीवाद हल न किये जा सकने वाले अंतरविरोधों से ग्रस्त है और उसके नाश के बीज उसके अंदर ही हैं, ऐसा अब भी माननेवालों को पागल-सनकी करार दिया जा रहा था। लेकिन पिछले 20 सालों में इतिहास चक्र 180 डिग्री घूम गया है। पूंजीवाद भयावह संकट में है। और उससे नाभिनालबद्ध विचारक और अर्थशास्त्री, मार्क्सवाद के घोर-विरोधी भी अलग धुन बजाने लगे हैं। अचानक मार्क्सवाद को बड़ी गंभीरता से लिया जाने लगा है। लेकिन इसके साथ ही गलत और तोड़ी-मरोड़ी सूचनाओं, तथ्यों, आंकड़ों के अंबार और ग्लैमर के ताजा संसार के जरिये हमारे सामने में एक ऐसा नया चमचमाता अंधेरा रचा जा रहा है कि हमारी आंखें और दिल-दिमाग चौंधियाने लग रहे हैं। ऐसे में मुक्तिबोध के, अपने समय में रचे जा रहे अंधकार-शास्त्र के विरुद्ध ज्योतिःशास्त्र रचने के युद्ध को समझना बेहद जरूरी है ताकि हम उनके प्रयास को नये स्तर पर ले जा सकें। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद शुरू हुए शीत-युद्ध के दौर में क्षयग्रस्त पूंजीवाद ने अपने बचाव में तैयार किये जा रहे वैचारिकी-सैद्धांतिकी का अंधकार-शास्त्र रचना शुरू किया। साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में यह और कारगर तौर पर किया गया। फोरम फार कल्चरल फ्रीडम नाम से इसे बाकायदा संगठित अभियान का रूप दिया गया। उस अंधकार-शास्त्र का हमारे अपने देश भारत के सामंती जकड़नों से ग्रस्त रुग्ण पूंजीवाद ने लपक कर स्वागत किया - ‘‘साम्राज्यवादियों के/ पैसे की संस्कृति/ भारतीय आकृति में बंधकर/ दिल्ली को/ वाशिंगटन व लंदन का उपनगर/ बनाने पर तुली है!!/ भारतीय धनतंत्री/ जनतंत्री बुद्धिवादी/ स्वेच्छा से उसी का ही कुली है!!’’(जमाने का चेहरा)

अपने एक आलोचनात्मक निबंध में उन्होंने लिखा कि 'अपने देश के बौद्धिकों की स्थिति देखता हूं तो लगता है जैसे हमारा देश अब भी उपनिवेश है।’ साहित्य के क्षेत्र में अपने यहां भी संगठन बनाकर नये-नये जन-विरोध, रचना-विरोधी सिद्धांतों-विचारों को फैलाया गया। इस सब पर विस्तार में बात करने की यह जगह नहीं है और कि यह सब इतिहास आप जानते हैं। नयी कविता की अन्य बहुतेरी विशेषताओं-संभावनाओं-सीमाओं का विश्लेषण करते हुए मुक्तिबोध ने दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले (1) ‘नई कविता के कलेवर पर शीत-युद्ध की छाप है। और (2) कि नई कविता के क्षेत्र में निम्न मध्यवर्ग के रचनाकारों की भाव-दशाएं इन प्रभावों के बावजूद उनसे भिन्न प्रगतिशील दिशा में उन्मुख हैं, इसे अनदेखा नहीं करना चाहिये।' अपने समय में सामान्य जन-जीवन को, कवि-साहित्यकार जिसका अंग है, देखते हुए मुक्तिबोध ने लिखा - ‘‘आज की कविता पुराने काव्य-युगों (इसके साथ इसे आज की जीवन पुराने युगों भी पढ़ सकते हैं) से कहीं अधिक, बहुत अधिक, अपने परिवेश के साथ द्वंद्व-स्थिति में प्रस्तुत है। इसलिए उसके भीतर तनाव का वातावरण है। परिस्थिति की पेचीदगी से बाहर न निकल सकने की हालत में मन जिस प्रकार अंतर्मुख होकर निपीड़ित हो उठता है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आज की कविता में घिराव का वातावरण भी है।’’ अतएव,....यह आग्रह दुर्निवार हो उठता है कि कवि-हृदय द्वंद्वों का भी अध्ययन करें, अर्थात् वास्तविकता में बौद्धिक दृष्टि द्वारा भी अंतःप्रवेश करें, और ऐसी विश्व-दृष्टि का विकास करें जिससे व्यापक जीवन की-जगत की व्याख्या हो सके, तथा अंतर्जीवन के भीतर के आंदोलन, आरपार फैली हुई वास्तविकता के संदर्भ से व्याख्यात, विश्लेषित और मूल्यांकित हों।’’(निबंध वस्तु और रूप: एक )

यह निबंध 1961 में लिखा गया था लेकिन मुक्तिबोध के भीतर यह प्रवृत्ति बहुत पहले से काम कर रही थी - ‘‘दार्शनिक प्रवृत्ति - जीवन और जगत के द्वंद्व - जीवन के आंतरिक द्वंद्व - इन सबको सुलझाने की, और एक अनुभव-सिद्ध व्यवस्थित तत्व-प्रणाली अथवा जीवन-दर्शन आत्मसात् कर लेने की, दुर्दम प्यास मन में हमेंशा रहा करती। आगे चलकर मेरी काव्य की गति को निश्चित करनेवाला सबसे सशक्त कारण यही प्रवृत्ति रही।’’ इससे इतना तो स्पष्ट है कि मुक्तिबोध ने मार्क्सवाद को यूं ही, किसी फैसन के चलते नहीं अपनाया। उन्होंने अपने जीवनानुभवों, अपने संवेदनात्मक ज्ञान व ज्ञनानात्मक संवेदन से गुजरते हुए, अपनी जीवन दृष्टि व विश्वदृष्टि का विस्तार करते, उसकी रोशनी में जीवन-जगत की साभ्यतिक-समकालीन समस्याओं का विश्लेषण-संश्लेषण करते हुए उपलब्ध किया था। और हम-आप सबसे प्रश्न किया था - ‘‘कुहरिल गत युगों के अपरिभाषित/ सिंधु में डूबी/ परस्पर, जो कि मानव-पुण्य धारा है,/ उसी के क्षुब्ध काले बादलों को साथ लाई हूं,/ बशर्ते तय करो,/ किस ओर हो तुम, अब/ सुनहले उर्ध्व-आसन के/ निपीड़िक पक्ष में, अथवा/ कहीं उससे लुटी-टूटी/ अंधेरी निम्न-कक्षा में तुम्हारा मन,/ कहां हो तुम?’’ और खुद के और हम सबके लिये जीवन के समूचे कर्म की भूमिका तय की - ‘‘हमें था चाहिये कुछ वह/ कि जो ब्रह्मांड समझे त्रस्त जीवन को............/हमें था चाहिये कुछ वह/ कि जो गंभीर ज्योतिःशास्त्र रच डाले/ नया दिक्काल-थियोरम बन, प्रकट हो भव्य सामान्यीकरण/ मन का/ कि जो गहरी करे व्याख्या/ अनाख्या वास्तविकताओं,/ जगत की प्रक्रियाओं की/........कि पूरा सत्य/ जीवन के विविध उलझे प्रसंगों में/ सहज ही दौड़ता आये-/ स्मरण में आय/ मार्मिक चोट के गंभीर दोहे-सा/ कि भीतर से सहारा दे/ बना दे प्राण लोहे सा/’’(नक्षत्र खंड)

अंधकार-शास्त्र के खिलाफ ज्योतिःशास्त्र रचने का काम मुक्तिबोध ने अपने समूचे जीवन और रचना कर्म में कियां और इसे किया पूरी तरह एक तल्लीन-तठस्थता के साथ। इस प्रक्रिया में उन्होंने मार्क्सवाद को समृद्ध व अद्यतन करने का काम किया। उनके समूचे रचनाकर्म के भीतर से इस ज्योतिःशास्त्र के सूत्रों को इकठ्ठा करने और अद्यतन मार्क्सवाद को समझने और उपलब्ध करने का काम, जिसकी जरूरत हमें आज और ज्यादा है, तो छोड़िये हमारे प्रकांड आलोचकों ने मुक्तिबोध को मध्यवर्गीय, सिजोफ्रेनिक, भाववादी, फ्रायड और मार्क्स का घालमेल करनेवाला बताकर खारिज करने, या यह नही तो फिर उसे अस्तीत्ववादी मुहावरे में फिट कर अस्मिता की तलाश करनेवाले के रूप में पेश किया। यह काम अब भी शेष है। इसे कौन करेगा? यह प्रश्न हमारे-आपके सामने है।

11/17/13

ओमप्रकाश वाल्मीकि की स्मृति : जसम

श्री ओमप्रकाश वाल्मीकि को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि


प्रकाशनार्थ/ नयी दिल्ली : 17 नवंबर 2013

हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार, क्रांतिकारी चिन्तक और ‘जूठन’ जैसी विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं रहे. उनका इस तरह असमय चले जाना लोकतान्त्रिक मूल्यों और सामाजिक बदलाव के प्रति प्रतिबद्ध भारतीय साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है. उनका जन्म 30 जून 1950 को मुजफ्फरनगर जिला (उत्तर प्रदेश) के बरला में हुआ था. वे कुछ वर्षों से कैंसर से संघर्ष कर रहे थे. उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर हो गयी थी. उनके गुर्दे में स्टैंड पड़ी हुई थी जिसको छः महीने बाद निकाल देना होता है. चिकित्सकों का कहना था कि प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण अभी आपरेशन नहीं किया जा सकता है. दिल्ली में इलाज के बाद भी स्थिति ठीक न होने पर उनके परिजन उन्हें देहरादून के मैक्स हस्पताल ले आए। जहाँ आज दिनांक 17 नवम्बर 2013 को सुबह अस्पताल में ही उनका निधन हो गया. जूठन के अलावा सलाम, घुसपैठिये, अब और नहीं, सफाई देवता, दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र और दलित साहित्य : अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ, 'सदियों का संताप' और 'बस बहुत हो चुका' उनकी मानीखेज किताबें है. 

सामाजिक भेदभाव, उत्पीडन और आर्थिक विषमता के खिलाफ संघर्षरत साहित्यिक-सांस्कृतिक धाराओं और सामाजिक-राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों ने एक सच्चे साथी को खो दिया है. दलित जीवन का जो ह्रदयविदारक और बेचैन कर देने वाला यथार्थ उनके लेखन के जरिए हिंदी साहित्य में आया, उसके बगैर हिंदी ही नहीं, किसी भी भारतीय भाषा का साहित्य प्रगतिशील-जनवादी नहीं हो सकता. ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचना, आलोचना और चिंतन का न केवल हिंदी साहित्य, बल्कि तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए स्थाई महत्त्व है. उन्होंने भारतीय साहित्य को लोकतान्त्रिक, जनपक्षधर, यथार्थवादी और समाजोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. वे ब्राह्मणवाद, सामंतवाद, पूंजीवाद और लैंगिक विभेद के खिलाफ थे और मानव मुक्ति के लिए संघर्षरत थे.

वाल्मीकि जी ने दलित साहित्य की जरूरत, उसकी शक्ति और उसके अंतर्विरोधों को भी उजागर किया. वर्ण व्यवस्था, सामंतवाद और पूंजीवाद जिन भी तौर तरीकों से मनुष्य और मनुष्य के बीच भेदभाव और शोषण-उत्पीडन की प्रवृतियों को बरक़रार रखने की कोशिश करता है, उनका विरोध करते हुए कमजोरों, मजलूमों, दलित-वंचितों की एकता बनाने के प्रति वे हमेशा चिंतित रहे. उनकी आत्मकथा 'जूठन' में जहाँ स्कूली छात्र ओमप्रकाश जानवर के खाल की गठरी लेकर सिर से पांव तक गंदगी और कपड़ों पर खून के धब्बे लिए पहुंचता है तो मां रो पड़ती हैं. और बड़ी भाभी कहती हैं कि ‘‘इनसे ये न कराओ ...भूखे रह लेंगे ....इन्हें इस गंदगी में ना घसीटो !’’ अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं कि 'मैं उस गंदगी से बाहर निकल आया हूँ, लेकिन लाखों लोग आज भी उस घिनौनी जिंदगी को जी रहे हैं।' जूठन ही नहीं, बल्कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की तमाम रचनाएँ अमानवीय सामाजिक-आर्थिक माहौल में जीवन जी रहे लोगों की मुक्ति की फ़िक्र से जुडी हुई हैं और जिस दलित सौंदर्यशास्त्र की वे मांग करते हैं, उसका भी मकसद उसी से संबद्ध है. जन संस्कृति मंच दलित-वंचित तबकों की मुक्ति के उनके सपनों और संघर्ष के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए उन्हीं के शब्दों को याद करते हुए उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि देता है- 

‘मेरी पीढ़ी ने अपने सीने पर
खोद लिया है संघर्ष
जहां आंसुओं का सैलाब नहीं
विद्रोह की चिंगारी फूटेगी
जलती झोपड़ी से उठते धुंवे में
तनी मुट्ठियाँ
नया इतिहास रचेंगी।‘

[जन संस्कृति मंच की ओर 
सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी]

11/16/13

मुक्तिबोध के काव्य संसार की यात्रा-2 :कॉ. रामजी राय


‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ (त्याग के साथ उपभोग करो) के उपदेश से लेकर ट्रस्टीशिप तक के विचार हृदय परिवर्तन के सिद्धांत या समझ से जुड़े रहे हैं -कि धन से जुड़े मन को बदला जा सकता है। इस बाबत यह कहते हुए कि -‘‘कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूं/ वर्तमान समाज चल नहीं सकता/ पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता...’’ मुक्तिबोध उस गांधी को भी वैचारिक-राजनीतिक धरातल पर खारिज करते हैं, जिनके अन्य गुणों को वे मानते और महत्व देते हैं। वे शायद ऐसा इसलिये करते हैं कि आर्थिक-राजनीतिक-सांस्थानिक एक शब्द में ठोस भैतिक समस्याओं का हल नैतिक-भावनात्मक स्तर पर नहीं दिया जा सकता। इसलिये और भी कि उन्हें गांधी से ही वह बच्चा मिलता है, जिसे उन्हें ‘संभालना व सुरक्षित रखना’ है। इस ‘भार का गंभीर अनुभव’ मुक्तिबोध को है और शब्दों की उस गुरुता का भी, जो कोई और नहीं गांधी की वह मूर्ति ही कहती है - ‘‘...भाग जा, हट जा/ हम हैं गुजर गये जमाने के चेहरे/ आगे तू बढ़ जा।’’ कविता की इन्हीं पंक्तियों के आगे की पंक्तियों में जब वे कहते हैं कि - ‘‘स्वातंत्र्य व्यक्ति का वादी/ छल नहीं सकता मुक्ति के मन को/ जन को’’ तब ऐसा कहते हुए वे व्यक्ति स्वातंत्र्य का नारा उछालने वाले अपने उन समकालीनों को ही निशाने में नहीं ले रहे बल्कि उस पूंजीतंत्र मात्र को निशाना बनाते हैं जो व्यक्ति स्वातंत्र्य का झंडा लेकर आया लेकिन जिसकी स्वतंत्रता ‘इत्यादि जन’(मुक्तिबोध का शब्द) की परतंत्रता बन गई।

एक और स्तर पर मुक्तिबोध ने रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी से लेकर जयशंकर प्रसाद कि आलोचना की है वह है उन लोगों के द्वारा साभ्यतिक प्रश्नों-समस्याओं, नवीन भारतीय राज-समाज को अ-यंत्र युग, ग्राम-समाज, ग्राम-स्वराज्य(आज का पंचायती राज) आदि के आधारों और वर्ग-संघर्ष रहित वर्ग-सहयोग, वर्ग-समन्वय और शांति के रास्ते से बनाने के विचार की। 

- ‘‘सुकोमल काल्पनिक तल पर/ नहीं है द्वन्द्व का उत्तर/ तुम्हारी स्वप्न वीथी कर सकेगी क्या......।’’ मैं इस सबके विस्तार में यहां नहीं जाना चाहता सिर्फ एक सवाल कि तो क्या मुक्तिबोध ऐसा इसलिये कहते-करते हैं कि वे मार्क्सवादी हैं और मार्क्सवाद ऐसा ही मानता और कहता रहा है? या इसे उन्होंने अपने जीवनानुभवों, अपने संवेदनात्मक ज्ञान व ज्ञनानात्मक संवेदन से गुजरते हुए, अपनी जीवन दृष्टि व विश्वदृष्टि का विस्तार करते उसकी रोशनी में जीवन-जगत की साभ्यतिक-समकालीन समस्याओं का विश्लेषण-संश्लेषण करते हुए उपलब्ध किया था? 

11/15/13

सांप्रदायिक दंगे और अखबारों की भूमिका: एक पड़ताल

सांप्रदायिकता का खबर बन जाना खरनाक नहीं है, खतरनाक है खबरों का सांप्रदायिक बन जाना। यह रपट दंगों के दौरान अखबारों की सांप्रदायिक मन-मिजाज की पोल खोलती है।  


कांग्रेस और दूसरी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियां हिंदुत्व की डगर पर बढ़ रही हैं तो भी उनमें एक हल्की शर्म या झिझक अक्सर दिखाई दे जाती है। लेकिन, लगता है कि हमारे 'निष्पक्ष’ मीडिया में अब ऐसी कोई शर्म या झिझक बाकी नहीं है। मुजफ्फरनगर-शामली की सांप्रदायिक हिंसा की जमीन तैयार करने, फिर अल्पसंख्यकों के सुनियोजित संहार और बलात्कार की घटनाओं पर पर्दापोशी करने, भगवा ब्रिगेड की हर कारगुजारी को जेनुइन ठहराने, सांप्रदायिक नेताओं को हीरो बनाने, उत्पीडि़तों को अपराधी ठहराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांगों को उत्पीडऩ साबित करने में मीडिया ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। हिंदी के प्रमुख अखबारों के मुजफ्फरनगर-शामली संस्करण देखकर लगता है कि कॉरपोरेट के हाथों संचालित और निष्पक्ष व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले ये अखबार अगर ऐसी भूमिका अदा कर रहे हैं तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अब ऑर्गेनाइजर और पांचजन्य की जरूरत ही क्या है? 

दैनिक जागरण इस इलाके का सबसे ज्यादा प्रसारसंख्या वाला अखबार है और इसका आरएसएस/भाजपा संबंध जगजाहिर है। संघ के दफ्तरों में इस अखबार के बाकायदा पारायण की परंपरा रही है। 27 अगस्त को मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के कवाल गांव में हुई तीन युवकों की हत्या की खबर लिखने में इस अखबार ने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। गौरतलब है कि पास ही के गांव मलिकपुर माजरा निवासी सचिन और उसके फुफेरे भाई गौरव ने कवाल में शाहनवाज की हत्या कर दी थी और फिर भीड़ ने इन दोनों जाट युवकों की भी मौके पर ही हत्या कर दी थी। पिछले कई महीनों से मुजफ्फरनगर व शामली जिलों में मुसलमानों पर एक के बाद एक हमलों के जरिये बड़े दंगे की कोशिशों में जुटी आरएसएस-बीजेपी की टीम ने इस दुर्भाग्यपूर्ण वारदात को तपाक से लपक लिया था और इसे छेडख़ानी की वारदात से जोड़कर जाटों के स्वाभिमान का सवाल बना दिया था। दैनिक जागरण के 28 अगस्त के अंक में इस बारे में छापी गई एक खबर का भड़काऊ शीर्षक था- 'सीने पर चढ़कर काटी थी सांसों की डोर’। इस बेहद आपत्तिजनक भाषा में लिखी गई खबर के बीच में बाकायदा 'लाइव’ लिखी डिब्बी भी लगाई गई थी, मानो संवाददाता मौके पर बैठकर घटनाक्रम का आखोंदेखा वर्णन कर रहा हो। 

जाटों और बाकी हिंदू जातियों के गुस्से को भड़काने में इस खबर और दोनों जाट युवकों की हत्या के नाम पर फैलाई गई एक फर्जी वीडियो क्लिप की बड़ी भूमिका रही। जाट बहुल गांवों में योजनाबद्ध ढंग से अल्पसंख्यकों को घेरकर उनकी हत्याओं, महिलाओं के साथ बलात्कार, घरों में आगजनी की वारदातों और इन गांवों से करीब एक लाख मुसलमानों के भागकर कैंपों व सुरक्षित रिश्तेदारियों में पहुंचने के बाद भी अखबार का रवैया उत्पीडि़तों को ही प्रताडि़त करने और इस भयानक हिंसा को वाजिब ठहराने का रहा। कैंपों में पड़े लुटे-पिटे मुसलमानों का मजाक बनाने और उन्हें मुआवजे के लालच में वहां पड़े होने की बातें कमोबेश सभी अखबार छाप रहे हैं लेकिन दैनिक जागरण ने 23 सितंबर को एक खबर के शीर्षक में सारी सीमाएं पार कर दीं। शीर्षक था- 'शरणार्थी शिविर में मौज मना रहे हैं दो हजार मुफ्तखोर’। 

अखबारों का यह रवैया आकस्मिक नहीं था। लगता था कि आरएसएस ने गांवों में लंबी तैयारियों के साथ ही अखबारों को भी पहले ही पूरी तरह पटा लिया था। अव्वल तो रामजन्मभूमि के नाम पर चले आंदोलन में ही संघ मीडिया को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने में कामयाब रहा था। तब हिंदी पट्टी के शहरों-कस्बों के बहुत सारे पत्रकार बाकायदा रामजन्मभूमि आंदोलन समिति का हिस्सा थे और खबरों में ही नहीं बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों व राज्य की खुफिया एजेंसियों से संघ की योजनाओं को मदद दिलाने में भी भूमिका निभा रहे थे। बाद में, संघ शावकों के लिए सरकारी दफ्तरों की तरह ही अखबारी दफ्तरों में भी लुकाछिपी के बजाय खुलकर खेलने का दौर आया और वे मीडिया हाउसों के संपादक व महाप्रबंधक जैसे पदों पर छा गए। और अंतत: रिपोर्टिंग का रुख ऐसा बदला कि संघ और भाजपा नेताओं की हिंसक व राष्ट्रविरोधी कारगुजारियां लोगों और संघ से ताल्लुक न रखने वाले नए पत्रकारों को भी राष्ट्रवादी व सहज लगने लगीं। मुजफ्फरनगर-शामली की सांप्रदायिक हिंसा में यही हुआ। मोदी की गुजरात सरकार के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह को जेल से जमानत दिलाकर मिशन यूपी पर भेजा गया तो पूरे प्रदेश में सांप्रदायिक वारदातों की बाढ़-सी आ गई। मुजफ्फरनगर-शामली जिलों में पिछले कई महीनों से जगह-जगह मुसलमान युवकों की पिटाई, रेलों व बसों में उन पर हमलों, मस्जिदों, मदरसों में तोडफ़ोड़, जमातियों व देवबंद मदरसे के छात्रों के साथ दुव्र्यवहार की वारदातें लगातार अंजाम दी जा रही थीं और संघ व भाजपा के नेता-कार्यकर्ता ऐसी किसी भी घटना को दंगे में तब्दील करने के लिए खुलेआम कोशिश करते दिखाई दे रहे थे तो भी मीडिया ने कभी उनकी भूमिका को प्रश्नांकित करने की कोशिश नहीं की। उलटे जब भी हमलावरों पर कार्रवाई की नौबत आई तो अखबार भगवा ब्रिगेड की 'एकतरफा कार्रवाई’ के सुर में सुर मिलाते नजर आए। 

शामली के एसपी (अब पूर्व) अब्दुल हमीद के मुसलमान होने को निशाना बनाकर माहौल गरमाए रखने और मामूली बातों को लेकर शामली को दो बार आग में झोंक दिए जाने की भाजपा विधायकों हुकुम सिंह और सुरेश राणा की ओछी हरकतों को अखबारों ने पूरा-पूरा सहयोग दिया। ऐसे अखबारों से यह उम्मीद की ही नहीं जा सकती थी कि वे गांवों में त्रिशूल-तलवारें बांटे जाने और एक बड़ी हिंसा की पटकथा तैयार कर लिए जाने की पोल खोलते। 

आखिर, सभी अखबारों ने आंखें मूंदकर संघ के पहले से तैयार इस सिद्धांत पर मुहर लगाई कि दंगे की वजह कवाल कांड को लेकर एकतरफा कार्रवाई के विरोध में उपजा गुस्सा था। प्रदेश सरकार और उसके मंत्री खासकर आजम खां और पूर्व मंत्री अमीर आलम खान पर सरकारी मशीनरी के हाथ-पांव बांध देने और सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बनाने को दंगों का कारण बताया गया। बेशक, सपा सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में होनी ही चाहिए लेकिन अखबारों ने यह जानना-बताना जरूरी नहीं समझा कि कवाल कांड से पहले की तमाम वारदातें और कवाल कांड से लेकर सात सितंबर की महापंचायत के बाद व्यापक पैमाने पर शुरू हुई हिंसा के बीच संघ व भाजपा के नेता क्या कर रहे थे। क्या पंचायतों-महापंचायतों के मंच उनके हाथों में नहीं आ गए थे? क्या शांति की बात भी करने वाले किसी भी नेता को वे सरेआम बेइज्जत नहीं करा रहे थे? क्या जगह-जगह मुसलमानों पर हुए हमलों में उनके नेटवर्क की कोई भूमिका नहीं थी? क्या महापंचायत में पहुंच रहे युवक खुलेआम हथियार लहराते हुए और मुसलमानों के खिलाफ अश्लील-आक्रामक नारेबाजी नहीं कर रहे थे? क्या बीजेपी और संघ परिवार के नेताओं के संचालन में हुई इन पंचायतों में मुसलमानों को सबक सिखाने के आह्वान नहीं किए गए? अखबारों ने बीजेपी नेताओं या खापों-पंचायतों के मुखियाओं से नहीं पूछा कि जाटों के गांवों की गरीब आबादियों जो हर हाल में उनकी जी-हुजूरी में थे, के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक हिंसा, बलात्कार और आगजनी के लिए आजम खां कैसे जिम्मेदार हो गए। अगर उस चैनल के प्रायोजित और हास्यास्पद स्टिंग को सच मान लें कि पुलिस को कार्रवाई न करने के लिए कहा गया था तो गांवों के इतने 'इंसाफपसंद’ चौधरी क्या कर रहे थे? लेकिन अखबारों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी हिंसा की आड़ के तौर पर एकतरफा कार्रवाई के जुमले को रट लिया था।

धुर उत्तराखंड तक पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी जमाने में एकतरफा धाक रखने वाले अमर उजाला को मेरठ-मुजफ्फरनगर के खेतों की डोल तक पर बैठकर पढ़े जाने का घमंड था। अमर उजाला की मेरठ यूनिट और भारतीय किसान यूनियन के मरहूम नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के सितारे एक साथ और एक-दूसरे के सहारे बुलंदी की तरफ बढ़े थे। इस सांप्रदायिक हिंसा को अमर उजाला ने शायद इन गांवों में अपना खोया रुतबा दोबारा हासिल करने का मौका समझा हो या फिर यह संघ की नेटवर्किंग और इस इलाके में ताकतवर जाटों के दबाव का नतीजा हो कि उसने भी गांवों में हुई भयानक हिंसा की तथ्यपरक रिपोर्टिंग करने के बजाय इसे जेनुइन और स्वाभाविक प्रतिक्रिया साबित करने की कोशिशों को ही प्रमुखता दी। सात सितंबर को महापंचायत से लौटते लोगों के साथ जौली नहर के पास मुसलमानों से टकराव को किसी जमाने में सरयू नदी का पानी कारसेवकों के खून से लाल हो जाने जैसे मिथ की तरह पेश किया जा रहा था। अफवाहें फैला दी गईं कि कई सौ जाटों को मारकर नहर में फेंक दिया गया है। ऐसे में इस अखबार ने पहले पेज पर एक समाचार प्रमुखता के साथ छापा कि जौली नहर पर पंचायत से लौटते लोगों पर हमला नक्सली हमले जैसा था। लेकिन, यह नहीं बताया कि आखिर कुल कितने लोगों की मौत हुई और कितने लोग लापता हैं। किसी भी अखबार ने इस तथ्य पर प्रकाश डालने की जरूरत नहीं समझी कि इस इलाके में भी जो लोग मारे गए, उनमें दोनों ही संप्रदायों के लोग थे। लांक गांव की भयंकर हिंसा से किसी तरह जान बचाकर आए अल्पसंख्यक जिस प्रधान सुधीर कुमार उर्फ बिल्लू पर दंगाइयों के नेतृत्व करने का आरोप लगा रहे थे, अमर उजाला 12 सितंबर के अंक में उसे राहत कार्य तेज कर देने वाले मसीहा की तरह पेश कर रहा था। दंगों के शिकार गरीब अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनहीनता का आलम यह था कि 15 सितंबर को एक खबर का शीर्षक था- 'अस्पतालों में तीमारदारों ने हंगामा काटा’। इसी अखबार ने 19 सितंबर को पहले पेज पर 'पुलिस पर हमलों तक के मुकदमे नहीं’ शीर्षक से स्टोरी प्रकाशित की जिसका लब्बोलुआब यह था कि आजम खां के दबाव में पुलिस इतनी बेबस थी कि सिपाही को गोली लगने और हिंसक भीड़ से घिरे अफसरों के मुकदमे भी दर्ज नहीं हो सके। मतलब, मुसलमानों को कुछ नहीं कहा जा रहा है लेकिन, ऐसी किसी खबर के लिए कोई जगह नहीं थी कि कई गांवों में आगजनी, हत्याओं और बलात्कार के समय पुलिस चौधरियों के घर पर चाय पीती रही थी, उत्पीडि़तों के मुकदमे दर्ज करने के बजाय पुलिस उन्हें धमकाकर एफिडेविट ले रही थी और पुलिस के आला अफसरों के बयान और गतिविधियां इतनी संदेहास्पद थीं कि जांच की मांग करती थीं।

एक मुस्लिम बहुल गांव से पलायन कर कमालपुर गांव में शरण लेने वाले दलितों को बीजेपी ने लगातार कवच की तरह इस्तेमाल किया। मानो, सांप्रदायिक दंगों में हिंदुओं के शिकार होने के लिए संघ-बीजेपी के सांप्रदायिक अभियान जिम्मेदार न हों। सच्चाई तो यह है कि संघ-भाजपा को अपने हिमायती के तौर पर देख रहे जाटों को हिंसा के लिए उकसाने, उनके गांवों का तानाबाना झुलसा देने, उन्हें मुकदमों में फंसा देने और उन्हें आसान मोहरा बना लेने के लिए इन्हीं ताकतों की साजिशें जिम्मेदार थीं। कमालपुर में शरणार्थी दलितों को ईख के खेत में झुकाकर दौड़ाते हुए एक फोटो खींचा गया जिसका अमर उजाला में कैप्शन लगाया गया कि जंगलों में मारे-मारे घूमते दलित। थोड़ा-सा भी विवेक रखने वाला आदमी ऐसे फोटो की असलियत समझ सकता है। बाद में 19 सितंबर को ऐसा ही एक फोटो खेतों की तरफ भागते लोगों का छापा गया कि किस तरह जाटों के गांवों के लोग पुलिस के डर से खेतों में भागे फिर रहे हैं। सवाल उठता है जो पत्रकार किसी तरह जंगलों में जाकर ऐसी कवरेज कर रहे थे, वे कस्बों में शिविरों में पड़े लोगों का दर्द क्यों नहीं सुन पा रहे थे। सामूहिक बलात्कार की खबरों को क्यों दबाया जा रहा था जबकि सोशल साइट्स और फैक्ट फाइंडिंग कमेटियों के दस्तावेजों में पीडि़त युवतियों की दास्तान दर्ज हो रही थी? काफी दिनों बाद किसी तरह पुलिस ने बलात्कार के छह मुकदमे दर्ज किए तो इन शिकायतों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने वाली खबरें छापी गईं।

अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान आदि सभी अखबार एक ही लाइन पर चलते रहे। हिंदुस्तान के मेरठ इकाई के संपादक ने 15 सितंबर को इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के बहाने से मुख्य खबर का शीर्षक लगाया, 'पुलिस की एकतरफा कार्रवाई से हुई हिंसा’। 18 सितंबर को इसी अखबार ने मुखपृष्ठ की बॉटम स्टोरी छापी- 'हिंदुस्तान ने किया था खुलासा, क्यों भड़का दंगा’। इस खुलासे में वही रटे-रटाए जुमले 'एकतरफा कार्रवाई’ और 'नेताओं की सियासत’ उठाए गए थे। एकतरफा कार्रवाई मतलब मुसलमानों की तरफदारी और नेताओं की सियासत मतलब आजम खां? बीजेपी-संघ की भी कोई सियासत रही होगी या ये संगठन भजन-कीर्तन में जुटे थे? बाद में बीजेपी के दो विधायक सुरेश राणा और संगीत सोम गिरफ्तार हुए तो ये अखबार इन विधायकों के पम्फलेट में बदल गए। प्रदेश सरकार ने इन दोनों को हीरो बनने का पूरा मौका दिया। 20 सितंबर को सुरेश राणा ने गिरफ्तारी दी तो अमर उजाला ने किसी नेता के मंत्री, राज्यपाल आदि बनने पर छापे जाने वाले विस्तृत जीवनचरित के अंदाज में खबर छापी- 'आंदोलन से सुर्खियों में आए थे राणा’। इसमें बताया गया कि 1997-98 में जलालाबाद (शामली जिले का एक कस्बा) में प्रतिमा क्षतिग्रस्त करने के मामले से राणा सुर्खियों में आए थे। कायदे से खबर का शीर्षक होना चाहिए था- 'धार्मिक मुद्दों पर सांप्रदायिक खेल की उपज हैं राणा’। इसी अखबार ने उनकी पत्नी नीता सिंह का बयान छापा - 'मुझे गिरफ्तारी पर गर्व है’। सांप्रदायिक दंगों के आरोपी विधायक के समर्थन में पत्नी के फोटो और बयानों के बहाने भावुक माहौल बनाने का अखबारों का अभियान लगातार जारी है। करवा चौथ पर हिंदुस्तान ने राणा की पत्नी नीता सिंह का पीले बाने में फोटो छापा और किसी राजपूतानी वीरांगना के अंदाज वाला उनका बयान छापा कि उन्हें देश की सुरक्षा की सरहद पर जाने वाले सैनिक की पत्नी जैसा महसूस हो रहा है। इन दोनों में से एक विधायक को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया तो एक अखबार ने उसकी पत्नी का बयान छापा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भी 14 साल के लिए वनवास पर गए थे। संगीत सोम ने 21 सितंबर को गिरफ्तारी से पहले सभा की जिसकी खबरें और तस्वीरें अखबारों ने किसी महान रणबांकुरे की गाथा की तरह पेश की। इस बारे में 22 सितंबर के दैनिक जागरण के कुछ शीर्षक देखिए- 'जनसैलाब के बीच सोम गिरफ्तार’, 'खून की नदी पर नाव चलाना चाहती है सरका’’, 'कोई जेल ज्यादा दिन नहीं रोक सकती मुझे’। आलम यह है कि दोनों विधायकों की हीरो छवि बनाने के लिए इन बड़े अखबारों में प्रतिद्वंद्विता चल रही है। उनकी हर तारीख, हर पेशी अखबारों में उनकी वंदना में तब्दील हो जाती है। इन दोनों के आजम खां पर हमले और अपनी कारगुजारियों पर गर्व भरे वही बयान पांच-पांच, सात-सात कॉलम में दोहराने की रस्म इन अखबारों ने तय कर ली है। साथ में समर्थकों के बहाने भी कई-कई फोटो छापे जाते हैं। उनसे पूछे जाने वाले सवाल भी किसी पत्रकार के बजाय किसी संघ कार्यकर्ता के प्रायोजित सवालों जैसे होते हैं।

मुजफ्फरनगर-शामली पहुंच रहे इन अखबारों की इन दिनों की दैनिक सुर्खियों में हिंसा के आरोपियों को बचाने के लिए जाटों की लामबंदी भी जोरशोर से शामिल है। इतने बड़े पैमाने पर हिंसा, बलात्कार और अल्पसंख्यकों के पलायन का कोई दोषी है या बस यही सच्चाई है कि निर्दोषों को फंसाकर जाटों का उत्पीडऩ किया जा रहा है? अखबार इन चौधरियों और आंदोलकारी जाट महिलाओं से नहीं पूछते कि चलिए निर्दोषों को फंसा दिया गया है तो असली हत्यारे, बलात्कारी कौन हैं, आप बताइए? उलटे आलम यह है कि आंदोलन जाटों से ज्यादा इन अखबारों के कंधों पर है। हिंदुस्तान ने 18 सितंबर को पूरे पेज पर फैलाकर शीर्षक लगाया- 'दो-दो सरकारें आईं पर जाटों का दर्द किसी ने न जाना’। इस शीर्षक के नीचे खरड़, लिसाढ़, सिसौली, फुगाना, मुंडभर, लांक, डुंगर, बहावडी, काकडा, कुटबा, भाज्जु आदि जाट बहुल गांवों के चौधरियों के फोटो व बयान सजाए गए कि जाटों के साथ एकतरफा कार्रवाई की जा रही है। संघ-बीजेपी को अपनी इस हिंसक इंजीनियरिंग में गठवाला खाप के मुखिया हरकिशन की खुली मदद मिली है। लिसाढ़ गांव में बलात्कार की शिकार हुई युवतियां इस मुखिया के बेटे का नाम भी ले रही हैं। हरिकिशन पर मुकदमे कायम किए गए हैं तो अखबार उसकी उम्र और सामाजिक हैसियत का गुणगान कर रहे हैं। हिंदुस्तान ने 18 सितंबर को ही गब्बरनुमा शीर्षक दिया- 'सो जा...नहीं तो पुलिस आ जाएगी’। गांव-गांव की महिलाओं के 'आंदोलन’ की खबरें एकत्रित करने के बजाय अलग-अलग पन्नों पर फैलाई जा रही हैं। कई-कई फोटो छापे जा रहे हैं जिनमें महिलाओं के हाथों में तमंचे, लाठी, डंडे लहरा रहे होते हैं। तीन अक्टूबर के दैनिक जागरण में एक ऐसे ही फोटो के साथ शीर्षक छापा गया- 'महिलाओं व बच्चों ने थामे लाठी और तमंचे’। साथ में मोटे-मोटे अक्षरों में पूरा हुनर उडेल दिया गया- 'अपने सुहाग और बेटों की फर्जी नामजदगी को लेकर मुजफ्फरनगर और मेरठ की महिलाएं देहरी लांघ सड़कों पर उतर आई हैं। उनका आक्रोश चंडी का रूप धारण करता जा रहा है। मीठे बोल झरने वाली जुबान मुर्दाबाद रूपी आग उगल रही है। चुनरी के बोझ से झुक जाने वाले कंधे सरकार के नुमाइंदों के पुतले ढो रहे हैं। चूडिय़ों की खनखनाहट नारेबाजी के शोरोगुल में खो गई है। मेहंदी रचे हाथों में लाठी, डंडे और तमंचे तक लहरा रहे हैं।’ 

राहत शिविरों के 15-17 युवाओं के आइएसआइ के संपर्क में होने के राहुल गांधी के बयान पर नरेंद्र मोदी सवाल खड़ा कर रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी के नेता तो आए दिन ऐसे बयान दे रहे हैं। काली वर्दी के कमांडो जैसे लोगों के बार-बार गांवों में दिखाई देने के प्रचार को जिस तरह मीडिया की मदद से खड़ा किया गया है, उसके पीछे संघ का दिमाग ही लगता है। हिंदुस्तान ने राहुल का बयान आते ही सीना ठोकने में देरी नहीं लगाई कि वह तो पहले ही ऐसा कह रहा था। दैनिक जागरण ने 23 सितंबर को 'जाटलैंड पर जमी नागपुर की नजर’ शीर्षक से लिखा कि संघ ने पूरे रिसर्च के साथ गांव-गांव में सामाजिक व जाति संगठनों की मदद से अपने कार्यकर्ता उतार रखे हैं। उधर, बीजेपी नेताओं को आक्रामक बने रहने के लिए कहा गया है। बीजेपी के सतपाल मलिक जैसे नेता धमकी के अंदाज में बोल रहे हैं कि सुरक्षा सेना नहीं पड़ोसी दे सकते हैं। राह चलते लोगों की हत्याओं का सिलसिला जारी है जिसे अखबार 'साइलेंट वार’ करार दे रहा है। खौफ का आलम तारी है लेकिन मुख्यमंत्री के मंत्री चाचा शिवपाल सिंह यादव उत्पीडि़तों के शिविरों में बने रहने पर सवाल खड़े कर रहे हैं और मीडिया तो लगातार ही इन राहत शिविरों को लेकर आक्रामक है ही। 

सवाल यह उठता है कि दंगों की रिपोर्टिंग करने के लिए जरूरी मानकों तक का पालन नहीं कर पाए अखबारों का यही रवैया चलता रहा तो शांति और इंसाफ की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? तथ्यों की तलाश में यहां पहुंची कई टीमों ने अखबारों के इस रवैये पर चिंता भी जाहिर की है। सवाल है प्रेस परिषद शायद इस ओर कब ध्यान देगी और कोई ठोस कदम उठाएगी? अधिकांश मामलों में प्रेस परिषद के निर्देशों को ठेंगा दिखाने के आदी मीडिया घरानों को इस मामले में अदालत तक ले जाया जाए तो शायद ज्यादा बेहतर हो।

और तहलका ... 

हथियारों की खरीद में दलाली को लेकर किए गए स्टिंग के जरिए एनडीए सरकार को हिलाकर रख देने वाले तरुण तेजपाल का तहलका भी मोदी युग तक आते-आते फुस्स हो चला लगता है? इस समूह की हिंदी पत्रिका पाक्षिक तहलका ने 30 सितंबर 2013 को निकाले अपने अंक में मुजफ्फरनगर-शामली दंगों को लेकर जो रिपोर्टिंग की, वह तथ्यों के अन्वेषण के बजाय संघ-बीजेपी द्वारा पहले ही फैला दिए गए फॉर्मूले को पुख्ता करने की हास्यास्पद कोशिश ही साबित हुई। 'फूट डालो राज करो’ शीर्षक से प्रकाशित आवरण कथा के दूसरे पैरे में कवाल में 27 अगस्त को तीन युवकों शाहनवाज, सचिन और गौरव की हत्या का उल्लेख करते हुए लिखा गया, 'इससे पैदा हुई चिंगारी ने हफ्ता बीतते-बीतते प्रचंड सांप्रदायिक ज्वाला का रूप ले लिया।’ यहां हम उम्मीद करते हैं कि शायद आगे जाकर यह साफ होगा कि इतनी बड़ी हिंसा कवाल से उठी चिंगारी के देखते-देखते ज्वाला में बदल जाना नहीं था बल्कि पिछले कई महीनों से संघ-बीजेपी और उनके दूसरे संगठन अमित शाह के नेतृत्व में इसकी तैयारी में जुटे थे। लेकिन कुछ नेताओं और अफसरों के बयानों के जरिये यह तो समझाने की कोशिश की गई कि सूबे की सरकार और उसका मुख्यमंत्री निकम्मे हो गए थे लेकिन संघ-बीजेपी के लिए छठे पैरे में मासूमियत से दो दिलचस्प प्रश्नवाचक वाक्य लिखे गए- 'क्या लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने राजनीतिक रूप से सबसे अहम सूबे में हिंसा भड़काने की साजिश रची? या फिर उसने केवल मौके का फायदा उठाया?’ इस आवरण कथा के लिए जुटे तहलका के तीन-तीन रिपोर्टर (दिवाकर आनंद, वीरेन्द्र नाथ भट्ट और साथ में अशहर खान) इसका जवाब नहीं देते। काश कि वे पिछले कुछ महीनों के अखबारों के स्थानीय पन्ने ही पढ़ डालते जो जगह-जगह मुसलमानों पर हमलों, धर्मस्थलों में तोडफ़ोड़ और भाजपा नेताओं की मुहिमों से रंगे पड़े थे। लेकिन, उन्होंने इसके बजाय जाटों की भावना पर जोर देते हुए लिखा- 'बातें दोनों ही तरह की हो रही हैं, लेकिन कई लोग इस बात से हैरान हैं कि राज्य सरकार जाट समुदाय की भावनाएं समझने में नाकाम रही, वह भी तब जब भाजपा पांच सितंबर को ही जाटों की हत्याओं के विरोध में मुजफ्फरनगर बंद का सफल आयोजन करा चुकी थी।’

बहरहाल, तहलका की पूरी कथा जरूर इस भावना पर केंद्रित रही। यह जिक्र देखिए- 'शाहनवाज वही युवक है जिस पर लड़की का पीछा करने का आरोप था और जिसकी हत्या लड़की के भाइयों ने की थी। इसके बाद लड़की के भाइयों की भी हत्या हो गई थी।’ कवाल कांड में छेडख़ानी के सिद्धांत को लेकर सवाल उठते रहे हैं। शुरू में इसे साइकिल की टक्कर से उपजा विवाद बताया गया था, जैसी बातों पर गौर फरमाना या इसका जिक्र करना तहलका टीम जरूरी नहीं समझती। क्या इसलिए कि इससे 'बहु-बेटी बचाओ’ जिसमें संघ के कारकुनों ने हिंदू शब्द भी जोड़ दिया था, नारा सवालों में आ जाता और सांप्रदायिक हिंसा के स्वत:स्फूर्त और स्वाभिवक गुस्सा होने के फॉर्मुले को खतरा होता? पूरी कथा को चतुराई से उसी तरह लिखा गया है, जिस तरह की मुजफ्फरनगर-शामली के संघ कार्यकर्ता और स्थानीय अखबार बोलते रहे कि पहले मुसलमान ने ये किया, फिर सरकार ने तरफदारी की और फिर ये सब हो गया। 'राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा के मुजफ्फरनगर से मुस्लिम सांसद कादिर राणा ने 30 अगस्त को कथित रूप से एक भड़काऊ भाषण दिया और उसके बाद जिले के उच्च अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। बाद में पुलिस ने उन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया।’ वैसे तो यह एक साधारण तथ्य का उल्लेख लगता है लेकिन तथ्य की ही बात करें तो उस दिन मुजफ्फरनगर के खालापार में जुमे की नमाज के बाद हजारों की भीड़ जमा थी। जगह-जगह हमलों, जाटों की 31 अगस्त की पंचायत के ऐलान और बीजेपी नेताओं के तेवरों से पैदा अराजकता के माहौल में बुरी तरह डरे मुसलमानों को कादिर समेत कई मुस्लिम नेताओं ने संबोधित किया था। इसे बीजेपी और उसके इशारों पर नाच रहे जाट नेताओं ने यह कहकर मुद्दा बनाया कि प्रशासन ने धारा 144 का उल्लंघन व भड़काऊ भाषण होने दिए और खुद अफसरों ने वहां पहुंचकर ज्ञापन लिए तो 31 अगस्त की पंचायत को कैसे रोका जा सकता था। लेकिन, इससे पहले ही प्रशासन के साथ भाकियू नेता राकेश टिकैत व कई बीजेपी नेताओं ने वार्ता के बाद पंचायत को स्थगित करने का ऐलान किया था और फिर बीजेपी और उसके जाट नेता इससे मुकर चुके थे। इस सबका जिक्र करने के बजाय तहलका टीम मासूमियत से लिखती है-''1 अगस्त को क्षेत्र के जाटों ने मिलकर उन मुस्लिम लड़कों के खिलाफ तुरंत पुलिस कार्रवाई करने की मांग की थी जो दो जाट युवकों की हत्या के दोषी थे। जब कुछ नहीं हुआ तो उन्होंने सात सितंबर को एक विशाल बहु-बेटी बचाओ जाट महासभा का आयोजन किया।’’ बेचारे तहलका को पता ही नहीं चला कि 31 अगस्त को नगंला मंदौड में बड़ी पंचायत हुई थी जिसमें जगह-जगह से हथियार लहराते युवकों के जत्थे नारेबाजी करते पहुंचे थे और बीजेपी व संघ नेताओं ने मंच पर कब्जा कर रखा था जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिए थे? उसे यह भी पता नहीं चला कि शांति की बात कर सकने वाले गैर भाजपाई जाट नेताओं को मंच से बोलने ही नहीं दिया गया था और यह भी कि पुलिस की उपस्थिति में ही पंचायत में शामिल युवकों ने एक कार सवार दंपति की हत्या की कोशिश की थी और कार को फूंक दिया था? सात सितंबर की महापंचायत तक क्या-क्या हो चुका था, पांच सितंबर को बीजेपी के बंद के अलावा लिसाढ़ में गठवाला खाप के मुखिया हरिकिशन जो संघ के हाथों की कठपुतली बन चुके थे, भी पंचायत कर अगले घटनाक्रम पर मुहर लगा चुके थे, तहलका को पता नहीं चल सका? 

सात सितंबर की महापंचायत का जिक्र करते हुए तहलका ने फिर से शाहनवाज के 'लड़की छेडऩे’ की बात को दोहराया- ''उस दिन कवाल के पास इंटरमीडिएट कॉलेज के मैदान पर एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ इकट्ठाहुई। इसी स्कूल में मृतक गौरव की बहन पढ़ती है जिसे कथित तौर पर शाहनवाज छेड़ता था।’’ आगे देखिए, ''बताया जाता है कि शाम पांच बजे के करीब इस महापंचायत से लौट रहे लोगों की ट्रैक्टर-ट्रोलियों पर मुसलमानों ने हमला कर दिया। इस घटना के चश्मदीदों के मुताबिक हमलावरों ने गंग नहर के पास उन पर देसी तमंचे और धारदार हथियारों से हमला किया था।’’ यह नहीं बताया गया कि हथियारबंद युवकों के जत्थे रास्ते भर मुसलमानों को ललकारते-पीटते महापंचायत में पहुंच रहे थे। कई गांवों में टकराव हो चुका था और एक मुसलमान युवक को अगवा कर पंचायतस्थल पर ही उसकी हत्या कर दी गई थी।

लेकिन तहलका की कल्पनाशक्ति और 'गॉशिप जर्नलिज़्म’ के नमूने अभी बाकी हैं। गांवों में हुए कत्लेआम के बारे में यह पत्रिका लिखती है- ''हालात ऐसे हो गए कि हजारों की संख्या में मुसलमानों और जाटों को अपना घर छोड़कर पलायन करना पड़ा।’’ हजारों जाटों ने किन-किन गांवों से पलायन किया, उनके राहत शिविर कहां हैं, यह या तो खुदा जाने या यह पत्रिका। 

इस कथा के अलावा एक स्टोरी 'आपराधिक गड़बड़ी के बारह दिन!’ भी कम दिलचस्प नहीं है। इसमें भी दंगों की जो वजहें गिनाई गईं, उनमें संघ-बीजेपी बरी ही रहे और महीनों से मुसलमानों के खिलाफ चल रही सिलसिलेवार वारदातों का जिक्र तक नहीं आया। महापंचायत से लौट रहे जाटों पर हमलों का जिक्र करते हुए जो लिखा गया, गौरतलब है- ''अगले दिन डेढ़-दो लाख लोगों का जत्था हमले से बच-बचाकर अपने गांवों में पहुंचा तो हालात काबू में रहने की हर संभावना खत्म हो गई।’’ पहली स्टोरी में पत्रिका ने लिखा है कि महापंचायत में ''एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई।’’ लेकिन अगली ही स्टोरी में मुसलमानों के हमले से किसी तरह बच-बचाकर अपने गांवों में पहुंचने वाला जत्था ही डेढ़-दो लाख लोगों का हो गया। तो क्या महापंचायत में पांच-दस लाख लोग थे या सारे के सारे लोग ही जत्था बनाकर जंगलों में मारे-मारे फिरे थे और सात सितंबर को अपने घर नहीं पहुंच पाए थे? फेसबुक पर अफवाहें फैला रहे संघी भी पांच-छह सौ जाटों के गायब हो जाने की बात कर रहे थे। डेढ़-दो लाख जाटों का जत्था एक रात इधर-उधर मारे फिरकर अगले दिन गांवों में पहुंच पाने की अफवाह तो संघी भी जानते हैं, किसी के गले नहीं उतरेगी पर तहलका के अतुल चौरसिया को यह लिखने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

समयान्तर से साभार 

11/14/13

मुक्तिबोध के काव्य-संसार की यात्रा -कॉ. रामजी राय

[पहली किस्त]

मुक्तिबोध खुद को ‘क्षुब्ध अंधकार की सियाह आग’ कहते हैं। वे एक ही साथ मुश्किल कवि हैं और सहज भी, आत्मग्रस्त-से तनाव भरे और ताकतवर भी? मुक्तिबोध की मुश्किल और ताकत इस बात में निहित है कि वे अपने समय के रोग लक्षणों की शिनाख्त करते हैं, आजादी मिलने के बाद स्थापित हो रहे अपने देश में उस उदार जनतंत्र के रोग लक्षणों की भी। और पाते हैं कि यह जो उदार जनतंत्र है ‘वह अपनी सामंती परंपरा से विछिन्न होकर भी, सामंती-शासकवर्गीय प्रवृत्तियो की तानाशाहियत को अपने खून में लिये हुए है।’ अर्थात् हम जिस उदार जनतंत्र के वासी हैं, उसकी नसों में सामंती खून बह रहा है। उसकी जनतांत्रिक जड़ें बेहद कमजोर हैं। वह एक अलिखित तानाशाही पर आधारित है। जिस क्षण भी कोई इसे चुनौती देने के गंभीर राजनीतिक उपक्रम में संलग्न होगा उसे उसका जवाब तानाशाही दमन से दिया जायेगा।

आज इस उदार जनतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब है: वर्चस्वशाली मौजूदा उदार जनतंत्र को, ‘‘उत्तर-विचारधारात्मक’’ सर्वसहमति को सिर झुका कर स्वीकार कर लेना। जबकि अभिव्यक्ति की वास्तविक आजादी का मतलब है: वर्चस्वशाली सर्वसहमति को सवालों के घेरे में खड़ा करना। इसे चुनौती देने के गंभीर राजनीतिक उपक्रम में संलग्न होना। ‘‘वर्तमान समाज चल नहीं सकता/ पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता।’’ इसलिये ‘‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/ उठाने ही होंगे/ तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’’ अन्यथा इस अभिव्यक्ति की आजादी का कोई मतलब नहीं है।

क्रमशः मुक्तिबोध आजाद भारत की सत्ता-समाज संरचना के प्रतिनिधि चरित्र-लक्षणों की गहन जांच करते, पहचानते और उसके बुनियादी अंतरविरोधों व जिस भुतहे वास्तव के रूप में अपने को वह अभिव्यक्त कर रहा था, उसका विश्लेषण-संश्लेषण-चित्रण करते हुए, उसके खिलाफ ‘‘हर संभव तरीके से’’ युद्ध की घोषण तक पहुंचते हैं, उन स्थितियों के खिलाफ जिसमें मनुष्य गुलाम, लांक्षित, रुद्ध और तिरष्कृत, घृणित जीव-सा बना दिया गया है।

मुक्तिबोध के काव्य में समय लहरीला है, उड़ता हुआ। मुक्तिबोध जैसे उस ‘‘ उस त्वरा-लहर का पीछा कर रहे होते हैं।’’ यहां कविता काल-यात्री है। उसका कोई कर्ता नहीं, पिता नहीं, वह किसी की बेटी नहीं। वह परमस्वाधीन है, विश्वशास्त्री है। आगमिष्यत की गहन-गंभीर छाया लिए वह जनचरित्री है।

वहां रोजमर्रे के जीवन की घटनाएं हैं, भुतहे वस्तव की तस्वीरें हैं, उससे कहीं अधिक विस्मयकारी, रोमांचक और रहस्यमय और भुतही जितना की अब तक हम देखते-समझते-जानते रहे हैं। वहां आत्मालोचना के रूप में हमारी अपनी कमजोरियों-गलतियों की गहरी व तीखी लेकिन आत्मीय भर्त्सना-आलोचना है, जिससे हम बचकर निकल जाने में ही अपनी भलाई देखते हैं।

वहां देश-देशांतर के अनुभवों से भरी देश-देशांतर को पार करती, हम तक आती ताजी-ताजी हजार-हजार हवाएं हैं, हमसे हमारी कमियों-खूबियों पर बतियाती बहस करती, भविष्य के नक्शे सुझाती-बनाती हुई।

वहां गतिमय अनंत संसार है, उसे जानने और उसे संभव संपूर्णता में अभिव्यक्ति करने के नये-नये गणितिक, वैज्ञानिक प्रयोग से लेकर प्राविधिक-तकनीकी अनुसंधान हैं, उनकी बाधाएं हैं, भूलें और मुश्किलें हैं, सफलताएं और संभावनाएं हैं- (कलाकार से वैज्ञानिक फिर वैज्ञानिक से कलाकार/ तुम बनो यहां पर बार-बार)। और चूंकि यह सब परिवर्तनकारी हैं इसलिए वहां दमनकारी सत्ताएं और उनके षडयंत्र भी अपने पूरे वजूद में हैं- ‘‘मेरा क्या था दोष?/ यही कि तुम्हारे मस्तक की बिजलियां/ अरे, सूरज गुल होने की प्रक्रिया/ बता दी मैंने/ सूत्रों द्वारा’’ 

कुल मिला कर वहां एक परिवर्तनकारी यथार्थवादी नई समझ और नया संघर्ष है, जिसमें आगामी कई हविष्यों के आसाधारण संकेत हैं - जिससे होता पट परिवर्तन/ यवनिका पतन/ मन में जग में।
एक वाक्य में वहां हमारे समय के भुतहे, जटिल यथार्थ की जटिल अभिव्यक्ति है और जटिल (कॉम्प्लेक्स) का अर्थ दुरूह (कॉम्प्लीकेटेड) नहीं होता। मुक्तिबोध की कविताएं हमारी मित्र कविताएं हैं। मेरे लिए तो गुरु कविताएं भी।

बकौल मुक्तिबोध -‘‘आज की जिंदगी में वही दृश्य दिखाई देते हैं जो महाभारत काल में थे।.....दोनों पक्षों (यानी आधुनिक कौरव और पांडव) में आंतरिक उद्देश्यों और सवभावों के भेद के साथ ही साथ एक बात सामान्य है, और वह यह है कि समाज की ह्रासकालीन स्थिति और व्यक्तित्व की ह्रास-ग्रस्त मति के दृश्य दोनों की परिस्थिति बन गए हैं।........ अभी भी बहुत से महापुरुष कौरवों की चाकरी करते हुए पांडवों से प्रेम करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। किंतु द्रोण, भीष्म और कर्ण-जैसे प्रचंड व्यक्तित्वों की ऐतिहासिक पराजय जैसी महाभारत काल में हुई थी, वैसी आज भी होने वाली है।

अंतर इतना ही है कि इस संघर्ष में (जो आगे चलकर आज नहीं तो पच्चीस साल बाद तुमुल युद्ध का रूप लेगा) कौन किस स्वभाव-धर्म और समाज-धर्म के आदर्शों से प्रेरित होकर ऐतिहासिक विकास के क्षेत्र में अपना-अपना रोल अदा करेगा, इसकी प्रारंभिक दृश्यावली अभी से तैयार है।’’ (प्रगतिशीलता और मानव सत्य नामक निबंध पेज 78, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 5)। यह तैयार दृश्यावली देखिए:

भई वाह !! कहां से ये फोटो उतरे / उन महत्-जनों के मुझ पर छा जाते चेहरे / पीले, भूरे, चौकोर और श्यामल / गठियल दुहरे!! / वे स्निग्ध, सुपोषित, संस्कृत मुख / अपने झूठे प्रतिबिंम्ब गिराते हैं।/ लाखों आंखों से उन्हें देखता रहता हूं।/उनके स्वप्नों में घुस कर मुझे स्वप्न आते। हैं बंधे खड़े,/ ये महत्, बृहत,/ उनके मुंह से प्रज्ज्वलित गैस-सी सांस-आग/ वे इस जमीन में गड़े खड़े/मशहूर करिश्मों वाले गहरे स्याह तिलस्मी तेज बैल/ तगड़े-तगड़े/ अपने-अपने खूंटों से सारे बंधे खड़े/ यह खूंटा स्वर्ण-धातु का है/रत्नाभ दीप्ति का है/ आत्मैक ज्योति का है/स्वार्थैक प्रीति का है।.......वे बड़े-बड़े पर्वत अंधियारे कुंए बन गए/ जो कल थे कपिला गाय आज तेंदुए बन गए।/ हाय हाय, यह श्याम कथानक है/ आदमी बदल जाने की यह प्रक्रिया भयानक है।/..............नैतिक शब्दावलि?/ मंदिर-अंतराल में भी श्वानों का सम्मेलन/ तो आत्मा के संगम का प्रश्न नहीं उठता/ यह है यथार्थ की चित्रावलि।....... वह दुष्ट ब्रह्म कर रहा जबरदस्ती वसूल/ हमसे तुमसे/यह मांस-किराया/कष्ट-रक्त-भाड़ा/ धरती पर रहने का/......वह उषःकाल का जगन्मनोहर/ हिरन मार आया/ पर ठीक सामने/ दुबला श्यामल जन-समाज-सम्मर्द देखकर/ एक सौ दस डिग्री/ उसको बुखार आया/ उसकी सारी उंगलियां खून से रंगी/कपड़ों पर लाल-लाल धब्बे/ उसके बचाव के लिए मुसकरा/ कलाकार आया। चुप रहो मुझे सब कहने दो/ फिर नहीं मिलेगा वक्त/जमाना और-और नाजुक होता है/ और-और वह सख्त।/.............उसके दासों के अनुदासों के उपदासों ने ही/अपने दासों को उपदासों को अनुदासों को भी/ देश-देश में इस स्वदेश में, आसमान में भी/मानव मस्तक की राहों में छांहों के जरिए/मनानुशासन, जीवन-शोषण, समय-निरोधन के/सब कार्यों में लगा दिया है सभी अनुचरों को।/ .... बेचैन वेदना को/ श्रृण-एक राशि के वर्गमूल में डलवा-गलवा कर/ उनको शून्यों से शून्यों ही में विभाजिता करवा/ चलवा डाला है स्याह स्टीमरोलर/ इस जीवन पर/ वह कौन?/ अरे वह लाभ-लोभ की अर्थवादिनी सत्ता का/ विकराल राष्ट्रपति है!!/ जिसके बंगले की छाया में तुम बैठो हो।/ हां, यहां, यहां!! (चुप रहो मुझे सब कहने दो, मुक्तिबोध रचनावली, खंड 2, पृष्ठ 389)

जब समस्याएं, स्थितियां महाभारत जैसी हों तो उसका समाधान भी महाभारत से कम क्यों कर होनेवाला। फिर तो- ‘‘वह कल होने वाली घटनाओं की कविता जी में उमगी।’’

उसके बाद नक्सलबाड़ी का विद्रोह, 74 का आंदोलन और आपात्काल तो जैसे सामाजिक-प्रयोगशाला में मुक्तिबोध की चिंताओं, क्रांति-स्वप्न और खोजे गये सत्ता के मस्तिष्क की बिजली और सूरज गुल होने के सूत्रों के सत्यापन हों। आज जगह-जगह कश्मीर, मणिपुर, छत्तीसगढ़-झारखंड में एएफएसपीए, ऑपरेशन ग्रीनहंट और देश भर में भी काले कानूनों का आपात्काल-सरीखा जाल क्या जनांदोलनों के दमन निमित्त लगाये जा रहे या एक दिन पूरे देश में ही मार्शल लॉ लगा दिये जाने के खंड-चित्र जैसे नहीं हैं? 










क्रमशः