12/20/13

ज़िंदा ही दफन कर दिए जाते हैं हम - प्रदीप की कवितायें

 













[छोटे से कस्बे में रहते हुए दुनिया को अलग तीखी नजर से देखते दोस्त प्रदीप की यह छोटी-छोटी कवितायें हमारे समय के सरकारी राष्ट्रवाद की बखिया उधेड़ती हैं। छोटी चिंगारियों की तरह की ये कवितायें धधकने की भूमिकाएँ हैं। शुक्रिया प्रदीप !]

गूंगी संसद

गूंगी संसद ऐसे नहीं बताएगी
रोटी से खेलने वाले
तीसरे आदमी के बारे में

रोटी बेलने वालो!
आओ,सब मिलकर मार दें
उस तीसरे आदमी को
संसद अपने आप चिल्लाएगी

रखवाला

दुनियां के सबसे बड़े लोकतन्त्र में
रहते हुए मैंने यह जाना
कि यह वो व्यवस्था है

जो भेड़िये को मेमनों का
रखवाला बनाती है

आदिवासी
उन्हें नहीं दी गई
बिजली, पानी, सड़क
नहीं दिया गया कभी
पेट भर भोजन
वे चुप रहे
जब तक वे चुप रहे
तब तक आदिवासी थे।
छीन ली गई उनसे
उनकी जमीन, उनका जंगल, उनकी इज्जत
और जब वे बोले उसके खिलाफ
तो नक्सलवादी हो गए।

सरकार के अत्याचार सहना
आदिवासी होना है
और उसके खिलाफ खड़े होना
नक्सलवादी।

ताबूत

हम बनाते हैं सरकार
सरकारें हमारे लिए
बनाती हैं ताबूत


उसमें ठोंकती हैं कील
आहिस्ता-आहिस्ता
इस तरह ज़िंदा ही
दफन कर दिए जाते हैं हम
अपनी ही बनाई सरकार द्वारा

घुट-घुट कर मरने के लिए।

किसान

भूख से तड़प रहे हैं किसान
खेत में फसल जला रहे हैं किसान
आत्महत्या कर रहे हैं किसान
सरकारी पोस्टर में मुस्कुरा रहे हैं किसान
सरकारी पोस्टर जला रहे हैं किसान
नया पोस्टर बना रहे हैं किसान
हंसिया और हथौड़ा उठा रहे हैं किसान