3/8/14

अमरकांत स्मृति

इलाहाबाद में दस्तावेजी फ़िल्म के बहाने याद किए गए कथाकार अमरकांत
हिन्दी कहानी के तीन दिग्गज: शेखर जोशी, अमरकान्त और मार्कण्डेय

इलाहबाद में अमरकांत को याद करते हुये 28 फरवरी 2014 को प्रतिरोध का सिनेमा ,जन संस्कृति मंच के इलाहाबाद इकाई और परिवेश की तरफ से संजय जोशी निर्देशित दस्तावेजी फिल्म (डाक्यूमेंट्री फिल्म) ‘कहानीकार अमरकांत’ का प्रदर्शन इलाहबाद विश्वविद्यालय के दृश्य-कला विभाग में आयोजित किया गया। फिल्म प्रदर्शन के पहले संजय जोशी ने इस दस्तावेजी फिल्म की महत्ता और फिल्म की निर्माण प्रक्रिया के बारे में अपनी बात रखते हुये बड़े पैमाने पर इस तरह के दस्तावेजीकरण की जरूरत पर जोर दिया।


यह दस्तावेजी फिल्म सन 2002 में इलाहबाद की गर्मियों में अमरकांत से की गई बातचीत पर आधारित है। जिसमें हमें उनके कहानीकार बनने के बारे में पता चलता है। यह बातचीत एक रूपक की तरह यमुना नदी में रिकार्ड की गई है। इस बातचीत से हमे अमरकांत के बचपन के दिन, स्कूली शिक्षा, इलाहबाद में कॉलेज के दिन, आगरा में सैनिक अख़बार की नौकरी और प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकों से हासिल साहित्य के संस्कार के बारे में पता चलता है। इस दस्तावेजी फिल्म का अधिकांश हिस्सा इलाहबाद में बिताये उनके जीवन पर रोशनी डालता है। 

निम्न मध्यवर्गीय कथाकार ‘अमरकांत ’की कहानियों और उपन्यासों में प्रेमचंदीय वस्तु और शिल्प तो स्पष्ट दीखता है| इसके साथ ही इस दस्तावेजी फिल्म में बातचीत के दौरान ‘अमरकांत ’प्रेमचंद के कथनों को साकार भी करते हुये दिखाई पड़ते हैं। प्रेमचंद का कथन है, “साहित्य राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल है.” वहीँ अमरकांत इस दस्तावेजी फिल्म में स्वीकारते हैं कि उनका साहित्य-सृजन स्वतन्त्रता आन्दोलन के साथ-साथ चला। 

अमरकांत जी पर बनी इस दस्तावेजी फिल्म में उनके कहानियों के छोटे-छोटे अंतरण (शाट्स) बहुत ही मार्मिक है, खासकर “दोपहर का भोजन ”। व्यक्तिगत विडम्बना को सामाजिक विडम्बना के रूप में उदघाटित करना अमरकांत के ही बूते कि बात है। चाहे “जिंदगी और जोंक ”कहानी या “हत्यारे” कहानी को इस नजरिये से देखा जा सकता है| ‘जिंदगी और जोंक’ कहानी के पात्र ‘रजुआ’ के संदर्भ में अमरकांत कहते हैं कि “स्वाभिमान से जीने की कोशिश तो करता है, लेकिन बार-बार असफल हो जाता है।” ये कथन अपने-आप में गहरी सामाजिक विडम्बना को उदघाटित करता है। 

इस दस्तावेजी फिल्म के अंत में आलोचकों और उनके साथी कथाकारों से उनकी रचनाओं और उनके जीवन के बारे में बातचीत से अमरकांत की रचना प्रक्रिया को समझने में सहायता मिलती है। इस दस्तावेजीकरण के माध्यम से अमरकांत के सामाजिक दृष्टिकोण और उनके रचना प्रक्रिया को समझने में सहायक हो सकता है।

संजय जोशी के कुशल निर्देशन ने अमरकांत की जीवनी के प्रत्येक पक्ष को उजागर किया है जो दर्शकों के ऊपर एक गहरी और संवेदनशील छाप छोडती है। इस लघु फिल्म और अमरकांत के रचनाओं को देखकर यह सहज ही कहा जा सकता है कि अगर प्रेमचन्द आजादी से पहले की भारत की सामाजिक विडम्बना को उजागर कर रहे थे, तो अमरकांत आजादी के बाद के भारत के सामाजिक विडम्बना को उजागर करते हैं। फिल्म प्रदर्शन के दौरान शहर के कॉमरेड जिया-उल-हक, कवि व आलोचक राजेन्द्र कुमार, मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और अधिवक्ता रविकिरन जैन और दमन विरोधी मंच के अध्यक्ष ओ. डी. सिंह, अमरकांत जी के सुपुत्र श्री अरविन्द उर्फ़ बिंदू जी, वरिष्ठ कवि हरिश्चंद्र पांडे, रामजी राय, उन्नयन पत्रिका के संपादक रामायन राम, मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद और विश्वविजय आदि के साथ बड़ी संख्या में छात्र –छात्राएँ मौजूद थे। सभा का संचालन प्रतिरोध का सिनेमा इलाहबाद चैप्टर से जुड़े राजन पाण्डेय ने किया।

-आशुतोष

1 comment:

Ashutosh Pandey said...

प्रतिरोध के सिनेमा के संयोजक संजय जोशी से निम्न ईमेल आईडी और फोन न. पर सम्पर्क कर 'कहानीकार अमरकांत' दस्तावेजी फिल्म पाया जा सकता है. thegroup.jsm@gmail.com ya 9811577426