2/27/14

पाइलिन- पृथ्वी- पट्टनायक

                  पाइलिन, पृथ्वी 2 और पट्टनायक:                      
                           ओड़ीशा में आपदा-पूंजीवाद का उदय                                     


.... समकालीन जनमत से साभार 

हिन्द महासागर में मँझले आकार के चक्रवात के ठीक दो दिन बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन [डीआरडीओ] ने 07 अक्टूबर, 2013 को बंगाल की खाड़ी में पृथ्वी-2 मिसाइल पर लदे किसी 750 किलोग्राम ‘रहस्यमय’ पदार्थ का विस्फोट किया। अहले दिन पाई-लिन बड़े चक्रवात में बदल गया और उसी तरफ बढ़ा जहां यह ‘रहस्यमय’ विस्फोट किया गया था। 12 अक्टूबर को यह चक्रवात बंगाल की खाड़ी में ठीक उस जगह अपनी भीषणता तक पहुंचा, जहां यह विस्फोट किया गया था। आंध्र प्रदेश और ओड़ीशा के समूचे तटीय इलाके में बदहवासी छा गई और लोग चक्रवात से बचने के लिए आपदा-गृहों में जाने लगे। गरीबों को जबरन बेदखल करवाने के महारथी सरकारी अफसरान लोगों को आपदा-गृहों तक पहुंचाने में मदद करने की बजाय चीखते रहे कि अगर लोग चक्रवात के रास्ते से नहीं हटे, तो जबरिया हटा दिया जाएगा। आपदा प्रबंधन में खास योग्यता हासिल करने के ओड़ीशा राज्य आपदा राहत प्राधिकरण [ओएसडीएमए] के दावे आडंबर और झूठ से भरे हैं। हकीकत में तो 1999 के सुपर-चक्रवात, जिसमें 20,000 से ज्यादा जानें गई थीं और लाखों लोग प्रभावित हुए थे, के तत्काल बाद पहल लेते हुए आपदा-गृह बनवाए गए थे। इसके बाद की सरकारों या इस आपदा राहत प्राधिकरण ने कुछ नहीं किया है। 

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की जमीनी इलाकों में 175-200 किलोमीटर की रफ्तार से बड़े चक्रवात चक्रवात की शुरुआती भविष्यवाणी सच साबित हुई। पर इससे पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया की पत्रकारिता जैसे नौसिखिये वैज्ञानिकों की भविष्यवाणियाँ इलाकों में फैल रही थीं कि भारत के समूचे आकार जितना बड़ा चक्रवात टकराने वाला है। इन लोगों ने उपग्रह द्वारा प्राप्त बंगाल की खाढ़ी में वाष्प-संघनन के चित्रों को पूरा ही गलत पढ़ा, जिसके नाते उन्हें यह चक्रवात इतना भीषण जान पड़ा। टीवी के पर्दे पर चीखते नौसिखिये वैज्ञानिकों की अफवाहों के ऊपर अमरीकी वैज्ञानिकों ने कहना शुरू कर दिया कि यह चक्रवात 2005 में अमरीका में अटलांटिक तट पर टकराने वाले कैटरीना चक्रवात से भी भीषण होगा। 

यह समाचार ओड़ीशा और आंध्र प्रदेश में तेजी से फैला और लोगों ने खाने-पीने की चीजें, पेट्रोल और अन्य जरूरी सामान ज्यादा से ज्यादा खरीदना शुरू कर दिया। जमाखोरी जैसी स्थिति आ गई, चीजों की कमी होने लगी और दाम तेजी से बढ़ गए। यह तो चक्रवात गुजर जाने के बाद समझ में आया कि इन अफवाहबाजी से वास्तविक लाभ किसने उठाया। नवीन पटनायक के नेतृत्त्व वाली बीजद सरकार जो नव उदारवाद एवं तीव्र औद्योगीकरण की प्रबल पक्षधर के रूप में जानी जाती है, अचानक विश्व के सामने जनता के महान त्राता के रोल में आ गई। चक्रवात के पूरी तरह गुजर जाने के पहले ही कारपोरेट मीडिया में यह फैसला सुना चुकी थी कि कैसे सरकार ने स्थितियों का सफलतापूर्वक सामना किया। 

याहू न्यूज के संपादक ने मुझसे कहा कि मैं इस क्षेत्र में उनके संवाददाता के लिए एक अनुवादक का इंतज़ाम कर दूँ। मैंने उनकी कोई सहायता करने से पहले इन संवाददाता महोदय, विवेक नेमना की वेबसाइट खोली। मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि बगैर घटनास्थल पर गए ही इन सज्जन ने कल्पना कर ली कि "इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि लगभग दस लाख लोगों को भारत में उसी सरकार ने किसी भी संभावित नुकसान से बचा लिया जो कभी-कभी विपरीत दिशा से आती हुई दो ट्रेनों को एक ही लाइन पर डाल देती है। यह ऐसी घटना है जिसमें इस प्रायद्वीप में आम तौर पर दसियों हज़ार लोग मारे जाते हैं, क्योंकि इस देश में लाखों गरीब लोग सदैव मौत के मुहाने पर रहते हैं। लेकिन ताज़ा आंकडों के अनुसार मृतकों की कुल संख्या 43, अमेरिका के सैंडी तूफान में कुल मरने वालों की संख्या की तुलना में बेहद कम है। घोर आश्चर्य"। जब मैंने इस संवाददाता से उसकी गलत सूचना पर आपत्ति जताई तो उसने कहा "आपकी असहमति से मैं सहमत हूँ"। तो मैंने पूछा कि असहमत होना और गलत सूचना देना क्या एक ही बात है, और इसका जवाब मुझे अभी तक नहीं मिला। 

टेलिविजन चैनल हालीवुड मार्का आपदा फिल्मों की तर्ज पर कमजर्फ और सनसनीखेज ‘सीधा प्रसारण’ कर रहे थे और खाये-अघाए लोग अपने सोफ़े में धँसे हुए इस टीवी-सनसनी का आनंद ले रहे थे। जिस तेजी से मीडिया टीआरपी रेटिंग को बढ़ाने में जुट गया था वह संभवतः आपदा-पूंजीवाद का पहला लक्षण है। इस चक्रवात ने कार्पोरेट मीडिया को अपनी छवि सुधारने के साथ-साथ बीजद सरकार को भी अपनी बेहद दागी छवि सुधारने का सुअवसर प्रदान कर दिया। टाटा-बिरला द्वारा हिंसात्मक तरीके से ज़मीनों पर कब्जा किये जाने और पुलिस द्वारा अपने ही देशवासियों पर किए गए अत्याचार की खबरों को दरकिनार करने वाली हर समाचार एजेंसी ने इस अवसर का उपयोग अपने ऊपर कारपोरेट के दलाल होने का कलंक धोने में किया। एनडीटीवी जो केवल क्रिकेट मैचों को कवर करने के लिए अपने संवाददाता ओड़ीशा भेजता है, उसने पाई-लिन कवर करने के लिए चार संवाददाता भेजे और इस कवरेज के बीच-बीच में वेदांता के विज्ञापन दिखा कर उससे अपने सम्बन्ध प्रगाढ़ करता रहा। नियामगिरि की पहाड़ियों में ग्राम-सभा के दौरान अपनी उजड्डता के लिए कुख्यात एनडीटीवी की रिपोर्टर आँचल वोरा फिर से चक्रवात पीडितों के बीच 'आप यहाँ क्यों आए हैं?' जैसे बेहूदा सवाल पूछती दिखायी पड़ी। बरखा दत्त की पूरी टीम, वोरा और दूसरे रिपोर्टेरों के साथ तूफानी हवाओं के थपेड़े खाते हुए लोगों के दृश्य दिखने में मशगूल थी। चक्रवात में एनडीटीवी के संवाददाता के दृढ़ता से खड़े रहने को वेदांता ने बखूबी भुनाया। भुबनेश्वर के वे सभी संवाददाता, जो पास्को और वेदांता के प्रबल पक्षधर थे, एकाएक चौथे खंभे के चमकते सितारे हो गए। विशेष तौर से इंडियन एक्सप्रेस के देबब्रत मोहंती और टाइम्स ऑफ इंडिया के संदीप मिश्र चक्रवात के कवरेज़ में सबसे आगे दिखाई पड़े। उन्होने अपने कार्पोरेटी आकाओं के पाप धोने के लिए शुरू में कुछ ‘अच्छी रिपोर्टिंग’ की गफलत में पड़ने की जरूरत नहीं। बजाय इसके वे कमोबेश बीजद सरकार के जन-संपर्क विभाग का बढ़ाव-मात्र थे। इनमें से कोई भी पत्रकार वहाँ नहीं पहुंचा जहां सरकारी अफसर नहीं पहुंचे, जहां चक्रवात के आने की जानकारी नहीं पहुँच सकी। उन्हें केवल जिलाधिकारियों के साथ देखा गया और उनकी रिपोर्टिंग में सरकार की चापलूसी साफ-साफ पढ़ी जा सकती थी। 

जब आपदा आती है तो हर भ्रष्ट जीव को नवजीवन का मौका मिल जाता है-शर्त यह कि सही समय पर सही जगह हों और मीडिया के लोगों को अपने पक्ष में कर लें। बड़बोले नरेंद्र मोदी के उत्तराखंड आपदा के हजारों पीड़ितों को बचाने के दावे से लेकर नवीन पटनायक के घड़ियाली आंसुओं तक, मैं पी साईनाथ के इस कथन से सहमत हूँ कि 'अच्छी आपदा को सभी पसंद करते हैं'। प्रेस ने एक फोटो जारी किया जिसमें भोजन के पैकेट बांधते हुए एक व्यक्ति को देखते हुए नवीन पटनायक खड़े हैं, इस चित्र का शीर्षक है "राहत कार्य की देखरेख मुख्य मंत्री स्वयं कर रहे हैं।’ महत्वाकांक्षी कैबिल टीवी और खदान उद्योग के बादशाह और बीजद सांसद बैजयंत पांडा जो दिल्ली में महंगी काकटेल पार्टियां देने के लिए विख्यात हैं, इस पाई-लिन से लाभान्वित होने वाले दूसरे प्रमुख व्यक्ति हैं। पांडा ने अपने प्रचार के लिए फ़ेसबुक के साथ ही अपने निजी टीवी समाचार चैनल ओटीवी का भरपूर उपयोग किया जिसमें उन्हें खुद हेलीकाप्टर चलाकर जहां-तहां राहत सामग्री गिराते हुए दिखाया गया। यों पांडा के छवि निडर नेता और जन-सामान्य के त्राता की बनाई गई। इसीलिए उन्होने जब सरकार से 1500 करोड़ का राहत पैकेज मांगा तो किसी ने इसपर सवाल नहीं उठाया। साथ ही उनकी कंपनी आइएमएफए का 2300 करोड़ का कर्ज भी माफ कर दिया गया। यदि आइएमएफए को जनता के धन का भुगतान करना पड़ता तब न तो पांडा हेलीकाप्टर के एडवेंचर कर पाते और न ही मुख्यमंत्री राहत कोश में कुछ लाख रुपयों का तुच्छ दान करके दानवीर कहलाने का सुख उठा पाते। एक-एक करके बदनाम और आपराधिक कारपोरेट घराने मुख्यमंत्री के दरवाजे पर लाइन लगा कर मामूली दान दे रहे हैं। पास्को ने एक करोड़ दिया, और जगतसिंहपुर के तटीय इलाकों में बिना पर्यावरण एवं वन मंत्रलाय की इजाजत के दो लाख पेड़ उसके स्टील प्लांट और निजी बन्दरगाह के लिए काट डाले गए। कांग्रेस के उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल, जिनके गुंडों ने ओड़ीशा के हिंसात्मक भूमि अधिग्रहण में गाँव की महिलाओं के सिर फोड़ दिये गए थे, ओड़ीशा के लोगों को बचाने के लिए देवी दुर्गा को धन्यवाद दे रहे थे । 

1999 के भीषण चक्रवात के बाद समुद्री किनारे के दलदली वनों के तेज कटाई पर बहुत शोर-शराबा मचा था क्योंकि ये तेज हवाओं, झंझावातों और समुद्र की तूफानी लहरों को रोकने में समर्थ अवरोध का कार्य करते हैं परंतु तब से अब तक ओड़ीशा के तटवर्ती दर्जनों बन्दरगाहों को सरकारी अनुमोदन मिल चुका है। कहिए तो ओड़ीशा के बचे हुए तटवर्ती वनों के लिए यह मौत की घंटी है। तब से अब तक की सरकारों को लगातार विश्व बैंक की यह सलाह मिल रही है कि समुद्री तटों पर ऊंची-ऊंची दीवारें बना दी जाये। उष्णकटिबंधीय तूफानों का मुकाबिला करने के लिए संभवतः यह सबसे अधिक अवैज्ञानिक तरीका है क्योंकि पाई-लिन जैसी परिस्थितियों में जब समुद्री लहरें जमीन पर दूर तक चली आती हैं, उसके बाद ये दीवारें पानी को वापस समुद्र में जाने से रोक देंगी। ये दीवारें मानसूनी बाढ़ के पानी को भी समुद्र में जाने से रोकेंगी और बाढ़ की संभावना बढ़ जाएगी। विश्व बैंक से यह उम्मीद करना राजनीतिक नासमझी होगी कि उसका कोई सुझाव ऐसा भी होगा जिससे ठेकेदार बिरादरी और आपदा पूंजीवाद को बढ़ावा न मिले। दूसरी बड़ी चिंता का विषय है देश के विद्वानों एवं वैज्ञानिको की बौद्धिक दरिद्रता जो इस प्रकार के भयानक तूफानों के मूल कारणों के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचते। यहाँ तक कि सीपीआई, सीपीएम सरीखे वाम दलों और जनांदोलनों से जुड़े सक्रिय लोगों भी सारी आलोचनात्मक धुरी और धार खोकर बीजद सरकार की लाखों लोगों की जान बचाने की तथाकथित बहादुरी पर तालियाँ पीट रहे थे। लगता है कि जब सरकार अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करती है या करने का दावा करती है, तो हम लोग उस सरकार की महानता से अभिभूत हो जाते हैं। शायद हमने दिल से यह मान लिया है कि सरकारें केवल कंपनियों के लिए हैं, हमारे लिए नहीं। 

बंगाल की खाड़ी सदैव तूफानी रही है और चक्रवात तटवर्ती ओड़ीशा और आंध्रप्रदेश के और मानसूनी बाढ़ महानदी-घाटी के लोगों के जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। लोगों के पास इस प्रकार की आपदाओं से अच्छी तरह निपटने के देसी तरीके हैं। लेकिन अब कभी-कभी आने की बजाय भीषण चक्रवात और घनघोर बरसात लगातार बढ़ रहे हैं। जलवायु में परिवर्तन हो रहे हैं, इसके वास्तविक कारणों पर बहस जारी है, परंतु ओड़ीशा के लोगों ने यह समझ लिया है कि ज्यों-ज्यों गर्मी बढ़ रही है त्यों-त्यों तूफानों की भयानकता भी बढ़ रही है। जंगलों के अंधाधुंध सफाये, बेरोकटोक खनन और अत्यधिक औद्योगिक सक्रियता के कारण ओड़ीशा में तापमान भयावह ढंग से बढ़ा है। घटते जल-स्तर के कारण यह इलाका निम्न पर्यावरणीय दबाव क्षेत्र बन गया है और बंगाल की खाड़ी से आने वाले चक्रवात का खतरा बढ़ गया है। बड़े-बड़े बांधों में पानी उद्योगों के लिए तब तक भरा रहता है जब तक कि बरसात शुरू न हो जाये। इससे गर्मियों में सिंचाई के लिए पानी की कमी हो जाती है और बरसात में पानी छोड़ने के नाते बाढ़ आ जाती है। यदि ओड़ीशा में प्रस्तावित सभी भारी उद्योग, खदानें, बन्दरगाह, रेल और बांध बन जाते हैं तो हमें भयावहतः परिणामों के लिए तैयार रहना चाहिए। क्योंकि आपदा-प्रबंधन भी दूसरी किसी वस्तु की तरह ही उनके लिए खुले बाज़ार में उपलब्ध है जिनके पास खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा है। 

1999 का भीषण चक्रवात जब पारादीप बन्दरगाह के पास जगतसिंहपुर से टकराया था, उस समय वह तेजी से आगे बढ़ गया था क्योंकि उसे रोकने वाले किनारे के दलदली वन और पहाड़ खत्म हो गए थे। पाई-लिन गोपालपुर क्षेत्र में टकराया और किनारों के दलदली वनों के कारण उसकी गति कम हो गई। ये दलदली वन ओड़ीशा के दक्षिणी तटों और बंगाल की खाड़ी तक प्रचुर मात्रा में फैले हुए हैं। किसी भी वैज्ञानिक ने पाई-लिन के अनुमान से कम घातक होने के वास्तविक कारणों पर प्रकाश नहीं डाला। वास्तविकता यह है कि 200 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से जमीन से टकराने के बाद हवा की गति पर लगाम लगाई इसी पूर्वी घाट ने। इसका श्रेय इस घाट की हरियाली भरी पहाड़ियों को जाता है। दिलचस्प यह कि जिस सरकार ने पूर्वी घाट का बंटाधार करने का प्रबंध किया है, वही लोगों का जीवन बचाने का श्रेय ले रही है। खनन ने चिलका झील के किनारे की सारी पहाड़ियों को मलबे में बदल दिया है और जब एक दशक बाद अगला भीषण चक्रवात आएगा तो पता चलेगा कि उसे रोकने के के लिए पूर्वी घाट समाप्त हो गया है और इसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता। तटवर्ती दलदली वन समाप्त हो चुके हैं और जो कुछ बचा -खुचा है उसे नए बनने वाले 12 बंदरगाह और वर्तमान दो बन्दरगाहों के विस्तार चट कर जाएगे। टाटा स्टील ने अपने प्रस्तावित विशेष आर्थिक क्षेत्र [सेज] के लिए पहले ही इस क्षेत्र के जंगलों का सफाया कर दिया है और गोपालपुर बंदरगाह का विस्तार ओड़ीशा का सबसे बदनाम ठेकेदार ओएसएल कर रहा है। सबसे भयानक बात यह कि भारत का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह गोपालपुर के समुद्र तट पर ही प्रस्तावित है, ठीक उसी स्थान पर जहां पाई-लिन टकराया था। यह तो फुकुशिमा की तरह की आपदा को सीधे-सीधे निमंत्रण देना हुआ। 

एक ओर मीडिया लाखों लोगों की जान बचाने के लिए पूरे विश्व में नवीन और बीजद का गुणगान कर रहा था, तो दूसरी ओर पाई-लिन के जाते ही सभी ‘रक्षक’ गायब हो गए। चक्रवात के बाद आई बाढ़ ने हजारों हेक्टेयर की फसल को प्रभावित किया और हजारों लोगों को बेघर कर दिया। कटक जिले में सरकारी अधिकारी और कंपनी वाले राहत सामग्री की लूट-खसोट में जुट गए। यही स्थिति राज्य के हर जिले में है परंतु इसे प्रकाश में आने ही नहीं दिया गया। बहुत से गांवों में पाई-लिन के बाद से आज तक कोई राहत सामग्री नहीं पहुंची है। जिनके पास न तो जमीन का पट्टा है और न ही बीपीएल कार्ड, उन्हें न तो अपने घर के पुनर्निर्माण की अनुमति मिली और न ही फसल के नुकसान का मुआवजा। फसल के नुकसान का मुआवजा भी बहुत कम घोषित किया गया है- लगभग 3000 रुपये प्रति एकड़। गंजाम जिले के बाहरी क्षेत्रों में जो नवीन पटनायक और बीजद का राजनैतिक आधार भी है, अपर्याप्त मुआवजा और राहत सामग्री के दोषपूर्ण वितरण ने स्थिति को और अधिक विषम बना दिया है। 

आपदा पूंजीवाद के लाभार्थी वही हैं जो आम तौर पर मुनाफा कमाते हैं। भुबनेश्वर में मेरे पड़ोसी ने स्वीकार किया कि 1999 के चक्रवात के बाद उसका व्यापार कई गुना बढ़ गया था। आधारभूत संरचना के पुनर्निर्माण में ठेकेदारों का व्यापार बढ़ जाता है। 1999 के भीषण चक्रवात के बाद समुद्रतटीय इलाकों में अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ और दानदाताओं से करोड़ों रुपये वसूलने के लिये सैकड़ों एनजीओ कुकुरमुत्तों की तरह उसी प्रकार उग आए जैसे कालाहांडी- बलांगीर- कोरापुट [केबीके] क्षेत्र में भुखमरी के बाद उगे थे। सुनामी के बाद आपदा-पूंजीपति श्रीलंका, दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में छा गए और आपदा का अपनी ताकत भर दोहन किया। 

एक ओर पाई-लिन और उसके बाद की बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र अभी तक सरकारी राहत का इंतज़ार कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर आपरेशन ग्रीन हंट के लिए लगाए गए ग्रेहाउण्ड, सीआरपीएफ़, आईआरबी, आईटीबीपी, बीएसएफ़ आदि के पैरामिलिटरी सिपाहियों को, सप्ताह में एक दिन जंगल में आदिवासियों की खोज में जाते वाले दिन को छोडकर, पूर्वी घाट के किलों में आराम फरमाते हुए देखा जा सकता है। कोई यह नहीं पूछता कि उन्हें राहत कार्यों में क्यों नहीं लगाया गया और पूछने पर भी इसका कोई उत्तर नहीं मिलता। पाई-लिन से तैयार आपदा-पूंजीवाद की सबसे ज्यादा गौर करने की चीज थी- बीजद और उसके चट्टे-बट्टों, वेदान्त जैसे कारपोरेट घरानों और एनडीटीवी व टाइम्स सरीखे मीडिया घरानों की निश्चिततता। इस निश्चितता के साथ ही इन्होने पाई-लिन के आने से पहले ही आपदा के सर्वाधिक दोहन की योजना तैयार की। सब कुछ एक पूर्व निर्धारित पटकथा पर योजनाबद्ध था- बीजद की सत्ता में सफलतापूर्वक वापसी हो, एनडीटीवी और अन्य खबर बेचने वालों की गिरती साख बचे और लुटेरी कंपनियों की सीएसआर [कारपोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी] को और ज्यादा सम्मान मिले। ओड़ीशा के एक मात्र आदिवासी मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग, जिनकी राहत कार्यों को ठीक से न चला पाने के लिए तीव्र आलोचना की गई थी, के विपरीत नवीन पटनायक ने स्वयं को आपदा पूंजीवाद का विशेषज्ञ सिद्ध कर दिया। यह विचित्र विडम्बना ही है कि जिस आपदा-गृहों ने आखीर में लोगों को पाई-लिन से शरण दी, वे बीजद सरकार द्वारा नहीं बल्कि 1999 के चक्रवात के बाद बनवाए गए थे। यही नहीं, 1999 के कटु अनुभवों ने ही ओड़ीशा के लोगों को सही समय पर सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए प्रेरित किया। यदि चक्रवात वास्तव में 1999 की तरह ही भीषण होता और लोग उतने मूर्ख होते जितना मीडिया और बीजद सरकार समझते हैं- इतने भोले और जिद्दी कि यह जानते हुए भी कि पाई-लिन अगले कुछ घंटों में पहुँचने ही वाला है, अपने घरों से न भागते- तो इतिहास कुछ और ही होता। 











  सूर्य शंकर दास  

2/24/14

अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले के खिलाफ

जन संस्कृति मंच

दिनांक २१ फरवरी के दिन दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय की पुस्तकों के लोकार्पण के बाद वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेई के साथ उनके संवाद के दौरान कुछेक साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा व्यवधान डालने और हल्ला हंगामा खड़ा करने की हम घोर निंदा करते हैं. संवाद और बहस मुबाहसे से घबराए ये तत्व वास्तव में लोगों की आलोचनात्मक चेतना से डरते हैं और जोर-ज़बरदस्ती से अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने में ही खुद को सुरक्षित समझते है .इन तत्वों के पास किसी भी साहित्यिक विमर्श को समझने की न सलाहियत है और न नीयत, उसमें लोकतांत्रिक हस्तक्षेप तो दूर की बात है .

पुस्तक मेले के ही दौरान पेंगुइन द्वारा वेंडी डोनिगर की पुस्तक की प्रतियां बाज़ार से हटा लिए जाने के विरोधस्वरूप १६ फरवरी के दिन आयोजित उक्त पुस्तक के पाठ के आयोजन के दौरान भी खुद को 'हिन्दू सेना' का सदस्य बताने वाले तत्वों ने व्यवधान डाला. इनमें से शायद ही किसी प्रदर्शनकारी ने डोनिगर की साढ़े छः सौ पृष्ठों की पुस्तक का मुंह भी देखा हो. शासन-प्रशासन की जिन एजेंसियों पर दायित्व है कि वे अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार की रक्षा करें, उन्हें बगैर किसी दबाव में आए यह सुनिश्चित करना होगा. लेखक और बुद्धिजीवी ऐसे तत्वों के आगे न तो खामोश रहेंगे और न ही अभिव्यक्ति की आज़ादी के दमन को बर्दाश्त करेंगे.

प्रणय कृष्ण 
 महासचिव, जन संस्कृति मंच