5/24/15

डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी के बहाने कुछ बिखरे ख्याल

[साथी दिनेश का एक बहसतलब लेख। जरूरी नहीं कि आप इस लेख के निष्कर्षों से सहमत हों, पर लेख से गुजरते हुए उनकी वाजिब चिंताओं में साझा जरूर कर सकते हैं।]

समाज के दर्पण वाली बात को ध्यान में रखें तो यूँ प्रत्येक फिल्म का कथानक समाज में होने वाले कार्य-व्यवहारों से ही प्रेरित होता है और इस तरह सभी फ़िल्में सत्य घटनाओं पर आधारित मानी जा सकती हैं. परन्तु इस तरह की किसी धारणा की निर्मिति करना निश्चय ही प्रश्नों के दायेरे में आ जाना है क्योंकि कुछ फ़िल्में घोषित रूप से सत्य घटना पर आधारित होती हैं कुछ फ़िल्मी तत्वों से भरी हुई, जिनमें हमें यहाँ-वहाँ बिखरे हुए जिन्दगी के टुकड़े दिख जाते हैं. इसलिए इस तरह की किसी बात के लिए कोई ठोस धरातल हमारे पास नहीं है. लेकिन जब पचास-साठ के ‘सिनेमाई राष्ट्रनिर्माण’ युग से होते हुए सत्तर-अस्सी के ‘एंग्री यंगमैन’ व नब्बे के ‘मेलोड्रामाई’ युग को ध्यान से देखते हैं और तब सिनेमा में जिस चीज की कमी महसूस होती है, उस कमी की भरपाई करने की कोशिश दिवाकर की फिल्म ‘व्योमकेश बख्शी’ करती है.

ऊपर कही गई बात शायद ज्यादा समझ में आये यदि यह याद की जाने की कोशिश की जाये कि हमारे लोकप्रिय हिंदी सिनेमा में ऐसी कितनी फ़िल्में बनी हैं जिनमें हमारे भारतीय तवारीखों के अहम् पड़ाव व भारतीय जिंदगियों में घटित होने वाली अहम् घटनाएँ विषय बने हों. विश्व सिनेमा में हम ऐसी समृद्ध परम्परा जरूर देखते हैं. कोई आजादी के आन्दोलन के खास नायक को केंद्र में रखकर बनाई फिल्मों व ‘समानांतर सिनेमा’ दौर की फिल्मों को धड़ल्ले से गिना सकता है, लेकिन क्या आज़ादी आन्दोलन पर केन्द्रित मुख्यधारा की फ़िल्में महज दयनीय महानता की फ़िल्में नहीं कही जा सकती हैं? जो गुबार गुजर जाने के बाद भावुक फ़िल्मी गानों और काल्पनिक नायकों को रचकर झूठी आश्वस्ति और तसल्ली ही देती हैं, इशारा बहुत बाद में आई राजकुमार संतोषी की ‘द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ जैसी फिल्मों की तरफ नहीं है हालाँकि इस फिल्म से बहुत पहले आई एटनबरो की ‘गांधी’ के बरक्स देखने पर उसकी सीमाएं जाहिर हो जाती हैं, और क्या ‘समानांतर सिनेमा’ को पचास-साठ के दौर के सिनेमा से छूटे हुए कामों को पूरा करने और विस्तार देने वाला आन्दोलन नहीं कहा जा सकता? आज़ादी के बाद एक तरफ राजकपूर ने अपनी फिल्मों से शहरों के एक कोने में सिमटे वैभव के साम्राज्य और उसी शहर के दूसरे कोने में फैले घटाटोप अँधेरे, और तरक्की के लिए गावों से शहरों की ओर आने वाले नौजवानों-मजदूरों की दुर्गति, साथ ही साथ संपत्ति इकठ्ठा करने के लिए, सामाजिक असमानता के लिए जिम्मेदार, होने वाले गैरकानूनी धंधों और काला बाजारी की तस्वीरें दिखाई. गुरुदत्त पतनशील सामंती ध्वंसावशेषों की आखिरी तिलमिलाती हुई अकड़ और क्रूरता के साथ सामाजिक विसंगतियों को सामने लाते हैं वहीँ दूसरी तरफ दिलीप कुमार आज़ादी के बाद के उस रोबीले, उर्जा से भरे नौजवान के रूप में हमारे सामने आते हैं जो हर तरह की मुसीबतों से अकेले ही टक्कर लेने का माद्दा रखता है. इस दौर की फिल्मों के केंद्र में महानगर और कस्बे हैं. गावों पर केन्द्रित फिल्मों का नायक अवास्तविक है जो एक सीमा तक सामंती अत्याचार सहने के बाद अकेले ही सामंत से टक्कर लेता है जो वायवीय सा ही प्रतीत होता है. यहाँ गाँव का खुरदरापन नहीं है, जाति की समस्या नहीं है, भूमि की समस्या नहीं है, बंधुवा मजदूरी की समस्या नहीं है, गाँवों के सवर्णों द्वारा गाँव के दलितों पर किये जाने वाले अत्याचार नहीं हैं, महिलाओं पर होने वाले अत्याचार नहीं हैं. इस सब को पर्दे पर लाने की जिम्मेदारी पहले-पहल लेता है समानान्तर सिनेमा, लेकिन इस दौर में भी किसी एक कड़ी को पकड़कर कथा विकसित कर फ़िल्में नहीं बनाई गईं, पूरे भारतीय समाज में फैली विसंगतियों को बाहर लाना और मनुष्य की मनुष्यता को बचा लेना ही इस दौर की फिल्मों का उद्देश्य रहा है.

बात कुछ भटकती हुई सी लग सकती है लेकिन अपनी बात स्पष्ट करने के लिए इतनी बाते जरुरी थीं. अब वह बात जिसका मैंने ऊपर इशारा किया था कि विश्व सिनेमा में बायोपिक, किताबों पर निर्मित होने वाली फिल्मों, किसी खास दौर में घटी किसी घटना की कड़ी को पकड़कर कथा विकसित कर फिल्में बनाए जाने की जो समृद्ध परंपरा है उसकी शुरुआत ‘व्योमकेश बख्शी’ से मानी जा सकती है. हालाँकि इस बात से कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, मैं भी किताबों पर आधारित फ़िल्में मसलन ‘साहब बीबी और गुलाम’, ‘गाइड’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और अन्य दूसरी फिल्मों को भूल नहीं रहा हूँ, लेकिन कई बार यह देखा गया है कि मूल किताब को पढ़कर होने वाला असर उन पर बनने वाली हिंदी फिल्मों को देखकर वही असर नहीं पैदा हो पाता. ‘गाइड’ कई अन्य वजहों से एक कालजयी फिल्म हो सकती है लेकिन इस फिल्म में बरसात कराकर अंत को जिस तरह से बदला गया है उससे सन्यासी बने राजू गाइड के मृत्यु के दृश्य से, किताब पढ़कर जो भाव पैदा होते हैं, एक अनास्था जगती है वह फिल्म में बरकरार नहीं रह पाती. वैसे तो विश्व सिनेमा में किताबों पर आधारित कई फिल्मों का निर्माण हुआ है लेकिन मैं विशेष रूप से जर्मनी में नाजी शासन काल में यहूदियों के कत्लेआम पर बनी ‘मार्क हर्मन’ की फिल्म ‘द बॉय इन द स्ट्रिप्ड पेजामा’ का उदाहरण देना चाहूँगा. फिल्म जर्मन लेखक ‘जॉन बोयने’ की इसी नाम की किताब पर बनी है. यह फिल्म एक नाजी अफसर के छोटे बच्चे की कहानी है जिसकी मुलाकात उसके घर से कुछ दूरी पर स्थित यातना गृह में कैद एक यहूदी छोटे बच्चे से होती है, वे दोनों दोस्त बन जाते हैं, जिसकी खबर बच्चे के नाजी अफसर पिता और माँ को नहीं है, बच्चे की माँ घर के पास स्थित यातना घर में यहूदियों के जलाए जाने से उठते धुएं और दुर्गन्ध से बच्चों पर विपरीत असर पड़ने का हवाला देकर वहां से अपने बच्चों को दूर ले जाने के लिए अपने पति को राजी करती है, उधर उनका बेटा अपने नए बने दोस्त यहूदी लड़के से उसके पिता के बारे पूछता है, वह अपने पिता के खो जाने की बात बताता है, वह छोटा बच्चा अपने यहूदी दोस्त को उसका पिता ढूँढने में मदद करने के लिए कहता है. इधर उस बच्चे की माँ जाने की सारी तैयारी कर चुकी होती है उधर उसका बेटा अपने यहूदी दोस्त के साथ उसके पिता को ढूँढने में मदद करने के लिए किसी तरह कंटीले बाड़े के बीच से यातना घर में घुसने में सफल हो जाता है, लेकिन अन्दर घुसते ही नाजी सैनिक सभी यहूदियों को भट्टियों में भेजना शुरू कर देते हैं. जलाए जाने के लिए भेजे जाने वाली यहूदी कतारों में वे दोनों छोटे बच्चे भी हैं. जब तक नाजी अफसर अपने बेटे को बचाने के लिए यातना घर में पहुँचता है उन दोनों बच्चों को भट्टियों में डाला जा चुका होता है. फिल्म का यह अंत सामान्य नहीं रहने देता. फिल्म का यह अंत बहुत देर तक पीछा करता है, आसानी से बाहर नहीं निकलने देता. सवाल किया जा सकता है हिंदी फिल्मों में कितनी ऐसी फ़िल्में हैं? कितनी फ़िल्में गुजरात नरसंहार पर बनी? कितनी फ़िल्में बाथे, बथानी, मिर्चपुर के दलित नरसंहार और हाशिमपुरा, मुजफ्फरनगर में मुस्लिमों के कत्लेआमों पर बनीं? यहाँ से देखने पर लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के बरक्स दस्तावेजी फ़िल्में ज्यादा आश्वस्त करती हैं. हिंदी के लोकप्रिय सिनेमा में बनने वाले बायोपिक में भी, खास तटस्थता के साथ समबन्धित व्यक्ति की जिन्दगी को सामने लाने के बजाए एक जबर्दस्ती की हीरोइक छवि का निर्माण कर और किसी के जीवन के नितांत व्यक्तिगत को मसालेदार बनाकर मुनाफा कमाने की मंशा ही प्रबल होती है.

पहले भी कहा जा चुका है कि घटना विशेष के किसी सूत्र को पकड़कर व उसपर कथा विकसित कर इतनी तैयारी के साथ हिंदी में कोई फिल्म पहली बार बनाई गई है तो शायद वह ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी’ है. दूसरे विश्वयुद्ध की छाया में कोलकाता में चीनियों और जापानियों के अफीम व हेरोइन के बढ़ रहे कारोबार के सूत्र को पकड़कर बड़ी बारीकी से दिवाकर और उर्मि मिलकर जासूसी पृष्ठभूमि वाली कथा को विस्तार देते हैं. पहली बार हिंदी फिल्मों में ‘दूसरे विश्व-युद्ध’ का प्रसंग देखकर फिल्मों की सोहबत में रहने वाले एक आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी महसूसते हैं कि जो क्षेत्र लोकप्रिय हिंदी फिल्मों के लिए अछूते थे वे अब हिंदी फिल्मों का हिस्सा बन रहे हैं. हिंदी सिनेमा का कथानक व्यापक होने लगा है. भारत विश्व-युद्ध से अछूता देश नहीं था, विश्व-युद्ध का क्या प्रभाव देश में पड़ा, सिनेमा में यह प्रभाव अभी मुकम्मल तौर पर अलग-अलग कोणों से आना बाकी है.

दिवाकर 1942 के विंटेज युग का, दूसरे विश्वयुद्ध की गहमागहमी से भरे कोलकाता को उसी खूबी से पर्दे पर उतारते हैं जिस खूबी के साथ शेर्लोक होम्स श्रृंखला की फिल्मों में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के इंग्लैंड का कोई शहर पर्दे पर दिखा था. कैमरे का प्रत्येक फ्रेम क्लासिक दौर की एक पेंटिंग सरीखा है जहाँ रंग बहुत चटकीले तो नहीं हैं लेकिन अपनी पूरी भव्यता के साथ मौजूद हैं. चूँकि फिल्म का कथानक एक जासूसी पात्र पर आधारित है तो फिल्म की शुरुआत भी खून-खराबे से शुरू होती है जैसे कि शेर्लोक होम्स श्रृंखला की फ़िल्मों की शुरुआत रहस्यमय तरीके से होने वाली मौतों से होती है. फिर डिटेक्टिव नायक के कॉलेज में ही पढ़ने वाले अजित बैनर्जी (आनंद तिवारी) के गायब पिता को खोजने के दौरान नायक के साथ-साथ जब दर्शक दृश्य-दर-दृश्य से गुजरता है तो हिंदी फ़िल्म देखते हुए वह एक अपनी तरह का अनुभव है.

पहले ही दृश्य में 1942 का कोलकाता पूरी रवानगी के साथ मौजूद होता है, सामने से आती हुई विंटेज कार, सड़क किनारे नहाते और दातून करते हुए लोग, सड़क को पार करते हुए बंगाली पोशाक में लोग, ‘जय बंगाल’ के चिपके हुए पोस्टर, पीछे तांगा, उसके पीछे ट्राम, ट्राम की खिड़की से दिखती बाजार की जीवंतता, सर पर कनस्तरों का बोझ लिए जाता हुआ मजदूर, सामान गाडी, फूलों की टोकरी सर पर रखे गुजरता हुआ माली, कार, जीप, डबल डेकर बस व ट्राम के जाम के बीच से सड़क पार करता हुआ डिटेक्टिव नायक, बाजार में चीनी नामों के साइन बोर्ड, बाजार से खरीददारी करते चीनी नागरिक, यह सब मिलकर एक असामान्य दृश्य रचते हैं. ऐसी ही दृश्यों का रचाव इस फिल्म को अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों के बराबर लाकर खड़ा कर देते हैं. याद कीजिये उस दृश्य को जहाँ व्योमकेश बक्शी एक प्राइवेट प्रॉपर्टी में भुवन बाबू के क़त्ल के सिलसिले में जांच करने आता है लेकिन पीछे से नदी किनारे साड़ी पहने खड़ी दिखती है एक औरत जो धीरे-धीरे अपनी साड़ी उतारकर स्विम सूट में प्रकट होती है, वह औरत जब तैरकर बाहर निकलती है तब दर्शकों का वाबस्ता होता है एक गरिमामय, असीम सुन्दर व रहस्यमयी पात्र अंगूरी देवी (स्वास्तिका मुखर्जी) से. किसी हिंदी फिल्म में इतनी निरपेक्षता के साथ फिल्म के किसी महत्वपूर्ण किरदार, जो पूरी कांसिपिरेसी का एक महत्वपूर्ण अंग है, का परिचय हुआ हो याद नहीं पड़ता. फिल्म में शहर की गलियों, इमारतों, कहवा घरों, पुलिस हेडक्वार्टर और ‘गजानन सिकदार’ के घर के अन्दर के दृश्यों का संयोजन जहाँ हर व्यक्ति और वस्तु पर संदिग्धता पसरी हुई है, दर्शकों को कायल बना लेती है. रहस्यमय वातावरण को बनाए रखने के लिए फिल्म का जरुरत से ज्यादा डार्क कलर थोड़ा परेशान करता है लेकिन दर्शकों को बांधे भी रखता है.

जैसा कि कहा गया है एक व्यापक कथानक को समेटे हुए ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी’ हिंदी लोकप्रिय सिनेमा में आगाज है, तो जाहिर है अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मानकों को छूती हुई इस फिल्म के कुछ दृश्यों में हल्कापन भी होगा ही. फिल्म के आखिरी हिस्से में जहाँ व्योमकेश बक्शी, योंग वांग और भुवन बाबू के क़त्ल की गुत्थी डॉ. गुहा (नीरज काबी) के सामने खोल रहा है तो वहां डॉ. गुहा का हँसते हुए उतावलेपन के साथ व्योमकेश बक्शी को बताते रहने को कहते जाना दृश्य को सामान्य बना देता है. वैसे ही एक जासूसी पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में जब सारी गतिविधियाँ, सारी घटनाएँ अपने जासूस नायक के मदद करने के लिए गढ़ी गई प्रतीत होने लगें तो वह असर बना नहीं रह पाता क्योंकि ऐसे दृश्य जासूस द्वारा घटनाओं की परतें खोले बगैर ही रहस्य के सूत्र दर्शकों को पकड़ा देते हैं. मसलन ‘अश्वनी बाबू’ आलमारी में छिपाकर रखे पान के डिब्बे की तरफ बार-बार इस तरह देखते हुए प्रतीत होते हैं जैसे वे ‘व्योमकेश’ को पान के डिब्बे के बारे में बताना ही चाह रहे हों. ऐसे ही जब ‘अंगूरी देवी’ ‘व्योमकेश’ से यह बताती है कि ‘योंग वांग’ ने मुझे तुमसे बचकर रहने के लिए कहा था, क्योंकि मैं जब कुछ छुपाने की कोशिश करुँगी तो पीछा नहीं छोड़ोगे, उसी तरफ जाओगे. ऐसे दृश्य डिटेक्टिव और दर्शकों दोनों का ही काम आसान करते प्रतीत होते हैं.

दिवाकर ने इस हिंदी फिल्म से जिस वैश्विक सिनेमा भाषा से भारतीय दर्शकों को परिचित कराते हैं उनके कुछ समकालीन भी लगभग वैसी ही भाषा वाले सिनेमा के निर्माण में सक्रिय हैं. यहाँ दूसरी अन्य लोकप्रिय हिंदी फिल्मों की तरह सब सापेक्ष ही नहीं है. यहाँ घटनाओं और दृश्यों में अनिश्चतता है, निरपेक्षता है जो हिंदी फिल्मों के दर्शकों के लिए नितांत नई चीज है. आने वाले समय में ये फ़िल्में भारतीय दर्शकों के फिल्म संस्कार को बदलने में भी जरूर कामयाब होंगी. वृहत कथानक को समेटने वाली फिल्मों की शुरुआत ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी’ से हुई है यही इसका महत्व भी है.

---  दिनेश 
आइसा नेता व
शोधछात्र ,दिल्ली विश्वविद्यालय

1 comment:

आशीष मिश्र said...

बहुत पठनीय और बहसतलब !