9/13/15

आपको जूतों की ज्यादा जरूरत है कि पुस्तकों की ?


[कलबुर्गी की कायराना हत्या के बाद उसके प्रतिवाद में निकले जुलूस से लौटकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी स्नातकोत्तर के विद्यार्थी बीरज की टिप्पणी]

हम सब कलबुर्गी हैं !

कभी-कभी मन में आता है कि किसी ने सच ही कहा है कि जब पुस्तकें सड़क के किनारे फुटपाथ पर रखकर बेची जा रही हों और जूते शो-रूम में रखकर तो उस समाज को जूतों की ही जरूरत ज्यादा है पुस्तकों और ज्ञान की नहीं। यह समय का विडंबनापूर्ण व्यवहार है कि आज हर जगह ऐसी स्थितियाँ देखने को मिल जाएंगी। 

बुद्धिजीवियों, प्रगतिशीलों, सहिष्णुतावादी और सौहार्द्र फैलाने वाले व्यक्तियों को जहां जेल, हत्या और दहशत की जिंदगी जीने को मिले और इसके विपरीत सांप्रदायिक, असहिष्णुतावादी, परंपरावादियों-पोंगापंथियों को राजकीय सम्मान और सत्ता का संरक्षण मिल रहा हो तो समझना चाहिए कि समाज दिशा से भटक गया है।
 
पिछले कुछ समय से नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे और कलबुर्गी की हत्या इस समाज के स्वरूप और मंशा पर सवाल खड़ा करती है कि आखिर यह देश, यह समाज किस दिशा में जाना चाहता है या अतिवादी, पुराणवादी-शास्त्रवादी लोग इसे सत्ता के बलबूते किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ? 

गोविंद पनसारे, दाभोलकर और कलबुर्गी कोई व्यक्ति नहीं, ये संस्थाएं हैं जिन्हें समर्थन प्राप्त था इस देश के प्रगतिशीलों और सहिष्णुतावादियों का। इनकी हत्या इस संस्था को तोड़ने का प्रयास हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो इन बुजुर्गों से आखिर किसके धर्म, किसके स्वार्थ को खतरा था। वस्तुतः खतरा व्यक्ति से नहीं विचारधारा से होता है और यह विचारधारा की हत्या का प्रयास है। 

जब सार्वजनिक रूप से देश में कथावाचकों और दक्षिणपंथियों द्वारा यह बोला जाता हो कि समाज को बनाए रखने के लिए जाति जरूरी है और प्रत्येक जाति को अपना-अपना काम करना चाहिए, जब प्रधानमंत्री जी लालकिले से यह बोलते हों कि दलित सफाई करते थे ताकि उनको आत्मसंतोष मिले तो मंशा साफ हो जाती है कि इन राष्ट्रवादियों के सपनों का भारत कैसा होगा? 

और यही सब सुनकर सुनकर जिस प्रगतिशील के मन में प्रश्न उठा वही तो है नरेंद्र दाभोलकर, पनसारे या कलबुर्गी। और इसी प्रश्न से ही तो खतरा है उन्हें जो देश को मनु की संहिता पर चलाना चाहते हैं। 

अब समय आ गया है, देश और दूर-दराज के गांवों में यह बात फैलाने का कि आशाराम, रामपाल, राधे माँ, नित्यानन्द, सदानंद और पता नहीं कितने आनंद इस देश और समाज को दिशा देंगे या पनसारे, कलबुर्गी या दाभोलकर जैसे लोग। चुनना आपको है, सोचना आपको है- भविष्य आपका है। ये आप अच्छी तरह जानते होंगे कि आपको जूतों की ज्यादा जरूरत है कि पुस्तकों की !

1 comment:

thegroup said...

very important comment, of course we require books more then shoes. we can make without shoes , bare feet but what will happen when when there will be no supply to our brain nerves, then we will be mere vegetables.