12/21/15

बलात्कार के हर मामले में न्याय सुनिश्चित करने से बलात्कार रुकेंगे, किशोरों के साथ वयस्कों जैसा बर्ताव करने से नहीं

बलात्कार के कुछ विशिष्ट मामलों में किशोरता की उम्र कम करने की मांग पर ऐपवा और आइसा चिंता व्यक्त करते हैं। हम ऐसे प्रयासों का दृढ़ विरोध करते हैं जो महिलाओं के लिए न्याय के हित में नहीं हैं। हम आप सभी से तथ्यों पर गौर करने और बलात्कार के मामलों में न्याय हासिल करने के संघर्ष के खिलाफ आने वाले असली मुद्दों को पहचानने की अपील करते हैं। 

जस्टिस वर्मा कमेटी ने क्या कहा था ?

हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि ज्योति सिंह के बलात्कार और हत्या के बाद न्याय की गुहार के परिणामस्वरूप बनी जस्टिस वर्मा कमेटी ने न सिर्फ मृत्युदंड को बल्कि किशोरों को वयस्क न्यायालय और जेल भेजने को भी नकारा था। अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों को विस्तार में उद्धृत करते हुए और इस मुद्दे पर महिला संगठनों की परिपक्वता की तारीफ़ करते हुए इस कमेटी ने कहा कि: "देश के विभिन्न क़ानूनों के तहत किए गए अपराधों के लिए किशोरों की उम्र को 18 से घटाकर 16 साल कर देने से सवाल पर हमने विशेषज्ञों की राय सुनी। हम विनम्रता से स्वीकार करते हैं कि सभी महिला संगठनों ने न सिर्फ इस मसले में बेहतर परिपक्वता दिखाई बल्कि उनके साथ ही विद्वानों और सोचने-समझने वाले बहुतेरे लोगों ने इस घटना को अपराधशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय, दोनों नजरियों से देखा। हमारे मुताबिक हमारे सामने प्रस्तुत तथ्य इस निर्णय पर पहुँचने के लिए पर्याप्त है कि 'किशोरता' की उम्र को घटाकर 16 नहीं किया जाना चाहिए।"

क्या किशोर बलात्कार का बड़ा खतरा उपस्थित करते हैं ?

एक झूठा प्रचार चलाया जा रहा है कि किशोरों द्वारा बलात्कार की घटनाएँ 'बढ़ रही' हैं। तथ्य यह है कि बलात्कार के मामलों में किशोर मुलजिमों का प्रतिशत बहुत कम है। और इनमें भी बड़ा हिस्सा किशोरों के बीच परस्पर सहमति से बने प्रेम सम्बन्धों के मामले का है जिनमें लड़की के अभिभावक 'बलात्कार' के झूठे आरोप दर्ज कराते हैं। इनमें से ज़्यादातर लड़के उत्पीड़ित जातियों से होते हैं।

अगर बलात्कार एक वयस्क अपराध है तो इसका वयस्क दंड भी क्यों नहीं होना चाहिए ?

'आम' तर्क यह है कि: 'बलात्कार एक वयस्क अपराध है', और अगर कोई बलात्कार के लिए परिपक्व है तो वह दंड के लिए भी परिपक्व होगा। 'परिपक्वता' की यह गलत अवधारणा है। यौनिक संवेग और हत्या या बलात्कार करने की क्षमता दस साल के बच्चे में भी विकसित हो सकती है। पर तथ्यतः इस क्षमता से 'परिपक्वता' नहीं प्रदर्शित होती। वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर अब पूरी दुनिया में यह माना जाता है कि किशोरावस्था में दिमाग का सीईओ कहा जाने वाला अगला हिस्सा पूरी तरह विकसित नहीं होता। यह हिस्सा योजना बनाने, निर्णय लेने, खतरों का सटीक अनुमान लगाने और दूरगामी लक्ष्य तय करने की क्षमता को नियंत्रित करता है। इसलिए किशोरों के साथ वयस्कों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। 

16 दिसंबर की घटना में किशोर ही 'सबसे बर्बर' था न ? 

न तो ज्योति सिंह और न ही उसके दोस्त की अपराध के बारे में दी गई गवाहियों में किशोर के 'सबसे बर्बर' होने की बात है। यह पुलिस द्वारा फैलाया गया और मीडिया तक पहुंचाया गया झूठ है। 
किसी भी हाल में, भविष्य में कानून में होने वाला बदलाव भूतकाल से नहीं लागू किया जा सकता। सजा काटने के बाद भी किशोर अपराधी के 'छोड़े जाने' का विरोध करना बेमानी है, क्योंकि कानूनन यह असंभव है।

बलात्कार किससे ज्यादा रुक सकता है- ‘असामान्य’ मामलों में 'असामान्य' दंड देने से या फिर बलात्कार के सभी मामलों में प्रचलित दंड देने से? 

तर्क दिया जा रहा है कि कुछ मामलों- मसलन जिनको मीडिया ने उछाला हो या जिनके खिलाफ गुस्सा हो, में किशोरों को चुनिन्दा तरीके से दंडित कर सकने के लिए हमें कानून में बदलाव चाहिए। यह दुखद है।

बलात्कार के कुछ मामलों को 'असामान्य' मानने का हमारा रवैया हमें बलात्कार के ज़्यादातर मामलों को 'सामान्य' मामने की इजाजत दे देता है। 16 दिसंबर वाले मामले में 'किशोरता' की उम्र सीमा घटाकर 16 साल कर देने की मांग करने वाले भाजपा नेता सुभ्रमण्यम स्वामी वही शख़्स हैं, जो आशाराम द्वारा उत्पीड़ित 16 साल की लड़की को 'झूठी' बता रहे हैं! 

समाज में हम युवा लड़कों को सिखाते हैं कि 'असली' बलात्कार कुछ 'जानवर' करते हैं जिनको क्रूरतम दंड दिया जाना चाहिए। लेकिन ठीक इसी समय वे ही लड़के वयस्कों से यह भी सीखते हैं कि बलात्कार कोई बड़ा मामला नहीं है। जब बस्तर में पुलिसबल एक चौदह साल की लड़की का बलात्कार करता है, तब उन्हें मीडिया या राजनीति में कोई उफान नहीं दिखता। वे देखते हैं कि भगाणा में दलित लड़कियों से बलात्कार करने वाले बच निकले। वे देखते हैं कि मुजफ्फरनगर के बलात्कारियों के साथ हीरो जैसा बर्ताव किया जाता है और मोदी सरकार के मंत्री संजीव बलयान कैसे खुलेआम उनसे जेल में जाकर मिलते हैं और उनका बचाव करते हैं। वे देखते हैं कि कैसे आशाराम के मामले के गवाह मारे गए। वे आशाराम के हजारों समर्थकों को खुलेआम यह प्रचार करते देखते हैं कि कैसे बलात्कार कानून 'समाज तोड़ने' वाले हैं। 

वे देखते हैं कि तेजपाल और पचौरी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे आने वाली महिलाओं पर ही आरोप लगाए गए, उनको शर्मिंदा किया गया जबकि उनके द्वारा जिन पुरुषों की शिकायत की गई थी, वे कानून से बचे रहे। 

बलात्कार नैतिक रूप से गलत है और यह एक जुर्म है जिसकी सजा निश्चय ही मिलेगी, युवा लड़के यह नहीं सीख रहे हैं। बजाय इसके वे सीख रहे हैं कि ‘कुछ’ बलात्कारी 'पशु' होते हैं, जो दंडित किए जाने लायक हैं, जबकि बलात्कार की ‘ज़्यादातर’ शिकायतें ‘झूठी’ होती हैं और बलात्कार रोकने की ज़्यादा ज़िम्मेदारी महिलाओं की है, पुरुषों की नहीं। जब तक हमारा समाज और व्यवस्था हमें ये पाठ पढ़ाते रहेंगे, हम बलात्कार और यौन-उत्पीड़न की रोकथाम नहीं कर सकेंगे। 

नए बलात्कार कानूनों के तहत न्याय मांगने के लिए आगे आने वाली ज़्यादातर शिकायतकर्ताओं को न्याय मुहैया कराने में व्यवस्था नाकामयाब रही है। व्यवस्था चलाने वाले मौजूदा क़ानूनों को लागू करने और हर मामले में न्याय सुनिश्चित करने की बजाय लोगों का ध्यान एक और नया 'सख्त' कानून लाकर बंटा देना चाहते हैं। 

हमें असामान्य मामलों में सख्त सजा की जरूरत नहीं है। हर बलात्कारी को न्यायपूर्ण और समय से दिया गया दंड ही बलात्कार के मामलों की सही रोकथाम कर सकता है। 

किशोरों को वयस्कों की जेल में डाल देने का प्रयोग दूसरे देशों में असफल रहा है 

बहुतेरे अध्ययन दिखाते हैं कि अमरीका में चुनिन्दा मामलों में किशोरों को वयस्क न्यायालयों और जेलों में भेजने से अपराध कम नहीं हुए। बजाय इसके, सुधारों में कमी आई और किशोरों को अपराधी बनने में बढ़ावा मिला। इनमें से एक अध्ययन बताता है कि कैसे किशोरों को वयस्क अपराधी-न्याय व्यवस्था में भेजने से "अपराधों में कमी नहीं आई"। https://www.ncjrs.gov/pdffiles1/ojj...

एक और अध्ययन दिखाता है कि "किशोर न्याय-व्यवस्था के मुक़ाबले वयस्क न्याय-व्यवस्था में आने वाले किशोरों में अपराध करने की दर 34 फीसदी ज्यादा देखी गई।" http://tucson.com/news/local/crime/...
इस अनुभव के मद्देनजर 2005 से 2010 के बीच 15 अमरीकी राज्यों ने किशोरों को वयस्क न्याय व्यवस्था में भेजे जाने को रोकने के लिए कानून बनाए।

मौजूदा जेजे ऐक्ट (जुविनाइल जस्टिस ऐक्ट) 'किशोर अपराधी को खुला छोड़ने' की इजाजत नहीं देता। ऊपर दर्ज बहुतेरे वयस्क अपराधियों की तरह 16 दिसंबर मामले का किशोर अपराधी खुला नहीं छूटा है। उसने जुविनाइल जस्टिस होम में कानून के मुताबिक सजा काटी। हमें किशोर और वयस्क दोनों तरह के अपराधियों के लिए बेहतर सुधारों और पुनर्सुधार उपायों की जरूरत है। ऐसे उपाय हमारे समाज को और अधिक सुरक्षित बनाएँगे। 

हम ज़ोर देकर कह रहे हैं कि महिलाओं के नाम पर किशोर क़ानूनों में प्रतिगामी बदलाव मत करिए। मौजूदा क़ानूनों को लागू करिए और महिलाओं की आजादी की सुरक्षा कीजिये। 

मीना तिवारी, कविता कृष्णन 
ऐपवा (ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमंस एसोसिएशन)
सुचेता डे , संदीप सौरव 
आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन)

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