12/21/15

बलात्कार के हर मामले में न्याय सुनिश्चित करने से बलात्कार रुकेंगे, किशोरों के साथ वयस्कों जैसा बर्ताव करने से नहीं

बलात्कार के कुछ विशिष्ट मामलों में किशोरता की उम्र कम करने की मांग पर ऐपवा और आइसा चिंता व्यक्त करते हैं। हम ऐसे प्रयासों का दृढ़ विरोध करते हैं जो महिलाओं के लिए न्याय के हित में नहीं हैं। हम आप सभी से तथ्यों पर गौर करने और बलात्कार के मामलों में न्याय हासिल करने के संघर्ष के खिलाफ आने वाले असली मुद्दों को पहचानने की अपील करते हैं। 

जस्टिस वर्मा कमेटी ने क्या कहा था ?

हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि ज्योति सिंह के बलात्कार और हत्या के बाद न्याय की गुहार के परिणामस्वरूप बनी जस्टिस वर्मा कमेटी ने न सिर्फ मृत्युदंड को बल्कि किशोरों को वयस्क न्यायालय और जेल भेजने को भी नकारा था। अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों को विस्तार में उद्धृत करते हुए और इस मुद्दे पर महिला संगठनों की परिपक्वता की तारीफ़ करते हुए इस कमेटी ने कहा कि: "देश के विभिन्न क़ानूनों के तहत किए गए अपराधों के लिए किशोरों की उम्र को 18 से घटाकर 16 साल कर देने से सवाल पर हमने विशेषज्ञों की राय सुनी। हम विनम्रता से स्वीकार करते हैं कि सभी महिला संगठनों ने न सिर्फ इस मसले में बेहतर परिपक्वता दिखाई बल्कि उनके साथ ही विद्वानों और सोचने-समझने वाले बहुतेरे लोगों ने इस घटना को अपराधशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय, दोनों नजरियों से देखा। हमारे मुताबिक हमारे सामने प्रस्तुत तथ्य इस निर्णय पर पहुँचने के लिए पर्याप्त है कि 'किशोरता' की उम्र को घटाकर 16 नहीं किया जाना चाहिए।"

क्या किशोर बलात्कार का बड़ा खतरा उपस्थित करते हैं ?

एक झूठा प्रचार चलाया जा रहा है कि किशोरों द्वारा बलात्कार की घटनाएँ 'बढ़ रही' हैं। तथ्य यह है कि बलात्कार के मामलों में किशोर मुलजिमों का प्रतिशत बहुत कम है। और इनमें भी बड़ा हिस्सा किशोरों के बीच परस्पर सहमति से बने प्रेम सम्बन्धों के मामले का है जिनमें लड़की के अभिभावक 'बलात्कार' के झूठे आरोप दर्ज कराते हैं। इनमें से ज़्यादातर लड़के उत्पीड़ित जातियों से होते हैं।

अगर बलात्कार एक वयस्क अपराध है तो इसका वयस्क दंड भी क्यों नहीं होना चाहिए ?

'आम' तर्क यह है कि: 'बलात्कार एक वयस्क अपराध है', और अगर कोई बलात्कार के लिए परिपक्व है तो वह दंड के लिए भी परिपक्व होगा। 'परिपक्वता' की यह गलत अवधारणा है। यौनिक संवेग और हत्या या बलात्कार करने की क्षमता दस साल के बच्चे में भी विकसित हो सकती है। पर तथ्यतः इस क्षमता से 'परिपक्वता' नहीं प्रदर्शित होती। वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर अब पूरी दुनिया में यह माना जाता है कि किशोरावस्था में दिमाग का सीईओ कहा जाने वाला अगला हिस्सा पूरी तरह विकसित नहीं होता। यह हिस्सा योजना बनाने, निर्णय लेने, खतरों का सटीक अनुमान लगाने और दूरगामी लक्ष्य तय करने की क्षमता को नियंत्रित करता है। इसलिए किशोरों के साथ वयस्कों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। 

16 दिसंबर की घटना में किशोर ही 'सबसे बर्बर' था न ? 

न तो ज्योति सिंह और न ही उसके दोस्त की अपराध के बारे में दी गई गवाहियों में किशोर के 'सबसे बर्बर' होने की बात है। यह पुलिस द्वारा फैलाया गया और मीडिया तक पहुंचाया गया झूठ है। 
किसी भी हाल में, भविष्य में कानून में होने वाला बदलाव भूतकाल से नहीं लागू किया जा सकता। सजा काटने के बाद भी किशोर अपराधी के 'छोड़े जाने' का विरोध करना बेमानी है, क्योंकि कानूनन यह असंभव है।

बलात्कार किससे ज्यादा रुक सकता है- ‘असामान्य’ मामलों में 'असामान्य' दंड देने से या फिर बलात्कार के सभी मामलों में प्रचलित दंड देने से? 

तर्क दिया जा रहा है कि कुछ मामलों- मसलन जिनको मीडिया ने उछाला हो या जिनके खिलाफ गुस्सा हो, में किशोरों को चुनिन्दा तरीके से दंडित कर सकने के लिए हमें कानून में बदलाव चाहिए। यह दुखद है।

बलात्कार के कुछ मामलों को 'असामान्य' मानने का हमारा रवैया हमें बलात्कार के ज़्यादातर मामलों को 'सामान्य' मामने की इजाजत दे देता है। 16 दिसंबर वाले मामले में 'किशोरता' की उम्र सीमा घटाकर 16 साल कर देने की मांग करने वाले भाजपा नेता सुभ्रमण्यम स्वामी वही शख़्स हैं, जो आशाराम द्वारा उत्पीड़ित 16 साल की लड़की को 'झूठी' बता रहे हैं! 

समाज में हम युवा लड़कों को सिखाते हैं कि 'असली' बलात्कार कुछ 'जानवर' करते हैं जिनको क्रूरतम दंड दिया जाना चाहिए। लेकिन ठीक इसी समय वे ही लड़के वयस्कों से यह भी सीखते हैं कि बलात्कार कोई बड़ा मामला नहीं है। जब बस्तर में पुलिसबल एक चौदह साल की लड़की का बलात्कार करता है, तब उन्हें मीडिया या राजनीति में कोई उफान नहीं दिखता। वे देखते हैं कि भगाणा में दलित लड़कियों से बलात्कार करने वाले बच निकले। वे देखते हैं कि मुजफ्फरनगर के बलात्कारियों के साथ हीरो जैसा बर्ताव किया जाता है और मोदी सरकार के मंत्री संजीव बलयान कैसे खुलेआम उनसे जेल में जाकर मिलते हैं और उनका बचाव करते हैं। वे देखते हैं कि कैसे आशाराम के मामले के गवाह मारे गए। वे आशाराम के हजारों समर्थकों को खुलेआम यह प्रचार करते देखते हैं कि कैसे बलात्कार कानून 'समाज तोड़ने' वाले हैं। 

वे देखते हैं कि तेजपाल और पचौरी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे आने वाली महिलाओं पर ही आरोप लगाए गए, उनको शर्मिंदा किया गया जबकि उनके द्वारा जिन पुरुषों की शिकायत की गई थी, वे कानून से बचे रहे। 

बलात्कार नैतिक रूप से गलत है और यह एक जुर्म है जिसकी सजा निश्चय ही मिलेगी, युवा लड़के यह नहीं सीख रहे हैं। बजाय इसके वे सीख रहे हैं कि ‘कुछ’ बलात्कारी 'पशु' होते हैं, जो दंडित किए जाने लायक हैं, जबकि बलात्कार की ‘ज़्यादातर’ शिकायतें ‘झूठी’ होती हैं और बलात्कार रोकने की ज़्यादा ज़िम्मेदारी महिलाओं की है, पुरुषों की नहीं। जब तक हमारा समाज और व्यवस्था हमें ये पाठ पढ़ाते रहेंगे, हम बलात्कार और यौन-उत्पीड़न की रोकथाम नहीं कर सकेंगे। 

नए बलात्कार कानूनों के तहत न्याय मांगने के लिए आगे आने वाली ज़्यादातर शिकायतकर्ताओं को न्याय मुहैया कराने में व्यवस्था नाकामयाब रही है। व्यवस्था चलाने वाले मौजूदा क़ानूनों को लागू करने और हर मामले में न्याय सुनिश्चित करने की बजाय लोगों का ध्यान एक और नया 'सख्त' कानून लाकर बंटा देना चाहते हैं। 

हमें असामान्य मामलों में सख्त सजा की जरूरत नहीं है। हर बलात्कारी को न्यायपूर्ण और समय से दिया गया दंड ही बलात्कार के मामलों की सही रोकथाम कर सकता है। 

किशोरों को वयस्कों की जेल में डाल देने का प्रयोग दूसरे देशों में असफल रहा है 

बहुतेरे अध्ययन दिखाते हैं कि अमरीका में चुनिन्दा मामलों में किशोरों को वयस्क न्यायालयों और जेलों में भेजने से अपराध कम नहीं हुए। बजाय इसके, सुधारों में कमी आई और किशोरों को अपराधी बनने में बढ़ावा मिला। इनमें से एक अध्ययन बताता है कि कैसे किशोरों को वयस्क अपराधी-न्याय व्यवस्था में भेजने से "अपराधों में कमी नहीं आई"। https://www.ncjrs.gov/pdffiles1/ojj...

एक और अध्ययन दिखाता है कि "किशोर न्याय-व्यवस्था के मुक़ाबले वयस्क न्याय-व्यवस्था में आने वाले किशोरों में अपराध करने की दर 34 फीसदी ज्यादा देखी गई।" http://tucson.com/news/local/crime/...
इस अनुभव के मद्देनजर 2005 से 2010 के बीच 15 अमरीकी राज्यों ने किशोरों को वयस्क न्याय व्यवस्था में भेजे जाने को रोकने के लिए कानून बनाए।

मौजूदा जेजे ऐक्ट (जुविनाइल जस्टिस ऐक्ट) 'किशोर अपराधी को खुला छोड़ने' की इजाजत नहीं देता। ऊपर दर्ज बहुतेरे वयस्क अपराधियों की तरह 16 दिसंबर मामले का किशोर अपराधी खुला नहीं छूटा है। उसने जुविनाइल जस्टिस होम में कानून के मुताबिक सजा काटी। हमें किशोर और वयस्क दोनों तरह के अपराधियों के लिए बेहतर सुधारों और पुनर्सुधार उपायों की जरूरत है। ऐसे उपाय हमारे समाज को और अधिक सुरक्षित बनाएँगे। 

हम ज़ोर देकर कह रहे हैं कि महिलाओं के नाम पर किशोर क़ानूनों में प्रतिगामी बदलाव मत करिए। मौजूदा क़ानूनों को लागू करिए और महिलाओं की आजादी की सुरक्षा कीजिये। 

मीना तिवारी, कविता कृष्णन 
ऐपवा (ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमंस एसोसिएशन)
सुचेता डे , संदीप सौरव 
आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन)

12/11/15

अकादमिक स्वायत्तता पर असहिष्णु उन्मादी हमले की भर्त्सना -जन संस्कृति मंच


जन संस्कृति मंच, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अशोक वोरा और दर्शनशास्त्र विभाग की प्रोफ़ेसर सुधा चौधरी पर किए जा रहे हमलों की भर्त्सना करता है। संघ से जुड़े संगठन सनातन धर्म के किसी भी पहलू से असहमत या उस पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखनेवालों पर हमले करते ही रहे हैं लेकिन इस बार इन्होने एक ऐसे व्याख्यानदाता को निशाना बनाया है जो हिन्दू प्रतीकों और मूर्तियों के पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किए गए कथित 'कुपाठ' का विरोध कर रहा था। यह पूरा प्रकरण यह बताता है कि हिन्दू धर्म का बचाव करनेवाले भी इन शक्तियों के आक्रमण की जद से बाहर नहीं हैं। ऐसा लगता है कि अब इन ताकतों ने ज्ञान और बौद्धिक कर्म मात्र को अपराध मान लिया है।

इस भाषण की रिकार्डिंग मौजूद है जिसे सुनकर हिन्दू परम्पराओं में अहैतुक आस्था रखनेवाला कोई व्यक्ति प्रसन्न ही हो सकता है। लेकिन इस भाषण के खिलाफ स्थानीय मीडिया के एक हिस्से की सहायता से जो तूफ़ान खड़ा किया गया, उससे सिर्फ यही समझ में आता है कि यह सब पूर्व-नियोजित था और वक्ता कुछ भी बोलते या मौन भी रहते, तो भी संभवतः विश्विद्यालय की अकादमिक दुनिया पर आतंक कायम करने की मुहिम के तहत यह सब किया ही जाता।

यह एक तरह से अकादमिक दुनिया से जुड़े सभी विद्वानों को दी गयी चेतावनी है कि वे अपने सारे क्रिया-कलाप को विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय से बाहर की राजनैतिक और वैचारिक सत्ता के इशारों पर संचालित करें। संसद में असहिष्णुता को लेकर चली लम्बी बहस के बाद घटी यह घटना बताती है कि संसद में सरकार चाहे जो बयान दे, जगह-जगह संघ से जुड़े संगठन अकादमिक स्वायत्तता, बौद्धिक स्वातंत्र्य, अभिव्यक्ति के अधिकार तथा बहस की लोकतान्त्रिक संस्कृति के खिलाफ संगठित अभियान चलाते ही रहेंगे और राजस्थान की तरह अन्य भाजपाई सरकारें उन्हें अपना समर्थन देती रहेंगी।

मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग की प्रोफ़ेसर सुधा चौधरी ने विश्वविद्यालय और इंडियन काउंसिल ऑफ फिलोसॉफिकल रिसर्च के सहयोग से 03 दिसंबर, 2015 को 'धार्मिक संवाद: आधुनिक अनिवार्यता' शीर्षक विस्तार व्याख्यान हेतु दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अशोक वोरा को आमंत्रित किया था। दिल्ली विश्विद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर वोरा ने हिंदू परम्पराओं की विदेशी विद्वानों द्वारा की गई कथित एकायामी दुर्व्याख्याओं का उदाहरण पेश करते हुए अपने तर्कों से उनका खंडन किया था। उनके मुताबिक ये व्याख्याएँ विकृत और असंगत हैं। उनके भाषण की रिकार्डिंग मौजूद है। खंडन करने की नीयत से प्रो. वोरा ने विदेशी विद्वानों की व्याख्याओं के जो नमूने पेश किये, उन्हें उनके भाषण से अलगा कर सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया और स्थानीय अखबारों में भड़काऊ ख़बरें छपीं। प्रो. वोरा को शायद सपने में भी गुमान नहीं रहा होगा कि 'भक्त' हिंदू धर्म की प्रतिष्ठा करने पर भी उत्तेजित हो सकते हैं।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के 'रणबांकुरों' ने दोनों विद्वानों के पुतले जलाए और सुधा चौधरी की बर्खास्तगी से लेकर गिरफ्तारी तक की मांग रखी। 07 दिसंबर को विद्यार्थी परिषद के नेता उच्च शिक्षा मंत्री से मिले। हिंदुत्ववादी संगठनों ने 08 दिसंबर को उदयपुर शहर के व्यस्ततम चौराहे को जाम कर दिया। उपद्रव के बाद राजस्थान के उच्च शिक्षा मंत्री ने प्रोफेसर वोरा की निंदा की और खुद एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया। इसी दिन राजस्थान सरकार के आदेश पर प्रोफेसर वोरा के खिलाफ धारा 295 और 153 (ए) के तहत एफआईआर दर्ज हो गई। महिला मुद्दों पर बेहतरीन काम करने वाली स्थानीय आयोजक प्रगतिशील दार्शनिक सुधा चौधरी के खिलाफ प्रदर्शन हुए। ताज़ा ख़बर ये है कि प्रोफेसर अशोक वोरा पर एफआईआर हो गयी है। विश्वविद्यालय की ओर से थाने में शिकायत दर्ज कराई गई है। कुलपति ने एक सेंसर बोर्ड बना दिया है जो विश्वविद्यालय में होने वाले सभी व्याख्यानों की पूर्व प्राप्त लिखित प्रति की जांच करेगा। फिलहाल प्रो. वोरा ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर मांग की है उनके खिलाफ प्राथमिकी तब तक दर्ज न की जाए जबतक कि कोई अधिकारी विद्वान उनके भाषण की रिकार्डिंग सुनकर उसका अर्थापन न करे।

जन संस्कृति मंच, बहस की संस्कृति के विरोधी कुपढ़ संघ-गिरोह के इस हमले की निंदा करते हुए मांग करता है कि प्रोफेसर वोरा के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर तत्काल वापस ली जाये, संदर्भ से काटकर भड़काऊ बयान देने और छापने वालों के खिलाफ भी कार्यवाही की जाये। जन संस्कृति मंच तमाम लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों से अपील करता है कि इस हमले के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करें और असहिष्णुता की लगातार घट रही घटनाओं पर जनमत बनाने की मुहिम को जारी रखें। 

(जन संस्कृति मंच की ओर से मृत्युंजय द्वारा जारी) 




12/9/15

'मैं जिंदा हूँ और गा रहा हूं.' - जसम की ओर से कवि विद्रोही की स्मृति

जनकवि रमाशंकर 'विद्रोही' को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

कल 8 दिसंबर, 2015 को शाम 4.30 के करीब जनकवि रमाशंकर 'विद्रोही' ने दिल्ली में अंतिम साँसें लीं. विद्रोही ने अपनों के बीच, आन्दोलन के मोर्चे पर अंतिम साँसे लीं. जैसा वे जिए, वैसा ही मरे. जैसे कोई मध्यकालीन संत शताब्दियाँ पार करके आधुनिक सभ्यता के जंगलों में आ निकले, उसकी सारी विडंबनाएं और चोटें झेलते, वैसे ही फक्कड़, मलंग बना फिरे, अपनी मातृभाषा में हमारे आज के समय के सबद और अभंग जोड़ते हमारे बीच से गुज़र जाए. कविता उनकी जीविका नहीं, ज़िंदगी थी और जन-आन्दोलन और मार्क्सवादी जीवन-दृष्टि उसकी सबसे पौष्टिक खुराक. कविता में वे बतियाते हैं, रोते और गाते हैं, खुद को और सबको संबोधित करते है, चिंतन करते हैं, भाषण देते हैं, बौराते हैं, गलियाते हैं, संकल्प लेते हैं. ”कविता क्या है?” जैसे सनातन विषय पर विद्रोही के विचार देखें-

”कविता क्या है
खेती है
कवि के बेटा-बेटी है
बाप का सूद है, मां की रोटी है।”

ऐसी कविता और ऐसी ज़िंदगी अक्सर उस सीमान्त पर विचरण करती हैं जहां मौत हाथ मिलाने के फासले पर होती है. जो दुनिया उन्हें मिली, उसमें जीने की 'शर्म की सी शर्त' उन्होंने नामंजूर कर दी. अपनी कविताओं में अलग दुनिया बनाई. उन्होंने अपने भौतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए किसी से कोई गुहार नहीं लगाई. अपने लोगों से उनकी अपेक्षा यही थी कि वे अपने कवि को बचाएं-

”...तुम वे सारे लोग मिलकर मुझे बचाओ-
जिसके खून के गारे से
पिरामिड बने, मीनारें बनीं, दीवारें बनीं,
क्योंकि मुझको बचाना उस औरत को बचाना है,
जिसकी लाश मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी पर
पड़ी है।

मुझको बचाना उन इंसानों को बचाना है,
जिनकी हड्डियां तालाब में बिखरी पड़ी हैं ।
मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है,
मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है,

तुम मुझे बचाओ!
मैं तुम्हारा कवि हूं। ”

और यह कवि बचा रहेगा, उन लोगों के बीच जिन्हें उसने जान से ज़्यादा प्यार किया है और जिनसे उसने खुद को बचाए रखने की उम्मीद की है. विद्रोही में पितृसत्ता-धर्मसत्ता और राजसत्ता के हर छ्द्म, हर पाखण्ड के खिलाफ अपरम्पार गुस्सा, तीखी घृणा है. प्राचीन और समकालीन मिथकों का कविता में रचा उनका पाठ हर उस शोषक , हर उस आततायी को तिलमिला देगा जिसे अपनी बदमाशियों को छिपाने के लिए संस्कृति की पोशाक चाहिए. विद्रोही ने कलजुगहे मजूर की आत्मा में प्रवेश किया और उसकी चाहतों का ऐसा अपूर्व विप्लवी, अछोर संसार रचा जो पूरी हिन्दी कविता में अनन्य है, जिसे यहाँ मैं पूरा ही उद्धृत कर रहा हूँ-

”जनि जनिहा मनइया जजीर मांगात ऽ ऽ
ई कलिजुगहा मजूर पूरी सीर मांगात ऽ ऽ
बीड़ी-पान मांगात ऽ ऽ सिगरेट मांगात ऽ ऽ
कॉफ़ी-चाय मांगात ऽ ऽ कप-प्लेट मांगात ऽ ऽ
नमकीन मांगात ऽ ऽ आमलेट मांगात ऽ ऽ
कि पसिनवा के बाबू आपन रेट मांगात ऽ ऽ

ई भरुकवा की जगहा गिलास मांगात ऽ ऽ
औ पतरवा के बदले थार मांगात ऽ ऽ
पूरा माल मांगात ऽ ऽ मलिकाना मांगात ऽ ऽ
बाबू हमसे पूछा ता ठकुराना मांगात ऽ ऽ

दूधे-दहिए के बरे अहिराना मांगात ऽ ऽ
दुलहिनी के बरे बरसाना मांगात ऽ ऽ
आलू-भांटा बरे बोड़री के चक मांगात ऽ ऽ
अंचारे बरे लखनी के बाग मांगात ऽ ऽ 

बिहारै बरे पूरा वृन्दावन मांगात ऽ ऽ
गोड़ धोवै बरे राजा गंगासागर मांगात ऽ ऽ
अंचावै बरे पूरा जगन्नाथ मांगात ऽ ऽ

गंगा-जमुना मांगात ऽ ऽ सरस्वती मांगात ऽ ऽ
तौ सौवै बरे जनक के बगीचा मांगात ऽ ऽ
दरी मांगै, गद्दा मांगै औ गलीचा मांगात ऽ ऽ 

अपने बिटुआ के अंजोरिया का बच्चा मांगात ऽ ऽ
और बियाहे बरे राजा अंगरक्खा मांगात ऽ ऽ
औ बराते बरे बाजा अलगोजा मांगात ऽ ऽ

न ता धोखी मांगात ऽ ऽ न ता धोखा मांगात ऽ ऽ
न ता ओझा मांगात ऽ ऽ न ता सोखा मांगात ऽ ऽ
सोझा-साझा ई मनइया शासन सोझा मांगात ऽ ऽ

न इनाम मांगात ऽ ऽ न इकराम मांगात ऽ ऽ
न कउनो भीख मांगात, न अनुदान मांगात ऽ ऽ
न गऊदान मांगात ऽ ऽ न रतिदान मांगात ऽ ऽ

ई सड़किया के बीचे खुलेआम मांगात ऽ ऽ
मांगे बहुतै सकारे, सरे शाम मांगात ऽ ऽ
आधी रतियौ के मांगे, आपन दाम मांगात ऽ ऽ

ई तो खाय बरे घोंघवा के खीर मांगात ऽ ऽ
दुलहिनिया के द्रोपदी के चीर मांगात ऽ ऽ
औ नचावै बरे बानर महावीर मांगात ऽ ऽ

न ता साधू मांगात ऽ ऽ न फकीर मांगात ऽ ऽ
ना ई तोहरी तिरथिया के नीर मांगात ऽ ऽ
ई अपनी मइया बहिनिया से बीर मांगात ऽ ऽ

जनि जनिहा मनइया जगीर मांगात ऽ ऽ
ई कलिजुगहा मजूर पूरी सीर मांगात ऽ ऽ 
जनि जनिहा मनइया जगीर मांगात ऽ ऽ

विद्रोही की कविता के हलवाहे, चरवाहे, केवट, कहार, दलित, मजदूर, किसान, औरतें, बच्चे जितना अपनी यातनाओं, उतना ही अपने सपनों के साथ आते हैं. वे तमाम पंडे, पुरोहितों, मुल्ला, मौलवियों, महाजनों, ज़मीदारों, पूंजीपतियों, साम्राज्यवादियों से अपने भविष्य को लेकर ही नहीं लड़ते, बल्कि अपहृत अतीत का भी हिसाब माँगते हैं. विद्रोही की कविताएँ सबसे ज़्यादा यही लोग समझेंगे. विद्रोही हमारे अपवंचित राष्ट्र के कवि हैं, उन लोगों के कवि हैं जिन्हें अभी राष्ट्र बनना है. लेकिन विद्रोही के विकट व्यक्तित्व को दुनियाबी व्याकरण से समझना मुश्किल है. जिन्होंने उन्हें दुनिया से बेखबर बाउल गानेवालों की तरह अकेले में डूब कर गाते देखा है, खुद से बातें करते देखा है, भीतर के किसी श्मशान के प्रेतों से लड़ते-झगड़ते देखा है, वे विद्रोही की उस अलग, अगम और निराली दुनिया का सिर्फ बाहरी आभास पा सके हैं जिसमें प्रवेश करना शायद किसी के लिए भी आसान न था.

रमाशंकर यादव 'विद्रोही' का जन्म 3 दिसंबर, 1957 को ऐरी फिरोजपुर ( जिला सुल्तानपुर) में श्री रामनारायण यादव व श्रीमती करमा देवी के घर हुआ. बचपन में ही शांतिदेवी से विवाह हो गया. शान्ति जी पढ़ती थीं और वे भैंसे चराते थे. गाँव में चर्चा होती कि रमाशंकर की पत्नी उन जैसे अनपढ़ को छोड़ देगी. इसी भय से विद्रोही शिक्षा के प्रति प्रेरित हुए. प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के स्कूल में हुई , फिर सरस्वती इंटर कालेज, उमरी से इंटर पास किया और राज डिग्री कालेज, बनवारीपुर, सुलतानपुर से बी.ए. किया. एल.एल. बी. की पढ़ाई धनाभाव के चलते पूरी नहीं कर पाए. नौकरी की, लेकिन नौकरी ज़्यादा दिन उन्हें बांध नहीं पाई. 1980 में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में हिन्दी से एम. ए. करने आ गए. 1983 के छात्र आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने के चलते कैंपस से निकल दिए गए. 1985 में उनपर मुक़दमा चला. तबसे उन्होंने आन्दोलन की राह से पीछे पलटकर नहीं देखा. वाम राजनीति और संस्कृतिप्रेमी छात्रों की कई पीढियों ने विद्रोही को उनकी ही शर्तों पर स्वीकार और प्यार किया है और विद्रोही छात्रों के हर न्यायपूर्ण आंदोलन में उनके साथ तख्ती उठाए, नारे लगाते, कविताएं सुनाते, सड़क पर मार्च करते रहे, यहाँ तक कि कल तक जब उन्होंने आखिरी साँसें लीं. जे़ एन. यू. में रहने के चलते विद्रोही की आवाज़ दिल्ली की सडकों पर, बैरिकेडों और पुलिस पिकेटों के सामने तमाम तरह के लोकतांत्रिक जुलूसों, प्रदर्शनों के समय दशकों तक गूंजती रही है. जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय पार्षद वे 2008 के राष्ट्रीय सम्मलेन में बने जो कवि धूमिल के गाँव खेवली में हुआ था. उसके बाद से दिल्ली के बाहर भी उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ आदि तमाम जगहों पर आयोजनों और आन्दोलनों में बुलाए जाते. विद्रोही कविता लिखते नहीं, कहते थे. उनकी खडी बोली की काफी कवितायेँ मित्रों ने लिपिबद्ध कीं जो 'नयी खेती' संग्रह में छपीं. कचोट इस बात की है कि उनकी ढेरों अवधी रचनाएं रिकार्ड नहीं की जा सकीं. एक स्मृति सदा के लिए खो गयी.

याद आता है कि गोरख पाण्डेय के गाँव जाते हुए कैसे बच्चों जैसी जिज्ञासा से भरे और उत्फुल्ल थे. आन्दोलनों और प्रतिवाद सभाओं के दौरान कविता सुनाकर बच्चों की तरह उनका खुश होना, उसे अपना एकमात्र तमगा और पुरस्कार बताना याद आता है. याद आता है पटना के गांधी मैदान के निकटवर्ती चौराहे पर उनके कविता-पाठ के दौरान रिक्शेवालों, खोमचेवालों और मजूरों का स्वतःस्फूर्त जुटना और ताली बजाना. विद्रोही जहां जाते, हाथों हाथ लिए जाते. बाहर के लोग भी उन्हें उतना ही प्यार करते जितना उन्हें जे.एन.यू. के छात्रों से हासिल हुआ था. जे. एन.यू. में नबारूण दा के काव्यपाठ के कार्यक्रम के बारे में सुधीर सुमन ने ११ दिसंबर, २०११ को मुझे विस्तृत मेल लिखा जिसका एक अंश नबारूण और विद्रोही की भेंट के बारे में था. दुर्ग में दोनों की मुलाक़ात हो चुकी थी. सुधीर ने लिखा, " जेएनयू के कार्यक्रम से बाहर निकलते वक्त जिस गर्मजोशी और प्यार से नबारूण दा छात्रों और जनता के प्यारे कवि विद्रोही से गले मिले, वह मेरी चेतना में एक बेहद सुकूनदेह अहसास की तरह दर्ज हो गया, जैसे बेचैन दिल को करार आ गया। पूरे देश में, खासकर हिंदी पट्टी में विद्रोही को जनता प्यार करती है, छात्रों के बीच वे बेहद लोकप्रिय हैं। उन्हें अपने लिए कोई कोई फंड, कोई पुरस्कार, सरकारों की कोई नजरे-इनायत नहीं चाहिए, उनके कवि को किसी साहित्यिक प्रोमोटर की जरूरत नहीं है..... आंदोलनकारियों और सामान्य जनता के बीच वे मशहूर हैं...., मैंने मन ही मन नबारूण दा को सलाम किया कि उन्होंने जनता के कवि को सम्मान दिया.., शायद यही जनता के क्रांतिकारी कवि की असली पहचान है।" आज दोनों हमारे बीच नहीं हैं. क्या सचमुच वे हमारे बीच नहीं हैं? विद्रोही इसे नहीं मानते. यकीन न हो तो उनकी ही एक कविता के इस अंश से आपको तसल्ली हो जाएगी-

"मरने को चे ग्वेरा भी मर गए
और चंद्रशेखर भी
लेकिन वास्तव में कोई नहीं मरा है
सब जिंदा हैं
जब मैं जिंदा हूँ

इस अकाल में
मुझे क्या कम मारा गया है
इस कलिकाल में
अनेकों बार मुझे मारा गया है
अनेकों बार घोषित किया गया है
राष्ट्रीय अखबारों में पत्रिकाओं में
कथाओं में, कहानियों में
कि विद्रोही मर गया।

तो क्या मैं सचमुच मर गया!
नहीं मैं जिंदा हूँ
और गा रहा हूं...... "

( प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)