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9/13/11

रमाशंकर यादव 'विद्रोही' की तीन कवितायें

मकबूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग, शीर्षक- रेप ऑफ़ इंडिया
















 


औरतें

कुछ औरतों ने
अपनी इच्छा से
कुएं में कूदकर जान दी थी,
ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है।
और कुछ औरतें
चिता में जलकर मरी थीं,
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है।

मैं कवि हूं,
कर्ता हूं,
क्या जल्दी है,
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित,
दोनों को एक ही साथ
औरतों की अदालत में तलब करूंगा,
और बीच की सारी अदालतों को
मंसूख कर दूंगा।

मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा,
जिन्हें श्रीमानों ने
औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किया है।
मैं उन डिग्रियों को निरस्त कर दूंगा,
जिन्हें लेकर फौजें और तुलबा चलते हैं।
मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा,
जिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम किया हुआ है।

मैं उन औरतों को जो
कुएं में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं,
फिर से जिंदा करूंगा,
और उनके बयानों को
दुबारा कलमबंद करूंगा,
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया!
कि कहीं कुछ बाकी तो नहीं रह गया!
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई!

क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने एक बित्ते के आंगन में
अपनी सात बित्ते की देह को
ता-जिंदगी समोए रही और
कभी भूलकर बाहर की तरफ झांका भी नहीं।
और जब वह बाहर निकली तो
औरत नहीं, उसकी लाश निकली।
जो खुले में पसर गयी है,
या मेदिनी की तरह।

एक औरत की लाश धरती माता
की तरह होती है दोस्तों!
जे खुले में फैल जाती है,
थानों से लेकर अदालतों तक।
मैं देख रहा हूं कि
जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है।
चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित,
और तमगों से लैस सीनों को फुलाए हुए सैनिक,
महाराज की जय बोल रहे हैं।
वे महाराज की जय बोल रहे हैं।
वे महाराज जो मर चुके हैं,
और महारानियां सती होने की तैयारियां कर रही हैं।
और जब महारानियां नहीं रहेंगी,
तो नौकरानियां क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियां कर रही हैं।

मुझे महारानियों से ज्यादा चिंता
नौकरानियों की होती है,
जिनके पति जिंदा हैं और
बेचारे रो रहे हैं।
कितना खराब लगता है एक औरत को
अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना,
जबकि मर्दों को
रोती हुई औरतों को मारना भी
खराब नहीं लगता।
औरतें रोती जाती हैं,
मरद मारते जाते हैं।
औरतें और जोर से रोती हैं,
मरद और जोर से मारते हैं।
औरतें खूब जोर से रोती हैं,
मरद इतने जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं।

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी,
जिसे सबसे पहले जलाया गया,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी रही होगी,
मेरी मां रही होगी।
लेकिन मेरी चिंता यह है कि
भविष्य में वह आखिरी औरत कौन होगी,
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी होगी
मेरी बेटी होगी,
और मैं ये नहीं होने दूंगा।





















नानी

कविता नहीं कहानी है,
और ये दुनिया सबकी नानी है,
और नानी के आगे ननिहाल का वर्णन अच्छा नहीं लगता।

मुझे अपने ननिहाल की बड़ी याद आती है,
आपको भी आती होगी!
एक अंधेरी कोठी में
एक गोरी सी बूढ़ी औरत,
रातो-दिन जलती रहती है चिराग की तरह,
मेरे खयालों में।
मेरे जेहन में मेरी नानी की तसवीर कुछ इस तरह से उभरती है
जैसे कि बाजरे के बाल पर गौरैया बैठी हो।
और मेरी नानी की आंखे...
उमड़ते हुए समंदर सी लहराती हुई उन आंखों में,
आज भी आपाद मस्तक डूब जाता हूं आधी रात को दोस्तों!

और उन आंखों की कोर पर लगा हुआ काजल,
लगता था कि जैसे क्षितिज छोर पर बादल घुमड़ रहे हों।
और मेरी नानी की नाक,
नाक नहीं पीसा की मीनार थी,
और मुंह, मुंह की मत पूछो,
मुंह की तारे थी मेरी नानी,
और जब चीख कर डांटती थीं,
तो जमीन इंजन की तरह हांफने लगती थी।
जिसकी आंच में आसमान का लोहा पिघलता था,
सूरज की देह गरमाती थी,
दिन धूप लगती थी,
और रात को जूड़ी आती थी।

और गला, द्वितीया के चंद्रमा की तरह,
मेरी नानी का गला पता ही नहीं चलता था,
कि हंसुली में फंसा है या हसुली गले में फंसी है।
लगता था कि गला, गला नहीं,
विधाता ने समंदर में सेतु बांध दिया है।

और मेरी नानी की देह, देह नहीं आर्मीनिया की गांठ थी,
पामीर के पठार की तरह समतल पीठ वाली मेरी नानी,
जब कोई चीज उठाने के लिए जमीन पर झुकती थीं,
तो लगता था जैसे बाल्कन झील में काकेसस की पहाड़ी झुक गई हो!
बिलकुल इस्कीमों बालक की तह लगती थी मेरी नानी।
और जब घर से निकलती थीं,
तो लगता था जैसे हिमालय से गंगा निकल रही हो!

एक आदिम निरंतरता
जे अनादि से अनंत की और उन्मुख हो।
सिर पर दही की डलिया उठाये,
जब दोनों हाथों को झुलाती हुई चलती थी,
तो लगता था जैसे सिर पर दुनिया उठाये हुए जा रही हो।
जिसमें मेरे पुरखों का भविष्य छिपा हो,
और मेरा जी करे कि मैं पूछूं,
कि ओ री बुढि़या, तू क्या है,
आदमी कि आदमी का पेड़!

पेड़ थी दोस्तों, मेरी नानी आदमियत की,
जिसका कि मैं एक पत्ता हूं।
मेरी नानी मरी नहीं है,
वह मोहनजोदड़ो के तालाब में स्नान को गई है,
और अपनी धोती को उसकी आखिरी सीढ़ी पर सुखा रही है।
उसकी कुंजी यहीं कहीं खो गई है,
और वह उसे बड़ी बेसब्री के साथ खोज रही है।
मैं देखता हूं कि मेरी नानी हिमालय पर मूंग दल रही है,
और अपनी गाय को एवरेस्ट के खूंटे से बांधे हुए है।
मैं खुशी में तालियां बजाना चाहता हूं,
लेकिन यह क्या!!
मेरी हथेलियों पर सरसों उग आई है,
मैं उसे पुकारना चाहता हूं,
लेकिन मेरे होठों पर दही जम गई है,
मैं पाता हूं
कि मेरी नानी दही की नदी में बही जा रही है।
मैं उसे पकड़ना चाहता हूं,
पकड़ नहीं पाता हूं,
मैं उसे बुलाना चाहता हूँ,
लेकिन बुला नहीं पाता हूं,
और मेरी देह, मेरी समूची देह,
एक पत्ते की तरह थर-थर कांपने लगती है,
जो कि अब गिरा कि तब गिरा।
























 गुलाम

1.
वो तो देवयानी का ही मर्तबा था,
कि सह लिया सांच की आंच,
वरना बहुत लंबी नाक थी ययाति की।
नाक में नासूर है और नाक की फुफकार है,
नाक विद्रोही की भी शमशीर है, तलवार है।
जज़्बात कुछ ऐसा, कि बस सातों समंदर पार है,
ये सर नहीं गुंबद है कोई, पीसा की मीनार है।
और ये गिरे तो आदमीयत का मकीदा गिर पड़ेगा,
ये गिरा तो बलंदियों का पेंदा गिर पड़ेगा,
ये गिरा तो मोहब्बत का घरौंदा गिर पड़ेगा,
इश्क  और हुश्न  का दोनों की दीदा गिर पड़ेगा।
इसलिए रहता हूं जिंदा
वरना कबका मर चुका हूं,
मैं सिर्फ काशी में ही नहीं रूमान में भी बिक चुका हूं।

हर जगह ऐसी ही जिल्लत,
हर जगह ऐसी ही जहालत,
हर जगह पर है पुलिस,
और हर जगह है अदालत।
हर जगह पर है पुरोहित,
हर जगह नरमेध है,
हर जगह कमजोर मारा जा रहा है, खेद है।
सूलियां ही हर जगह हैं, निज़ामों की निशान,
हर जगह पर फांसियां लटकाये जाते हैं गुलाम।
हर जगह औरतों को मारा-पीटा जा रहा है,
जिंदा जलाया जा रहा है,
खोदा-गाड़ा जा रहा है।
हर जगह पर खून है और हर जगह आंसू बिछे हैं,
ये कलम है, सरहदों के पार भी नगमे लिखे हैं।

2.
आपको बतलाऊं मैं इतिहास की शुरुआत को,
और किसलिए बारात दरवाजे पर आई रात को,
और ले गई दुल्हन उठाकर
और मंडप को गिराकर,
एक दुल्हन के लिए आये कई दूल्हे मिलाकर।
और जंग कुछ ऐसा मचाया कि तंग दुनिया हो गई,
और मरने वाले की चिता पर जिंदा औरत सो गई।
और तब बजे घडि़याल,
पड़े शंख-घंटे घनघनाये,
फौजों ने भोंपू बजाये, पुलिस भी तुरही बजाये।
मंत्रोच्चारण यूं हुआ कि मंगल में औरत रचती हो,
जीते जी जलती रहे जिस भी औरत के पति हो।

3.
तब बने बाज़ार और बाज़ार में सामान आये,
और बाद में सामान की गिनती में खुल्ला बिकते थे गुलाम,
सीरिया और काहिरा में पट्टा होते थे गुलाम,
वेतलहम-येरूशलम में गिरवी होते थे गुलाम,
रोम में और कापुआ में रेहन होते थे गुलाम,
मंचूरिया-शंघाई में नीलाम होते थे गुलाम,
मगध-कोशल-काशी में बेनामी होते थे गुलाम,
और सारी दुनिया में किराए पर उठते गुलाम,
पर वाह रे मेरा जमाना और वाह रे भगवा हुकूमत!
अब सरे बाजार में ख़ैरात बंटते हैं गुलाम।

लोग कहते हैं कि लोगों पहले ऐसा न था,
पर मैं तो कहता हूं कि लोगों कब, कहां, कैसा न था ?
दुनिया के बाजार में सबसे पहले क्या बिका था ?
तो सबसे पहले दोस्तों .... बंदर का बच्चा बिका था।
और बाद में तो डार्विन ने सिद्ध बिल्कुल कर दिया,
वो जो था बंदर का बच्चा,
बंदर नहीं वो आदमी था।

12/8/10

दाढी के बहाने मूर (मार्क्स) से गपशप - विद्रोही

मूर है मेरा सनम

मूर है सेहरा मेरा, और मूर है मेरा सनम,
और वाह रे दाढ़ी तेरी, और वाह रे तेरी कलम।
एक किताबत पसरकर है छा गई संसार पर,
अंटार्टिका, अर्जेंटिना और चीन की दीवार पर।
यूरोप का पूर्वी किनारा,
लाल फिर भी लाल है,
कीर जैसे एशिया का पश्चिमी सिर लाल है।

लाल है पोलैण्ड और बाल्टिक सागर लाल है,
लाल है बर्लिन और जर्मन, फ्रांस-पेरिस लाल है।
ठेठ, बिलकुल ठेठ देखो, चाइना भी लाल है,
लाल है तिब्बत-ल्हासा, काठमांडू लाल है।
हिंदुओं का हिंदू ये नेपाली हिंदू लाल है,
और लाल मुस्लिम दुनिया देखो, लीबिया भी लाल है।
लाल है कर्नल गदाफी, ये गुरिल्ला लाल है.

तो लाल झंडा चढ़ गया है,
मंदिरों पर मस्जिदों पर,
लाल हैं पंडे-पुरोहित, मुल्ला-टुल्ला लाल हैं।
लाल हैं प्रोटेस्टेंट, क्रिश्चियन और कैथोलिक लाल हैं,
लाल है कट्टर यहूदी और पारसी लाल हैं।
और आपके भी राष्ट्रध्वज का एक तिहाई लाल है!
ये भगतसिंह की जमीं हिंदोस्तां भी लाल है,
और उधर आस्ट्रेलिया के सब गड़रिये लाल हैं।
कहा तक वर्णन करूं भेड़ों की पूछें लाल हैं,
अफ्रीका के काले वनों के लकड़हारे लाल हैं।
लाल है नेल्सन मंडेला, सारे काले लाल हैं,
लाल है मिस्री पिरामिड, नील का जल लाल है।
लाल है काबुल का किशमिश, तुर्की छुहारा लाल है,
लाल है अरबी कबीले और सहारा लाल है।
खून से लथपथ ये रेगिस्तान का बच्चा लाल है,
लाल है बेरुत और लेबनान देखो लाल है।
आज का नैसेरवां यासर अराफात लाल है,
लाल हैं बंजारा कौमे बद्दू कबीले लाल हैं।
और जात का बदजात ये आभीर बच्चा लाल है!

लाल तो अमरीका का सारा पिछवाड़ा लाल है,
नाक के नीचे उसी के क्यूबा भी लाल है।
क्यूबा का लाल कास्त्रो, लालों का भी लाल है,
ये लाल अपनी मां का नहीं, दुनिया की मां का लाल है।
उसकी दाढ़ी का नजारा, शौक है संसार का,
ये भी औलाद है उसी मूर दाढ़ीजार का।
आगे, तो हां लोगों, बिना दाढ़ी बिना मूंछ,
और कर गये लड़के करिश्मा, दढ़ियलों से पूछ-पूछ।

करने को तो औरतों ने क्रांति कर डाला जहां में,
फिर भी पूछेंगे बेहूदे, कि बताओ कि कहां में?
मैं बताता हूं, नहीं चलकर दिखाता हूं, वहीं,
आप चाहोगे तो बाबूजी दिखा दूंगा यहीं।

पर छोड़िये जी!
उनकी बातें फिर कभी जब फिर मिलेंगे,
आज की तो बात दाढ़ी-मूंछ के ही सिलसिले में।
फेरहिस्त लम्बी है लोगों, मेरे दाढ़ीबाजों की,
हो ची मिन्ह चाचा की दाढ़ी, दाढ़ी-ए-नव्वाब थी,
सिर झुका दाढ़ी हिला दे, तो हिल उठे लेदुआन,
दाढ़ी हिलाकर हंस दिए तो हिल गया वाशिंगटन ,
गिर गया गश खा कनेडी, रो पड़ा सच में निक्सन।

बात दाढ़ी की चली तो याद लेनिन की है आई,
सोचता हूं लेनिन, लेनिन था कि वह दाढ़ी था भाई!
क्या गजब की दाढ़ी इस ब्लादीमिर इल्यीच की थी,
यही लौंडा आगे चलकर दोस्तों लेनिन हुआ,
क्या कट थी दाढ़ी,
रूस कट या फ्रेंच कट या अन्य कट,
पर गौर से देखोगे तो लगती है
इंटरनेषनल कट।

और स्टालिन की मूंछों को कहोगे कौन कट ?
जाट कट या लाट कट याकि थीं कज्जाक कट,
पर ताव दे दो तो लगें
पूरी तरह उजबेक कट।
माउरा नहर के वेग कट,
मध्य युग के नाइटों कट,
नटों के उस्ताद कट,
मार्शल कट, जनरल कट और सिपहसालार कट,
पूर्वी सरदार कट, क्षत्रिय कट, तलवार कट
मूंछ स्टालिन की थी अकबर महान सम्राट कट,
जिसके आगे सीजर की मूंछें लगेंगी गिरहकट।
मूंछ तो बाबूजी रख लेते,
डाकू और चोरकट,
पर नाम जोसेफ का नहीं यूं ही स्टालिन पड़ा था,
उसकी मूंछें उस वक्त दुनिया का अमन-ओ-चैन थीं,
युद्ध के उपरांत उपजे
राष्ट्रसंघ कट थी।

इंसान की पहचान आदत से है, फैशन से नहीं,
क्या कहोगे भगत सिंह के हैट का क्या कट था ?
सिख कट या हिंदू कट याकि था अंग्रेज कट?
बराबरी का ताज था, बिरादरी का तख्त था,
समाजवाद का निशान, हैट क्रांति कट था।

कामरेड कट था-

दोस्ती का हाथ, दोस्त इंकलाब के लिए,
गया, गया चला गया,
तभी तो याद आ रही,
तभी सदा सता रही
भगत सिंह, भगतसिंह, कामरेड!
तुम्हारी मातृभूमि आर्तनाद कर रही है अर्द्धरात्रि में,
भगत सिंह, भगत सिंह, कामरेड!
तुम्हारी मातृभूमि रो रही
भूख-प्यास, दुख-शोक से,
कि वीरवर! उसे तुम्हारे खून की पुकार है,
उसे तुम्हारे बस उसी विचार की पुकार है,
जो विचार तेरा भी है मेरा भी है,
फिदेल, चे ग्वेरा का है,
जो विचार मूर का, मजूर का है,
हमें हमारे देश को वही विचार चाहिए,
हमें हमारे देश को वही किताब चाहिए।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को अवश्य।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को अटल।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को सहज।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को सरल।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब साध्य है।
कि जो किताब इंकलाब का ही इंतखाब है।
हमें हमारे देश को वही किताब चाहिए,
हमें हमारे देश को इंकलाब चाहिए।

क्योंकि इंकलाब से भला,
क्योंकि इंकलाब से बड़ा,
कुछ नहीं है
कुछ नहीं है
कुछ नहीं है
जहान में।

...रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

11/21/10

ख़ुदा, रामचंदर की यारी है ऐसी- विद्रोही

कबीर का तेवर देखना है तो आईये 'विद्रोही' के इलाके में. विद्रोही कविता जीते हैं, ओढ़ते-बिछाते हैं. कविता उनकी जिन्दगी है. बतियाते-गपियाते हुए विद्रोही ऐसा तीखा मज़ा लेते हैं कि धर्म-धुरंधरों के औसान खता हो जाते हैं. समाज के आख़िरी आदमी, खेत-मजदूर तक ये कविता बिना किसी विघ्न-बाधा, बिना किसी आलोचक सीधे पहुंचने की कूबत रखती है. कविता के नागर देश के बाशिंदों के लिए यह कविता थोड़ी नागवार गुजरेगी, पर इसके जिम्मेदार वे खुद ही हैं.
खैर, कविता ये रही. बोल कर पढेंगें, तो मज़ा बढ़ जायेगा, ऐसा मुझे लगा.

ख़ुदा, रामचंदर की यारी है ऐसी

पटाखा है ये और ये फुलझड़ी है,
ये दुनिया तुम्हारी ज़हर से भरी है.
यहां हर डगर पर कन्हैया खड़े हैं
कन्हैया खड़े हैं तो वंशी लिए हैं,
और काजल लगाए हैं, चंदन लिए हैं,
और नंगे हैं, पर पान खाए हुए हैं,
औ काजल लगाकर लजाए हुए हैं.

दुनिया की गाएं, इन्हीं की है गाएं,
कि दुनिया में चाहे जहां भी चराएं.
इधर देखिए रामचंदर खड़े हैं,
बगल में इन्हीं के लखन जी खड़े हैं,
बीच में उनके सीता माताजी खड़ी हैं.
ये सीताजी माताजी पूरी सती हैं,
ये पति के रहते भी बेपति हैं.

रोइये, रोइये! अब सभी रोइये!
राम, सीता, लखन, तीनो वन को चले हैं,
बे पैसे ही नारियों को तारते चले हैं,
मल्लाहों से पांव ये धुलाते चले हैं.
ये संतों-महंतों को देते चले हैं,
गरीबों, किसानों से लेते चले हैं.

प्रथम बाण से ये चमारों को मारें,
दूसरे बाण से ये गंवारों को मारें,
तीसरे बाण से जो बचा उसको मारें,
औरतों को तो अपने ही हाथों से मारें.

इधर देखिए ये ख़ुदा जी खड़े हैं,
ख़ुदा, रामचंदर से जैसे जुदा हैं,
ख़ुदा-रामचंदर में नुक्ते का अंतर,
ख़ुदा-रामचंदर हैं पूरे बराबर.
इधर रामचंद्र जी चंदन लिए हैं,
उधर से ख़ुदा जी भी टोपी लिए हैं.

कहां से नया बल ख़ुदा को हुआ है,
कब से हुए रामचंदर बहादुर?
ख़ुदा रामचंदर ये दोनों जने ही,
अमरीकी बुकनी की मालिश किए हैं,
ख़ुदा, रामचंदर ये दोनों हैं नंगे
पर पांवों में डालर की मालिश किए हैं.

...रमाशंकर यादव 'विद्रोही'