10/30/10

जोगिया से प्रीत प्रीत किये दुःख होय - किशोरी आमोनकर

खूबसूरती किसे कहते हैं, यह किशोरी जी को सुन-देख कर सीखा जा सकता है. वे अपनी उपस्थिति से एक भूलती जा रही दुनिया में थाम लेने वाली आवाज़ का प्रतिनिधित्व करती हैं. उनको सुनते हुए हमेशा ललक बनी रहती है कि और सुना जाये. आप खामोश हो जाते हैं और वह आवाज़ खाली मन में गहरे धंस जाती है.
यह बंदिश पुरानी तो हैं पर पर एक स्त्री का गहरा दुःख इसमें रचा-बसा है. जोगी संग जाने की आवाज़ हमारी परम्परा में प्रेम और छटपटाहट लपेटे है. मुझे एक लोकगीत याद आ रहा है जिसको आधार बना कर कवि गोरख पांडे ने कविता लिखी थी- सात सुरों में पुकारता है प्यार!
जो हो,
आइये सुनते हैं किशोरी जी से यह बंदिश - "जोगिया से प्रीत प्रीत किये दुःख होय"

10/13/10

सुनो लड़की! -तसलीमा नसरीन

सुनो लड़की!

उन्होंने कहा - आराम से...
कहा- शांत रहो...
कहा- बातें बंद...
कहा- चुप रहो...
फ़रमाया उन्होंने- बैठ जाओ...
आदेश दिया- अपना सर झुकाओ...
कहा- रोना जारी रखो, आंसुओं को बहने दो...

जवाब में तुम क्या करती हो?

अब तुम खड़ी हो जाओ
तुरंत तुमको खड़े होना चाहिए
कमर सीधी रखो
सर को ऊंचा उठाओ...
तुम्हें बोलना चाहिए
अपने ख्यालों को जोर से बोलो
चीखो!

इतनी तेज आवाज़ में चिल्लाओ कि बचने के लिए वे दौड़ पड़ें अपनी खोह में
वे कहेंगे- तुम बे-हया हो!
इसे सुनकर तुम हंसना, बस हंस देना...

वे कहेंगे- तुम कुलटा हो!
सुनना जब यह, और जोर से हंसना तुम...

तब वे कहेंगे- तुम दोषी हो!
फिर हंसना, पिछली बार से तेज़ आवाज़ में...

तुम्हारी हंसी सुन वे चिल्ला पड़ेंगे-
छिनाल हो तुम!

जब वे ऐसा कहें
अपने पीछे अपना हाथ टिकाकर,
सीधी खड़ी हो, मजबूती से
और जवाब दो- हाँ मैं हूँ, हूँ मैं छिनाल!

वे सहम जायेंगे .
वे घूरेंगे अविश्वास से,
वे इंतज़ार करेंगे कि तुम कुछ और कहो, कुछ और ...

तब उनके बीच के मर्द गुस्से और पसीने से भर जायेंगे
और औरतें,
तुम्हारी तरह छिनाल होने के सपनों में खो जायेंगी.


-तसलीमा नसरीन

मैं ख्याल हूँ किसी और का- मेहदी हसन

आज सुनिए मेहदी हसन साहब की आवाज़ में सलीम कौसर की कही हुई ग़ज़ल.
ग़ज़ल ये रही-

मैं ख्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है,
सरे आइना मेरा अक्स है,पसे आइना कोई और है.

मैं किसी के दस्ते तलब में हूँ तो किसी के हर्फे दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे मांगता कोई और है

अज़ब ऐतबारों पे ऐतबार के दरमियान है ज़िंदगी
मैं करीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है

तुझे दुश्मनों की खबर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्तां कोई और थी मेरा वाकया कोई और है

वही मुन्सिफों की रिवायतें वही फैसलों की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोई और था ये मेरी सजा कोई और है

जो मेरी रियाज़ते नीम शब को सलीम सुबहो न मिल सके
तो फिर इसके माने तो ये हुए की यहाँ खुदा कोई और है.

इस ग़ज़ल को जब भी मैं सुनता हूँ तो लगता है की वक्त खुद अपनी गवाही पेश कर रहा है, वह भी पूरी इंसानी कायनात के सामने. विडंबनाओं को बहुत ही गहरे भरे हुए इस सभ्यता के रहस्यों को यह ग़ज़ल जितने आसान लफ़्ज़ों में बयां करती है वही कला का चरम है.
ऊपर से मेहदी साहब की गायकी, जिन्होंने इस ग़ज़ल में राग ऐसे पिरोये हैं कि ग़ालिब याद आ गए-
'पुर हूँ शिकवे से राग से जैसे बाजा'

10/1/10

फ़ैज़- आइये हाथ उठाएं हम भी- इकबाल बानो

फैसला आ गया. वीरेन डंगवाल के शब्दों में
"जो नहीं होना था, वही सब हुआं हुआं, इधर गहरा खड्ड था, उधर गहरा कुआं"
ये कैसी जम्हूरियत है जहां एक सामान्य न्याय की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए लाखों लाख पुलिस तैनात की गयी?
और लोग किससे डर रहे हैं? नेताओं को सुनकर तो ऐसा लग रहा है कि हिन्दुस्तान की मुकम्मल आबादी सांप्रदायिक है, और नेता जन सेकुलर,जबकि बात उल्टी है. अगर इस मुद्दे पर राजनीति बंद कर दी जाये तो अवाम अपने मसले खुद हल कर लेगी.

आज सुनिए फ़ैज़ की प्रार्थना, इकबाल बानो की आवाज़ में-