12/20/13

ज़िंदा ही दफन कर दिए जाते हैं हम - प्रदीप की कवितायें

 













[छोटे से कस्बे में रहते हुए दुनिया को अलग तीखी नजर से देखते दोस्त प्रदीप की यह छोटी-छोटी कवितायें हमारे समय के सरकारी राष्ट्रवाद की बखिया उधेड़ती हैं। छोटी चिंगारियों की तरह की ये कवितायें धधकने की भूमिकाएँ हैं। शुक्रिया प्रदीप !]

गूंगी संसद

गूंगी संसद ऐसे नहीं बताएगी
रोटी से खेलने वाले
तीसरे आदमी के बारे में

रोटी बेलने वालो!
आओ,सब मिलकर मार दें
उस तीसरे आदमी को
संसद अपने आप चिल्लाएगी

रखवाला

दुनियां के सबसे बड़े लोकतन्त्र में
रहते हुए मैंने यह जाना
कि यह वो व्यवस्था है

जो भेड़िये को मेमनों का
रखवाला बनाती है

आदिवासी
उन्हें नहीं दी गई
बिजली, पानी, सड़क
नहीं दिया गया कभी
पेट भर भोजन
वे चुप रहे
जब तक वे चुप रहे
तब तक आदिवासी थे।
छीन ली गई उनसे
उनकी जमीन, उनका जंगल, उनकी इज्जत
और जब वे बोले उसके खिलाफ
तो नक्सलवादी हो गए।

सरकार के अत्याचार सहना
आदिवासी होना है
और उसके खिलाफ खड़े होना
नक्सलवादी।

ताबूत

हम बनाते हैं सरकार
सरकारें हमारे लिए
बनाती हैं ताबूत


उसमें ठोंकती हैं कील
आहिस्ता-आहिस्ता
इस तरह ज़िंदा ही
दफन कर दिए जाते हैं हम
अपनी ही बनाई सरकार द्वारा

घुट-घुट कर मरने के लिए।

किसान

भूख से तड़प रहे हैं किसान
खेत में फसल जला रहे हैं किसान
आत्महत्या कर रहे हैं किसान
सरकारी पोस्टर में मुस्कुरा रहे हैं किसान
सरकारी पोस्टर जला रहे हैं किसान
नया पोस्टर बना रहे हैं किसान
हंसिया और हथौड़ा उठा रहे हैं किसान

11/26/13

ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति सभा की रपट

मध्यवर्गीय व्यक्तिवाद के खिलाफ लगातार लड़ते रहे वाल्मीकि 


कबीर, नाभादास, अश्वघोष और बुद्ध की परंपरा से जोड़कर वाल्मीकि जी को देखना चाहिए: प्रो. मैनेजर पांडेय   
दलित साहित्य के लिए साहित्यिक मूल्य के बजाए जीवन मूल्य को   कसौटी बनाया वाल्मीकि ने: प्रो. तुलसी राम  
ईश्वर और आस्तिकता के घोर विरोधी थे वाल्मीकि जी: बजरंग  

नई दिल्ली, 25 नवंबर

गलदश्रु भावुकता और श्रद्धालुओं की फूल मालाओं से ख़बरदार रहकर ही ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचनात्मकता को समझा जा सकता है। मध्यवर्गीय अवसरवाद के खि़ला़फ उनकी कहानियों में जो प्रतिरोध दजऱ् हुआ है-उसे देखा जाना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रविवार को आयोजित संयुक्त
स्मृति सभा में ये विचार व्यक्त किये गए।

स्कूल आफ सोशल साइंसेज में दलित साहित्य कला केंद्र, प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित सभा में प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कबीर, नाभादास, अश्वघोष और बुद्ध को याद करते हुए प्रतिरोध की उस साहित्यिक परंपरा को रेखांकित किया जिसकी बुनियाद पर ओमप्रकाश वाल्मीकि और विशेष तौर पर दलित रचनात्मकता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। वाल्मीकि की भाषा को उन्होंने उल्लेखनीय बताया। सभा को कुल 11 वक्ताओं ने संबोधित किया। अध्यक्षता करते हुए प्रो. विमल थोराट ने वाल्मीकि जी के साथ अपनी सुदीर्घ वैचारिक निकटता को भावपूर्ण शब्दों में याद करते हुए कहा कि जाति व्यवस्था आज भी मौजूद है, अभी बहुत सारे सवाल सुलझे नहीं हैं, सामाजिक क्रांति चाहने वालों के लिए ओमप्रकाश एक जरूरी लेखक थे, उनका लेखन और उनके विचार आगे भी प्रासंगिक रहेंगे, उनसे आंदोलन को मजबूत बनाने का हौसला मिलता है। उन्होंने हर वर्ष वाल्मीकि जी के स्मृति दिवस पर स्मृति सम्मान देने की घोषणा भी की। 

इसके पहले बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि मिथकों की फिसलन भरी राह के प्रति वाल्मीकि जी की रचनात्मक सचेतनता बेहद महत्वपूर्ण है। ईश्वरवाद और आस्तिकता से उनका घोर विरोध था। वे उन्मादी राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के विरोधी थी। उन्होंने ओमप्रकाश जी की अप्रकाशित रचनाओं को एकत्र कर रचनावली प्रकाशित करने का प्रस्ताव दिया। ‘घुसपैठिए’ समेत वाल्मीकि की तीन कहानियों पर अपनी बात को केंद्रित करते हुए जेएनयू के शोध छात्र मार्तण्ड प्रगल्भ ने कहा कि मध्यवर्गीय दलित अधिकारी 'घुसपैठिए' के अंतर्द्वंद्व और मेडिकल के दलित छात्र की आत्महत्या के बीच इस कहानी को जिस तरह रचा गया है वह मध्यवर्गीय विरोध-वादी नैतिकता के खिलाफ लेखक के असंतोष की दास्तान बन जाती है। व्यक्ति और लेखक के विचार में अंतर भी हो सकता है और कई बार रचना का अर्थ लेखक की घोषित मंशा से ‘स्वतंत्र’ भी हो सकता है। मार्तण्ड के मुताबिक, वाल्मीकि की कहानियों को जातिगत उत्पीड़न के सिंगिल फ्रेम में रखकर देखने के बजाय हमें हिंदी की अपनी आलोचनात्मक दृष्टि का विकास करना चाहिए और ओमप्रकाश जी की उस कथात्मक अंतदृष्टि को पहचानना चाहिए जो मध्यवर्गीय दलित व्यक्तिवाद के खिलाफ निरंतर संघर्षरत रही है। प्रो. चमनलाल ने वाल्मीकि की कहानियों में अभिव्यक्त यथार्थ के स्वरूप की अर्थ गांभीर्य को रेखांकित करते हुए उन्हें सच्चा यथार्थवादी लेखक बताया।

प्रो. तुलसीराम ने कहा कि हिंदी की रचनाओं में दलित पात्रों के लुम्पेनाइजेशन के विरोध में वाल्मीकि ने जिस साहस से लगातार संघर्ष किया, वह स्मरणीय है। इस प्रसंग में उन्होंने प्रेमचंद की ‘कफन’ कहानी को याद किया। उन्होंने कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि मानते थे कि दलित साहित्य को साहित्यिक मूल्य के बजाय जीवन मूल्य की कसौटी पर देखना चाहिए। स्मृति सभा में डा. रामचंद्र ने कहा कि उन्होंने सिर्फ दलितों के लिए ही नहीं लिखा है, बल्कि पूरे समाज को बेहतर बनाने के लिए लिखा है। कवि-कथाकार अनीता भारती ने कहा कि उन्होंने समता और बंधुत्व के सपनों के साथ लिखा और अत्याचार व प्रताड़ना से लड़ने के लिए प्रेरित किया। 

चित्रकार सवि सावरकर ने कहा कि उन्हें सिर्फ अंबेडकर तक सीमित नहीं रखना चाहिए, उनकी परंपरा बुद्ध और अश्वघोष से जुड़ती है। कवि जयप्रकाश लीलवान, दिलीप कटारिया और प्रो. एसएन मालाकार ने भी सभा को संबोधित किया। सभा के अंत में एक मिनट का मौन रखा गया। 

ओमप्रकाश वाल्मीकि 










सुधीर सुमन की ओर से जारी

11/20/13

मुक्तिबोध के काव्य-संसार की यात्रा-3 :कॉ. रामजी राय

सोवियत संघ के पतन के बाद तो जैसे मार्क्सवाद-समाजवाद की मृत्यु का सोहर गाया जाने लगा। एकमात्र सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के रूप में पूंजीवाद के विजय के साथ इतिहास के अंत की घोषणा की जा चुकी थी। पूंजीवादी उत्पादन-अतिरेक के संकट की मार्क्स के भविष्यवाणी दफना देने का फतवा जारी कर दिया गया था। पूंजीवाद हल न किये जा सकने वाले अंतरविरोधों से ग्रस्त है और उसके नाश के बीज उसके अंदर ही हैं, ऐसा अब भी माननेवालों को पागल-सनकी करार दिया जा रहा था। लेकिन पिछले 20 सालों में इतिहास चक्र 180 डिग्री घूम गया है। पूंजीवाद भयावह संकट में है। और उससे नाभिनालबद्ध विचारक और अर्थशास्त्री, मार्क्सवाद के घोर-विरोधी भी अलग धुन बजाने लगे हैं। अचानक मार्क्सवाद को बड़ी गंभीरता से लिया जाने लगा है। लेकिन इसके साथ ही गलत और तोड़ी-मरोड़ी सूचनाओं, तथ्यों, आंकड़ों के अंबार और ग्लैमर के ताजा संसार के जरिये हमारे सामने में एक ऐसा नया चमचमाता अंधेरा रचा जा रहा है कि हमारी आंखें और दिल-दिमाग चौंधियाने लग रहे हैं। ऐसे में मुक्तिबोध के, अपने समय में रचे जा रहे अंधकार-शास्त्र के विरुद्ध ज्योतिःशास्त्र रचने के युद्ध को समझना बेहद जरूरी है ताकि हम उनके प्रयास को नये स्तर पर ले जा सकें। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद शुरू हुए शीत-युद्ध के दौर में क्षयग्रस्त पूंजीवाद ने अपने बचाव में तैयार किये जा रहे वैचारिकी-सैद्धांतिकी का अंधकार-शास्त्र रचना शुरू किया। साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में यह और कारगर तौर पर किया गया। फोरम फार कल्चरल फ्रीडम नाम से इसे बाकायदा संगठित अभियान का रूप दिया गया। उस अंधकार-शास्त्र का हमारे अपने देश भारत के सामंती जकड़नों से ग्रस्त रुग्ण पूंजीवाद ने लपक कर स्वागत किया - ‘‘साम्राज्यवादियों के/ पैसे की संस्कृति/ भारतीय आकृति में बंधकर/ दिल्ली को/ वाशिंगटन व लंदन का उपनगर/ बनाने पर तुली है!!/ भारतीय धनतंत्री/ जनतंत्री बुद्धिवादी/ स्वेच्छा से उसी का ही कुली है!!’’(जमाने का चेहरा)

अपने एक आलोचनात्मक निबंध में उन्होंने लिखा कि 'अपने देश के बौद्धिकों की स्थिति देखता हूं तो लगता है जैसे हमारा देश अब भी उपनिवेश है।’ साहित्य के क्षेत्र में अपने यहां भी संगठन बनाकर नये-नये जन-विरोध, रचना-विरोधी सिद्धांतों-विचारों को फैलाया गया। इस सब पर विस्तार में बात करने की यह जगह नहीं है और कि यह सब इतिहास आप जानते हैं। नयी कविता की अन्य बहुतेरी विशेषताओं-संभावनाओं-सीमाओं का विश्लेषण करते हुए मुक्तिबोध ने दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले (1) ‘नई कविता के कलेवर पर शीत-युद्ध की छाप है। और (2) कि नई कविता के क्षेत्र में निम्न मध्यवर्ग के रचनाकारों की भाव-दशाएं इन प्रभावों के बावजूद उनसे भिन्न प्रगतिशील दिशा में उन्मुख हैं, इसे अनदेखा नहीं करना चाहिये।' अपने समय में सामान्य जन-जीवन को, कवि-साहित्यकार जिसका अंग है, देखते हुए मुक्तिबोध ने लिखा - ‘‘आज की कविता पुराने काव्य-युगों (इसके साथ इसे आज की जीवन पुराने युगों भी पढ़ सकते हैं) से कहीं अधिक, बहुत अधिक, अपने परिवेश के साथ द्वंद्व-स्थिति में प्रस्तुत है। इसलिए उसके भीतर तनाव का वातावरण है। परिस्थिति की पेचीदगी से बाहर न निकल सकने की हालत में मन जिस प्रकार अंतर्मुख होकर निपीड़ित हो उठता है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आज की कविता में घिराव का वातावरण भी है।’’ अतएव,....यह आग्रह दुर्निवार हो उठता है कि कवि-हृदय द्वंद्वों का भी अध्ययन करें, अर्थात् वास्तविकता में बौद्धिक दृष्टि द्वारा भी अंतःप्रवेश करें, और ऐसी विश्व-दृष्टि का विकास करें जिससे व्यापक जीवन की-जगत की व्याख्या हो सके, तथा अंतर्जीवन के भीतर के आंदोलन, आरपार फैली हुई वास्तविकता के संदर्भ से व्याख्यात, विश्लेषित और मूल्यांकित हों।’’(निबंध वस्तु और रूप: एक )

यह निबंध 1961 में लिखा गया था लेकिन मुक्तिबोध के भीतर यह प्रवृत्ति बहुत पहले से काम कर रही थी - ‘‘दार्शनिक प्रवृत्ति - जीवन और जगत के द्वंद्व - जीवन के आंतरिक द्वंद्व - इन सबको सुलझाने की, और एक अनुभव-सिद्ध व्यवस्थित तत्व-प्रणाली अथवा जीवन-दर्शन आत्मसात् कर लेने की, दुर्दम प्यास मन में हमेंशा रहा करती। आगे चलकर मेरी काव्य की गति को निश्चित करनेवाला सबसे सशक्त कारण यही प्रवृत्ति रही।’’ इससे इतना तो स्पष्ट है कि मुक्तिबोध ने मार्क्सवाद को यूं ही, किसी फैसन के चलते नहीं अपनाया। उन्होंने अपने जीवनानुभवों, अपने संवेदनात्मक ज्ञान व ज्ञनानात्मक संवेदन से गुजरते हुए, अपनी जीवन दृष्टि व विश्वदृष्टि का विस्तार करते, उसकी रोशनी में जीवन-जगत की साभ्यतिक-समकालीन समस्याओं का विश्लेषण-संश्लेषण करते हुए उपलब्ध किया था। और हम-आप सबसे प्रश्न किया था - ‘‘कुहरिल गत युगों के अपरिभाषित/ सिंधु में डूबी/ परस्पर, जो कि मानव-पुण्य धारा है,/ उसी के क्षुब्ध काले बादलों को साथ लाई हूं,/ बशर्ते तय करो,/ किस ओर हो तुम, अब/ सुनहले उर्ध्व-आसन के/ निपीड़िक पक्ष में, अथवा/ कहीं उससे लुटी-टूटी/ अंधेरी निम्न-कक्षा में तुम्हारा मन,/ कहां हो तुम?’’ और खुद के और हम सबके लिये जीवन के समूचे कर्म की भूमिका तय की - ‘‘हमें था चाहिये कुछ वह/ कि जो ब्रह्मांड समझे त्रस्त जीवन को............/हमें था चाहिये कुछ वह/ कि जो गंभीर ज्योतिःशास्त्र रच डाले/ नया दिक्काल-थियोरम बन, प्रकट हो भव्य सामान्यीकरण/ मन का/ कि जो गहरी करे व्याख्या/ अनाख्या वास्तविकताओं,/ जगत की प्रक्रियाओं की/........कि पूरा सत्य/ जीवन के विविध उलझे प्रसंगों में/ सहज ही दौड़ता आये-/ स्मरण में आय/ मार्मिक चोट के गंभीर दोहे-सा/ कि भीतर से सहारा दे/ बना दे प्राण लोहे सा/’’(नक्षत्र खंड)

अंधकार-शास्त्र के खिलाफ ज्योतिःशास्त्र रचने का काम मुक्तिबोध ने अपने समूचे जीवन और रचना कर्म में कियां और इसे किया पूरी तरह एक तल्लीन-तठस्थता के साथ। इस प्रक्रिया में उन्होंने मार्क्सवाद को समृद्ध व अद्यतन करने का काम किया। उनके समूचे रचनाकर्म के भीतर से इस ज्योतिःशास्त्र के सूत्रों को इकठ्ठा करने और अद्यतन मार्क्सवाद को समझने और उपलब्ध करने का काम, जिसकी जरूरत हमें आज और ज्यादा है, तो छोड़िये हमारे प्रकांड आलोचकों ने मुक्तिबोध को मध्यवर्गीय, सिजोफ्रेनिक, भाववादी, फ्रायड और मार्क्स का घालमेल करनेवाला बताकर खारिज करने, या यह नही तो फिर उसे अस्तीत्ववादी मुहावरे में फिट कर अस्मिता की तलाश करनेवाले के रूप में पेश किया। यह काम अब भी शेष है। इसे कौन करेगा? यह प्रश्न हमारे-आपके सामने है।

11/17/13

ओमप्रकाश वाल्मीकि की स्मृति : जसम

श्री ओमप्रकाश वाल्मीकि को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि


प्रकाशनार्थ/ नयी दिल्ली : 17 नवंबर 2013

हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार, क्रांतिकारी चिन्तक और ‘जूठन’ जैसी विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं रहे. उनका इस तरह असमय चले जाना लोकतान्त्रिक मूल्यों और सामाजिक बदलाव के प्रति प्रतिबद्ध भारतीय साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है. उनका जन्म 30 जून 1950 को मुजफ्फरनगर जिला (उत्तर प्रदेश) के बरला में हुआ था. वे कुछ वर्षों से कैंसर से संघर्ष कर रहे थे. उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर हो गयी थी. उनके गुर्दे में स्टैंड पड़ी हुई थी जिसको छः महीने बाद निकाल देना होता है. चिकित्सकों का कहना था कि प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण अभी आपरेशन नहीं किया जा सकता है. दिल्ली में इलाज के बाद भी स्थिति ठीक न होने पर उनके परिजन उन्हें देहरादून के मैक्स हस्पताल ले आए। जहाँ आज दिनांक 17 नवम्बर 2013 को सुबह अस्पताल में ही उनका निधन हो गया. जूठन के अलावा सलाम, घुसपैठिये, अब और नहीं, सफाई देवता, दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र और दलित साहित्य : अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ, 'सदियों का संताप' और 'बस बहुत हो चुका' उनकी मानीखेज किताबें है. 

सामाजिक भेदभाव, उत्पीडन और आर्थिक विषमता के खिलाफ संघर्षरत साहित्यिक-सांस्कृतिक धाराओं और सामाजिक-राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों ने एक सच्चे साथी को खो दिया है. दलित जीवन का जो ह्रदयविदारक और बेचैन कर देने वाला यथार्थ उनके लेखन के जरिए हिंदी साहित्य में आया, उसके बगैर हिंदी ही नहीं, किसी भी भारतीय भाषा का साहित्य प्रगतिशील-जनवादी नहीं हो सकता. ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचना, आलोचना और चिंतन का न केवल हिंदी साहित्य, बल्कि तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए स्थाई महत्त्व है. उन्होंने भारतीय साहित्य को लोकतान्त्रिक, जनपक्षधर, यथार्थवादी और समाजोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. वे ब्राह्मणवाद, सामंतवाद, पूंजीवाद और लैंगिक विभेद के खिलाफ थे और मानव मुक्ति के लिए संघर्षरत थे.

वाल्मीकि जी ने दलित साहित्य की जरूरत, उसकी शक्ति और उसके अंतर्विरोधों को भी उजागर किया. वर्ण व्यवस्था, सामंतवाद और पूंजीवाद जिन भी तौर तरीकों से मनुष्य और मनुष्य के बीच भेदभाव और शोषण-उत्पीडन की प्रवृतियों को बरक़रार रखने की कोशिश करता है, उनका विरोध करते हुए कमजोरों, मजलूमों, दलित-वंचितों की एकता बनाने के प्रति वे हमेशा चिंतित रहे. उनकी आत्मकथा 'जूठन' में जहाँ स्कूली छात्र ओमप्रकाश जानवर के खाल की गठरी लेकर सिर से पांव तक गंदगी और कपड़ों पर खून के धब्बे लिए पहुंचता है तो मां रो पड़ती हैं. और बड़ी भाभी कहती हैं कि ‘‘इनसे ये न कराओ ...भूखे रह लेंगे ....इन्हें इस गंदगी में ना घसीटो !’’ अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं कि 'मैं उस गंदगी से बाहर निकल आया हूँ, लेकिन लाखों लोग आज भी उस घिनौनी जिंदगी को जी रहे हैं।' जूठन ही नहीं, बल्कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की तमाम रचनाएँ अमानवीय सामाजिक-आर्थिक माहौल में जीवन जी रहे लोगों की मुक्ति की फ़िक्र से जुडी हुई हैं और जिस दलित सौंदर्यशास्त्र की वे मांग करते हैं, उसका भी मकसद उसी से संबद्ध है. जन संस्कृति मंच दलित-वंचित तबकों की मुक्ति के उनके सपनों और संघर्ष के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए उन्हीं के शब्दों को याद करते हुए उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि देता है- 

‘मेरी पीढ़ी ने अपने सीने पर
खोद लिया है संघर्ष
जहां आंसुओं का सैलाब नहीं
विद्रोह की चिंगारी फूटेगी
जलती झोपड़ी से उठते धुंवे में
तनी मुट्ठियाँ
नया इतिहास रचेंगी।‘

[जन संस्कृति मंच की ओर 
सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी]

11/16/13

मुक्तिबोध के काव्य संसार की यात्रा-2 :कॉ. रामजी राय


‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ (त्याग के साथ उपभोग करो) के उपदेश से लेकर ट्रस्टीशिप तक के विचार हृदय परिवर्तन के सिद्धांत या समझ से जुड़े रहे हैं -कि धन से जुड़े मन को बदला जा सकता है। इस बाबत यह कहते हुए कि -‘‘कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूं/ वर्तमान समाज चल नहीं सकता/ पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता...’’ मुक्तिबोध उस गांधी को भी वैचारिक-राजनीतिक धरातल पर खारिज करते हैं, जिनके अन्य गुणों को वे मानते और महत्व देते हैं। वे शायद ऐसा इसलिये करते हैं कि आर्थिक-राजनीतिक-सांस्थानिक एक शब्द में ठोस भैतिक समस्याओं का हल नैतिक-भावनात्मक स्तर पर नहीं दिया जा सकता। इसलिये और भी कि उन्हें गांधी से ही वह बच्चा मिलता है, जिसे उन्हें ‘संभालना व सुरक्षित रखना’ है। इस ‘भार का गंभीर अनुभव’ मुक्तिबोध को है और शब्दों की उस गुरुता का भी, जो कोई और नहीं गांधी की वह मूर्ति ही कहती है - ‘‘...भाग जा, हट जा/ हम हैं गुजर गये जमाने के चेहरे/ आगे तू बढ़ जा।’’ कविता की इन्हीं पंक्तियों के आगे की पंक्तियों में जब वे कहते हैं कि - ‘‘स्वातंत्र्य व्यक्ति का वादी/ छल नहीं सकता मुक्ति के मन को/ जन को’’ तब ऐसा कहते हुए वे व्यक्ति स्वातंत्र्य का नारा उछालने वाले अपने उन समकालीनों को ही निशाने में नहीं ले रहे बल्कि उस पूंजीतंत्र मात्र को निशाना बनाते हैं जो व्यक्ति स्वातंत्र्य का झंडा लेकर आया लेकिन जिसकी स्वतंत्रता ‘इत्यादि जन’(मुक्तिबोध का शब्द) की परतंत्रता बन गई।

एक और स्तर पर मुक्तिबोध ने रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी से लेकर जयशंकर प्रसाद कि आलोचना की है वह है उन लोगों के द्वारा साभ्यतिक प्रश्नों-समस्याओं, नवीन भारतीय राज-समाज को अ-यंत्र युग, ग्राम-समाज, ग्राम-स्वराज्य(आज का पंचायती राज) आदि के आधारों और वर्ग-संघर्ष रहित वर्ग-सहयोग, वर्ग-समन्वय और शांति के रास्ते से बनाने के विचार की। 

- ‘‘सुकोमल काल्पनिक तल पर/ नहीं है द्वन्द्व का उत्तर/ तुम्हारी स्वप्न वीथी कर सकेगी क्या......।’’ मैं इस सबके विस्तार में यहां नहीं जाना चाहता सिर्फ एक सवाल कि तो क्या मुक्तिबोध ऐसा इसलिये कहते-करते हैं कि वे मार्क्सवादी हैं और मार्क्सवाद ऐसा ही मानता और कहता रहा है? या इसे उन्होंने अपने जीवनानुभवों, अपने संवेदनात्मक ज्ञान व ज्ञनानात्मक संवेदन से गुजरते हुए, अपनी जीवन दृष्टि व विश्वदृष्टि का विस्तार करते उसकी रोशनी में जीवन-जगत की साभ्यतिक-समकालीन समस्याओं का विश्लेषण-संश्लेषण करते हुए उपलब्ध किया था? 

11/15/13

सांप्रदायिक दंगे और अखबारों की भूमिका: एक पड़ताल

सांप्रदायिकता का खबर बन जाना खरनाक नहीं है, खतरनाक है खबरों का सांप्रदायिक बन जाना। यह रपट दंगों के दौरान अखबारों की सांप्रदायिक मन-मिजाज की पोल खोलती है।  


कांग्रेस और दूसरी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियां हिंदुत्व की डगर पर बढ़ रही हैं तो भी उनमें एक हल्की शर्म या झिझक अक्सर दिखाई दे जाती है। लेकिन, लगता है कि हमारे 'निष्पक्ष’ मीडिया में अब ऐसी कोई शर्म या झिझक बाकी नहीं है। मुजफ्फरनगर-शामली की सांप्रदायिक हिंसा की जमीन तैयार करने, फिर अल्पसंख्यकों के सुनियोजित संहार और बलात्कार की घटनाओं पर पर्दापोशी करने, भगवा ब्रिगेड की हर कारगुजारी को जेनुइन ठहराने, सांप्रदायिक नेताओं को हीरो बनाने, उत्पीडि़तों को अपराधी ठहराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांगों को उत्पीडऩ साबित करने में मीडिया ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। हिंदी के प्रमुख अखबारों के मुजफ्फरनगर-शामली संस्करण देखकर लगता है कि कॉरपोरेट के हाथों संचालित और निष्पक्ष व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले ये अखबार अगर ऐसी भूमिका अदा कर रहे हैं तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अब ऑर्गेनाइजर और पांचजन्य की जरूरत ही क्या है? 

दैनिक जागरण इस इलाके का सबसे ज्यादा प्रसारसंख्या वाला अखबार है और इसका आरएसएस/भाजपा संबंध जगजाहिर है। संघ के दफ्तरों में इस अखबार के बाकायदा पारायण की परंपरा रही है। 27 अगस्त को मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के कवाल गांव में हुई तीन युवकों की हत्या की खबर लिखने में इस अखबार ने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। गौरतलब है कि पास ही के गांव मलिकपुर माजरा निवासी सचिन और उसके फुफेरे भाई गौरव ने कवाल में शाहनवाज की हत्या कर दी थी और फिर भीड़ ने इन दोनों जाट युवकों की भी मौके पर ही हत्या कर दी थी। पिछले कई महीनों से मुजफ्फरनगर व शामली जिलों में मुसलमानों पर एक के बाद एक हमलों के जरिये बड़े दंगे की कोशिशों में जुटी आरएसएस-बीजेपी की टीम ने इस दुर्भाग्यपूर्ण वारदात को तपाक से लपक लिया था और इसे छेडख़ानी की वारदात से जोड़कर जाटों के स्वाभिमान का सवाल बना दिया था। दैनिक जागरण के 28 अगस्त के अंक में इस बारे में छापी गई एक खबर का भड़काऊ शीर्षक था- 'सीने पर चढ़कर काटी थी सांसों की डोर’। इस बेहद आपत्तिजनक भाषा में लिखी गई खबर के बीच में बाकायदा 'लाइव’ लिखी डिब्बी भी लगाई गई थी, मानो संवाददाता मौके पर बैठकर घटनाक्रम का आखोंदेखा वर्णन कर रहा हो। 

जाटों और बाकी हिंदू जातियों के गुस्से को भड़काने में इस खबर और दोनों जाट युवकों की हत्या के नाम पर फैलाई गई एक फर्जी वीडियो क्लिप की बड़ी भूमिका रही। जाट बहुल गांवों में योजनाबद्ध ढंग से अल्पसंख्यकों को घेरकर उनकी हत्याओं, महिलाओं के साथ बलात्कार, घरों में आगजनी की वारदातों और इन गांवों से करीब एक लाख मुसलमानों के भागकर कैंपों व सुरक्षित रिश्तेदारियों में पहुंचने के बाद भी अखबार का रवैया उत्पीडि़तों को ही प्रताडि़त करने और इस भयानक हिंसा को वाजिब ठहराने का रहा। कैंपों में पड़े लुटे-पिटे मुसलमानों का मजाक बनाने और उन्हें मुआवजे के लालच में वहां पड़े होने की बातें कमोबेश सभी अखबार छाप रहे हैं लेकिन दैनिक जागरण ने 23 सितंबर को एक खबर के शीर्षक में सारी सीमाएं पार कर दीं। शीर्षक था- 'शरणार्थी शिविर में मौज मना रहे हैं दो हजार मुफ्तखोर’। 

अखबारों का यह रवैया आकस्मिक नहीं था। लगता था कि आरएसएस ने गांवों में लंबी तैयारियों के साथ ही अखबारों को भी पहले ही पूरी तरह पटा लिया था। अव्वल तो रामजन्मभूमि के नाम पर चले आंदोलन में ही संघ मीडिया को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने में कामयाब रहा था। तब हिंदी पट्टी के शहरों-कस्बों के बहुत सारे पत्रकार बाकायदा रामजन्मभूमि आंदोलन समिति का हिस्सा थे और खबरों में ही नहीं बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों व राज्य की खुफिया एजेंसियों से संघ की योजनाओं को मदद दिलाने में भी भूमिका निभा रहे थे। बाद में, संघ शावकों के लिए सरकारी दफ्तरों की तरह ही अखबारी दफ्तरों में भी लुकाछिपी के बजाय खुलकर खेलने का दौर आया और वे मीडिया हाउसों के संपादक व महाप्रबंधक जैसे पदों पर छा गए। और अंतत: रिपोर्टिंग का रुख ऐसा बदला कि संघ और भाजपा नेताओं की हिंसक व राष्ट्रविरोधी कारगुजारियां लोगों और संघ से ताल्लुक न रखने वाले नए पत्रकारों को भी राष्ट्रवादी व सहज लगने लगीं। मुजफ्फरनगर-शामली की सांप्रदायिक हिंसा में यही हुआ। मोदी की गुजरात सरकार के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह को जेल से जमानत दिलाकर मिशन यूपी पर भेजा गया तो पूरे प्रदेश में सांप्रदायिक वारदातों की बाढ़-सी आ गई। मुजफ्फरनगर-शामली जिलों में पिछले कई महीनों से जगह-जगह मुसलमान युवकों की पिटाई, रेलों व बसों में उन पर हमलों, मस्जिदों, मदरसों में तोडफ़ोड़, जमातियों व देवबंद मदरसे के छात्रों के साथ दुव्र्यवहार की वारदातें लगातार अंजाम दी जा रही थीं और संघ व भाजपा के नेता-कार्यकर्ता ऐसी किसी भी घटना को दंगे में तब्दील करने के लिए खुलेआम कोशिश करते दिखाई दे रहे थे तो भी मीडिया ने कभी उनकी भूमिका को प्रश्नांकित करने की कोशिश नहीं की। उलटे जब भी हमलावरों पर कार्रवाई की नौबत आई तो अखबार भगवा ब्रिगेड की 'एकतरफा कार्रवाई’ के सुर में सुर मिलाते नजर आए। 

शामली के एसपी (अब पूर्व) अब्दुल हमीद के मुसलमान होने को निशाना बनाकर माहौल गरमाए रखने और मामूली बातों को लेकर शामली को दो बार आग में झोंक दिए जाने की भाजपा विधायकों हुकुम सिंह और सुरेश राणा की ओछी हरकतों को अखबारों ने पूरा-पूरा सहयोग दिया। ऐसे अखबारों से यह उम्मीद की ही नहीं जा सकती थी कि वे गांवों में त्रिशूल-तलवारें बांटे जाने और एक बड़ी हिंसा की पटकथा तैयार कर लिए जाने की पोल खोलते। 

आखिर, सभी अखबारों ने आंखें मूंदकर संघ के पहले से तैयार इस सिद्धांत पर मुहर लगाई कि दंगे की वजह कवाल कांड को लेकर एकतरफा कार्रवाई के विरोध में उपजा गुस्सा था। प्रदेश सरकार और उसके मंत्री खासकर आजम खां और पूर्व मंत्री अमीर आलम खान पर सरकारी मशीनरी के हाथ-पांव बांध देने और सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बनाने को दंगों का कारण बताया गया। बेशक, सपा सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में होनी ही चाहिए लेकिन अखबारों ने यह जानना-बताना जरूरी नहीं समझा कि कवाल कांड से पहले की तमाम वारदातें और कवाल कांड से लेकर सात सितंबर की महापंचायत के बाद व्यापक पैमाने पर शुरू हुई हिंसा के बीच संघ व भाजपा के नेता क्या कर रहे थे। क्या पंचायतों-महापंचायतों के मंच उनके हाथों में नहीं आ गए थे? क्या शांति की बात भी करने वाले किसी भी नेता को वे सरेआम बेइज्जत नहीं करा रहे थे? क्या जगह-जगह मुसलमानों पर हुए हमलों में उनके नेटवर्क की कोई भूमिका नहीं थी? क्या महापंचायत में पहुंच रहे युवक खुलेआम हथियार लहराते हुए और मुसलमानों के खिलाफ अश्लील-आक्रामक नारेबाजी नहीं कर रहे थे? क्या बीजेपी और संघ परिवार के नेताओं के संचालन में हुई इन पंचायतों में मुसलमानों को सबक सिखाने के आह्वान नहीं किए गए? अखबारों ने बीजेपी नेताओं या खापों-पंचायतों के मुखियाओं से नहीं पूछा कि जाटों के गांवों की गरीब आबादियों जो हर हाल में उनकी जी-हुजूरी में थे, के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक हिंसा, बलात्कार और आगजनी के लिए आजम खां कैसे जिम्मेदार हो गए। अगर उस चैनल के प्रायोजित और हास्यास्पद स्टिंग को सच मान लें कि पुलिस को कार्रवाई न करने के लिए कहा गया था तो गांवों के इतने 'इंसाफपसंद’ चौधरी क्या कर रहे थे? लेकिन अखबारों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी हिंसा की आड़ के तौर पर एकतरफा कार्रवाई के जुमले को रट लिया था।

धुर उत्तराखंड तक पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी जमाने में एकतरफा धाक रखने वाले अमर उजाला को मेरठ-मुजफ्फरनगर के खेतों की डोल तक पर बैठकर पढ़े जाने का घमंड था। अमर उजाला की मेरठ यूनिट और भारतीय किसान यूनियन के मरहूम नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के सितारे एक साथ और एक-दूसरे के सहारे बुलंदी की तरफ बढ़े थे। इस सांप्रदायिक हिंसा को अमर उजाला ने शायद इन गांवों में अपना खोया रुतबा दोबारा हासिल करने का मौका समझा हो या फिर यह संघ की नेटवर्किंग और इस इलाके में ताकतवर जाटों के दबाव का नतीजा हो कि उसने भी गांवों में हुई भयानक हिंसा की तथ्यपरक रिपोर्टिंग करने के बजाय इसे जेनुइन और स्वाभाविक प्रतिक्रिया साबित करने की कोशिशों को ही प्रमुखता दी। सात सितंबर को महापंचायत से लौटते लोगों के साथ जौली नहर के पास मुसलमानों से टकराव को किसी जमाने में सरयू नदी का पानी कारसेवकों के खून से लाल हो जाने जैसे मिथ की तरह पेश किया जा रहा था। अफवाहें फैला दी गईं कि कई सौ जाटों को मारकर नहर में फेंक दिया गया है। ऐसे में इस अखबार ने पहले पेज पर एक समाचार प्रमुखता के साथ छापा कि जौली नहर पर पंचायत से लौटते लोगों पर हमला नक्सली हमले जैसा था। लेकिन, यह नहीं बताया कि आखिर कुल कितने लोगों की मौत हुई और कितने लोग लापता हैं। किसी भी अखबार ने इस तथ्य पर प्रकाश डालने की जरूरत नहीं समझी कि इस इलाके में भी जो लोग मारे गए, उनमें दोनों ही संप्रदायों के लोग थे। लांक गांव की भयंकर हिंसा से किसी तरह जान बचाकर आए अल्पसंख्यक जिस प्रधान सुधीर कुमार उर्फ बिल्लू पर दंगाइयों के नेतृत्व करने का आरोप लगा रहे थे, अमर उजाला 12 सितंबर के अंक में उसे राहत कार्य तेज कर देने वाले मसीहा की तरह पेश कर रहा था। दंगों के शिकार गरीब अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनहीनता का आलम यह था कि 15 सितंबर को एक खबर का शीर्षक था- 'अस्पतालों में तीमारदारों ने हंगामा काटा’। इसी अखबार ने 19 सितंबर को पहले पेज पर 'पुलिस पर हमलों तक के मुकदमे नहीं’ शीर्षक से स्टोरी प्रकाशित की जिसका लब्बोलुआब यह था कि आजम खां के दबाव में पुलिस इतनी बेबस थी कि सिपाही को गोली लगने और हिंसक भीड़ से घिरे अफसरों के मुकदमे भी दर्ज नहीं हो सके। मतलब, मुसलमानों को कुछ नहीं कहा जा रहा है लेकिन, ऐसी किसी खबर के लिए कोई जगह नहीं थी कि कई गांवों में आगजनी, हत्याओं और बलात्कार के समय पुलिस चौधरियों के घर पर चाय पीती रही थी, उत्पीडि़तों के मुकदमे दर्ज करने के बजाय पुलिस उन्हें धमकाकर एफिडेविट ले रही थी और पुलिस के आला अफसरों के बयान और गतिविधियां इतनी संदेहास्पद थीं कि जांच की मांग करती थीं।

एक मुस्लिम बहुल गांव से पलायन कर कमालपुर गांव में शरण लेने वाले दलितों को बीजेपी ने लगातार कवच की तरह इस्तेमाल किया। मानो, सांप्रदायिक दंगों में हिंदुओं के शिकार होने के लिए संघ-बीजेपी के सांप्रदायिक अभियान जिम्मेदार न हों। सच्चाई तो यह है कि संघ-भाजपा को अपने हिमायती के तौर पर देख रहे जाटों को हिंसा के लिए उकसाने, उनके गांवों का तानाबाना झुलसा देने, उन्हें मुकदमों में फंसा देने और उन्हें आसान मोहरा बना लेने के लिए इन्हीं ताकतों की साजिशें जिम्मेदार थीं। कमालपुर में शरणार्थी दलितों को ईख के खेत में झुकाकर दौड़ाते हुए एक फोटो खींचा गया जिसका अमर उजाला में कैप्शन लगाया गया कि जंगलों में मारे-मारे घूमते दलित। थोड़ा-सा भी विवेक रखने वाला आदमी ऐसे फोटो की असलियत समझ सकता है। बाद में 19 सितंबर को ऐसा ही एक फोटो खेतों की तरफ भागते लोगों का छापा गया कि किस तरह जाटों के गांवों के लोग पुलिस के डर से खेतों में भागे फिर रहे हैं। सवाल उठता है जो पत्रकार किसी तरह जंगलों में जाकर ऐसी कवरेज कर रहे थे, वे कस्बों में शिविरों में पड़े लोगों का दर्द क्यों नहीं सुन पा रहे थे। सामूहिक बलात्कार की खबरों को क्यों दबाया जा रहा था जबकि सोशल साइट्स और फैक्ट फाइंडिंग कमेटियों के दस्तावेजों में पीडि़त युवतियों की दास्तान दर्ज हो रही थी? काफी दिनों बाद किसी तरह पुलिस ने बलात्कार के छह मुकदमे दर्ज किए तो इन शिकायतों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने वाली खबरें छापी गईं।

अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान आदि सभी अखबार एक ही लाइन पर चलते रहे। हिंदुस्तान के मेरठ इकाई के संपादक ने 15 सितंबर को इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के बहाने से मुख्य खबर का शीर्षक लगाया, 'पुलिस की एकतरफा कार्रवाई से हुई हिंसा’। 18 सितंबर को इसी अखबार ने मुखपृष्ठ की बॉटम स्टोरी छापी- 'हिंदुस्तान ने किया था खुलासा, क्यों भड़का दंगा’। इस खुलासे में वही रटे-रटाए जुमले 'एकतरफा कार्रवाई’ और 'नेताओं की सियासत’ उठाए गए थे। एकतरफा कार्रवाई मतलब मुसलमानों की तरफदारी और नेताओं की सियासत मतलब आजम खां? बीजेपी-संघ की भी कोई सियासत रही होगी या ये संगठन भजन-कीर्तन में जुटे थे? बाद में बीजेपी के दो विधायक सुरेश राणा और संगीत सोम गिरफ्तार हुए तो ये अखबार इन विधायकों के पम्फलेट में बदल गए। प्रदेश सरकार ने इन दोनों को हीरो बनने का पूरा मौका दिया। 20 सितंबर को सुरेश राणा ने गिरफ्तारी दी तो अमर उजाला ने किसी नेता के मंत्री, राज्यपाल आदि बनने पर छापे जाने वाले विस्तृत जीवनचरित के अंदाज में खबर छापी- 'आंदोलन से सुर्खियों में आए थे राणा’। इसमें बताया गया कि 1997-98 में जलालाबाद (शामली जिले का एक कस्बा) में प्रतिमा क्षतिग्रस्त करने के मामले से राणा सुर्खियों में आए थे। कायदे से खबर का शीर्षक होना चाहिए था- 'धार्मिक मुद्दों पर सांप्रदायिक खेल की उपज हैं राणा’। इसी अखबार ने उनकी पत्नी नीता सिंह का बयान छापा - 'मुझे गिरफ्तारी पर गर्व है’। सांप्रदायिक दंगों के आरोपी विधायक के समर्थन में पत्नी के फोटो और बयानों के बहाने भावुक माहौल बनाने का अखबारों का अभियान लगातार जारी है। करवा चौथ पर हिंदुस्तान ने राणा की पत्नी नीता सिंह का पीले बाने में फोटो छापा और किसी राजपूतानी वीरांगना के अंदाज वाला उनका बयान छापा कि उन्हें देश की सुरक्षा की सरहद पर जाने वाले सैनिक की पत्नी जैसा महसूस हो रहा है। इन दोनों में से एक विधायक को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया तो एक अखबार ने उसकी पत्नी का बयान छापा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भी 14 साल के लिए वनवास पर गए थे। संगीत सोम ने 21 सितंबर को गिरफ्तारी से पहले सभा की जिसकी खबरें और तस्वीरें अखबारों ने किसी महान रणबांकुरे की गाथा की तरह पेश की। इस बारे में 22 सितंबर के दैनिक जागरण के कुछ शीर्षक देखिए- 'जनसैलाब के बीच सोम गिरफ्तार’, 'खून की नदी पर नाव चलाना चाहती है सरका’’, 'कोई जेल ज्यादा दिन नहीं रोक सकती मुझे’। आलम यह है कि दोनों विधायकों की हीरो छवि बनाने के लिए इन बड़े अखबारों में प्रतिद्वंद्विता चल रही है। उनकी हर तारीख, हर पेशी अखबारों में उनकी वंदना में तब्दील हो जाती है। इन दोनों के आजम खां पर हमले और अपनी कारगुजारियों पर गर्व भरे वही बयान पांच-पांच, सात-सात कॉलम में दोहराने की रस्म इन अखबारों ने तय कर ली है। साथ में समर्थकों के बहाने भी कई-कई फोटो छापे जाते हैं। उनसे पूछे जाने वाले सवाल भी किसी पत्रकार के बजाय किसी संघ कार्यकर्ता के प्रायोजित सवालों जैसे होते हैं।

मुजफ्फरनगर-शामली पहुंच रहे इन अखबारों की इन दिनों की दैनिक सुर्खियों में हिंसा के आरोपियों को बचाने के लिए जाटों की लामबंदी भी जोरशोर से शामिल है। इतने बड़े पैमाने पर हिंसा, बलात्कार और अल्पसंख्यकों के पलायन का कोई दोषी है या बस यही सच्चाई है कि निर्दोषों को फंसाकर जाटों का उत्पीडऩ किया जा रहा है? अखबार इन चौधरियों और आंदोलकारी जाट महिलाओं से नहीं पूछते कि चलिए निर्दोषों को फंसा दिया गया है तो असली हत्यारे, बलात्कारी कौन हैं, आप बताइए? उलटे आलम यह है कि आंदोलन जाटों से ज्यादा इन अखबारों के कंधों पर है। हिंदुस्तान ने 18 सितंबर को पूरे पेज पर फैलाकर शीर्षक लगाया- 'दो-दो सरकारें आईं पर जाटों का दर्द किसी ने न जाना’। इस शीर्षक के नीचे खरड़, लिसाढ़, सिसौली, फुगाना, मुंडभर, लांक, डुंगर, बहावडी, काकडा, कुटबा, भाज्जु आदि जाट बहुल गांवों के चौधरियों के फोटो व बयान सजाए गए कि जाटों के साथ एकतरफा कार्रवाई की जा रही है। संघ-बीजेपी को अपनी इस हिंसक इंजीनियरिंग में गठवाला खाप के मुखिया हरकिशन की खुली मदद मिली है। लिसाढ़ गांव में बलात्कार की शिकार हुई युवतियां इस मुखिया के बेटे का नाम भी ले रही हैं। हरिकिशन पर मुकदमे कायम किए गए हैं तो अखबार उसकी उम्र और सामाजिक हैसियत का गुणगान कर रहे हैं। हिंदुस्तान ने 18 सितंबर को ही गब्बरनुमा शीर्षक दिया- 'सो जा...नहीं तो पुलिस आ जाएगी’। गांव-गांव की महिलाओं के 'आंदोलन’ की खबरें एकत्रित करने के बजाय अलग-अलग पन्नों पर फैलाई जा रही हैं। कई-कई फोटो छापे जा रहे हैं जिनमें महिलाओं के हाथों में तमंचे, लाठी, डंडे लहरा रहे होते हैं। तीन अक्टूबर के दैनिक जागरण में एक ऐसे ही फोटो के साथ शीर्षक छापा गया- 'महिलाओं व बच्चों ने थामे लाठी और तमंचे’। साथ में मोटे-मोटे अक्षरों में पूरा हुनर उडेल दिया गया- 'अपने सुहाग और बेटों की फर्जी नामजदगी को लेकर मुजफ्फरनगर और मेरठ की महिलाएं देहरी लांघ सड़कों पर उतर आई हैं। उनका आक्रोश चंडी का रूप धारण करता जा रहा है। मीठे बोल झरने वाली जुबान मुर्दाबाद रूपी आग उगल रही है। चुनरी के बोझ से झुक जाने वाले कंधे सरकार के नुमाइंदों के पुतले ढो रहे हैं। चूडिय़ों की खनखनाहट नारेबाजी के शोरोगुल में खो गई है। मेहंदी रचे हाथों में लाठी, डंडे और तमंचे तक लहरा रहे हैं।’ 

राहत शिविरों के 15-17 युवाओं के आइएसआइ के संपर्क में होने के राहुल गांधी के बयान पर नरेंद्र मोदी सवाल खड़ा कर रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी के नेता तो आए दिन ऐसे बयान दे रहे हैं। काली वर्दी के कमांडो जैसे लोगों के बार-बार गांवों में दिखाई देने के प्रचार को जिस तरह मीडिया की मदद से खड़ा किया गया है, उसके पीछे संघ का दिमाग ही लगता है। हिंदुस्तान ने राहुल का बयान आते ही सीना ठोकने में देरी नहीं लगाई कि वह तो पहले ही ऐसा कह रहा था। दैनिक जागरण ने 23 सितंबर को 'जाटलैंड पर जमी नागपुर की नजर’ शीर्षक से लिखा कि संघ ने पूरे रिसर्च के साथ गांव-गांव में सामाजिक व जाति संगठनों की मदद से अपने कार्यकर्ता उतार रखे हैं। उधर, बीजेपी नेताओं को आक्रामक बने रहने के लिए कहा गया है। बीजेपी के सतपाल मलिक जैसे नेता धमकी के अंदाज में बोल रहे हैं कि सुरक्षा सेना नहीं पड़ोसी दे सकते हैं। राह चलते लोगों की हत्याओं का सिलसिला जारी है जिसे अखबार 'साइलेंट वार’ करार दे रहा है। खौफ का आलम तारी है लेकिन मुख्यमंत्री के मंत्री चाचा शिवपाल सिंह यादव उत्पीडि़तों के शिविरों में बने रहने पर सवाल खड़े कर रहे हैं और मीडिया तो लगातार ही इन राहत शिविरों को लेकर आक्रामक है ही। 

सवाल यह उठता है कि दंगों की रिपोर्टिंग करने के लिए जरूरी मानकों तक का पालन नहीं कर पाए अखबारों का यही रवैया चलता रहा तो शांति और इंसाफ की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? तथ्यों की तलाश में यहां पहुंची कई टीमों ने अखबारों के इस रवैये पर चिंता भी जाहिर की है। सवाल है प्रेस परिषद शायद इस ओर कब ध्यान देगी और कोई ठोस कदम उठाएगी? अधिकांश मामलों में प्रेस परिषद के निर्देशों को ठेंगा दिखाने के आदी मीडिया घरानों को इस मामले में अदालत तक ले जाया जाए तो शायद ज्यादा बेहतर हो।

और तहलका ... 

हथियारों की खरीद में दलाली को लेकर किए गए स्टिंग के जरिए एनडीए सरकार को हिलाकर रख देने वाले तरुण तेजपाल का तहलका भी मोदी युग तक आते-आते फुस्स हो चला लगता है? इस समूह की हिंदी पत्रिका पाक्षिक तहलका ने 30 सितंबर 2013 को निकाले अपने अंक में मुजफ्फरनगर-शामली दंगों को लेकर जो रिपोर्टिंग की, वह तथ्यों के अन्वेषण के बजाय संघ-बीजेपी द्वारा पहले ही फैला दिए गए फॉर्मूले को पुख्ता करने की हास्यास्पद कोशिश ही साबित हुई। 'फूट डालो राज करो’ शीर्षक से प्रकाशित आवरण कथा के दूसरे पैरे में कवाल में 27 अगस्त को तीन युवकों शाहनवाज, सचिन और गौरव की हत्या का उल्लेख करते हुए लिखा गया, 'इससे पैदा हुई चिंगारी ने हफ्ता बीतते-बीतते प्रचंड सांप्रदायिक ज्वाला का रूप ले लिया।’ यहां हम उम्मीद करते हैं कि शायद आगे जाकर यह साफ होगा कि इतनी बड़ी हिंसा कवाल से उठी चिंगारी के देखते-देखते ज्वाला में बदल जाना नहीं था बल्कि पिछले कई महीनों से संघ-बीजेपी और उनके दूसरे संगठन अमित शाह के नेतृत्व में इसकी तैयारी में जुटे थे। लेकिन कुछ नेताओं और अफसरों के बयानों के जरिये यह तो समझाने की कोशिश की गई कि सूबे की सरकार और उसका मुख्यमंत्री निकम्मे हो गए थे लेकिन संघ-बीजेपी के लिए छठे पैरे में मासूमियत से दो दिलचस्प प्रश्नवाचक वाक्य लिखे गए- 'क्या लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने राजनीतिक रूप से सबसे अहम सूबे में हिंसा भड़काने की साजिश रची? या फिर उसने केवल मौके का फायदा उठाया?’ इस आवरण कथा के लिए जुटे तहलका के तीन-तीन रिपोर्टर (दिवाकर आनंद, वीरेन्द्र नाथ भट्ट और साथ में अशहर खान) इसका जवाब नहीं देते। काश कि वे पिछले कुछ महीनों के अखबारों के स्थानीय पन्ने ही पढ़ डालते जो जगह-जगह मुसलमानों पर हमलों, धर्मस्थलों में तोडफ़ोड़ और भाजपा नेताओं की मुहिमों से रंगे पड़े थे। लेकिन, उन्होंने इसके बजाय जाटों की भावना पर जोर देते हुए लिखा- 'बातें दोनों ही तरह की हो रही हैं, लेकिन कई लोग इस बात से हैरान हैं कि राज्य सरकार जाट समुदाय की भावनाएं समझने में नाकाम रही, वह भी तब जब भाजपा पांच सितंबर को ही जाटों की हत्याओं के विरोध में मुजफ्फरनगर बंद का सफल आयोजन करा चुकी थी।’

बहरहाल, तहलका की पूरी कथा जरूर इस भावना पर केंद्रित रही। यह जिक्र देखिए- 'शाहनवाज वही युवक है जिस पर लड़की का पीछा करने का आरोप था और जिसकी हत्या लड़की के भाइयों ने की थी। इसके बाद लड़की के भाइयों की भी हत्या हो गई थी।’ कवाल कांड में छेडख़ानी के सिद्धांत को लेकर सवाल उठते रहे हैं। शुरू में इसे साइकिल की टक्कर से उपजा विवाद बताया गया था, जैसी बातों पर गौर फरमाना या इसका जिक्र करना तहलका टीम जरूरी नहीं समझती। क्या इसलिए कि इससे 'बहु-बेटी बचाओ’ जिसमें संघ के कारकुनों ने हिंदू शब्द भी जोड़ दिया था, नारा सवालों में आ जाता और सांप्रदायिक हिंसा के स्वत:स्फूर्त और स्वाभिवक गुस्सा होने के फॉर्मुले को खतरा होता? पूरी कथा को चतुराई से उसी तरह लिखा गया है, जिस तरह की मुजफ्फरनगर-शामली के संघ कार्यकर्ता और स्थानीय अखबार बोलते रहे कि पहले मुसलमान ने ये किया, फिर सरकार ने तरफदारी की और फिर ये सब हो गया। 'राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा के मुजफ्फरनगर से मुस्लिम सांसद कादिर राणा ने 30 अगस्त को कथित रूप से एक भड़काऊ भाषण दिया और उसके बाद जिले के उच्च अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। बाद में पुलिस ने उन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया।’ वैसे तो यह एक साधारण तथ्य का उल्लेख लगता है लेकिन तथ्य की ही बात करें तो उस दिन मुजफ्फरनगर के खालापार में जुमे की नमाज के बाद हजारों की भीड़ जमा थी। जगह-जगह हमलों, जाटों की 31 अगस्त की पंचायत के ऐलान और बीजेपी नेताओं के तेवरों से पैदा अराजकता के माहौल में बुरी तरह डरे मुसलमानों को कादिर समेत कई मुस्लिम नेताओं ने संबोधित किया था। इसे बीजेपी और उसके इशारों पर नाच रहे जाट नेताओं ने यह कहकर मुद्दा बनाया कि प्रशासन ने धारा 144 का उल्लंघन व भड़काऊ भाषण होने दिए और खुद अफसरों ने वहां पहुंचकर ज्ञापन लिए तो 31 अगस्त की पंचायत को कैसे रोका जा सकता था। लेकिन, इससे पहले ही प्रशासन के साथ भाकियू नेता राकेश टिकैत व कई बीजेपी नेताओं ने वार्ता के बाद पंचायत को स्थगित करने का ऐलान किया था और फिर बीजेपी और उसके जाट नेता इससे मुकर चुके थे। इस सबका जिक्र करने के बजाय तहलका टीम मासूमियत से लिखती है-''1 अगस्त को क्षेत्र के जाटों ने मिलकर उन मुस्लिम लड़कों के खिलाफ तुरंत पुलिस कार्रवाई करने की मांग की थी जो दो जाट युवकों की हत्या के दोषी थे। जब कुछ नहीं हुआ तो उन्होंने सात सितंबर को एक विशाल बहु-बेटी बचाओ जाट महासभा का आयोजन किया।’’ बेचारे तहलका को पता ही नहीं चला कि 31 अगस्त को नगंला मंदौड में बड़ी पंचायत हुई थी जिसमें जगह-जगह से हथियार लहराते युवकों के जत्थे नारेबाजी करते पहुंचे थे और बीजेपी व संघ नेताओं ने मंच पर कब्जा कर रखा था जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिए थे? उसे यह भी पता नहीं चला कि शांति की बात कर सकने वाले गैर भाजपाई जाट नेताओं को मंच से बोलने ही नहीं दिया गया था और यह भी कि पुलिस की उपस्थिति में ही पंचायत में शामिल युवकों ने एक कार सवार दंपति की हत्या की कोशिश की थी और कार को फूंक दिया था? सात सितंबर की महापंचायत तक क्या-क्या हो चुका था, पांच सितंबर को बीजेपी के बंद के अलावा लिसाढ़ में गठवाला खाप के मुखिया हरिकिशन जो संघ के हाथों की कठपुतली बन चुके थे, भी पंचायत कर अगले घटनाक्रम पर मुहर लगा चुके थे, तहलका को पता नहीं चल सका? 

सात सितंबर की महापंचायत का जिक्र करते हुए तहलका ने फिर से शाहनवाज के 'लड़की छेडऩे’ की बात को दोहराया- ''उस दिन कवाल के पास इंटरमीडिएट कॉलेज के मैदान पर एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ इकट्ठाहुई। इसी स्कूल में मृतक गौरव की बहन पढ़ती है जिसे कथित तौर पर शाहनवाज छेड़ता था।’’ आगे देखिए, ''बताया जाता है कि शाम पांच बजे के करीब इस महापंचायत से लौट रहे लोगों की ट्रैक्टर-ट्रोलियों पर मुसलमानों ने हमला कर दिया। इस घटना के चश्मदीदों के मुताबिक हमलावरों ने गंग नहर के पास उन पर देसी तमंचे और धारदार हथियारों से हमला किया था।’’ यह नहीं बताया गया कि हथियारबंद युवकों के जत्थे रास्ते भर मुसलमानों को ललकारते-पीटते महापंचायत में पहुंच रहे थे। कई गांवों में टकराव हो चुका था और एक मुसलमान युवक को अगवा कर पंचायतस्थल पर ही उसकी हत्या कर दी गई थी।

लेकिन तहलका की कल्पनाशक्ति और 'गॉशिप जर्नलिज़्म’ के नमूने अभी बाकी हैं। गांवों में हुए कत्लेआम के बारे में यह पत्रिका लिखती है- ''हालात ऐसे हो गए कि हजारों की संख्या में मुसलमानों और जाटों को अपना घर छोड़कर पलायन करना पड़ा।’’ हजारों जाटों ने किन-किन गांवों से पलायन किया, उनके राहत शिविर कहां हैं, यह या तो खुदा जाने या यह पत्रिका। 

इस कथा के अलावा एक स्टोरी 'आपराधिक गड़बड़ी के बारह दिन!’ भी कम दिलचस्प नहीं है। इसमें भी दंगों की जो वजहें गिनाई गईं, उनमें संघ-बीजेपी बरी ही रहे और महीनों से मुसलमानों के खिलाफ चल रही सिलसिलेवार वारदातों का जिक्र तक नहीं आया। महापंचायत से लौट रहे जाटों पर हमलों का जिक्र करते हुए जो लिखा गया, गौरतलब है- ''अगले दिन डेढ़-दो लाख लोगों का जत्था हमले से बच-बचाकर अपने गांवों में पहुंचा तो हालात काबू में रहने की हर संभावना खत्म हो गई।’’ पहली स्टोरी में पत्रिका ने लिखा है कि महापंचायत में ''एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई।’’ लेकिन अगली ही स्टोरी में मुसलमानों के हमले से किसी तरह बच-बचाकर अपने गांवों में पहुंचने वाला जत्था ही डेढ़-दो लाख लोगों का हो गया। तो क्या महापंचायत में पांच-दस लाख लोग थे या सारे के सारे लोग ही जत्था बनाकर जंगलों में मारे-मारे फिरे थे और सात सितंबर को अपने घर नहीं पहुंच पाए थे? फेसबुक पर अफवाहें फैला रहे संघी भी पांच-छह सौ जाटों के गायब हो जाने की बात कर रहे थे। डेढ़-दो लाख जाटों का जत्था एक रात इधर-उधर मारे फिरकर अगले दिन गांवों में पहुंच पाने की अफवाह तो संघी भी जानते हैं, किसी के गले नहीं उतरेगी पर तहलका के अतुल चौरसिया को यह लिखने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

समयान्तर से साभार 

11/14/13

मुक्तिबोध के काव्य-संसार की यात्रा -कॉ. रामजी राय

[पहली किस्त]

मुक्तिबोध खुद को ‘क्षुब्ध अंधकार की सियाह आग’ कहते हैं। वे एक ही साथ मुश्किल कवि हैं और सहज भी, आत्मग्रस्त-से तनाव भरे और ताकतवर भी? मुक्तिबोध की मुश्किल और ताकत इस बात में निहित है कि वे अपने समय के रोग लक्षणों की शिनाख्त करते हैं, आजादी मिलने के बाद स्थापित हो रहे अपने देश में उस उदार जनतंत्र के रोग लक्षणों की भी। और पाते हैं कि यह जो उदार जनतंत्र है ‘वह अपनी सामंती परंपरा से विछिन्न होकर भी, सामंती-शासकवर्गीय प्रवृत्तियो की तानाशाहियत को अपने खून में लिये हुए है।’ अर्थात् हम जिस उदार जनतंत्र के वासी हैं, उसकी नसों में सामंती खून बह रहा है। उसकी जनतांत्रिक जड़ें बेहद कमजोर हैं। वह एक अलिखित तानाशाही पर आधारित है। जिस क्षण भी कोई इसे चुनौती देने के गंभीर राजनीतिक उपक्रम में संलग्न होगा उसे उसका जवाब तानाशाही दमन से दिया जायेगा।

आज इस उदार जनतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब है: वर्चस्वशाली मौजूदा उदार जनतंत्र को, ‘‘उत्तर-विचारधारात्मक’’ सर्वसहमति को सिर झुका कर स्वीकार कर लेना। जबकि अभिव्यक्ति की वास्तविक आजादी का मतलब है: वर्चस्वशाली सर्वसहमति को सवालों के घेरे में खड़ा करना। इसे चुनौती देने के गंभीर राजनीतिक उपक्रम में संलग्न होना। ‘‘वर्तमान समाज चल नहीं सकता/ पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता।’’ इसलिये ‘‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/ उठाने ही होंगे/ तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’’ अन्यथा इस अभिव्यक्ति की आजादी का कोई मतलब नहीं है।

क्रमशः मुक्तिबोध आजाद भारत की सत्ता-समाज संरचना के प्रतिनिधि चरित्र-लक्षणों की गहन जांच करते, पहचानते और उसके बुनियादी अंतरविरोधों व जिस भुतहे वास्तव के रूप में अपने को वह अभिव्यक्त कर रहा था, उसका विश्लेषण-संश्लेषण-चित्रण करते हुए, उसके खिलाफ ‘‘हर संभव तरीके से’’ युद्ध की घोषण तक पहुंचते हैं, उन स्थितियों के खिलाफ जिसमें मनुष्य गुलाम, लांक्षित, रुद्ध और तिरष्कृत, घृणित जीव-सा बना दिया गया है।

मुक्तिबोध के काव्य में समय लहरीला है, उड़ता हुआ। मुक्तिबोध जैसे उस ‘‘ उस त्वरा-लहर का पीछा कर रहे होते हैं।’’ यहां कविता काल-यात्री है। उसका कोई कर्ता नहीं, पिता नहीं, वह किसी की बेटी नहीं। वह परमस्वाधीन है, विश्वशास्त्री है। आगमिष्यत की गहन-गंभीर छाया लिए वह जनचरित्री है।

वहां रोजमर्रे के जीवन की घटनाएं हैं, भुतहे वस्तव की तस्वीरें हैं, उससे कहीं अधिक विस्मयकारी, रोमांचक और रहस्यमय और भुतही जितना की अब तक हम देखते-समझते-जानते रहे हैं। वहां आत्मालोचना के रूप में हमारी अपनी कमजोरियों-गलतियों की गहरी व तीखी लेकिन आत्मीय भर्त्सना-आलोचना है, जिससे हम बचकर निकल जाने में ही अपनी भलाई देखते हैं।

वहां देश-देशांतर के अनुभवों से भरी देश-देशांतर को पार करती, हम तक आती ताजी-ताजी हजार-हजार हवाएं हैं, हमसे हमारी कमियों-खूबियों पर बतियाती बहस करती, भविष्य के नक्शे सुझाती-बनाती हुई।

वहां गतिमय अनंत संसार है, उसे जानने और उसे संभव संपूर्णता में अभिव्यक्ति करने के नये-नये गणितिक, वैज्ञानिक प्रयोग से लेकर प्राविधिक-तकनीकी अनुसंधान हैं, उनकी बाधाएं हैं, भूलें और मुश्किलें हैं, सफलताएं और संभावनाएं हैं- (कलाकार से वैज्ञानिक फिर वैज्ञानिक से कलाकार/ तुम बनो यहां पर बार-बार)। और चूंकि यह सब परिवर्तनकारी हैं इसलिए वहां दमनकारी सत्ताएं और उनके षडयंत्र भी अपने पूरे वजूद में हैं- ‘‘मेरा क्या था दोष?/ यही कि तुम्हारे मस्तक की बिजलियां/ अरे, सूरज गुल होने की प्रक्रिया/ बता दी मैंने/ सूत्रों द्वारा’’ 

कुल मिला कर वहां एक परिवर्तनकारी यथार्थवादी नई समझ और नया संघर्ष है, जिसमें आगामी कई हविष्यों के आसाधारण संकेत हैं - जिससे होता पट परिवर्तन/ यवनिका पतन/ मन में जग में।
एक वाक्य में वहां हमारे समय के भुतहे, जटिल यथार्थ की जटिल अभिव्यक्ति है और जटिल (कॉम्प्लेक्स) का अर्थ दुरूह (कॉम्प्लीकेटेड) नहीं होता। मुक्तिबोध की कविताएं हमारी मित्र कविताएं हैं। मेरे लिए तो गुरु कविताएं भी।

बकौल मुक्तिबोध -‘‘आज की जिंदगी में वही दृश्य दिखाई देते हैं जो महाभारत काल में थे।.....दोनों पक्षों (यानी आधुनिक कौरव और पांडव) में आंतरिक उद्देश्यों और सवभावों के भेद के साथ ही साथ एक बात सामान्य है, और वह यह है कि समाज की ह्रासकालीन स्थिति और व्यक्तित्व की ह्रास-ग्रस्त मति के दृश्य दोनों की परिस्थिति बन गए हैं।........ अभी भी बहुत से महापुरुष कौरवों की चाकरी करते हुए पांडवों से प्रेम करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। किंतु द्रोण, भीष्म और कर्ण-जैसे प्रचंड व्यक्तित्वों की ऐतिहासिक पराजय जैसी महाभारत काल में हुई थी, वैसी आज भी होने वाली है।

अंतर इतना ही है कि इस संघर्ष में (जो आगे चलकर आज नहीं तो पच्चीस साल बाद तुमुल युद्ध का रूप लेगा) कौन किस स्वभाव-धर्म और समाज-धर्म के आदर्शों से प्रेरित होकर ऐतिहासिक विकास के क्षेत्र में अपना-अपना रोल अदा करेगा, इसकी प्रारंभिक दृश्यावली अभी से तैयार है।’’ (प्रगतिशीलता और मानव सत्य नामक निबंध पेज 78, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 5)। यह तैयार दृश्यावली देखिए:

भई वाह !! कहां से ये फोटो उतरे / उन महत्-जनों के मुझ पर छा जाते चेहरे / पीले, भूरे, चौकोर और श्यामल / गठियल दुहरे!! / वे स्निग्ध, सुपोषित, संस्कृत मुख / अपने झूठे प्रतिबिंम्ब गिराते हैं।/ लाखों आंखों से उन्हें देखता रहता हूं।/उनके स्वप्नों में घुस कर मुझे स्वप्न आते। हैं बंधे खड़े,/ ये महत्, बृहत,/ उनके मुंह से प्रज्ज्वलित गैस-सी सांस-आग/ वे इस जमीन में गड़े खड़े/मशहूर करिश्मों वाले गहरे स्याह तिलस्मी तेज बैल/ तगड़े-तगड़े/ अपने-अपने खूंटों से सारे बंधे खड़े/ यह खूंटा स्वर्ण-धातु का है/रत्नाभ दीप्ति का है/ आत्मैक ज्योति का है/स्वार्थैक प्रीति का है।.......वे बड़े-बड़े पर्वत अंधियारे कुंए बन गए/ जो कल थे कपिला गाय आज तेंदुए बन गए।/ हाय हाय, यह श्याम कथानक है/ आदमी बदल जाने की यह प्रक्रिया भयानक है।/..............नैतिक शब्दावलि?/ मंदिर-अंतराल में भी श्वानों का सम्मेलन/ तो आत्मा के संगम का प्रश्न नहीं उठता/ यह है यथार्थ की चित्रावलि।....... वह दुष्ट ब्रह्म कर रहा जबरदस्ती वसूल/ हमसे तुमसे/यह मांस-किराया/कष्ट-रक्त-भाड़ा/ धरती पर रहने का/......वह उषःकाल का जगन्मनोहर/ हिरन मार आया/ पर ठीक सामने/ दुबला श्यामल जन-समाज-सम्मर्द देखकर/ एक सौ दस डिग्री/ उसको बुखार आया/ उसकी सारी उंगलियां खून से रंगी/कपड़ों पर लाल-लाल धब्बे/ उसके बचाव के लिए मुसकरा/ कलाकार आया। चुप रहो मुझे सब कहने दो/ फिर नहीं मिलेगा वक्त/जमाना और-और नाजुक होता है/ और-और वह सख्त।/.............उसके दासों के अनुदासों के उपदासों ने ही/अपने दासों को उपदासों को अनुदासों को भी/ देश-देश में इस स्वदेश में, आसमान में भी/मानव मस्तक की राहों में छांहों के जरिए/मनानुशासन, जीवन-शोषण, समय-निरोधन के/सब कार्यों में लगा दिया है सभी अनुचरों को।/ .... बेचैन वेदना को/ श्रृण-एक राशि के वर्गमूल में डलवा-गलवा कर/ उनको शून्यों से शून्यों ही में विभाजिता करवा/ चलवा डाला है स्याह स्टीमरोलर/ इस जीवन पर/ वह कौन?/ अरे वह लाभ-लोभ की अर्थवादिनी सत्ता का/ विकराल राष्ट्रपति है!!/ जिसके बंगले की छाया में तुम बैठो हो।/ हां, यहां, यहां!! (चुप रहो मुझे सब कहने दो, मुक्तिबोध रचनावली, खंड 2, पृष्ठ 389)

जब समस्याएं, स्थितियां महाभारत जैसी हों तो उसका समाधान भी महाभारत से कम क्यों कर होनेवाला। फिर तो- ‘‘वह कल होने वाली घटनाओं की कविता जी में उमगी।’’

उसके बाद नक्सलबाड़ी का विद्रोह, 74 का आंदोलन और आपात्काल तो जैसे सामाजिक-प्रयोगशाला में मुक्तिबोध की चिंताओं, क्रांति-स्वप्न और खोजे गये सत्ता के मस्तिष्क की बिजली और सूरज गुल होने के सूत्रों के सत्यापन हों। आज जगह-जगह कश्मीर, मणिपुर, छत्तीसगढ़-झारखंड में एएफएसपीए, ऑपरेशन ग्रीनहंट और देश भर में भी काले कानूनों का आपात्काल-सरीखा जाल क्या जनांदोलनों के दमन निमित्त लगाये जा रहे या एक दिन पूरे देश में ही मार्शल लॉ लगा दिये जाने के खंड-चित्र जैसे नहीं हैं? 










क्रमशः

10/7/13

कुबेर दत्त स्मृति आयोजन की रपट

जनप्रतिरोध की सांस्कृतिक विरासत से 
 रूबरू हुए लोग कुबेर दत्त स्मृति आयोजन में
 
 


‘‘हमारा इतिहास आधा देवताओं और आधा राजा रानियों ने घेर रखा है, हमारी पंरपरा है कि हम चित्रण को देखने के आदी रहे हैं। धर्म ने अशिक्षित जनता तक पहुंचने के लिए चित्रकला का खूब सहारा लिया है। अगर धर्म चित्रकला के जरिए जनता तक पहुंच सकता है तो राजनीति भी इसके जरिए उस तक पहुंच सकती है, यह भारतीय चित्रकारों ने दिखाया है।’’- चित्रकार अशोक भौमिक ने 4 अक्टूबर को गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित स्मृति आयोजन में दूसरा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए यह कहा। ‘चित्रकला में प्रतिरोध’ विषय की शुरुआत उन्होंने विश्वप्रसिद्ध चित्रकारों गोया और पाब्लो पिकासो के चित्रों में मौजूद जनता के दमन और उसके प्रतिरोध के यथार्थ का जिक्र करते हुए किया और तेभागा, तेलंगाना, बंगाल का अकाल, नाविक विद्रोह, रेल हड़ताल, जनसंहार आदि से संबंधित चित्त प्रसाद, सोमनाथ होड़, देवव्रत मुखोपाध्याय, जैनुल आबदीन, कमरूल हसन सरीखे भारतीय चित्रकारों के चित्रों के जरिए इस कला की प्रतिरोधी पंरपरा से अवगत कराया। चित्रों के बारे में बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि निराशा या हार जाना एक ऐसा संदेश है जो आने वाली लड़ाई के लिए हमें सचेत करता है। जनता किन हथियारों से लड़ेगी यह उतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना कि आंदोलन करने की जरूरत महत्वपूर्ण होती है। प्रतिरोध के चित्र भी उस जरूरत के ही परिणाम हैं। इस मौके पर सांस्कृतिक संकुल (सांस), जसम की ओर से प्रकाशित कुबेर दत्त की कुछ अप्रकाशित और कुछ असंकलित कविताओं के संग्रह ‘इन्हीं शब्दों में’ का लोकार्पण आनंद प्रकाश, मदन कश्यप और कर्मेंदु शिशिर ने किया। पूर्वा धनश्री ने इस संग्रह से ‘स्त्री की जगह’ और ‘आंखों में रहना’, श्याम सुशील ने ‘शब्द’ और ‘मेरे हिस्से का पटना’ तथा सुधीर सुमन ने ‘जड़ों में’ शीर्षक कविताओं का पाठ किया।

लोकार्पित संग्रह पर बोलते हुए आनंद प्रकाश ने कहा कि इस संग्रह की कविताओं में उदासी और अवसाद बहुत है, जो कुबेर दत्त के व्यक्तित्व से अलग है। लेकिन अपने युग की निराशा को भी सशक्त वाणी देना किसी कवि का कर्तव्य होता है और यह काम कुबेर दत्त ने किया है। इसमें भाषा पर बहुत टिप्पणियां हैं, जिसको पढ़ते हुए लगता है कि उनके सामने बड़ा सवाल यह है कि भाषा का सही विकास कैसे किया जाए। आज की कविता में जो बड़बोलापन है वह कुबेर की कविताओं में नहीं है।

मदन कश्यप ने कहा कि कुबेर दत्त प्रचलित काव्य आस्वाद को बदलने की कोशिश करने वाले कवि हैं। जो समय की रूढि़यां हैं उनको तोड़े बगैर और उससे बाहर आए बगैर उनकी कविता को ठीक से समझा नहीं जा सकता। किसी भी चीज, घटना और परिस्थितियों पर बेहतरीन कविता लिखने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। उनके पास व्यापक जीवन अनुभव था। मीडिया के इस पतनशील दौर में भी प्रतिबद्धता को बचाए रखने की जिद उनमें थी और उस जिद को उनकी कविताओं में भी देखा जा सकता है। ये कविताएं पंरपरागत और मूल्यहीन जीवन के खिलाफ नए और प्रतिबद्ध जीवन की आकांक्षा के साथ रची गई हैं। भाषा की जड़ों में लौटने का मतलब ही है उसे अधिक से अधिक मूर्त, संवादधर्मी और संप्रेषणीय बनाना।

दूरदर्शन से संबद्ध रहे महेंद्र महर्षि ने कहा कि कुबेर दत्त चित्रों के खिलाड़ी थे। उनके चित्रों में हर आंख खुली हुई है। कुबेर दत्त के साथ गुजारे गए जीवन के 35 वर्षों को याद करते हुए दूरदर्शन अर्काइव की पूर्व निदेशक और सुप्रसिद्ध नृत्य निर्देशक कमलिनी दत्त ने कहा कि कुबेर दत्त समग्र रूप से एक ब्राडकास्टर थे। विषय चयन, स्क्रिप्ट लेखन, वायस ओवर और संगीत के चयन, हर चीज पर उनकी नजर रहती थी। उनकी कविता की भाषा और गद्य की भाषा अलग है और उनके स्क्रिप्ट की भाषा भी अलग है। उन्‍होंने दृश्य माध्यम की भाषा खुद विकसित की थी। उनके सारे वायस ओवर अद्भुत है। आज के इंटरव्यूअर जिस तरह एग्रेसिव होते हैं और खुद ही ज्यादा बोलते रहते हैं, ऐसा कुबेर नहीं करते थे। जिससे बात हो रही है, उससे वे बेहद सहज अंदाज में बात करते थे। कौशल्या रहबर जी से लिया गया उनका इंटरव्यू इसका बेहतरीन उदाहरण है।

आयोजन के आखिर में हंसराज रहबर की पत्नी कौशल्या रहबर जी से कुबेर दत्त की बातचीत का वीडियो दिखाया गया। भारत में इंकलाब की कोशिशों से आजीवन संबंद्ध और उसके प्रति वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध रहे रहबर जी के साथ कुबेर दत्त के बहुत आत्मीय और वैचारिक संबंध थे। भगतसिंह विचार मंच, जिसके रहबर अध्यक्ष थे, कुबेर दत्त उसके महासचिव थे। कौशल्या रहबर जी से बातचीत में रहबर जी के जीवन के कई अनछुए पहलू सामने आए। गांधी, नेहरू, गालिब जैसे बड़े बड़ों को बेनकाब करने वाले रहबर जी को खुद बेनकाब देखना अपने आप में विलक्षण अनुभव था। हंसराज रहबर की जन्मशती वर्ष में यह उनके प्रति श्रद्धांजलि भी थी। खास बात यह थी कि खुद कौशल्या रहबर और उनकी पुत्रवधुएं भी पूरे आयोजन में मौजूद थीं। वीडियो के अंत में रहबर जी द्वारा कुछ गजलों का पाठ भी देखने-सुनने को मिला।

सभागार में कुबेर दत्त के नए संग्रह की कविताओं और उनके चित्रों पर आधारित पोस्टर भी लगाए गए थे। संचालन सुधीर सुमन ने किया। इस मौके पर वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी, लेखक प्रेमपाल शर्मा, दिनेश मिश्र, कवि इब्बार रब्बी, धनंजय सिंह, नीलाभ, रंजीत वर्मा, सोमदत्त शर्मा, अच्युतानंद मिश्र, रोहित प्रकाश, इरेंद्र, अवधेश, क्रांतिबोध, कहानीकार महेश दर्पण, योगेंद्र आहूजा, संपादक हरिनारायण, प्रेम भारद्वाज, पत्रकार स्वतंत्र मिश्र, रंगकर्मी सुनील सरीन, रोहित कुमार, चित्रकार मुकेश बिजौले, महावीर वर्मा, हिम्मत सिंह, हिंदी के शोधार्थी रामनरेश राम, बृजेश, रूबीना सैफी, फिल्मकार संजय जोशी, सौरभ वर्मा, भूमिका, रविदत्त शर्मा, संजय वत्स, रामनिवास, रोहित कौशिक, संतोष प्रसाद, मित्ररंजन, वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता और मोहन सिंह समेत कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और साहित्य-कला प्रेमी जन मौजूद थे। - सुधीर सुमन

5/14/13

मुक्तिबोध नए भारत की खोज के कवि हैं - रामजी राय

कविता समूह (जन संस्‍कृति मंच) द्वारा
लोकतंत्र के ‘अंधेरे में’ आधी सदी 
पर विचार गोष्ठी की रपट


नई दिल्ली: 13 मई 2013

मुक्तिबोध की मशहूर कविता के प्रकाशन के पचास वर्ष के मौके पर जन संस्कृति मंच के कविता समूह की ओर से गांधी शांति प्रतिष्ठान में लोकतंत्र के ‘अंधेरे में’ आधी सदी विषयक विचार-गोष्ठी आयोजित की गई। जसम के पिछले सम्मेलन में कविता, कहानी, जनभाषा, लोककला आदि के क्षेत्र में सृजनात्मकता को आवेग देने के लिए विशेष समूह बनाए गए थे। इस आयोजन से कविता समूह की गतिविधि का सिलसिला शुरू हुआ। 
आयोजन की शुरुआत रंगकर्मी राजेश चंद्र द्वारा ‘अंधेरे में’ के पाठ से हुई। 

इस मौके पर चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा ‘अंधेरे में’ के अंशों पर बनाए गए पोस्टर को आलोचक अर्चना वर्मा ने तथा मंटो पर केंद्रित ‘समकालीन चुनौती’ के विशेषांक को लेखक प्रेमपाल शर्मा ने लोकार्पित किया। 
विचारगोष्ठी की शुरुआत करते हुए प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि 57 से 63 तक मुक्तिबोध की यह कविता संभावना की कविता थी, पर 2013 में वास्तविकता की कविता है। यह एक 'समग्र' कविता है। मुक्तिबोध की कविताओं में जिस ‘वह’ की तलाश है, दरअसल वह जिंदगी के संघर्षों से अर्जित क्रांति - चेतना है। लेनिन के मुताबिक़ कई बार 'फैंटेसी' असहनीय यथार्थ के खिलाफ एक बगावत भी होती है। इस कविता में फैंटेसी पूंजीवादी सभ्यता की समीक्षा करती है। यह मध्यवर्ग के आत्मालोचन की कविता भी है। अंधेरे से लड़ने के लिए अंधेरे को समझना जरूरी होता है। यह कविता अंधेरे को समझने और समझाने वाली कविता है। 


आलोचक अर्चना वर्मा ने कहा कि मौजूदा प्रचलित विमर्शों के आधार पर इस कविता को पढ़ा जाए, तो हादसों की बड़ी आशंकाएं हैं। जब यह कविता लिखी गई थी, उससे भी ज्यादा यह आज के समय की जटिलताओं और तकलीफों को प्रतिबिंबित करने वाली कविता है। ऊपर से दिखने वाली फार्मूलेबद्ध सच्चाइयों के सामने सर झुकाने वाली 'आधुनिक 'चेतना के बरक्स मुक्तिबोध तिलस्म और रहस्य के जरिये सतह के नीचे गाड़ दी गयी सच्चाइयों का उत्खनन करते हैं। यह यह एक आधुनिक कवि की अद्वितीय उपलब्धि है।

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सामाजिक बेचैनी की लहरों ने हमें दिल्ली में ला पटका था, हम कैरियर बनाने नहीं आए थे। उस दौर में हमारे लिए ‘अंधेरे में’ कविता बहुत प्रासंगिक हो उठी थी। इस कविता ने हमारी पीढ़ी की संवेदना को बदला और अकविता की खोह में जाने से रोका। हमारे लोकतंत्र का अंधेरा एक जगह कहीं घनीभूत दिखाई पड़ता है तो इस कविता में दिखाई पड़ता है। पिछले पांच दशक की कविता का भी जैसे केंद्रीय रूपक है ‘अंधेरे में’। यह निजी संताप की नहीं, बल्कि सामूहिक यातना और कष्टों की कविता है।
चित्रकार अशोक भौमिक ने मुक्तिबोध की कविता के चित्रात्मक और बिंबात्मक पहलू पर बोलते हुए कहा कि जिस तरह गुएर्निका को समझने के लिए चित्रकला की परंपरागत कसौटियां अक्षम थीं, उसी तरह का मामला ‘अंधेरे में’ कविता के साथ है। उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी विद्रोह और उसके दमन तथा साम्राज्यवादी हमले के खिलाफ वियतनाम के संघर्ष ने बाद की पीढि़यों को ‘अंधेरे में’ कविता को समझने के सूत्र दिए। ‘अंधेरे में’ ऐसी कविता है, जिसे सामने रखकर राजनीति और कला तथा विभिन्न कलाओं के बीच के अंतर्संबंध को समझा जा सकता है।

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक और आलोचक रामजी राय ने कहा कि मुक्तिबोध को पढ़ते हुए हम अंधेरे की नींव को समझ सकते हैं। पहले दिए गए शीर्षक ‘आशंका के द्वीप अंधेरे में’ में से अपने जीवन के अंतिम समय में आशंका के द्वीप को हटाकर मुक्तिबोध ने 1964 में ही स्पष्ट संकेत दिया था कि लोकतंत्र का अंधेरा गहरा गया है। 'अँधेरे में' अस्मिता या म‍हज क्रांतिचेतना की जगह नए भारत की खोज और उसके लिए संघर्ष की कविता है। मुक्तिबोध क्रांति के नियतिवाद के कवि नहीं हैं, वे वर्तमान में उसकी स्थिति के आकलन के कवि हैं। वे अपनी कविता में विद्रोह की धधकती हुई ज्वालामुखियों की गड़गडाहट दर्ज करते हैं। इस देश की पुरानी हाय में से कौन आग भड़केगी, जो शोषण और दमन के ढांचे को बदल देगी, वे इस सोच और स्वप्न के कवि हैं। सही मायने में वे कविता के होलटाइमर थे। 

विचार गोष्ठी का संचालन जसम, कविता समूह के संयोजक आशुतोष कुमार ने किया। इस मौके पर कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि मदन कश्यप, कथाकार महेश दर्पण, ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक दिनेश मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, वरिष्ठ कवयित्री प्रेमलता वर्मा, शीबा असलम फहमी, दिगंबर आशु, यादव शंभु, अंजू शर्मा, सुदीप्ति, स्वाति भौमिक, वंदना शर्मा, विपिन चौधरी, भाषा सिंह, मुकुल सरल, प्रभात रंजन, गिरिराज किराडू, विभास वर्मा, संजय कुंदन, चंद्रभूषण, इरफान, हिम्मत सिंह, प्रेमशंकर, अवधेश, संजय जोशी, रमेश प्रजापति, विनोद वर्णवाल, कपिल शर्मा, सत्यानंद निरुपम, श्याम सुशील, कृष्ण सिंह, बृजेश, रविप्रकाश, उदयशंकर, संदीप सिंह, रोहित कौशिक, अवधेश कुमार सिंह, ललित शर्मा, आलोक शर्मा, मनीष समेत कई जाने-माने साहित्यकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी और प्रकाशक मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। इस मौके पर फोनिम, लोकमित्र और द ग्रुप की ओर से किताबों, फिल्मों के सीडी और कविता पोस्टर के स्‍टॉल भी लगाए गए थे। 

सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी, संपर्क: 9868990959

4/18/13

कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को अविलंब रिहा करो ! : जन संस्कृति मंच


नई दिल्ली: 17 अप्रैल 2013, महाराष्ट्र में कबीर कला मंच (पुणे) के इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के खिलाफ लंबे समय से जारी राज्य दमन की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं और विगत 02 अप्रैल को महाराष्ट्र विधानसभा के समक्ष सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार किए जाने वाले चर्चित संस्कृतिकर्मी शीतल साठे और सचिन माली की अविलंब रिहाई की मांग करते हैं। गर्भवती शीतल साठे को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है और सचिन माली को एटीएस के हवाले कर दिया गया है। इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के साथ राज्य सत्ता का यह पूर्णरूपेण गैर-लोकतांत्रिक और आपराधिक व्यवहार है। अखबार जिसे नक्सल समर्थकों का आत्मसमर्पण कह रहे हैं, वह आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि फर्जी आरोपों के कारण भूमिगत होने के लिए मजबूर किए गए और आतंकवाद निरोधक दस्ता द्वारा निरंतर तलाशी की प्रतिक्रिया में उठाया गया लोकतांत्रिक प्रतिवाद है। जन संस्कृति मंच के हम साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकारों के साथ पूरी तरह एकजुटता जाहिर करते हैं और उनको राज्य मशीनरी द्वारा प्रताडि़त किए जाने तथा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रतिवाद की अपील करते हैं। जन संस्कृति मंच की सारी इकाइयां इस प्रतिवाद को संगठित करेंगी। 

शासकवर्ग की राज्य मशीनरी लगातार दलाल, गुलाम और समझौतापरस्त बनाने की जो सांस्कृतिक मुहिम चलाती रहती है, जिसकी चपेट में बुद्धिजीवियों और कलाकारों का भी अच्छा-खासा हिस्सा आ जाता है, उसके समानांतर अगर कोई जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए संस्कृतिकर्म को अपनी जिंदगी का मकसद बनाता है और सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न का विरोध करता है, तो वह अनुकरणीय है और उससे समाज में बेहतर परिवर्तन की उम्मीद बंधती है। कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों ने दलितों, कमजोर तबकों व मजदूरों के उत्पीड़न, शोषण और उनके हिंसक दमन के खिलाफ लोगों में चेतना फैलाने का बेमिसाल काम किया है। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी अपने गीतों और नाटकों के जरिए लोगों को संगठित करने का काम किया है। यह इस देश और इस देश की जनता के प्रति उनके असीम प्रेम को ही प्रदर्शित करता है। 

शीतल और सचिन ने एटीएस के आरोपों से इनकार किया है कि वे छिपकर नक्सलियों की बैठकों में शामिल होते हैं या आदिवासियों को नक्सली बनने के लिए प्रेरित करते हैं। दोनों का कहना है कि वे बाबा साहेब अंबेडकर, अण्णा भाऊ साठे और ज्योतिबा फुले के विचारों को लोकगीतों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते हैं। सवाल यह है कि क्या अंबेडकर या फुले के विचारों को लोगों तक पहुंचाना गुनाह है? क्या भगतसिंह के सपनों को साकार करने वाला गीत गाना गुनाह है? सवाल यह भी है कि अगर कोई संस्कृतिकर्मी माओवादी विचारों के जरिए ही इस देश और समाज की बेहतरी का सपना देखता है, तो उसे अपने विचारों के साथ एक लोकतंत्र में संस्कृतिकर्म करने दिया जाएगा या नहीं?

इसके पहले मई 2011 में एटीएस (आतंकवाद निरोधक दस्ता) ने कबीर कला मंच के सदस्य दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले को दमनकारी कानून यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया था। दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले पर आरोप लगाया गया कि वे माओवादी हैं और जाति उत्पीड़न और सामाजिक-आर्थिक विषमता के मुद्दे उठाते हैं। पिछले दो सालों में इस आरोप को साबित करने के लिए कुछ किताबें पेश किए गए और यह तथ्य पेश किया गया कि कबीर कला मंच के कलाकार समाज की खामियों को दर्शाते हैं और अपने गीत-संगीत और नाटकों के जरिए उसे बदलने की जरूरत बताते हैं। प्रशासन के इस रवैये के कारण कबीर कला मंच के अन्य सदस्यों को छुपने के लिए विवश होना पड़ा, जिन्हें राज्य ने ‘फरार’ घोषित कर दिया। राज्य के इस दमनकारी रुख के खिलाफ कबीर कला मंच के इन युवा कलाकारों के पक्ष में प्रगतिशील-लोकतांत्रिक लोगों की ओर से दबाव बनाने के बाद गिरफ्तार कलाकारों को जमानत मिली। जाहिर है उसी आरोप में शीतल साठे और सचिन को भी पकड़ा गया है।
  
हम सिर्फ जमानत से संतुष्ट नहीं है, बल्कि मांग करते हैं कि कबीर कला मंच के कलाकारों पर लादे गए फर्जी मुकदमे अविलंब खत्म किए जाएं और उन्हें तुरत रिहा किया जाए, संस्कृतिकर्मियों पर आतंकवादी या माओवादी होने का आरोप लगाकर उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बाधित न किया जाए तथा उनके परिजनों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाए।

सुधीर सुमन 
राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

3/31/13

कॉ. चंद्रशेखर : प्रतिलिपियों से भरी दुनिया में मौलिक होने की जिद


आज कॉ. चंद्रशेखर का शहादत दिवस है। 31 मार्च 1997 को सिवान में आरजेडी सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के गुंडो ने चंद्रशेखर और उनके एक साथी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। चंद्रशेखर की हत्या ने कई सवाल खड़े किए। हत्या के बाद दलालों ने उस राजनीति को भी भावनात्मक स्तर पर तोड़ने की कोशिश की जिसे चंद्रशेखर जनता के बीच ले जाते हुए शहीद हो गए। पेश है चंद्रशेखऱ पर प्रणय कृष्ण का लेख जो चंदू को समझने के लिहाज से बेहद प्रासंगिक है।

प्रतिलिपियों से भरी इस दुनिया में चंदू मौलिक होने की जिद के साथ अड़े रहे। प्रथमा कहती थी, ” वह रेयर आदमी हैं।” 91-92 में जेएनयू में हमारी तिकड़ी बन गई थी। राजनीति, कविता, संगीत, आवेग और रहन-सहन- सभी में हम एक से थे। हमारा नारा था,” पोयट्री, पैशन एंड पालिटिक्स”। चंदू इस नारे के सबसे ज्यादा करीब थे। समय, परिस्थिति और मौत ने हम तीनों को अलग-अलग ठिकाने लगाया, लेकिन तब तक हम एक-दूसरे के भीतर जीने लगे थे। चंदू कुछ इस तरह जिये कि हमारी कसौटी बनते चले गये। बहुत कुछ स्वाभिमान, ईमान, हिम्मत और मौलिकता और कल्पना- जिसे हम जिंदगी की राह में खोते जाते हैं, चंदू उन सारी खोई चीजों को हमें वापस दिलाते रहे।

इलाहाबाद, फ़रवरी 1997 की एक सुबह। कॉलबेल सुनकर दरवाजा खोला तो देखा कि चंदू सामने खड़े हैं। वही चौकाने वाली हरकत। बिना बताये चले जाना और बिना बताये, सूचना दिये अचानक सामने खड़े हो जाना। शहीद हो जाने के बाद भी चंदू ने अपनी आदत छोड़ी नहीं है। चंदू हर रोज हमारी चेतना के थकने का इंतजार करते हैं और अवचेतन में खिड़की से दाखिल हो जाते हैं। हमारा अवचेतन जाने कितने लोगों की मौत हमें बारी-बारी दिखाता है और चंदू को जिंदा रखता है। चेतना का दबाव है कि चंदू अब नहीं हैं, अवचेतन नहीं मानता और दूसरों की मौत से उसकी क्षतिपूर्ति कर देता है। यह सपना है या यथार्थ पता नहीं चलता, जब तक कि चेतन-अवचेतन की इस लड़ाई में नींद की दीवार भरभराकर गिर नहीं जाती।

हमारी तिकड़ी में राजनीति, कविता और प्रेम के सबसे कठिनतम समयों में अनेक समयों पर अनेक परीक्षाओं में से गुजरते हुये अपनी अस्मिता पाई थी, चंदू जिसमें सबसे पवित्र लेकिन सबसे निष्कवच होकर निकले थे।
चंदू का व्यक्तित्व गहरी पीड़ा और आंतरिक ओज से बना था जिसमें एक नायकत्व था। उनकी सबसे गहरी पहचान दो तरह के लोग ही कर सकते थे- एक वे जो राजनीतिक अंतर्दृष्टि रखते हैं और दूसरे वह स्त्री जो उन्हें प्यार कर सकती थी।

खूबसूरत तो वे थे ही, लेकिन आंखे सबसे ज्यादा संवाद करती थीं। जिस तरह कोई शिशु किसी रंगीन वस्तु को देखता है और उसकी चेतना की सारी तहों में वह रंग घुलता चला जाता है, चंदू उसी तरह किसी व्यक्तित्व को अपने भीतर तक आने देते थे, इतना कि वह उसमें कैद हो जाये। कहते हैं कि मौत के बाद भी वे खूबसूरत आंखें खुली थीं। वे सोते भी थे तो आंखें आधी-खुली रहती थीं जिनमें जिंदगी की प्यास चमकती थी। फ़िल्में देखते थे तो लंबे समय तक उसमें डूबकर बातें करके रहते, उपन्यास पढ़ते तो कई दिनों तक उसकी चर्चा करते।

जिस दिन उन्होंने जेएनयू छोड़ा, उसी दिन आंध्रप्रदेश के टी. श्रीनिवास राव ने मुझे एक पत्र में लिखा,” आज चंद्रशेखर भी चले गये। कैंपस में मैं नितांत अकेला पड़ गया हूं।” श्रीनिवास राव एक दलित भूमिहीन परिवार से आते हैं। चंद्रशेखर के नेतृत्व में हमने उनके संदर्भ में एकेडमिक काउंसिल में एक ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। राव का एम.ए. में 55 प्रतिशत अंक नहीं आ पाया था जबकि एम.फिल., पी.एच.डी. में उनका रिकार्ड शानदार था। उनका कहना था कि पारिवारिक परिवेश के चलते एम.ए. में 55 प्रतिशत अंक नहीं पा सके जो यूजीसी की परीक्षा और प्राध्यापन के लिये आवश्यक शर्त है अत: पीएचडी में होते हुये भी उन्हें एम.ए. का कोर्स फिर से करने दिया जाए।

नियमों से छूट देते हुये और प्रशासन की तमाम हठधर्मिता के बावजूद यह लडा़ई हम जीत गये। मुझे याद है कि जब बिहार की स्थिति के मद्देनजर जे.एन.यू. की प्रवेश परीक्षा के केंद्र को बिहार से हटा देने का मुद्दा एकेडमिक कौंसिल में आया तो वे फ़ट पड़े और मजबूरन यह प्रस्ताव प्रशासन को वापस लेना पड़ा। निजीकरण के खिलाफ़ जे.एन.यू के कैंपस में तबका सबसे बड़ा और जीत हासिल करने वाला आंदोलन उनके नेतृत्व में छेड़ा गया। यह पूरे मुल्क में शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ़ पहला बड़ा और सफ़ल आंदोलन था। शासक वर्गों की चाल थी कि यदि जे.एन.यू का निजीकरण कर दिया जाये तो उसे मॉडल के रूप में पेश करके पूरे भारत के सभी विश्वविद्यालयों का निजीकरण कर दिया जाये। चंद्र्शेखर छात्रसंघ में अकेले पड़ गये थे। तमाम तरह की शाक्तियां इस आसन्न आंदोलन को रोकने के लिये जुट पड़ीं थीं। लेकिन अप्रैल-मई 1995 में उनका नायकत्व चमक उठा था। इस आंदोलन के दौरान अगर उनके भाषणों को अगर रिकार्ड किया गया होता तो वह हमारी धरोहर होते। मुझे नहीं लगता कि क्लासिकीय ज्ञान, सामान्य जनता के अनुभवों, अचूक मारक क्षमता और उदबोधनात्मक आदर्शवाद से युक्त भाषण जिंदगी में फिर कभी सुन पाउंगा। वे जब फ़ार्म में होते तो अंतर्भाव की गहराइयों से बोलते थे। अंग्रेजी में वे सबसे अच्छा बोलते और लिखते थे, हालांकि हिंदी और भोजपुरी में उनका अधिकार किसी से कम नहीं था।

जे.एन.यू. के भीतर गरीब, पिछड़े इलाकों से आने वाले उत्पीड़ित वर्गों के छात्र-छात्रायें कैसे अधिकाधिक संख्या में पढ़ने आ सकें, यह उनकी चिंता का मुख्य विषय था। 1993-94 की हमारी यूनियन ने पिछड़े इलाकों, पिछड़े छात्रों और छात्रों के प्रवेश के लिये अतिरिक्त डेप्रिवेशन प्वाइंट्स पाने की मुहिम चलाई। इसका ड्राफ़्ट चंद्रशेखर और प्रथमा ने तैयार किया था, मेरा काम था बस उसी ड्राफ़्ट के आधार पर हरेक फोरम में बहस करना। 94-95  में जब चंद्रशेखर अध्यक्ष बने तो डेप्रिवेशन पाइंटस 10 साल बाद फिर से जे.एन.यू. में लागू हुआ।

चंद्र्शेखर बेहद धीरज के साथ स्थितियों को देखते, लेकिन पानी नाक के ऊपर जाते देख वे बारूद की तरह फ़ट पड़्ते। अनेक ऐसे अवसरों की याद हमारे पास सुरक्षित है। साथ-साथ काम करते हुये चंद्रशेखर और हमारे बीच काम का बंटवारा इतना सहज और स्वाभाविक था कि हमें एक-दूसरे से राय नहीं करनी पड़ती थी। हमारे बीच बहुत ही खामोश बातचीत चला करती। ऐसी आपसी समझदारी जीवन में किसी और के साथ शायद ही विकसित कर पाऊं।

रात में चुपचाप अपनी चादर सोते हुये दूसरे साथी को ओढ़ा देना, पैसा न होने पर मेस से अपना खाना लाकर मेहमान को खिला देना, खाना न खाये होने पर भी भूख सहन कर जाना और किसी से कुछ न कहना उनकी ऐसी आदतें थीं जिनके कारण उनकों मेरी निर्मम आलोचना का शिकार भी होना पड़ता था। दूसरों के स्वाभिमान के लिये पूरी भीड़ में अकेले लड़ने के लिये तैयार हो जाने के कई मंजर मैंने अपनी आंखों से देखे हैं। एक बार एक बूढ़ा आदमी दौड़कर बस पकड़ना चाह रहा था और कंडक्टर ने बस नहीं रोकी। चंदू कंडक्टर से लड़ पड़े। कंडक्टर और ड्राइवर ने लोहे की छड़ें निकाल लीं और सांसदों के बंगले पर खड़े सुरक्षाकर्मियों को बुला लिया। तभी बस में चढ़े जे.एन.यू. के छात्र भी उतर पड़े और कंडक्टर, ड्राइवर और सुरक्षा कर्मियों को पीछे हटना पड़ा। चंदू सब कुछ दांव पर लगा देने वाले व्यक्ति थे। जीवन का चाहे कोई भी क्षेत्र हो- प्रेम हो, राजनीति हो या युद्ध हो। उन्होंने अपने लिये कुछ बचाकर नहीं रखा। वे निष्कवच थे, इसीलिये मेरे जैसों को उन्हें लेकर बहुत चिंता रहती।

चंदू के भीतर एक क्रांतिकारी जिद्दीपन था। जब किसी जुलूस में कम लोग जुटते तो मैं हताश होकर बैठ जाता। लेकिन चंदू अड़ जाते। उनका तर्क रहता,” चाहे जितने कम लोग हों, जुलूस निकलेगा।” और अपने तेज बेधक नारों से वे माहौल गुंजा देते। सीवान जाने को लेकर मेरा उनसे मतभेद था। मेरा मानना था कि वे पटना में रहकर युवा मोर्चा संभाले रखें। वे प्राय: मेरी बात का प्रतिवाद नहीं करते थे। लेकिन अगर वे चुप रह जाते तो मैं समझ लेता यह चुप्पी लोहे जैसी है और इस इस्पाती जिद्द को डिगा पाना असंभव है।

दिल्ली के बुद्धिजीवियों, नागरिक अधिकार मंचों, अध्यापकों और छात्रों, पत्रकारों के साथ उनका गहरा रिश्ता रहता आया। वे बड़े से बड़े बुद्धिजीवी से लेकर रिक्शावाले, डीटीसी के कर्मचारियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को समान रूप से अपनी राजनीति समझा ले जाते थे। महिलाऒं में वे प्राय: लोकप्रिय थे क्योंकि जहां भी जाते खाना बनाने से लेकर, सफ़ाई करने तक और बतरस में उनके साथ घुलमिल जाते। छोटे बच्चों के साथ उनका संवाद सीधा और गहरा था।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लगातार तीन साल तक छात्रसंघ में चुने जाकर उन्होंने कीर्तिमान बनाया था, लेकिन साथ ही उन्होंने वहां के कर्मचारियों और शिक्षकों के साझे मोर्चे को भी बेहद पुख्ता किया। छात्रसंघ में काम करने वाले टाइपिस्ट रावत जी बताते हैं कि जे.एन.यू. से वे जिस दिन सीवान गये, उससे पहले की पूरी रात उन्होंने रावतजी के घर बिताई।

फिल्म संस्थान, पुणे के छात्रसंघ के अध्यक्ष शम्मी नंदा चंद्रशेखर के गहरे दोस्त थे। उनके साथ युवा फ़िल्मकारों का एक पूरा दस्ता अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह के अवसर पर चंद्रशेखर के कमरे में आकर टिका हुआ था। रात-रात भर फ़िल्मों के बारे में चर्चा होती, फिल्म संस्थान के व्यवसायीकरण के खिलाफ़ पर्चे लिखे जाते और दिन में चंद्रशेखर इन युवा फिल्मकारों के साथ सेमिनारों में हस्तक्षेप करते। फिल्म संस्थान के युवा साथी चंद्रशेखर के की इस शहादत पर मर्माहत थे और सीवान जाकर उन पर फ़िल्म बनाकर अपने साथी को श्रद्धांजलि देना चाहते थे। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के छात्र जब 11 अप्रैल के संसद मार्च में आये तो उन्होंने याद किया कि चंद्रशेखर ने किस तरह ए.एम.यू. के छात्रों पर गोली चलने के बाद उनके आंदोलन का राजधानी में नेतृत्व किया। जे.एन.यू. छात्रसंघ को उन्होंने देशभर यहां तक कि देश से बाहर चलने वाले जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ दिया। चाहे वर्मा का लोकतंत्र बहाली आंदोलन हो, चाहे पूर्वोत्तर राज्यों में जातीय हिंसा के खिलाफ़ बना शांति कमेटियां या टाडा विरोधी समितियां, नर्मदा आंदोलन हो या सुन्दर लाल बहुगुणा का टेहरी आंदोलन हो- चंदशेखर उन सारे आंदोलनों के अनिवार्य अंग थे। उन्होंने बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर-पूर्व प्रांत के सुदूर क्षेत्रों की यात्रायें भी कीं। मुजफ़्फ़रनगर में पहाड़ी महिलाऒं पर नृशंस अत्याचार के खिलाफ़ चंदू ने तथ्यान्वेषण समिति का नेतृत्व किया।

निजीकरण को अपने विश्वविद्यालय में शिकस्त देने के बाद उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय में हजारों छात्रों की सभा को संबोधित किया। बीएचयू में उन्होंने इसे मुद्दा बनाया और छात्रों को आगाह किया और फिल्म संस्थान, पुणे में तो एक पूरा आंदोलन ही खड़ा करवा देने में सफ़लता पाई। आजाद हिंदुस्तान के किसी एक छात्र नेता ने छात्र आदोलन को ही सारे जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ने का इतना व्यापक कार्यभार अगर किया तो सिर्फ़ चंद्रशेखर ने।

यह अतिशयोक्ति नहीं, सच है। 1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ़ राजनीतिक प्रस्ताव लाये तो उन्हें यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया। समय की कमी का बहाना बनाया गया। चंद्रेशेखर ने वहीं आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांगलादेश और दूसरे तीसरी दुनिया के देशों के प्रतिनिधियों का एक ब्लाक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ चल रहे जबर्दस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताऒं से मिले और सियोल में बीस हजार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया। यह एक खतरनाक काम था जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिये जाने का खतरा उठाकर भी अंजाम दिया।

चंद्रशेखर एक विराट, आधुनिक छात्र आंदोलन की नींव तैयार करने के बाद इन सारे अनुभवों की पूंजी लेकर सीवान गये। उनका सपना था कि उत्तर-पश्चिम बिहार में चल रहे किसान आंदोलन को पूर्वी उत्तर-प्रदेश में भी फ़ैलाया जाये और शहरी मध्यवर्ग, बुद्धिजीवी, छात्रों और मजदूरों की व्यापक गोलबंदी करते हुये नागरिक समाज के शक्ति संतुलन को निर्णायक क्रांतिकारी मोड़ दिया जाये। पट्ना, दिल्ली और दूसरे तमाम जगहों के प्रबुद्ध लोगों को उन्होंने सीवान आने का न्योता दे रखा था। वे इस पूरे क्षेत्र में क्रांतिकारी जनवाद का एक माड्ल विकसित करना चाहते थे जिसे भारत के दूसरे हिस्सों में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

चंद्रशेखर ने उत्कृष्ट कवितायें और कहानियां भी लिखीं। उनके अंग्रेजी में लिखे अनेक पत्र साहित्य की धरोहर हैं। वे फिल्मों में गहरी दिलचस्पी रखते थे। कुरोसावा, ब्रेसो, सत्यजित राय और न जाने कितने ही फिल्मकारों की वे च्रर्चा करते जिनके बारे में हम बहुत ही कम जानते थे। वे बिहार के किसान आंदोलन पर एक फिल्म बनाना चाहते थे जिसको उनकी अनुपस्थिति में उनके मित्र अरविन्द दास को अंजाम देना था। भिखारी ठाकुर पर पायनियर में उन्होंने अपना अंतिम लेख लिखा था जिसे प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय इस विषय पर लिखा गया अब तक का सर्वश्रेष्ठ बताते हैं।

उनकी डायरी में निश्चय ही उनकी कोमल संवेदनाओं के अनेक चित्र सुरक्षित होंगे। एक मित्र को लिखे अपने पत्र में वे पार्टी से निकाले गये एक साथी के बारे में बड़ी ममता से लिखते हैं कि उन्हें संभालकर रखने, उन्हें भौतिक और मानसिक सहारा देने की जरूरत है। इस साथी के गौरवपूर्ण संघर्षों की याद दिलाते हुये वे कहते हैं कि’ बनने में बहुत समय लगता है, टूटने में बहुत कम’। इस एक पत्र में साथियों के प्रति उनकी मर्मस्पर्शी चिंता छलक पड़ती है।

मैंने कई बार चंद्रशेखर को विचलित और बेहद दुखी देखा है। ऐसा ही एक समय था 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस। खुद बुरी तरह हिल जाने के बाद भी वे दिन रात उन छात्रों के कमरों में जाते जिनके घर दंगा पीड़ित इलाकों में पड़ते थे। उन्हें हिम्मत देते और फिर राजनीतिक लड़ाई में जुट जाते। कहा जाये तो जब तक वे रहे उनके नेतृत्व में धर्मनिरेपेक्षता का झंडा लहराता रहा। सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताकतों को जे.एन.यू. में उन्होंने बुरी तरह हराया और देश भर में इसके खिलाफ़ लामबंदी करते रहे। छात्रसंघ में न रहने के बावजूद इसी साल आडवाणी को उन्होंने जे.एन.यू. में घुसने नहीं दिया।

चंदू का हास्टल का कमरा अनेक ऐसे समाज छात्रों और समाज से विद्रोह करने वाले, विरल संवेदनाओं वाले लोगों की आश्रयस्थली था जो कहीं और एड्जस्ट नहीं कर पाते थे। मेस बिल न चुका पाने के कारण छात्रसंघ का अध्यक्ष होने के बावजूद उनके कमरे में प्रशासन का ताला लग जाता। उनके लिये तो जे.एन.यू. का हर कमरा खुलता रहता लेकिन अपने आश्रितों के लिये वे विशेष चिंतित रहते। एक बार मेस बिल जमा करने के लिये उन्हें 1600 रुपये इकट्ठा करके दिये गये। अगले दिन पता चला कि कमरा अभी नहीं खुला। चंदू ने बड़ी मासूमियत से बताया कि 800 रुपये उन्होंने किसी दूसरे लड़के को दे दिये क्योंकि उसे ज्यादा जरूरत थी।

चंदू को उनकी मां से अलग समझा ही नहीं जा सकता। सैनिक स्कूल, तिलैया और फ़िर नेशनल डिफ़ेन्स एकेडमी, पुणे, फिर पटना और फिर जे.एन.यू.। इस लंबे सफ़र में पिछले 15-16 सालों से मां-बेटे एक दूसरे को खोजते रहे और अंतत: मां की गोद चंदू को शहादत के साथ ही मिली। मां जब कभी 360, झेलम ए.एन.यू.में आकर रहतीं तो पूरे फ़्लोर के सभी लड़कों की मां की तरह रहतीं। चंदू से गुस्सा हुयीं तो अयूब या विनय गुप्ता के कमरे में जाकर सो गयीं। फिर संदू उन्हें मनाते और वे भी डांटने-फ़टकारने के बाद बेटे की लापरवाही माफ़ कर देंतीं। एक बार उसी फ़्लोर पर दो छात्रों में जमकर लड़ाई हो गयी। मां ने तुरन्त हस्तक्षेप किया। बच्चों को डांट-फटकार और सांत्वना की घुट्टी पिलाकर झगड़ा खतम करा दिया।

1992 की ही बात है। सीवान से खबर आयी कि मां को कुत्ते ने काट लिया है। चंद्रशेखर बुरी तरह विचलित हो गये। मैं उन्हें सीवान के लिये गाड़ी पकड़ाने दिल्ली रेलवे स्टेशन गया लेकिन उनकी हालत देखकर मुझसे रहा नहीं गया और मैं उनके साथ गाड़ी में सवार हो गया। मैं गोरखपुर उतरा और उनसे कहा कि वे सीवान जाकर तुरन्त फोन करें। शाम को उनका फोन आया कि मां ठीक-ठाक हैं तब जान में जान आई।

चंद्रशेखर की सबसे प्रिय किताब थी लेनिन की पुस्तक ‘क्या करें’। नेरुदा के संस्मरण भी उन्हें बेहद प्रिय थे। अकसर अपने भाषणों में वे पाश की प्रसिद्ध पंक्ति दोहराते थे- ‘सबसे खतरनाक है हमारे सपनों का मर जाना।’ 1993 में जब हम जे.एन.यू. छात्रसंघ का चुनाव लड़ रहे थे तो सवाल-जवाब के सत्र में किसी ने उनसे पूछा,” क्या आप किसी व्यक्तिगत मह्त्वाकांक्षा के लिये चुनाव लड़ रहे हैं?” उनका जवाब भूलता नहीं। उन्होंने कहा,” हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगतसिंह की तरह जीवन, चेग्वेआरा की तरह मौत”। चंदू ने अपना वायदा पूरा किया।

चंदू की शहादत का मूल्यांकल अभी बाकी है। उसके निहितार्थों की समीक्षा अभी बाकी है। पीढ़ियां इस शहादत का मूल्यांकन करेंगी। लेकिन आज जो बात तय है वह यह कि हमारे युग की एक बड़ी घटना है यह। इस एक शहादत ने कितने नये रास्ते खोल दिये अभी तक इसका मूल्यांकन नहीं हुआ है। लेकिन दिल्ली नौजवानों के नारों से गूंज रही है- चंद्रशेखर, भगतसिंह! वी शैल फ़ाइट, वी शैल विन।

3/13/13

बाजार के दबावों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद थे गणेश पाइन


बाजार के दबावों और उसकी शर्तों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद की तरह सृजनरत रहने वाले मशहूर चित्रकार गणेश पाइन का मंगलवार 12 मार्च को कोलकाता के एक अस्पताल में दिल के दौरे से निधन हो गया, सीने में दर्द के कारण उन्हें सोमवार को वहां भर्ती किया गया था।
1937 में जन्मे गणेश पाइन आजादी के बाद की दूसरी पीढ़ी के कलाकार थे और कई मामले में अपने समकालीनों में सर्वथा अलग थे। अपनी कला के प्रचार के प्रति प्रायः उदासीन रहने वाले गणेश पाइन लोकस्मृतियों, परंपरा और जनजीवन को एक कलाकार की कल्पना से जोड़कर पेश करने के लिए चर्चित रहे। उन्होंने इसका जिक्र कई बार किया कि कैसे उन्हांेने एक बूढ़े मोची का चित्र बनाया, तो पूरा होने पर ध्यान में डूबे किसी दार्शनिक की तरह लगने लगा, कि कैसे किसी सफाई मजदूर का चित्र उन्होंने बनाया, तो उसका चेहरा कवि की तरह नजर आने लगा। अपने चित्रों में वस्तु या यथार्थ को हुबहू पेश करने की बजाय उसे अपनी मनःस्थितियों के अनुरूप पेश करना उन्हें ज्यादा भाता था। और यह मन मानो दादी मां की कथाओं में मग्न बच्चे का मन था, जहां ‘हत्यारा’ अचानक कहीं से नहीं टपक पड़ता था, बल्कि अतीत से निकलकर आता था, लोककथाओं से निकले किसी पुराने योद्धा की वेशभूषा में पुराने किस्म की ही तलवार लेकर। वे बताते थे कि बचपन में दादी मां के मुंह से सुनी कहानियों का भी असर उनके चित्रों पर था। ‘हत्यारा’ शीर्षक चित्र मानो आज के हत्यारों की वंश परंपरा का दस्तावेज है। राजा, रानी, सौदागर, रथ आदि उनके चित्रों में नजर आते हैं- एक पूरा अतीत है, जिसे आजादी के बाद की पीढ़ी ने प्रत्यक्ष नहीं देखा, लेकिन जो विभिन्न रूपों में उसके अवचेतन का हिस्सा बने हुए हैं। यहां यह गौर करने लायक है कि अन्य भारतीय कलाकारों की तरह मिथकीय देवी-देवता, महापुरुष या ऐतिहासिक राजा-रानी को उन्होंने अपने चित्रों का विषय नहीं बनाया, बल्कि वे नामहीन हैं, किसी ऐतिहासिक या मिथकीय संदर्भ से उनका नाता नहीं है। गणेश पाइन के एक चित्र का शीर्षक ही है- ‘एक प्राचीन पुरुष की मृत्यु’। वे प्राचीन दुनिया की कल्पनाओं में हमेशा खोए रहने वाले व्यक्ति नहीं थे, भविष्य की कल्पनाएं उन्हें भाती थी, उन्हें टीवी पर साइंस फिक्शन वाले सीरियल देखना पसंद था। कविताओं में उनकी दिलचस्पी थी और जीवनानंद दास उनके प्रिय कवि थे।


उन्हें पेंटर आफ डार्कनेस यानी अंधेरे का चित्रकार भी कहा गया, क्योंकि मौत की छाया उनके कई चित्रों में दिखती है। इसका कारण वे बताते थे कि नौ साल की उम्र में ही 1946 में उन्होंने दंगे में मारे गए लोगों को करीब से देखा था, जिसका प्रभाव उनके चित्रों पर पड़ा तथा इसके अलावा कई प्रियजनों के बिछड़ने का भी असर पड़ा। कोलकाता गवर्नमेंट काॅलेज के स्नातक गणेश पाइन ने लंबे समय तक एनिमेटर का काम किया। वे अपने चित्रों पर वाल्ट डिजनी के कार्टूनों का प्रभाव भी मानते थे। अपने बेहतरीन रेखांकन के लिए भी उन्हंे जाना गया। लेकिन इससे भी ज्यादा वे अपने चित्रों की खास शैली के लिए मशहूर रहे। टेंपरा माध्यम में काम करना उन्हें पसंद था।

गणेश पाइन की जिंदगी भी अपने समकालीन आधुनिक चित्रकारों से सर्वथा अलग थी। करीब पांच दशक के अपने कैरियर में उनका ज्यादा समय कोलकाता में ही गुजरा, वे आयोजनों और समारोहों से प्रायः बचते रहे। यद्यपि पश्चिम की तमाम आधुनिक कला शैलियों से वे परिचित थे। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन पर अवनींद्रनाथ टैगोर के अतिरिक्त हाल्स रेम्ब्रांडिट व पाल क्ली का ज्यादा असर है। पाइन भारत के उन गिने चुने कलाकारों में थे, जो पश्चिम की आधुनिक कला और उसके बाजार से कभी आतंकित नहीं हुए। भारत के अतिरिक्त पेरिस, लंदन, वाशिंगटन और जर्मनी सहित दुनिया भर में उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनियां लगाई र्गइं। एमएफ हुसैन गणेश पाइन के प्रशंसकों में थे। कुछ लोगों की राय है कि इसने भी उनके चित्रों की कीमत बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा की, लेकिन खुद वे बाजार के पीछे कभी नहीं भागे, बल्कि उनके चित्रों का दुर्लभ होना ही उनको मूल्यवान बनाता था।
गणेश पाइन ने बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में कला पर बाजारवाद के बढ़ते दबाव के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि ‘‘पहले के चित्रकारों के लिए कला जीवन का एक मकसद थी। अब कला की बिक्री बढ़ने से जहां चित्रकारों को लाभ हुआ है वहीं इसने कुछ कलाकारों की कुछ नया कर दिखाने की क्षमता को नष्ट कर दिया है। लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको इससे एक नया उत्साह मिला है।’’ हालांकि कला को अपने जीवन का मकसद बताते हुए उन्होंने दो टूक कहा था कि ‘रोजगार का कोई वैकल्पिक साधन नहीं होने के कारण इसी से मेरी रोजी-रोटी भी चलती है। जहां तक चित्रों के लिए विषय का सवाल है, मैं अपने अंतर्मन से ही इसे तलाशता हूं।’ उनका मानना था कि ‘‘कला समाज का सौंदर्य है। अगर कला की उपेक्षा हुई तो समाज का सौंदर्य और संतुलन नष्ट हो जाएगा।’

अपनी ही शर्तों पर खामोशी से अपना काम करने वाले, बाजार की शर्तों को नामंजूर करते हुए कला और स्मृति की अपनी पंरपरा के साथ अविचल सृजनरत रहने वाले इस विलक्षण भारतीय चित्रकार को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।