8/12/16

पत्रकार नेहा दीक्षित पर संघ- भाजपा तत्वों के हमले के खिलाफ बयान



पत्रकार नेहा दीक्षित और आउटलुक पत्रिका पर सारे मुकदमें वापस हों! 

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर संघ- भाजपा तत्वों के हमले के खिलाफ जन संस्कृति मंच का बयान



जहां पिछले दो सालों में कार्पोरेट मीडिया का एक अच्छा ख़ासा हिस्सा केंद्र की मोदी सरकार की हिमायत में सारी हदें पार कर जा रहा है, वहीं प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने के तमाम प्रयासों को धता बताते हुए अनेक साहसी पत्रकारों और पत्र-पत्रिकाओं ने जोखिम उठाते हुए इसी दौर में साम्प्रदायिक तांडव को बेनकाब करने के अनुकरणीय उदाहरण भी पेश किए हैं. ‘गुजरात फाइल्स’ की लेखिका राना अय्यूब और आउटलुक से जुडी नेहा दीक्षित ऐसी ही पत्रकार हैं। 

अंग्रेज़ी की पत्रिका आउटलुक के 8 अगस्‍त, 2016 के अंक में छपी आवरण कथा ''ऑपरेशन बेबी लिफ्ट'' (हिंदी में प्रचलित/अनूदित ''बेटी उठाओ अभियान'') के सामने आने के बाद इस पत्रिका के प्रकाशक, संपादक समेत रिपोर्टर नेहा दीक्षित के खिलाफ़ भाजपा प्रवक्ता और गुवाहाटी उच्च न्यायालय के वकील बिजन महाजन, भाजपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के मोमीनुल अव्वाल और सहायक सोलीसीटर जनरल सुभाष चन्द्र कायल की शिकायत पर ‘साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने के आरोप में’ प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी है। एक के बाद एक भाजपा और संघ प्रवक्ताओं ने इस आवरण कथा को लिखनेवाली पत्रकार और छापनेवाली पत्रिका के खिलाफ हमला बोला, लेकिन वे अबतक इस रिपोर्ट में प्रस्तुत एक भी तथ्य को काट नहीं सके हैं। ऐसे में प्राथमिकी दर्ज कराने से लेकर 'मानहानि' का दावा करते हुए संघ से जुड़े संगठनों और व्यक्तियों ने सोशल मीडिया में नेहा दीक्षित और आउटलुक पर हमला बोल दिया है। जन संस्कृति मंच इस हमले की कठोर भर्त्सना करता है। 

तीन राज्यों (असम, गुजरात और पंजाब) से तथ्य संग्रह कर तीन महीने लगाकर 11,000 शब्दों में लिखी गयी की यह रिपोर्ट विस्तार से बताती है कि कैसे संघ से जुडी संस्थाओं के तत्वावधान में 31 नाबालिग आदिवासी बच्चियों को गुजरात और पंजाब ले जाया गया। बाल-अधिकार सुरक्षा कमीशन, [असम] बाल कल्याण कमेटी [कोकराझार] और राज्य बाल सुरक्षा सोसाईटी और चाइल्डलाइन [दिल्ली और पटियाला] जैसी संस्थाओं ने निर्देश दिया था कि इन बच्चियों को वापस भेजा जाये पर गुजरात और पंजाब की राज्य सरकारों से वरदहस्त पायी हुई संघ से जुडी इन संस्थाओं ने खुले-आम न केवल इन निर्देशों को हवा में उड़ा दिया, बल्कि उनके इस कृत्य में सर्वोच्च न्यायालय के 1 सितम्बर, 2010 के उस आदेश का भी उल्लंघन किया गया जिसके अनुसार मणिपुर और असम की सरकारों को यह निर्देश दिया गया था कि वे सुनिश्चित करें कि 12 साल से कम उम्र के बच्चों को पढाई के नाम पर राज्य के बाहर न ले जाया जाए। रिपोर्ट विस्तार से दिखाती है कि इन संस्थाओं के इस कृत्य में ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000’ से लेकर बच्चों के अधिकार के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा पारित और भारत द्वारा अनुमोदित संकल्पों का भी उल्लंघन निहित है। नेहा दीक्षित की रिपोर्ट के अनुसार, “ सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद, असम सी.आई.डी. की रिपोर्ट के अनुसार 2012 से 2015 के बीच लगभग 5000 बच्चे लापता हैं। कार्यकर्ताओं को यकीन है कि यह संख्या लगभग उतनी ही है जितने बच्चे पढ़ाई या रोज़गार के बहाने अवैध सौदागरी (ट्रैफिकिंग) की भेंट चढ़े। इनमें से 800 बच्चे 2015 में गायब हुए।” नेहा दीक्षित की यह रिपोर्ट इन तथ्यों के अलावा पूर्वोत्तर के आदिवासियों के बीच संघ की कारगुजारियों, उससे जुड़ी ख़ास तौर पर राष्ट्र सेविका समिति, सेवा भारती, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आदि संस्थाओं के क्रिया-कलाप को व्यापक सर्वेक्षण, अनेक साक्षात्कारों और तीक्ष्ण विश्लेषण के ज़रिए उजागर करती है। 

आश्चर्य नहीं कि इस मामले की जांच करने की बजाय पुलिस ने मामला उठाने वालों के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है। जब जब भी कोई खोजी पत्रकार, बौद्धिक या कलाकार सांप्रदायिक रणनीतियों, अल्पसंख्यकों पर हमलों, आदिवासियों के हिन्दूकरण जैसे मुद्दों में संघ से जुड़े तत्वों की भूमिका को प्रामाणिक ढंग से बेनकाब करने का साहस करता है, उसे कानूनी और गैर-कानूनी तरीकों से प्रताड़ित करने का अभियान चल पड़ता है। नेहा दीक्षित की रिपोर्ट पर ‘साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप’ यह कहने के बराबर है कि अपराध करनेवालों से ज़्यादा दोषी अपराध को जनहित में उजागर करने वाले लोग हैं। ज्ञातव्य है इससे पहले भी 2013 में नेहा दक्षित को मुजफ्फरनगर पर लिखी अपनी स्‍टोरी के लिए उत्‍पीड़न का शिकार होना पड़ा है। हम संघ-सम्प्रदाय से सम्बद्ध तत्वों द्वारा कानून के साथ इस खिलवाड़ की भर्त्सना करते हैं और अपने न्याय-विधान से कानून के ऐसे दुरुपयोगों के खिलाफ सावधान होने का आग्रह करते हैं।

हम मांग करते हैं कि नेहा दीक्षित और आउटलुक के खिलाफ सारे मुकदमों को जनहित में तत्काल वापस लिया जाए।



( जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह-सचिव, जसम द्वारा जारी)

12/21/15

बलात्कार के हर मामले में न्याय सुनिश्चित करने से बलात्कार रुकेंगे, किशोरों के साथ वयस्कों जैसा बर्ताव करने से नहीं

बलात्कार के कुछ विशिष्ट मामलों में किशोरता की उम्र कम करने की मांग पर ऐपवा और आइसा चिंता व्यक्त करते हैं। हम ऐसे प्रयासों का दृढ़ विरोध करते हैं जो महिलाओं के लिए न्याय के हित में नहीं हैं। हम आप सभी से तथ्यों पर गौर करने और बलात्कार के मामलों में न्याय हासिल करने के संघर्ष के खिलाफ आने वाले असली मुद्दों को पहचानने की अपील करते हैं। 

जस्टिस वर्मा कमेटी ने क्या कहा था ?

हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि ज्योति सिंह के बलात्कार और हत्या के बाद न्याय की गुहार के परिणामस्वरूप बनी जस्टिस वर्मा कमेटी ने न सिर्फ मृत्युदंड को बल्कि किशोरों को वयस्क न्यायालय और जेल भेजने को भी नकारा था। अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों को विस्तार में उद्धृत करते हुए और इस मुद्दे पर महिला संगठनों की परिपक्वता की तारीफ़ करते हुए इस कमेटी ने कहा कि: "देश के विभिन्न क़ानूनों के तहत किए गए अपराधों के लिए किशोरों की उम्र को 18 से घटाकर 16 साल कर देने से सवाल पर हमने विशेषज्ञों की राय सुनी। हम विनम्रता से स्वीकार करते हैं कि सभी महिला संगठनों ने न सिर्फ इस मसले में बेहतर परिपक्वता दिखाई बल्कि उनके साथ ही विद्वानों और सोचने-समझने वाले बहुतेरे लोगों ने इस घटना को अपराधशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय, दोनों नजरियों से देखा। हमारे मुताबिक हमारे सामने प्रस्तुत तथ्य इस निर्णय पर पहुँचने के लिए पर्याप्त है कि 'किशोरता' की उम्र को घटाकर 16 नहीं किया जाना चाहिए।"

क्या किशोर बलात्कार का बड़ा खतरा उपस्थित करते हैं ?

एक झूठा प्रचार चलाया जा रहा है कि किशोरों द्वारा बलात्कार की घटनाएँ 'बढ़ रही' हैं। तथ्य यह है कि बलात्कार के मामलों में किशोर मुलजिमों का प्रतिशत बहुत कम है। और इनमें भी बड़ा हिस्सा किशोरों के बीच परस्पर सहमति से बने प्रेम सम्बन्धों के मामले का है जिनमें लड़की के अभिभावक 'बलात्कार' के झूठे आरोप दर्ज कराते हैं। इनमें से ज़्यादातर लड़के उत्पीड़ित जातियों से होते हैं।

अगर बलात्कार एक वयस्क अपराध है तो इसका वयस्क दंड भी क्यों नहीं होना चाहिए ?

'आम' तर्क यह है कि: 'बलात्कार एक वयस्क अपराध है', और अगर कोई बलात्कार के लिए परिपक्व है तो वह दंड के लिए भी परिपक्व होगा। 'परिपक्वता' की यह गलत अवधारणा है। यौनिक संवेग और हत्या या बलात्कार करने की क्षमता दस साल के बच्चे में भी विकसित हो सकती है। पर तथ्यतः इस क्षमता से 'परिपक्वता' नहीं प्रदर्शित होती। वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर अब पूरी दुनिया में यह माना जाता है कि किशोरावस्था में दिमाग का सीईओ कहा जाने वाला अगला हिस्सा पूरी तरह विकसित नहीं होता। यह हिस्सा योजना बनाने, निर्णय लेने, खतरों का सटीक अनुमान लगाने और दूरगामी लक्ष्य तय करने की क्षमता को नियंत्रित करता है। इसलिए किशोरों के साथ वयस्कों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। 

16 दिसंबर की घटना में किशोर ही 'सबसे बर्बर' था न ? 

न तो ज्योति सिंह और न ही उसके दोस्त की अपराध के बारे में दी गई गवाहियों में किशोर के 'सबसे बर्बर' होने की बात है। यह पुलिस द्वारा फैलाया गया और मीडिया तक पहुंचाया गया झूठ है। 
किसी भी हाल में, भविष्य में कानून में होने वाला बदलाव भूतकाल से नहीं लागू किया जा सकता। सजा काटने के बाद भी किशोर अपराधी के 'छोड़े जाने' का विरोध करना बेमानी है, क्योंकि कानूनन यह असंभव है।

बलात्कार किससे ज्यादा रुक सकता है- ‘असामान्य’ मामलों में 'असामान्य' दंड देने से या फिर बलात्कार के सभी मामलों में प्रचलित दंड देने से? 

तर्क दिया जा रहा है कि कुछ मामलों- मसलन जिनको मीडिया ने उछाला हो या जिनके खिलाफ गुस्सा हो, में किशोरों को चुनिन्दा तरीके से दंडित कर सकने के लिए हमें कानून में बदलाव चाहिए। यह दुखद है।

बलात्कार के कुछ मामलों को 'असामान्य' मानने का हमारा रवैया हमें बलात्कार के ज़्यादातर मामलों को 'सामान्य' मामने की इजाजत दे देता है। 16 दिसंबर वाले मामले में 'किशोरता' की उम्र सीमा घटाकर 16 साल कर देने की मांग करने वाले भाजपा नेता सुभ्रमण्यम स्वामी वही शख़्स हैं, जो आशाराम द्वारा उत्पीड़ित 16 साल की लड़की को 'झूठी' बता रहे हैं! 

समाज में हम युवा लड़कों को सिखाते हैं कि 'असली' बलात्कार कुछ 'जानवर' करते हैं जिनको क्रूरतम दंड दिया जाना चाहिए। लेकिन ठीक इसी समय वे ही लड़के वयस्कों से यह भी सीखते हैं कि बलात्कार कोई बड़ा मामला नहीं है। जब बस्तर में पुलिसबल एक चौदह साल की लड़की का बलात्कार करता है, तब उन्हें मीडिया या राजनीति में कोई उफान नहीं दिखता। वे देखते हैं कि भगाणा में दलित लड़कियों से बलात्कार करने वाले बच निकले। वे देखते हैं कि मुजफ्फरनगर के बलात्कारियों के साथ हीरो जैसा बर्ताव किया जाता है और मोदी सरकार के मंत्री संजीव बलयान कैसे खुलेआम उनसे जेल में जाकर मिलते हैं और उनका बचाव करते हैं। वे देखते हैं कि कैसे आशाराम के मामले के गवाह मारे गए। वे आशाराम के हजारों समर्थकों को खुलेआम यह प्रचार करते देखते हैं कि कैसे बलात्कार कानून 'समाज तोड़ने' वाले हैं। 

वे देखते हैं कि तेजपाल और पचौरी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे आने वाली महिलाओं पर ही आरोप लगाए गए, उनको शर्मिंदा किया गया जबकि उनके द्वारा जिन पुरुषों की शिकायत की गई थी, वे कानून से बचे रहे। 

बलात्कार नैतिक रूप से गलत है और यह एक जुर्म है जिसकी सजा निश्चय ही मिलेगी, युवा लड़के यह नहीं सीख रहे हैं। बजाय इसके वे सीख रहे हैं कि ‘कुछ’ बलात्कारी 'पशु' होते हैं, जो दंडित किए जाने लायक हैं, जबकि बलात्कार की ‘ज़्यादातर’ शिकायतें ‘झूठी’ होती हैं और बलात्कार रोकने की ज़्यादा ज़िम्मेदारी महिलाओं की है, पुरुषों की नहीं। जब तक हमारा समाज और व्यवस्था हमें ये पाठ पढ़ाते रहेंगे, हम बलात्कार और यौन-उत्पीड़न की रोकथाम नहीं कर सकेंगे। 

नए बलात्कार कानूनों के तहत न्याय मांगने के लिए आगे आने वाली ज़्यादातर शिकायतकर्ताओं को न्याय मुहैया कराने में व्यवस्था नाकामयाब रही है। व्यवस्था चलाने वाले मौजूदा क़ानूनों को लागू करने और हर मामले में न्याय सुनिश्चित करने की बजाय लोगों का ध्यान एक और नया 'सख्त' कानून लाकर बंटा देना चाहते हैं। 

हमें असामान्य मामलों में सख्त सजा की जरूरत नहीं है। हर बलात्कारी को न्यायपूर्ण और समय से दिया गया दंड ही बलात्कार के मामलों की सही रोकथाम कर सकता है। 

किशोरों को वयस्कों की जेल में डाल देने का प्रयोग दूसरे देशों में असफल रहा है 

बहुतेरे अध्ययन दिखाते हैं कि अमरीका में चुनिन्दा मामलों में किशोरों को वयस्क न्यायालयों और जेलों में भेजने से अपराध कम नहीं हुए। बजाय इसके, सुधारों में कमी आई और किशोरों को अपराधी बनने में बढ़ावा मिला। इनमें से एक अध्ययन बताता है कि कैसे किशोरों को वयस्क अपराधी-न्याय व्यवस्था में भेजने से "अपराधों में कमी नहीं आई"। https://www.ncjrs.gov/pdffiles1/ojj...

एक और अध्ययन दिखाता है कि "किशोर न्याय-व्यवस्था के मुक़ाबले वयस्क न्याय-व्यवस्था में आने वाले किशोरों में अपराध करने की दर 34 फीसदी ज्यादा देखी गई।" http://tucson.com/news/local/crime/...
इस अनुभव के मद्देनजर 2005 से 2010 के बीच 15 अमरीकी राज्यों ने किशोरों को वयस्क न्याय व्यवस्था में भेजे जाने को रोकने के लिए कानून बनाए।

मौजूदा जेजे ऐक्ट (जुविनाइल जस्टिस ऐक्ट) 'किशोर अपराधी को खुला छोड़ने' की इजाजत नहीं देता। ऊपर दर्ज बहुतेरे वयस्क अपराधियों की तरह 16 दिसंबर मामले का किशोर अपराधी खुला नहीं छूटा है। उसने जुविनाइल जस्टिस होम में कानून के मुताबिक सजा काटी। हमें किशोर और वयस्क दोनों तरह के अपराधियों के लिए बेहतर सुधारों और पुनर्सुधार उपायों की जरूरत है। ऐसे उपाय हमारे समाज को और अधिक सुरक्षित बनाएँगे। 

हम ज़ोर देकर कह रहे हैं कि महिलाओं के नाम पर किशोर क़ानूनों में प्रतिगामी बदलाव मत करिए। मौजूदा क़ानूनों को लागू करिए और महिलाओं की आजादी की सुरक्षा कीजिये। 

मीना तिवारी, कविता कृष्णन 
ऐपवा (ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमंस एसोसिएशन)
सुचेता डे , संदीप सौरव 
आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन)

12/11/15

अकादमिक स्वायत्तता पर असहिष्णु उन्मादी हमले की भर्त्सना -जन संस्कृति मंच


जन संस्कृति मंच, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अशोक वोरा और दर्शनशास्त्र विभाग की प्रोफ़ेसर सुधा चौधरी पर किए जा रहे हमलों की भर्त्सना करता है। संघ से जुड़े संगठन सनातन धर्म के किसी भी पहलू से असहमत या उस पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखनेवालों पर हमले करते ही रहे हैं लेकिन इस बार इन्होने एक ऐसे व्याख्यानदाता को निशाना बनाया है जो हिन्दू प्रतीकों और मूर्तियों के पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किए गए कथित 'कुपाठ' का विरोध कर रहा था। यह पूरा प्रकरण यह बताता है कि हिन्दू धर्म का बचाव करनेवाले भी इन शक्तियों के आक्रमण की जद से बाहर नहीं हैं। ऐसा लगता है कि अब इन ताकतों ने ज्ञान और बौद्धिक कर्म मात्र को अपराध मान लिया है।

इस भाषण की रिकार्डिंग मौजूद है जिसे सुनकर हिन्दू परम्पराओं में अहैतुक आस्था रखनेवाला कोई व्यक्ति प्रसन्न ही हो सकता है। लेकिन इस भाषण के खिलाफ स्थानीय मीडिया के एक हिस्से की सहायता से जो तूफ़ान खड़ा किया गया, उससे सिर्फ यही समझ में आता है कि यह सब पूर्व-नियोजित था और वक्ता कुछ भी बोलते या मौन भी रहते, तो भी संभवतः विश्विद्यालय की अकादमिक दुनिया पर आतंक कायम करने की मुहिम के तहत यह सब किया ही जाता।

यह एक तरह से अकादमिक दुनिया से जुड़े सभी विद्वानों को दी गयी चेतावनी है कि वे अपने सारे क्रिया-कलाप को विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय से बाहर की राजनैतिक और वैचारिक सत्ता के इशारों पर संचालित करें। संसद में असहिष्णुता को लेकर चली लम्बी बहस के बाद घटी यह घटना बताती है कि संसद में सरकार चाहे जो बयान दे, जगह-जगह संघ से जुड़े संगठन अकादमिक स्वायत्तता, बौद्धिक स्वातंत्र्य, अभिव्यक्ति के अधिकार तथा बहस की लोकतान्त्रिक संस्कृति के खिलाफ संगठित अभियान चलाते ही रहेंगे और राजस्थान की तरह अन्य भाजपाई सरकारें उन्हें अपना समर्थन देती रहेंगी।

मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग की प्रोफ़ेसर सुधा चौधरी ने विश्वविद्यालय और इंडियन काउंसिल ऑफ फिलोसॉफिकल रिसर्च के सहयोग से 03 दिसंबर, 2015 को 'धार्मिक संवाद: आधुनिक अनिवार्यता' शीर्षक विस्तार व्याख्यान हेतु दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अशोक वोरा को आमंत्रित किया था। दिल्ली विश्विद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर वोरा ने हिंदू परम्पराओं की विदेशी विद्वानों द्वारा की गई कथित एकायामी दुर्व्याख्याओं का उदाहरण पेश करते हुए अपने तर्कों से उनका खंडन किया था। उनके मुताबिक ये व्याख्याएँ विकृत और असंगत हैं। उनके भाषण की रिकार्डिंग मौजूद है। खंडन करने की नीयत से प्रो. वोरा ने विदेशी विद्वानों की व्याख्याओं के जो नमूने पेश किये, उन्हें उनके भाषण से अलगा कर सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया और स्थानीय अखबारों में भड़काऊ ख़बरें छपीं। प्रो. वोरा को शायद सपने में भी गुमान नहीं रहा होगा कि 'भक्त' हिंदू धर्म की प्रतिष्ठा करने पर भी उत्तेजित हो सकते हैं।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के 'रणबांकुरों' ने दोनों विद्वानों के पुतले जलाए और सुधा चौधरी की बर्खास्तगी से लेकर गिरफ्तारी तक की मांग रखी। 07 दिसंबर को विद्यार्थी परिषद के नेता उच्च शिक्षा मंत्री से मिले। हिंदुत्ववादी संगठनों ने 08 दिसंबर को उदयपुर शहर के व्यस्ततम चौराहे को जाम कर दिया। उपद्रव के बाद राजस्थान के उच्च शिक्षा मंत्री ने प्रोफेसर वोरा की निंदा की और खुद एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया। इसी दिन राजस्थान सरकार के आदेश पर प्रोफेसर वोरा के खिलाफ धारा 295 और 153 (ए) के तहत एफआईआर दर्ज हो गई। महिला मुद्दों पर बेहतरीन काम करने वाली स्थानीय आयोजक प्रगतिशील दार्शनिक सुधा चौधरी के खिलाफ प्रदर्शन हुए। ताज़ा ख़बर ये है कि प्रोफेसर अशोक वोरा पर एफआईआर हो गयी है। विश्वविद्यालय की ओर से थाने में शिकायत दर्ज कराई गई है। कुलपति ने एक सेंसर बोर्ड बना दिया है जो विश्वविद्यालय में होने वाले सभी व्याख्यानों की पूर्व प्राप्त लिखित प्रति की जांच करेगा। फिलहाल प्रो. वोरा ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर मांग की है उनके खिलाफ प्राथमिकी तब तक दर्ज न की जाए जबतक कि कोई अधिकारी विद्वान उनके भाषण की रिकार्डिंग सुनकर उसका अर्थापन न करे।

जन संस्कृति मंच, बहस की संस्कृति के विरोधी कुपढ़ संघ-गिरोह के इस हमले की निंदा करते हुए मांग करता है कि प्रोफेसर वोरा के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर तत्काल वापस ली जाये, संदर्भ से काटकर भड़काऊ बयान देने और छापने वालों के खिलाफ भी कार्यवाही की जाये। जन संस्कृति मंच तमाम लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों से अपील करता है कि इस हमले के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करें और असहिष्णुता की लगातार घट रही घटनाओं पर जनमत बनाने की मुहिम को जारी रखें। 

(जन संस्कृति मंच की ओर से मृत्युंजय द्वारा जारी) 




12/9/15

'मैं जिंदा हूँ और गा रहा हूं.' - जसम की ओर से कवि विद्रोही की स्मृति

जनकवि रमाशंकर 'विद्रोही' को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

कल 8 दिसंबर, 2015 को शाम 4.30 के करीब जनकवि रमाशंकर 'विद्रोही' ने दिल्ली में अंतिम साँसें लीं. विद्रोही ने अपनों के बीच, आन्दोलन के मोर्चे पर अंतिम साँसे लीं. जैसा वे जिए, वैसा ही मरे. जैसे कोई मध्यकालीन संत शताब्दियाँ पार करके आधुनिक सभ्यता के जंगलों में आ निकले, उसकी सारी विडंबनाएं और चोटें झेलते, वैसे ही फक्कड़, मलंग बना फिरे, अपनी मातृभाषा में हमारे आज के समय के सबद और अभंग जोड़ते हमारे बीच से गुज़र जाए. कविता उनकी जीविका नहीं, ज़िंदगी थी और जन-आन्दोलन और मार्क्सवादी जीवन-दृष्टि उसकी सबसे पौष्टिक खुराक. कविता में वे बतियाते हैं, रोते और गाते हैं, खुद को और सबको संबोधित करते है, चिंतन करते हैं, भाषण देते हैं, बौराते हैं, गलियाते हैं, संकल्प लेते हैं. ”कविता क्या है?” जैसे सनातन विषय पर विद्रोही के विचार देखें-

”कविता क्या है
खेती है
कवि के बेटा-बेटी है
बाप का सूद है, मां की रोटी है।”

ऐसी कविता और ऐसी ज़िंदगी अक्सर उस सीमान्त पर विचरण करती हैं जहां मौत हाथ मिलाने के फासले पर होती है. जो दुनिया उन्हें मिली, उसमें जीने की 'शर्म की सी शर्त' उन्होंने नामंजूर कर दी. अपनी कविताओं में अलग दुनिया बनाई. उन्होंने अपने भौतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए किसी से कोई गुहार नहीं लगाई. अपने लोगों से उनकी अपेक्षा यही थी कि वे अपने कवि को बचाएं-

”...तुम वे सारे लोग मिलकर मुझे बचाओ-
जिसके खून के गारे से
पिरामिड बने, मीनारें बनीं, दीवारें बनीं,
क्योंकि मुझको बचाना उस औरत को बचाना है,
जिसकी लाश मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी पर
पड़ी है।

मुझको बचाना उन इंसानों को बचाना है,
जिनकी हड्डियां तालाब में बिखरी पड़ी हैं ।
मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है,
मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है,

तुम मुझे बचाओ!
मैं तुम्हारा कवि हूं। ”

और यह कवि बचा रहेगा, उन लोगों के बीच जिन्हें उसने जान से ज़्यादा प्यार किया है और जिनसे उसने खुद को बचाए रखने की उम्मीद की है. विद्रोही में पितृसत्ता-धर्मसत्ता और राजसत्ता के हर छ्द्म, हर पाखण्ड के खिलाफ अपरम्पार गुस्सा, तीखी घृणा है. प्राचीन और समकालीन मिथकों का कविता में रचा उनका पाठ हर उस शोषक , हर उस आततायी को तिलमिला देगा जिसे अपनी बदमाशियों को छिपाने के लिए संस्कृति की पोशाक चाहिए. विद्रोही ने कलजुगहे मजूर की आत्मा में प्रवेश किया और उसकी चाहतों का ऐसा अपूर्व विप्लवी, अछोर संसार रचा जो पूरी हिन्दी कविता में अनन्य है, जिसे यहाँ मैं पूरा ही उद्धृत कर रहा हूँ-

”जनि जनिहा मनइया जजीर मांगात ऽ ऽ
ई कलिजुगहा मजूर पूरी सीर मांगात ऽ ऽ
बीड़ी-पान मांगात ऽ ऽ सिगरेट मांगात ऽ ऽ
कॉफ़ी-चाय मांगात ऽ ऽ कप-प्लेट मांगात ऽ ऽ
नमकीन मांगात ऽ ऽ आमलेट मांगात ऽ ऽ
कि पसिनवा के बाबू आपन रेट मांगात ऽ ऽ

ई भरुकवा की जगहा गिलास मांगात ऽ ऽ
औ पतरवा के बदले थार मांगात ऽ ऽ
पूरा माल मांगात ऽ ऽ मलिकाना मांगात ऽ ऽ
बाबू हमसे पूछा ता ठकुराना मांगात ऽ ऽ

दूधे-दहिए के बरे अहिराना मांगात ऽ ऽ
दुलहिनी के बरे बरसाना मांगात ऽ ऽ
आलू-भांटा बरे बोड़री के चक मांगात ऽ ऽ
अंचारे बरे लखनी के बाग मांगात ऽ ऽ 

बिहारै बरे पूरा वृन्दावन मांगात ऽ ऽ
गोड़ धोवै बरे राजा गंगासागर मांगात ऽ ऽ
अंचावै बरे पूरा जगन्नाथ मांगात ऽ ऽ

गंगा-जमुना मांगात ऽ ऽ सरस्वती मांगात ऽ ऽ
तौ सौवै बरे जनक के बगीचा मांगात ऽ ऽ
दरी मांगै, गद्दा मांगै औ गलीचा मांगात ऽ ऽ 

अपने बिटुआ के अंजोरिया का बच्चा मांगात ऽ ऽ
और बियाहे बरे राजा अंगरक्खा मांगात ऽ ऽ
औ बराते बरे बाजा अलगोजा मांगात ऽ ऽ

न ता धोखी मांगात ऽ ऽ न ता धोखा मांगात ऽ ऽ
न ता ओझा मांगात ऽ ऽ न ता सोखा मांगात ऽ ऽ
सोझा-साझा ई मनइया शासन सोझा मांगात ऽ ऽ

न इनाम मांगात ऽ ऽ न इकराम मांगात ऽ ऽ
न कउनो भीख मांगात, न अनुदान मांगात ऽ ऽ
न गऊदान मांगात ऽ ऽ न रतिदान मांगात ऽ ऽ

ई सड़किया के बीचे खुलेआम मांगात ऽ ऽ
मांगे बहुतै सकारे, सरे शाम मांगात ऽ ऽ
आधी रतियौ के मांगे, आपन दाम मांगात ऽ ऽ

ई तो खाय बरे घोंघवा के खीर मांगात ऽ ऽ
दुलहिनिया के द्रोपदी के चीर मांगात ऽ ऽ
औ नचावै बरे बानर महावीर मांगात ऽ ऽ

न ता साधू मांगात ऽ ऽ न फकीर मांगात ऽ ऽ
ना ई तोहरी तिरथिया के नीर मांगात ऽ ऽ
ई अपनी मइया बहिनिया से बीर मांगात ऽ ऽ

जनि जनिहा मनइया जगीर मांगात ऽ ऽ
ई कलिजुगहा मजूर पूरी सीर मांगात ऽ ऽ 
जनि जनिहा मनइया जगीर मांगात ऽ ऽ

विद्रोही की कविता के हलवाहे, चरवाहे, केवट, कहार, दलित, मजदूर, किसान, औरतें, बच्चे जितना अपनी यातनाओं, उतना ही अपने सपनों के साथ आते हैं. वे तमाम पंडे, पुरोहितों, मुल्ला, मौलवियों, महाजनों, ज़मीदारों, पूंजीपतियों, साम्राज्यवादियों से अपने भविष्य को लेकर ही नहीं लड़ते, बल्कि अपहृत अतीत का भी हिसाब माँगते हैं. विद्रोही की कविताएँ सबसे ज़्यादा यही लोग समझेंगे. विद्रोही हमारे अपवंचित राष्ट्र के कवि हैं, उन लोगों के कवि हैं जिन्हें अभी राष्ट्र बनना है. लेकिन विद्रोही के विकट व्यक्तित्व को दुनियाबी व्याकरण से समझना मुश्किल है. जिन्होंने उन्हें दुनिया से बेखबर बाउल गानेवालों की तरह अकेले में डूब कर गाते देखा है, खुद से बातें करते देखा है, भीतर के किसी श्मशान के प्रेतों से लड़ते-झगड़ते देखा है, वे विद्रोही की उस अलग, अगम और निराली दुनिया का सिर्फ बाहरी आभास पा सके हैं जिसमें प्रवेश करना शायद किसी के लिए भी आसान न था.

रमाशंकर यादव 'विद्रोही' का जन्म 3 दिसंबर, 1957 को ऐरी फिरोजपुर ( जिला सुल्तानपुर) में श्री रामनारायण यादव व श्रीमती करमा देवी के घर हुआ. बचपन में ही शांतिदेवी से विवाह हो गया. शान्ति जी पढ़ती थीं और वे भैंसे चराते थे. गाँव में चर्चा होती कि रमाशंकर की पत्नी उन जैसे अनपढ़ को छोड़ देगी. इसी भय से विद्रोही शिक्षा के प्रति प्रेरित हुए. प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के स्कूल में हुई , फिर सरस्वती इंटर कालेज, उमरी से इंटर पास किया और राज डिग्री कालेज, बनवारीपुर, सुलतानपुर से बी.ए. किया. एल.एल. बी. की पढ़ाई धनाभाव के चलते पूरी नहीं कर पाए. नौकरी की, लेकिन नौकरी ज़्यादा दिन उन्हें बांध नहीं पाई. 1980 में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में हिन्दी से एम. ए. करने आ गए. 1983 के छात्र आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने के चलते कैंपस से निकल दिए गए. 1985 में उनपर मुक़दमा चला. तबसे उन्होंने आन्दोलन की राह से पीछे पलटकर नहीं देखा. वाम राजनीति और संस्कृतिप्रेमी छात्रों की कई पीढियों ने विद्रोही को उनकी ही शर्तों पर स्वीकार और प्यार किया है और विद्रोही छात्रों के हर न्यायपूर्ण आंदोलन में उनके साथ तख्ती उठाए, नारे लगाते, कविताएं सुनाते, सड़क पर मार्च करते रहे, यहाँ तक कि कल तक जब उन्होंने आखिरी साँसें लीं. जे़ एन. यू. में रहने के चलते विद्रोही की आवाज़ दिल्ली की सडकों पर, बैरिकेडों और पुलिस पिकेटों के सामने तमाम तरह के लोकतांत्रिक जुलूसों, प्रदर्शनों के समय दशकों तक गूंजती रही है. जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय पार्षद वे 2008 के राष्ट्रीय सम्मलेन में बने जो कवि धूमिल के गाँव खेवली में हुआ था. उसके बाद से दिल्ली के बाहर भी उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ आदि तमाम जगहों पर आयोजनों और आन्दोलनों में बुलाए जाते. विद्रोही कविता लिखते नहीं, कहते थे. उनकी खडी बोली की काफी कवितायेँ मित्रों ने लिपिबद्ध कीं जो 'नयी खेती' संग्रह में छपीं. कचोट इस बात की है कि उनकी ढेरों अवधी रचनाएं रिकार्ड नहीं की जा सकीं. एक स्मृति सदा के लिए खो गयी.

याद आता है कि गोरख पाण्डेय के गाँव जाते हुए कैसे बच्चों जैसी जिज्ञासा से भरे और उत्फुल्ल थे. आन्दोलनों और प्रतिवाद सभाओं के दौरान कविता सुनाकर बच्चों की तरह उनका खुश होना, उसे अपना एकमात्र तमगा और पुरस्कार बताना याद आता है. याद आता है पटना के गांधी मैदान के निकटवर्ती चौराहे पर उनके कविता-पाठ के दौरान रिक्शेवालों, खोमचेवालों और मजूरों का स्वतःस्फूर्त जुटना और ताली बजाना. विद्रोही जहां जाते, हाथों हाथ लिए जाते. बाहर के लोग भी उन्हें उतना ही प्यार करते जितना उन्हें जे.एन.यू. के छात्रों से हासिल हुआ था. जे. एन.यू. में नबारूण दा के काव्यपाठ के कार्यक्रम के बारे में सुधीर सुमन ने ११ दिसंबर, २०११ को मुझे विस्तृत मेल लिखा जिसका एक अंश नबारूण और विद्रोही की भेंट के बारे में था. दुर्ग में दोनों की मुलाक़ात हो चुकी थी. सुधीर ने लिखा, " जेएनयू के कार्यक्रम से बाहर निकलते वक्त जिस गर्मजोशी और प्यार से नबारूण दा छात्रों और जनता के प्यारे कवि विद्रोही से गले मिले, वह मेरी चेतना में एक बेहद सुकूनदेह अहसास की तरह दर्ज हो गया, जैसे बेचैन दिल को करार आ गया। पूरे देश में, खासकर हिंदी पट्टी में विद्रोही को जनता प्यार करती है, छात्रों के बीच वे बेहद लोकप्रिय हैं। उन्हें अपने लिए कोई कोई फंड, कोई पुरस्कार, सरकारों की कोई नजरे-इनायत नहीं चाहिए, उनके कवि को किसी साहित्यिक प्रोमोटर की जरूरत नहीं है..... आंदोलनकारियों और सामान्य जनता के बीच वे मशहूर हैं...., मैंने मन ही मन नबारूण दा को सलाम किया कि उन्होंने जनता के कवि को सम्मान दिया.., शायद यही जनता के क्रांतिकारी कवि की असली पहचान है।" आज दोनों हमारे बीच नहीं हैं. क्या सचमुच वे हमारे बीच नहीं हैं? विद्रोही इसे नहीं मानते. यकीन न हो तो उनकी ही एक कविता के इस अंश से आपको तसल्ली हो जाएगी-

"मरने को चे ग्वेरा भी मर गए
और चंद्रशेखर भी
लेकिन वास्तव में कोई नहीं मरा है
सब जिंदा हैं
जब मैं जिंदा हूँ

इस अकाल में
मुझे क्या कम मारा गया है
इस कलिकाल में
अनेकों बार मुझे मारा गया है
अनेकों बार घोषित किया गया है
राष्ट्रीय अखबारों में पत्रिकाओं में
कथाओं में, कहानियों में
कि विद्रोही मर गया।

तो क्या मैं सचमुच मर गया!
नहीं मैं जिंदा हूँ
और गा रहा हूं...... "

( प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

10/14/15

सत्य से सत्ता के युद्ध का रंग है ...

लेखकों, कलाकारों द्वारा पुरस्कार वापसी पर जन संस्कृति मंच का बयान

जन संस्कृति मंच उन तमाम साहित्यकारों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों का स्वागत करता है जिन्होंने देश में चल रहे साम्प्रदायिकता के नंगे नाच और उस पर सत्ता-प्रतिष्ठान की आपराधिक चुप्पी के खिलाफ साहित्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के पुरस्कारों तथा पद्मश्री आदि अलंकरण लौटा दिए हैं. जन संस्कृति मंच साहित्य अकादमी की राष्ट्रीय परिषद् तथा अन्य पदों से इस्तीफा देनेवाले साहित्यकारों को भी बधाई देता है जिन्होंने वर्तमान मोदी सरकार के अधीन इस संस्था की कथित 'स्वायत्तता' की हकीकत का पर्दाफ़ाश कर दिया है. जिस संस्था के अध्यक्ष इस कदर लाचार हैं कि प्रो. कलबुर्गी जैसे महान 'साहित्य अकादमी विजेता' लेखक की बर्बर हत्या के खिलाफ अगस्त माह से लेकर अबतक न बयान जारी कर पाए हैं और न ही दिल्ली में एक अदद शोक-सभा तक का आयोजन, उस संस्था की 'स्वायत्तता' कितनी रह गयी है? आखिर किस का खौफ उन्हें यह करने से रोक रहा है? के. सच्चिदानंदन द्वारा उनको लिखा पत्र सब कुछ बयान कर देता है, जिसका उत्तर तक देना उन्हें गवारा न हुआ. सितम्बर के पहले हफ्ते में भी विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि अकादमी के अध्यक्ष से दिल्ली में मिले थे और उनसे आग्रह किया था कि प्रो.कलबुर्गी की शोक-सभा बुलाएं. आज तक उन्होंने कुछ नहीं किया.

भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद् हो या पुणे का फिल्म इंस्टिट्यूट, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी हो या भारतीय विज्ञान परिषद्, आई.आई.एम और आई.आई.टी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान हों अथवा तमाम केन्द्रीय विश्विद्यालय तथा राष्ट्रीय महत्त्व के ढेरों संस्थान- शायद ही किसी की भी स्वायत्तता नाममात्र को भी साम्प्रदायिक विचारधारा और अधिनायकवाद के आखेट से बच सके. ऐसे में साहित्य अकादमी की स्वायत्तता की दुहाई देकर अकादमी पुरस्कार लौटानेवालों को नसीहत देना सच को पीठ दे देना ही है.

2014 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले मुज़फ्फरनगर में अल्पसंख्यकों के जनसंहार के बाद से लेकर अब तक हत्याओं का निर्बाध सिलसिला जारी है. पैशाचिक उल्लास के साथ हत्यारी टोलियाँ दादरी जिले के एक छोटे से गाँव में गोमांस खाने की अफवाह के बल पर एक निरपराध अधेड़ मुसलमान का क़त्ल करने से लेकर पुणे-धारवाड़-मुंबई-बंगलुरु जैसे महानगरों तक अल्पसंख्यकों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आखेट करती घूम रही हैं. बुद्धिजीवियों, कलाकारों, पत्रकारों के नाम पर 'डेथ वारंट' जारी कर रही हैं. घटनाए इतनी हैं कि गिनाना भी मुश्किल है. इनके नुमाइंदे टी.वी. कार्यक्रमों में प्रतिपक्षी विचार रखनेवालों को बोलने नहीं दे रहे, खुलेआम धमकियां और गालियाँ दे रहे हैं. सोशल मीडिया पर इनके समर्थक किसी भी लोकतांत्रिक आवाज़ का गला घोंटने और साम्प्रदायिक घृणा का प्रचार करने में सारी सीमाएं लांघ गए हैं. कारपोरेट मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इन कृत्यों को चंद हाशिए के सिरफिरे तत्वों का कारनामा बताकर सरकार की सहापराधिता पर पर्दा डालना चाहता है. क्या इन कृत्यों का औचित्य स्थापन करनेवाले सांसद और मंत्री हाशिए के तत्व हैं? लेकिन छिपाने की सारी कोशिशों के बाद भी बहुत साफ़ है कि इतनी वृहद योजना के साथ पूरे देश में, कश्मीर से कन्याकुमारी तक, असम से गुजरात तक निरंतर चल रहे इस भयावह घटनाचक्र के पीछे सिर्फ चन्द सिरफिरे हाशिए के तत्वों का हाथ नहीं, बल्कि एक दक्ष सांगठनिक मशीनरी और दीर्घकालीन योजना है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में 16 मई, 2014 के बाद से सैकड़ों छोटे बड़े दंगे प्रायोजित किए जा चुके हैं. खान-पान, रहन-सहन, प्रेम और मैत्री की आज़ादी पर प्रतिबन्ध लगाए जा रहे हैं. गुलाम अली के संगीत का कार्यक्रम आयोजित करना या पाकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री की पुस्तक का लोकार्पण आयोजित कराना भी अब खतरों से खेलना जैसा हो गया है. त्योहारों पर खुशी की जगह अब खौफ होता है कि न जाने कब, कहाँ क्या हो जाए. भारत एक भयानक अंधे दौर से गुज़र रहा है. अभिव्यक्ति ही नहीं, बल्कि जीने का अधिकार भी अब सुरक्षित नहीं.

आज़ाद भारत में पहली बार एक साथ इतनी तादाद में लेखकों-लेखिकाओं और कलाकारों ने सम्मान, पुरस्कार लौटा कर और पदों से इस्तीफा देकर 'सत्य से सत्ता के युद्ध' में अपना पक्ष घोषित किया है. यह परिघटना ऐतिहासिक महत्त्व की है क्योंकि सम्मान वापस करनेवाले लेखक और कलाकार दिल्ली, केरल, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तराखंड, बंगाल, कश्मीर आदि तमाम प्रान्तों के हैं. वे कश्मीरी, हिन्दी, उर्दू, मलयालम, मराठी, कन्नड़, अंग्रेज़ी, बांगला आदि तमाम भारतीय भाषाओं के लेखक-लेखिकाएं हैं. उनका प्रतिवाद अखिल भारतीय है. उन्होंने अपने प्रतिवाद से एक बार फिर साबित किया है कि सांस्कृतिक बहुलता और सामाजिक समता और सदभाव, तर्कशीलता और विवेकवाद भारतीय साहित्य का प्राणतत्व है. रूढ़िवाद और यथास्थितिवाद का विरोध इसका अंग है. इन मूल्यों पर हमला भारतीयता की धारणा पर हमला है. हमारी आखों के सामने अगर एक पैशाचिक विनाशलीला चल रही है, तो उसका प्रतिरोध भी आकार ले रहा है. हमारे लेखक और कलाकार जिन्होंने यह कदम उठाया है, सिर्फ इन मूल्यों को बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि भविष्य के भारत और भारत के भविष्य की लड़ाई को छेड़ रहे हैं.

आइये, उनका साथ दें और इस मुहिम को तेज़ करें.

राजेन्द्र कुमार ( अध्यक्ष , जन संस्कृति मंच )
प्रणय कृष्ण (महासचिव,जन संस्कृति मंच)

9/13/15

आपको जूतों की ज्यादा जरूरत है कि पुस्तकों की ?


[कलबुर्गी की कायराना हत्या के बाद उसके प्रतिवाद में निकले जुलूस से लौटकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी स्नातकोत्तर के विद्यार्थी बीरज की टिप्पणी]

हम सब कलबुर्गी हैं !

कभी-कभी मन में आता है कि किसी ने सच ही कहा है कि जब पुस्तकें सड़क के किनारे फुटपाथ पर रखकर बेची जा रही हों और जूते शो-रूम में रखकर तो उस समाज को जूतों की ही जरूरत ज्यादा है पुस्तकों और ज्ञान की नहीं। यह समय का विडंबनापूर्ण व्यवहार है कि आज हर जगह ऐसी स्थितियाँ देखने को मिल जाएंगी। 

बुद्धिजीवियों, प्रगतिशीलों, सहिष्णुतावादी और सौहार्द्र फैलाने वाले व्यक्तियों को जहां जेल, हत्या और दहशत की जिंदगी जीने को मिले और इसके विपरीत सांप्रदायिक, असहिष्णुतावादी, परंपरावादियों-पोंगापंथियों को राजकीय सम्मान और सत्ता का संरक्षण मिल रहा हो तो समझना चाहिए कि समाज दिशा से भटक गया है।
 
पिछले कुछ समय से नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे और कलबुर्गी की हत्या इस समाज के स्वरूप और मंशा पर सवाल खड़ा करती है कि आखिर यह देश, यह समाज किस दिशा में जाना चाहता है या अतिवादी, पुराणवादी-शास्त्रवादी लोग इसे सत्ता के बलबूते किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ? 

गोविंद पनसारे, दाभोलकर और कलबुर्गी कोई व्यक्ति नहीं, ये संस्थाएं हैं जिन्हें समर्थन प्राप्त था इस देश के प्रगतिशीलों और सहिष्णुतावादियों का। इनकी हत्या इस संस्था को तोड़ने का प्रयास हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो इन बुजुर्गों से आखिर किसके धर्म, किसके स्वार्थ को खतरा था। वस्तुतः खतरा व्यक्ति से नहीं विचारधारा से होता है और यह विचारधारा की हत्या का प्रयास है। 

जब सार्वजनिक रूप से देश में कथावाचकों और दक्षिणपंथियों द्वारा यह बोला जाता हो कि समाज को बनाए रखने के लिए जाति जरूरी है और प्रत्येक जाति को अपना-अपना काम करना चाहिए, जब प्रधानमंत्री जी लालकिले से यह बोलते हों कि दलित सफाई करते थे ताकि उनको आत्मसंतोष मिले तो मंशा साफ हो जाती है कि इन राष्ट्रवादियों के सपनों का भारत कैसा होगा? 

और यही सब सुनकर सुनकर जिस प्रगतिशील के मन में प्रश्न उठा वही तो है नरेंद्र दाभोलकर, पनसारे या कलबुर्गी। और इसी प्रश्न से ही तो खतरा है उन्हें जो देश को मनु की संहिता पर चलाना चाहते हैं। 

अब समय आ गया है, देश और दूर-दराज के गांवों में यह बात फैलाने का कि आशाराम, रामपाल, राधे माँ, नित्यानन्द, सदानंद और पता नहीं कितने आनंद इस देश और समाज को दिशा देंगे या पनसारे, कलबुर्गी या दाभोलकर जैसे लोग। चुनना आपको है, सोचना आपको है- भविष्य आपका है। ये आप अच्छी तरह जानते होंगे कि आपको जूतों की ज्यादा जरूरत है कि पुस्तकों की !

9/6/15

प्रो. कलबुर्गी की याद बरास्ते ‘शरण साहित्य ’-प्रणय कृष्ण

‘जो जड़ है वह नष्ट हो जाता है, जो गतिमान है, वह नष्ट नहीं होता’
(प्रो. कलबुर्गी की याद बरास्ते ‘शरण साहित्य ’-प्रणय कृष्ण)


अपने समय के समाज के बारे में बसवेश्वर अपनी बहन नागलम्बिका से कहते हैं, “….बहन, ऐसा प्रतीत होता है कि बुरे लोगों के समाज में जो निकृष्टतम होते हैं , वे ही नेता होते हैं. इन्हें लगता है कि वे धर्म के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं , यदि उनके पास थोड़ा पैसा हो और कुछ दुष्ट अनुयायी हों. लेकिन वे दिन दूर नहीं जब ये पैसा , ये पुजारी और उनके अनुयायी इस मठ की मृत्यु का कारण बनेंगे. ” (श्री कलबुर्गी के नाटक ‘केट्टिटू कल्याण’ (कल्याण का पतन) के बसवराज नायकर कृत अंग्रेजी अनुवाद ‘दि फॉल ऑफ़ कल्याण’, पृष्ठ २९ से उद्धृत)

जान पड़ता है कि ३० अगस्त के दिन ‘धर्म के नाम पर’ कुछ भी कर गुजरने का हौसला रखने वालों ने पैसे और दुष्ट अनुयायियों के बल पर भाड़े के हत्यारों से प्रो. कलबुर्गी की ह्त्या करा दी. ‘मूर्ति पूजा की निंदा के चलते ही संभवतः प्रो.कलबुर्गी की ह्त्या हुई’- ऐसा समाचार पाकर ३० अगस्त की रात एक साथी ह्त्या से आक्रोशित होकर मुझे फोन पर कह रहे थे, “आज दयानंद होते या बिल्ले-सुर बकरिहा लिखनेवाले निराला, तो उन्हें भी ये लोग मार डालते.”

श्री कलबुर्गी का जीवन-दर्शन

‘जो जड़ है वह नष्ट हो जाता है, जो गतिमान है, वह नष्ट नहीं होता’ , यह पंक्ति प्रो. कलबुर्गी के लिखे बसवन्ना के जीवन पर आधारित नाटक ‘केट्टितू कल्याण’ (कल्याण का पतन) में बार-बार टेक की तरह दोहराई जाती है. इन पंक्तियों में श्री कलबुर्गी का जीवन-दर्शन गूंजता है, जो सर्वाधिक १२ वीं सदी के क्रांतिकारी संत बसवेश्वर से प्रभावित रहा. इस नाटक में न केवल बसवेश्वर का क्रांतिकारी जीवन और दर्शन , बल्कि श्री कलबुर्गी द्वारा उसकी समकालीन प्रासंगिकता की अद्यतन व्याख्या भी सुरक्षित है. जड़ता और यथास्थितिवाद की ताकतों ने भले ही उनकी ह्त्या कर दी, लेकिन उनके जीवंत और गतिमान विचार नष्ट नहीं किए जा सकते. बसवन्ना और उनके अद्भुत व्याख्याकार कलबुर्गी के जीवन और दर्शन की उल्लेखनीय समानताओं को ध्यान में रखते हुए ही शायद उनकी मृत्यु पर बंगलुरु के टाउन हॉल पर आयोजित विरोध-प्रदर्शन में एक प्रदर्शनकारी ने तख्ती पर लिख रखा था, ‘कल बसवन्ना थे, आज कलबुर्गी.” बसवन्ना भी अपने विचारों के लिए ही जिए और मरे.

‘कल्याण का पतन’ नाटक तीन हिस्सों में बसव के जीवन और दर्शन के तीन सोपानों को प्रस्तुत करता है. कर्मकांड से अच्छे धर्म की ओर यात्रा बागेवाड़ी में, भौतिक प्रकृति से आध्यात्म की ओर कूडल संगम में और आध्यात्मिक संस्कृति से सामाजिक संस्कृति की ओर यात्रा कल्याण में पूरी हुई. बसव के जीवन-दर्शन की प्रो. कलबुर्गी द्वारा नाट्य-रूप में प्रस्तुत यह गतिमानता एक तरह से समूचे लिंगायत आदोलन की अंतिम परिणति के रूप में सामाजिक क्रान्ति के उद्देश्य को प्रस्थापित करती है.

सच के लिए सत्ता से टकराने वाले इतिहासकार

कलबुर्गी कन्नड़ साहित्य की दुनिया के उन महत्वपूर्ण लोगों में से थे जिन्होंने कर्नाटक क्षेत्र के इतिहास को प्रशिक्षित इतिहासकारों से भी अधिक दक्षता के साथ वैज्ञानिक ढंग से उद्घाटित किया. श्री कलबुर्गी, रहमत तारिकेरे, डी.आर.नागराज, एम. चिदानंदमूर्ति, एन. पी. शंकरनारायण आदि कन्नड़ साहित्यकारों का वैज्ञानिक इतिहास-लेखन में जैसा योगदान है, वैसा किसी आधुनिक भारतीय भाषा के साहित्य में नहीं मिलता. इसी साल जून में श्री कलबुर्गी ने एक भाषण में अपनी इतिहास-दृष्टि का मानो सार प्रस्तुत करते हुए कहा, “ ऐतिहासिक तथ्यों पर दो तरह के शोध-कार्य होते हैं . एक वह होता है जो सत्य की खोज पर समाप्त हो जाता है , दूसरा उसके आगे जाकर वर्तमान का पथ-प्रदर्शक बनता है.. जहाँ पहले किस्म का शोध-कार्य महज अकादमिक होता है , वहीं दूसरे वाले में वर्तमान का मार्ग-दर्शन होता है .वक्त का तकाज़ा है कि इन दूसरे किस्म के शोध-कार्यों पर जोर दिया जाए जो वर्तमान के सवालों से इतिहास से मिलने वाली सीख की रोशनी में रू-ब-रू होते हैं.” वर्तमान की चुनौतियों से इतिहास के सम्बन्ध पर जोर देने के चलते ही वे समय समय पर धर्मसत्ता और राजसत्ता के प्रतिष्ठानों से टकराते रहे. अपने तार्किक और वस्तुवादी दृष्टिकोण के कारण खुद लिंगायत धर्म-प्रतिष्ठान से भी उनका टकराव होता रहा. बसवन्ना (जिनके जीवन और दर्शन के वे सबसे श्रेष्ठ व्याख्याता थे) के जीवन और रिश्तों के बारे में प्रचारित मिथकों की छानबीन और व्याख्या के ज़रिए उनके पीछे के ऐतिहासिक यथार्थ के उदघाटन के प्रयास में १९८९ में उन्हें लिंगायत समुदाय के रूढ़िवादियों का कोप झेलना पडा. उस समय भी उन्हें मार डालने की धमकियां दी गयी. मार्ग शृंखला की पुस्तकें जिनमें कन्नड़ साहित्य, इतिहास और संस्कृति से सम्बंधित उनके शोधपरक निबंध संकलित हैं, उसकी पहली पुस्तक ‘मार्ग १’ से उन्हें दो अध्याय लिंगायत मठाधीशों के दबाव में वापस लेने पड़े . इस घटना पर व्यथित होकर उन्होंने कहा था की ” मैंने अपने परिवार की सुरक्षा के लिए यह किया, लेकिन इसी दिन मेरी बौद्धिक मृत्यु हो गयी.” क्षोभ में उन्होंने जो भी उस समय कहा ,लेकिन उनकी निर्भीक बौद्धिक यात्रा जारी रही. इसी शृंखला की पुस्तक ‘मार्ग ४‘ पर उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड २००६ में मिला. १९८९ में उनको मिली धमकियों के विरोध में भी अखिल भारतीय प्रतिवाद के स्वर उठे थे. इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली के २० मई, १९८९ के अंक में सम्पादक के नाम पत्र में इस घटना पर प्रतिवाद जताते हुए सर्वश्री बिश्वरूप दास, सुधीर चन्द्र, लैसी लोबो, घनश्याम शाह, अर्जुन पटेल, एस.एस. पुणलेकर, सोनल श्रॉफ, परमजीत सिंह, अचिन विनायक, किरण देसाई, सत्यकाम जोशी, के.एस. रमण आदि बौद्धिकों ने लिखा था, “राजनीतिक निरंकुशता अकादमिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है. धार्मिक मतान्धता की तानाशाही और रूढ़िवाद के साथ मिलकर इसने हमारे ‘आधुनिक’ और ‘सभ्य’ युग में बौद्धिक कर्म को वैसा बना दिया है जैसा वह सुकरात और गैलीलियो के समय हो उठा था. फिर, श्री कलबुर्गी की प्रताड़ना की इस क्रूर विडम्बना से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि उनके खिलाफ अभियान चलानेवाले महान क्रान्तिकारी संत बसव के अनुयायी हैं. क्या वे भूल गए हैं कि ये विचार की ही ताकत थी जिस के बल पर बसव ने अपने समय के रूढ़िवाद के आडम्बरों और गड़बड़ियों को बेनकाब किया था ? क्या वे खुद उसी रूढ़िवाद की स्थापना में लग गए हैं, जिसके खिलाफ बसव ने अपने समय में लड़ाई की थी और सुधारने की कोशिश की थी? अन्यथा उन्हें कलबुर्गी के साथ ईमानदार तार्किकता की भावना के साथ बहस करनी चाहिए थी, न कि उन्हें संस्थाबद्ध धर्म की ताकत से खामोश करने की कोशिश.” १९८९ से २०१५ का भारत बहुत अलग है. अब धर्म की ताकत से खामोश करने से आगे जाकर बन्दूक के बल पर बौद्धिकों और तर्कनिष्ठ लोगों को खामोश करने का अभियान संचालित है. श्री दाभोलकर, कामरेड पानसारे और कलबुर्गी महोदय को पिछले तीन सालों में इसी तरह से खामोश किया गया. वह इतिहास कैसा होगा जिसमें तथ्य का ही गला घोंट दिया जाए? वह विज्ञान कैसा होगा जिससे तर्क गायब हो? वह अकादमी कैसी होगी जिसमें विचारों की सरे-राह ह्त्या हो? यह सवाल आज के भारत में जिस तरह विकराल मुंह बाए खड़े हैं, वैसे कभी न थे.

सन २०१२ में कर्नाटक सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने प्रो. कलबुर्गी को उस समिति का प्रमुख बनाया जिसे आदिलशाही वंश के अधीन रचे गए समस्त साहित्य को कन्नड़ में लाने का कार्यभार सौंपा गया. उर्दू, फारसी और अरबी में उपलब्ध इस प्रभूत साहित्य का संरक्षण इसलिए भी आवश्यक है कि बीजापुर के इतिहास की बेशुमार जानकारियों इनमें मौजूद हैं. इनका साहित्यिक मूल्य भी कुछ कम नहीं. भाषाविद, संस्कृति के अध्येता, लोक साहित्य के विशेषग्य और शिलालेखों, ताम्रपत्रों आदि के पाठ में महारत प्राप्त अग्रणी इतिहासकार होने के कारण ही उन्हें यह जिम्मा दिया गया. श्री कलबुर्गी आदिलशाही वंश को दक्कन के पठार में सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता का अलमबरदार मानते थे और इब्राहीम आदिलशाह को उन्होंने ‘ दक्षिण भारत का अकबर ‘ बताया था. उन्होंने मुहम्मद कासिम फ़रिश्ता की ‘गुलैन- ए- इबाहिमी’ और काजी नूरुल्ला की ‘तारीख-ए-आदिलशाही’ सहित २० पुस्तकों का अनुवाद पहले चरण में पूरा करने का जिम्मा लिया था और जीवन के अंतिम दिनों में इस काम में लगे हुए थे. प्रो. कलबुर्गी के अनुवादों का सम्पादन कर रही लेखिका एम. एस. आशा का कहना है कि उनकी अगली रचना १२ वीं सदी से १६ वीं सदी के बीच कन्नड़ में स्त्री लेखन के विलुप्त होने के कारणों की खोज पर केन्द्रित थी, जिस दौर में लिंगायतों के बीच उभरे पुरोहित वर्ग ने वचन परम्परा के साहित्य का दमन किया था.

शरणों की विवेकवादी परम्परा के वाहक

४५० से भी ज्यादा संतों की वाणियों को अथक शोध के माध्यम से १५ खण्डों में ‘समग्र वचन सम्पुट’ में संकलित किया गया है. प्रो. कलबुर्गी के सम्पादन से इन खण्डों की शुरुआत हुई. जिस ‘वचन साहित्य’ के महान अध्येता प्रो. कलबुर्गी थे, उसमें क्या कहा गया है? क्या इन संतों ( शरण और शरणियों) ने वेदों पर व्यंग्य नहीं किया, कर्मकांडों का उपहास नहीं किया? क्या देवी- देवताओं की उपासना का तिरस्कार नहीं किया? उनकी ह्त्या के बाद भी जिस तरह विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधि टी.वी. चैनल पर श्री कलबुर्गी पर देवी –देवताओं के तिरस्कार का आरोप लगा रहे थे और प्रकारांतर से लोगों के विक्षोभ के बहाने उनकी हत्या के औचित्य का संकेत कर रहे थे, क्या वे बसवन्ना, अक्क महादेवी, अल्लम प्रभू, चेन्न बसवन्ना, दोहर काकय्या, चेन्नैया, सिद्धरमा, गणचार और सैकड़ों शरणों और शरणियों से अतीत में जाकर बदला लेंगे? नीचे हम प्रतिष्ठित ग्रंथों से शरणों के वचन साहित्य के कुछ उद्धरण दे रहे हैं. इन्हें पढ़कर कोई बताए कि कर्मकांड, मूर्तिपूजा और पाखंड के खिलाफ इससे अधिक क्या कुछ कहा जा सकता है? क्या श्री कलबुर्गी इससे इतर या इससे बढ़ कर कुछ कहते हैं?

१. बसवेश्वर कहते हैं, ” गोबर के गणेश को चम्पा के फूल से पूजें तो भी वो अपनी बदबू नहीं छोड़ता” ( र. श्री. मुगलि, कन्नड़ साहित्य का इतिहास, नयी दिल्ली, १८७१, पृष्ठ ९३, भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश भाग -२, ले. रामविलास शर्मा पृष्ठ ११९ से उद्धृत, किताबघर, नयी दिली, २००९)

२. बसवेश्वर के काफी बाद संभवतः १५ वीं सदी के कवि वेमना का कहना है , “क्या बार बार स्नान करने से मुक्ति प्राप्त हो जाती है? तो उस हालत में सब मछलियाँ मुक्तिप्राप्त हैं. अगर माथे पर राख मलने से मुक्ति मिलती हो तो गधा राख में ही लोटता है. अगर शाकाहार से ही शारीरिक पूर्णता मिलती हो तो बकरी तुमको मात देगी. यदि शूद्र का लड़का शूद्र ही हो तो ब्राह्मणोत्तम के रूप में वशिष्ठ की कैसे पूजा कर सकते हो? क्या वह शूद्र स्त्री उर्वशी के पुत्र नहीं थे?.. अगर अछूत स्त्री के पति को भी अछूत समझा जाए, तो वशिष्ठ के बारे में तुम कैसे गर्व कर सकते हो?क्या उनकी पत्नी अरुंधती अछूत नहीं थी? जब तुम कोई वैदिक कर्मकांड करते हो, या तीर्थस्थान पर जाते हो, तो मुंडन करने के लिए नाई सर पर पानी छिड़कता है. कोई नहीं कह सकता कि पुरोहित के पानी ने चमत्कार किया या नहीं पर नाई के पानी ने काम किया, यह दिखने के लिए मुड़ा सर गवाही दे रहा है .” ( र. श्री. मुगलि, कन्नड़ साहित्य का इतिहास, नयी दिल्ली, १८७१, पृष्ठ ५२ , भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश भाग -२, ले. रामविलास शर्मा पृष्ठ १२२ से उद्धृत, किताबघर, नयी दिली, २००९) -

३. शिवशरणी काळव्वे अपने एक पद में पूछती हैं-
“ मुर्गी-बकरी छोटी मछली
खाने वालों को कुलश्रेष्ठ कहते हो,
शिवजी को पंचामृत दूध देनेवाली
गाय खानेवालों को हीन जाति कहते हो,
कैसे वे हीन जाति, कैसे ये कुलश्रेष्ठ हैं?”
(‘बारहवीं सदी की कन्नड़ कवयित्रियाँ और स्त्री- विमर्श’- ले. काशीनाथ अम्बलगे, पृष्ठ ७३)

इन्हीं वचनकारों और शरणियों की विवेकवादी परंपरा के वाहक थे श्री कलबुर्गी. आश्चर्य है कि वीरशैव आन्दोलन से काफी पहले से लिखे जा रहे सूत्रों और स्मृतियों में शूद्रों, अन्त्यजों, स्त्रियों के बारे में जो कुछ कहा गया, अंतरजातीय विवाह करनेवालों को भीषण प्रताड़ना के जैसे निर्देश वहां दिए गए हैं, उन्हें लेकर कोई धर्मध्वजावाहक आज भी आहत नहीं होता, जबकि शरण परम्परा के वचनों के व्याख्याता को सहना इन लोगों के लिए आज भी मुश्किल हो रहा है.

लिंगायत मत ने एक हजार साल से भी पहले वैदिक प्राधिकार, जाति-भेद, चार आश्रमों और चार वर्णों की व्यवस्था, बहुदेववाद, पुरोहितवाद, पशु-बलि, आत्म-बलि, सती-प्रथा, कर्मों के बंधन, ईश्वर और आत्मा के द्वैत, मंदिर- पूजा, छूत- अछूत, स्वर्ग और नरक की धारणाओं का खंडन किया. इस आन्दोलन की ऊर्जा और प्रेरणा आज भी ‘वचन साहित्य’ या ‘शरण साहित्य’ में सुरक्षित है, जिसे श्री कलबुर्गी किसी भी धर्म-ग्रन्थ या पूजा-पद्धति के मुकाबले आज भी सामाजिक प्रगति के लिए प्रासंगिक पाते हैं. गद्य-पद्यमय शरण साहित्य के रचयिताओं ने संगठित धर्मों को ‘सत्ता-प्रतिष्ठान’ माना. उनकी निगाह में ये जड़ संस्थाएं थीं जो मनुष्य को सुरक्षा और सुनिश्चित भविष्य का वायदा करती थी, जबकि शरणों के लिए धर्म गतिमान, स्वतःस्फूर्त और मुक्ति के सौदों से मुक्त था. अल्लम प्रभू के अनुसार, “गरीबों को भोजन दो, सत्य बोलो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, नगर के लिए पानी की टंकियां बनवाओ. तुम मृत्यु के बाद स्वर्ग चले जाओगे, लेकिन हमारे परमात्मा के सत्य के नज़दीक भी नहीं पहुँच पाओगे. जो मनुष्य हमारे इष्ट को जानता है, उसे बदले में कुछ मिलता नहीं. ”

दुर्भाग्य से समय बीतने के साथ जैसा कि बहुत से क्रांतिकारी धार्मिक आन्दोलनों के साथ इतिहास में होता रहा है, वीरशैव मत में अनेक ऐसी चीज़ों का दाखिला होता गया जिनका बसवेश्वर ने निषेध किया था. मंदिर-पूजा बहाल हुई जिसके बारे में बसवेश्वर ने कहा था –

‘धनवान शिवमन्दिर बनवाते हैं,
मैं गरीब मैं क्या कर सकता हूं।
मेरे पैर ही मिनार, शरीर ही मन्दिर,
सिर ही सोने का मुकुट है,
कूडल संगमदेव ! जड़ नाशमय है चेतन अविनाश है।’
( ‘बसवेश्वर’- ले. काशीनाथ अम्बलगे, पृष्ठ १६)

कर्मकांड वापस आए, गुरु को शिष्य द्वारा भेंट देने की परम्परा वापस आई, सामाजिक स्तर-भेद पैदा हुए और जंगम वरीयताक्रम के अंतर्गत गुरु-शिष्य सम्बन्ध का नितांत व्यक्तिगत होना संस्थाबद्ध हुआ. जिस लिंगायत आन्दोलन के तहत बसवन्ना ने ब्राह्मण युवती और मोची युवक की शादी कराई क्योंकि दोनों ही लिंगायत थे, वह आन्दोलन न रह कर बाद में स्वयं एक जाति बन गया. लिंगायत आन्दोलन और विचार का धर्म के रूप में संस्थाबद्ध होना तो मध्यकाल से ही चली आती परिघटना है, लेकिन वर्तमान समय में भारतीय लोकतंत्र की प्रतियोगी राजनीति ने जिस तरह जातियों को वोट में तब्दील किया उसके चलते विचारों पर आधारित सामाजिक समूहों ने भी वोटों का संख्याबल एकत्रित करने के लिए जाति के रूप में नयी आत्म-परिभाषा रची. लिंगायत आन्दोलन का जातिकरण इसी रास्ते हुआ जो आधुनिक परिघटना ही है. श्री कलबुर्गी ने गैर-बराबरी और शोषण पर आधारित राजसत्ता और धर्मसत्ता के द्वारा वीरशैव मत के आत्मसातीकरण का विरोध करना जारी रखा. उनके अनुसार वीरशैव मत में वैयक्तिक साधना या मुक्ति अथवा वैयक्तिक उन्नति के लिए जगह नहीं थी, बल्कि सामाजिक मुक्ति ही उसका मुख्य ध्येय है. अपनी इस धारणा के चलते वीरशैव मत के जंगम सम्प्रदाय जहां वैयक्तिक मुक्ति पर बल है, उसके पञ्च पीठों से भी उनका विरोध का रिश्ता रहा. ‘कल्याण का पतन’ नाटक में बसवेश्वर का संवाद है, “ सार्वभौम अनुभव और कुछ नहीं, बल्कि अध्यात्मिक अनुभव का सामाजीकरण है. हर व्यक्ति को सार्वभौम अनुभव होना चाहिए लेकिन यह जनता के लिए तब तक संभव नहीं जब तक वह पुरानी व्यवस्था को नष्ट करके नयी व्यवस्था कायम नहीं करती. (‘दि फॉल ऑफ़ कल्याण’, पृष्ठ ३३ ) सामाजिक मुक्ति की धारणा पर बल देने के लिए श्री कलबुर्गी १२ वीं सदी के शरण आन्दोलन को भक्ति आन्दोलन से भी भिन्न बताते हैं. इसी साल जून महीने में (पहले भी उद्धृत) एक भाषण में उन्होंने कहा, “ भक्ति आन्दोलन ने वैयक्तिक मुक्ति और व्यक्ति के दैवीकरण पर जोर दिया. लेकिन शरण आन्दोलन ने सामाजिक बदलाव पर बल दिया. भक्ति आन्दोलन व्यक्ति की बेहतरी तक सीमित रहा जबकि शरण आन्दोलन ने सामाजिक प्रगति के लिए प्रयास किया.” संभव है कि उनका यह कथन हम में से भी कुछ को अटपटा लगे, क्योंकि हम हिन्दी-उर्दू भाषी क्षेत्र के लोग कबीर के सामाजिक विचारों से परिचित हैं. लेकिन बसवेश्वर कबीर से भी दो शताब्दी पहले पैदा हुए थे और सैकड़ों शरणों, शरणियों का समूचा वचन साहित्य सामाजिक क्रान्ति के विचार से ओत-प्रोत है. भक्ति आन्दोलन से उनकी भिन्नता और समानता के बिंदु हम तब तक ठीक से नहीं समझ पाएंगे जब तक हम इस पूरे साहित्य का अवगाहन न करें. यह वचन साहित्य अधिकाँश में अछूत, शूद्र आदि कही जानेवाली जातियों के संतों और स्त्री संतों द्वारा रचा गया, जबकि उसके आदि-प्रणेता बसवन्ना स्वयं ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे. श्री कलबुर्गी ने पारंपरिक धर्मसत्ता और पूंजीवादी राजसत्ताओं द्वारा वीरशैव आन्दोलन को उसकी सामाजिक क्रान्ति की चेतना और विवेकवादी परम्परा से काट कर अपने हित में आत्मसात किए जाने के विरुद्ध जो संघर्ष छेड़ रखा था, उसी संघर्ष में लगे उनके एक सहयोगी जाने-माने लेखक और पत्रकार लिंगानासत्यमपेटे की करीब तीन महीने पहले गुलबर्गा में हत्या कर उनके शव को गटर में फेंक दिया गया. पिछले साल १२ जून को संघ परिवार के नेताओं आर.एस.मुतलिक, एस. एल. कुलकर्णी, प्रमोद कट्टी, मुकुंद कुलकर्णी, अनिल पोतदार आदि ने बंगलुरु में श्री कुल्बर्गी के मूर्ति-पूजा के खिलाफ दिए गए बयानों को हिन्दू भावनाओं को आहत करनेवाला बताते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी. हाल ही में उन्होंने लिंगायतों को हिन्दू धर्म से अलग बताया जिसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को और भी नाराज़ किया. नाराजगी सिर्फ आस्था और ज्ञान की व्याख्या को लेकर नहीं थी, बल्कि उसका ठोस राजनीतिक परिप्रेक्ष्य यह था कि भाजपा का कर्नाटक में बड़ा आधार ब्राह्मणों के अलावा लिंगायत समुदाय से आता है. भाजपा के मुख्यमंत्री २००४ में येदुरप्पा ही बनाए गए जो लिंगायत समुदाय से आते हैं.

लेकिन श्री कुलबर्गी ने किसी तात्कालिक राजनीतिक कारणों से यह वक्तव्य नहीं दिया था. यह उनका मत पहले से ही था जिसके ठोस ऐतिहासिक और तार्किक सन्दर्भ हैं. वचन साहित्य के संग्रह ‘समग्र वचन सम्पुट’ के पहले पांच खण्डों में ही वेदों और यहाँ तक कि वेदान्त के विरोध में शरण और शरणियों के बहुतेरे पद मिल जाएंगे, जिनका स्वर तीखा है. डा. एन. जी. महादेवप्पा ने वैदिक प्राधिकार, बहुदेववाद, वैदिक कर्मकांड, ब्राह्मण पुरोहितों, जाति-प्रथा, संन्यास, तीर्थाटन, मंदिर पूजा आदि का निषेध करने के चलते वीरशैव मत को हिन्दू धर्म से अलग माना है. (देखें http://lingayatreligion.com/Lingayat/Lingayatism_An_Independent_Religion.htm) महज ब्रहम और जीव की एकता के सिद्धांत के चलते अनेक लोग वीरशैव मत को व्रेदांत के विशिष्टाद्वैत मत के अधीन रखते हैं, लेकिन अद्वैत मत का सिर्फ एक ही स्रोत या परम्परा हो, यह आवश्यक नहीं. महादेवप्पा के अनुसार, ” यह एक आम गलतफहमी है कि लिंगायत मत उस शैव मत की ही एक उप-धारा है, जो शैव मत स्वयं हिन्दू धर्म का ही एक सम्प्रदाय है और यह भी कि लिंगायत शूद्र होते हैं. लेकिन पाठगत साक्ष्य और तर्क पर आधारित सत्य यही है कि लिंगायत मत हिन्दू धर्म का सम्प्रदाय या उप-सम्प्रदाय नहीं, बल्कि एक स्वतन्त्र धर्म है.”

वास्तव में भारत में हिन्दू धर्म के भीतर भी सुधार आन्दोलन बार-बार चले और उसके बाहर भी. मध्य-युग का भक्ति आन्दोलन और आधुनिक युग में आर्यसमाज, ब्रहम-समाज आदि भीतर चले आन्दोलनों के उदाहरण हैं. लेकिन अनेक बार समाज-सुधारक इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे कि रूढ़ियाँ इतनी बलबती हैं कि भीतर सुधार की गुंजायश नहीं है. आचार-रीति आदि ही नहीं बल्कि दर्शन के स्तर पर भी हिन्दू मुख्यधारा से भिन्न आन्दोलन चार्वाक, लोकायत, बौद्ध, जैन आदि हैं. कलबुर्गी और महादेवप्पा आदि विद्वान लिंगायत को भी इसी श्रेणी में रखते हैं. आधुनिक युग में पेरियार और आम्बेडकर के आन्दोलन भी स्वघोषित रूप से इसी श्रेणी के हैं. यह एक बहुत बड़ी परम्परा है जो हिंदुत्व की मुख्यधारा में न पड़ते हुए भी भारतीय है. आज प्रो. कलबुर्गी की शहादत के अवसर पर उनकी प्रेरणा को स्थायी बनाने के लिए नए किस्म की भारतीयता को आकार देने का सांस्कृतिक- सामाजिक संघर्ष भी उतना ही ज़रूरी है जितना कि राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक बराबरी का. आज भी जब हम अंतरजातीय और अंतर-धार्मिक प्रेम और विवाह करनेवाले युवक-युवतियों की ह्त्या होते देखते हैं तो गौतम, वशिष्ठ और मनु के वे सूत्र याद आते हैं ( देखें – ‘धर्मशास्त्र का इतिहास- पी. वी काणे) जिनमें नीचे और ऊंचे कुल के बीच होनेवाले विवाहों के लिए विवाह करनेवाले स्त्री या पुरुष को मृत्युदंड देने के भयावह तरीकों का विधान किया गया है. वहीं बसवेश्वर को याद कीजिए जो ब्राह्मणी युवती और मोची युवक का विवाह कराते हैं और स्वयं उसका परिणाम भुगतते हैं. खुद सोचिए किस रास्ते आप नए भारत को ले जाना चाहेंगे.

मातृभाषा में मौलिक चिंतन का प्रतिमान

प्रो. कलबुर्गी १९८० के दशक के कन्नड़ भाषा आन्दोलन ( गोकाक आन्दोलन) के अग्रणी लोगों में थे. कन्नड़ अभिनेता डा. राजकुमार उसके सर्वमान्य नेता थे और शायद ही कोई महत्वपूर्ण कन्नड़ लेखक उस समय ऐसा रहा हो जो आन्दोलन में शामिल न रहा हो. श्री कल्बुर्गी आन्दोलन के प्रथम सत्याग्रहियों में थे. उन्होंने १०३ पुस्तकें लिखीं और यह साबित किया कि आज के समय में भी मातृभाषाओं में चिंतन और शोध के उच्चतम शिखर छुए जा सकते हैं. ख़ास कर उनकी रचनाएं अंग्रेज़ी में नहीं मिलतीं, अनूदित रूप में भी बहुत कम मिलती हैं. उन्होंने अपने कई यशस्वी समकालीन कन्नड़ लेखकों जैसे ए.के. रामानुजन की तरह मातृभाषा और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में एकसाथ नहीं लिखा. प्रायः रचनात्मक साहित्य तो मातृभाषाओं में रचा जाता है लेकिन वैदुषिक साहित्य को अंग्रेज़ी जैसी विश्व-भाषा में रचने का भारत में चलन है, ख़ास कर शिखर विद्वानों के बीच. श्री कलबुर्गी ने इसे स्वीकार नहीं किया. वे मातृभाषाओं में शिक्षा देने के प्रबल हिमायती थे और हाल ही में उन्होंने कर्नाटक सरकार से मांग की थी कि वह केंद्र सरकार से अपनी भाषा नीति स्पष्ट करने को कहे.

मित्रों, प्रो.कुलबर्गी, कामरेड गोवेंद पानसारे और डा. दाभोलकर की हत्याएं तथा पाकिस्तान और बांग्लादेश में परिपाटी से हट कर मुक्त विचार रखनेवालों की हत्याएं यह बताती हैं कि सही और सच्चे विचारों से क़ानून, राजनीति और विचारधारा के स्तर पर निपट पाना धर्मसत्ता, राजसत्ता, पितृसत्ता, पूंजी की सत्ता और वर्ण-व्यवस्था की सत्ता के व्यापक गठजोड़ के बावजूद इन ताकतों के लिए मुश्किल पड़ रहा है. इसीलिए व्यक्तिगत हत्याओं का सहारा लिया जा रहा है. नए भारत की खोज के लिए शहीद हुए इन अग्रजों के उसूलों और विचारों को आम जनता के बीच रचनात्मक प्रयासों से लोकप्रिय बनाना ही वह कार्यभार है जो उस लोकजागरण के लिए ज़रूरी है जिस के लिए वे जीवन भर संघर्षरत रहे और जो भारत के भविष्य की एकमात्र आशा है.

प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच












6/25/15

''दिल्ली'' हम तुमसे बदला जरूर लेंगे! -महेश्वर

[साथी गोरख की ख़ुदकुशी (?) के बाद जनमत में महेश्वर का लिखा मार्मिक संपादकीय। कवि-आलोचक-संपादक-संगठक महेश्वर को आज उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हुए] 
महेश्वर और गोरख 
...लेकिन, दिल्ली.... ओ दिल्ली! तुमने अपनी फिजाँ में इस कदर विसंस्कृति का जहर घोर रखा है कि उसके बहुतेरे आस-पास वाले भी उसे ‘बहुत गहरे’ समझने के अपने छिछलेपन का प्रदर्शन करते नजर आए। न जाने क्या क्या लिख रहे हैं वे उसकी ''चाहत'' पर! उसने तो कभी चालू फिकरों से काम नहीं लिया लेकिन ये.... ये तो उसकी मौत पर लिखते हुए भी चालू फिकरों की कैद से छूट नहीं पा रहे हैं। उसकी ''चाहत'' को महज ''प्यार'' तक और ''प्यार'' को भी महज ''लड़कियों'' तक सीमित रखते हुए, उन्होंने उसके भूगोल को बेइन्तहा सीमित कर दिया है--जे.एन.यू. के किसी नगण्य ‘स्वप्न लोक’ तक! घसीटा भी कुछ दूर, तो उस ''राजनीतिक आस्था'' के खिलाफ, जिससे वह ताजिंदगी जुदा नहीं हुआ !! बहुत खूब! इतना ही समझे, और उसमें भी इतना कम!!....

वह दिल्ली गया था ''ग़ालिबो-मीर की दिल्ली'' देखने, पर वह दिल्ली को देखकर हैरान रह गया--‘उनका शहर लोहे से बना है, फूलों से कटता जाए!!’। गोरख से बात करते हुए हमने पूछा था बनारस में, कि क्या मतलब है ''फूलों से कटता जाए है'' का। अपनी चिर-परिचित विस्मय की मुद्रा और चहक के साथ बोला था वह-- '' कटता जाए है से मेरा मतलब ‘कटता जाए है’ है भाई, ‘अलग-थलग पड़ता जाए है’ नहीं! तब तो अचकचा कर रह गए थे हम, और आगे कुछ पूछा भी नहीं। लेकिन अब उसका अर्थ खुलता नजर आ रहा है-- और खुलता नजर आ रहा है उसकी खुदकुशी का अर्थ भी। याद आ रही है उसकी ‘फूल’ कविता-- ''फूल हैं गोया मिट्टी के दिल हैं धड़कते हुए/ ...मौत पर खिलखिलाती हुई चम्पई जिंदगी/...जो कभी मात खाए नहीं/...खूबसूरत हैं इतने की बरबस ही जीने की इच्छा जगा दें/...कि दुनिया को जीने के लायक बनाने की इच्छा जगा दें।'' लोहे का शहर मौत पर खिलखिलाती हुई इसी चम्पई जिंदगी--यानी, उसके शब्दों में कहें तो--‘फूलों’ से कटता जा रहा था। वह अपनी जद्दोजहद में इस लोहे के शहर को कटता हुआ देख रहा था और कुछ हद तक सपफल भी हुआ था--कम से कम कविता में। उसने दिल्ली में तीसरी धारा की कविता का --यानी, क्रांतिकारी धारा की कविता का -- जिसके पीछे एक जनशक्ति थी और जिसका उसे गुमान भी रहता था-- लोहा मनवा लिया था। लेकिन वह इसे भौतिक जीवन का साकार सच मानने की हद तक चला गया था शायद। और यहीं एक खतरा था। कोमलता-- जिंदगी में कोमलता उसकी मांग थी। अपने तईं की जिंदगी को ऐसा बनाने में भी उसने कोई कोताही नहीं बरती। लेकिन क्या ऐसा नहीं होता कि जैसी जिंदगी--जैसी दुनिया--आप बनाना चाहते हों, उसकी चाहत आपको अपनी जिंदगी में भी लोगों से होने लगे... यानी, चाहत लोगों को गहरे उतरकर समझने की और लोगों द्वारा भी खुद को गहरे में समझे जाने की? लोगों को प्यार देने की, तो लोगों से भी, रंचमात्र ही सही, प्यार पाने की? सह-अनुभूति की--ऐसे लोगों से घिरे रहने की, जो आपको प्यार करते हों?.... गोरख में यह चाहत थी और बाद को तो खूब थी। जो उसे सचमुच जानते हैं, वे जानते हैं कि यह सबकुछ उसमें किस हद तक था।....

लेकिन किसी भी आदमी में एक हद से ज्यादा कोमलता और इस चाहत का होना बहुत अच्छा नहीं होता। वह आदमी को अतिसंवेदनशील बना देती है। वह आदमी के भीतर एक और आदमी पैदा कर देती है, जो उसकी गति को रोककर उसे उसकी चाहत का बंदी बनाने की ओर ले जाता है, वह आदमी को विभाजित कर देता है। ऐसा नहीं कि गोरख इससे सचेत नहीं था। वह अपने इस दूसरे आदमी से लड़ता था-- ''नहीं बिना गति नहीं मुक्ति भी नहीं/ नहीं-नहीं तो जीने का प्रण नहीं!'' और जब भी यह मध्यवर्गीय चाहत उसकी गति को रोकती थी, लगता था वह जीने का प्रण भी छोड़ देगा। इस आत्मसंघर्ष में वह विजयी रहा-- कम से कम कविता में। उसकी कविता में यह ‘दूसरा आदमी’ अपना सिक्का नहीं जमा पाता। कविता में वह पूरी शक्ति के साथ बोलता था। उसे लगता था कि एक हरहराता हुआ जनज्वार आने वाला है: और वह ‘जनता की पलटनियां’ का गीत गाने लगता था। वह बेहिचक बोलता था- ''खुद-ब-खुद नहीं कहतीं हथकडि़यां झनझनाकर कि जाओ, तुम्हें आजाद किया/ उनहे चाहिए धारदार अस्त्र की भरपूर चोट।'' यहां वह कोमलता और अतिशय प्यार की चाहत को जगह नहीं देना चाहता था। वह कहता था- ''ऐसे में एक दूसरे के जख्मों पर पट्टी बांधने/ और एक दूसरे के साथ-साथ होने के सिवा / जानता हूं/ बेमानी है प्यार।'' बाद के दिनों में भी जब उसके भीतर ‘दूसरे आदमी’ से उसका भीषणतम संघर्ष जारी था-- जब उसकी रचनाओ में ‘मेलोडी’ का एक दूसरा स्तर कुछ प्रधान होने लगा था-- तब भी उसकी आग दहक रही थी। इन दिनों वह ‘गा़लिबो-मीर’ और ‘जफर’ की लय में बोलने लगा था। तकलीफ से भरी उमड़ती लय के भीतर भी एक नया संयम लाने की कोशिश कर रहा था वह, और कर रहा था वह अपने भीतर एक नया संयम लाने की जद्दोजहद। कभी ग़ालिब के ''रगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं काइल'' गाते-गाते गाने लगता था-- '' जो रगों में दौड़ के थम गया, अब उमड़ने वाला है आंख से/ वो लहू है जुल्म के मारों का, या कि इन्कलाब का ज्वार है!'' और कभी ''रोज मामूरा ए दुनिया में खराबी है ‘जफर''’ को गुनगुनाते-गुनगुनाते उसे बदलने लगता था-- ''हैं कम नहीं खराबियां फिर भी सनम दुआ करो/ मरने की तुमपे ही चाह हो जीने की सबको आस हो!''....

अपनी ''प्यास का एक किस्सा'' सुनाते हुए गोरख गुनगुनाने लगता था-- ''सुनना तेरी भी दास्तां अब तो जिगर के पास हो'' लेकिन उसके आसपास के सभी लोग तो भयानक रूप से उदासीन हो गए थे, और कुछ तो निदर्यता की हद तक कठोर। उसके अपने बहुत करीबी मित्र भी उतने संवेदनशील नहीं रह गए थे जितने की उसे जरूरत थी। जिस ''लोहे के शहर'' दिल्ली को वह फूलों से कटता देखने की हद तक आगे बढ़ गया था, उस ''लोहे के शहर'' दिल्ली ने उसके अपने मित्रों-परिचितों के भीतर भी अपरिचय, उदासीनता, उपेक्षा, बेरुखी और ईर्ष्या के न जाने कितने थूहर-जंगल उगा रखे थे। और यह सच है कि वह अपने को इसमें घिरा महसूस कर रहा था। यह जानते हुए भी कि ''धरती पर उगे हैं कांटे, धरती पर उगे हैं पहाड़, शरीर में उगे हैं हाथ, और हाथों में उगे हैं औजार''-- वह इनका प्रयोग इस ‘थूहर-जंगल’ पर तो कर नहीं सकता था। विसंस्कृतिकरण के इस थूहर-जंगल को-- जिसमें उसके- व्यापकतम अर्थों में- अपने लोग भी कहीं न कहीं कैद थे-- नष्ट भ्रष्ट करने के लिए जरूरी था एक सांस्कृतिक तूफान। और चाहे जो कहिए, वह इस तूफान का अग्रदूत होते-होते अंतर्मुखी हो गया। लोगों ने उसकी इस अंतर्मुखी यात्रा को महज मानसिक विक्षेप और पागलपन समझा। लेकिन यही विभाजित गोरख हमारे अपने समय का-- संव्रफमण के दौर का-- एक कटु सत्य है-- भारतीय समाज के संक्रमण काल का विकसित होता मायकोव्स्की। जी चाहे आप उसे ‘अधूरा मायकोव्स्की’ कह लें, मगर उसकी तुलना फिलहाल नहीं मिल सकती। जानते हैं, अपनी आत्महत्या से पहले अपने भीतर के ‘दूसरे आदमी’ के बारे में मायकोव्स्की ने क्या कहा था? उसने कहा था- '' मुझे राजनीति में, कविता में, यहां तक कि समुद्र पर हाथों में मेगाफोन लिए जब मैं ‘नेत्ते’ जहाज को संबोधित करता हूं--अपने भीतर के दूसरे मायकोव्स्की से कोई खौफ नहीं होता। लेकिन जब भावुकता की झील के पास, जहां बुलबुलें गाती हैं, जहां झिलमिलाता चांद नीचे उतरकर चांद की कश्ती खे रहा होता है-- वहां मैं एक भग्न नौका की तरह थरथराता हूं। इस बारे में मुझसे कुछ और मत पूछिए। वहां मेरा दूसरा मुझसे बली हो जाता है, मुझे जीत लेता है और वश में कर लेता है। और.... और कि मैं महसूस करता हूं कि अगर मैंने अपने असली ‘मेटलिक’ मायकोव्स्की की हत्या न कर दी, तो बहुत संभव है कि वह एक खंडित मनुष्य की तरह बस जीता चला जाए।'' इस पर लूनाचार्स्की कहते हैं--'' उसके इस दूसरे ने ‘मेटलिक’ मायकोव्स्की के एक हिस्से को चबा लिया था। उसने अपने दांत उसके भीतर गहरे गड़ा दिए थे, और मायकोव्स्की नहीं चाहता था कि जीवन के सागर में छेदों भरी नौका खेता रहे। सो, उसने बेहतर समझा कि शुरू में ही इस सिलसिले का अंत कर दिया जाए।'' क्या पता, हमारे मित्र गोरख को खण्डित मनुष्य हो जाने के एहसास की ‘बीमारी’ ने ही ग्रस लिया हो!.... ‘प्यास का एक किस्सा’ सुनाते हुए तो वह ऐसे ही किसी नजारे का वर्णन करता है, जहां उसका दूसरा बहुत मजबूत हो जाता है-- '' एक झीना-सा पर्दा था/ पर्दा उठा--/ सामने थीं दरख्तों की लहराती हरियालियां/ झील में चांद कश्ती चलाता हुआ/ और खुशबू की बांहों में लिपटे हुए/ फूल ही फूल थे।'' यह कौन बोल रहा है? गोरख? या कोई मायकोव्स्की?

बहरहाल, इस सवल को इतिहास पर छोडि़ए। छोडि़ए उनको भी, जो गोरख की जिंदगी में तो निष्ठुर रहे, लेकिन आज उसकी मौत के बाद, उसके भीतर के ‘दूसरे आदमी’ से सहानुभूति जतला रहे हैं-- और वह भी तौहीन भरी सहानुभूति--घसीटते हुए उसे उसकी राजनीतिक आस्था के खिलाफ--सिर्फ इस क्षुद्र स्वार्थ में, कि वे जिन नपुंसक विचारों के पोषक हैं, उनकी दुकान कुछ और सजा सकें! दुकान भी जो कि उनकी अपनी नहीं। हमें तो सच्चे, अपने दूसरे के खिलाफ लड़ते भरपूर शक्ति से बोलते गोरख से प्यार है। हम तो संवेदनाओं को नई ऊंचाइयों की ओर ले जाने के लिए-- ताकि कोई दूसरा गोरख ‘अपने दूसरे ’ के खिलाफ लड़ते हुए आत्महंता रास्ता न अख्तियार कर ले--अपने को झकझोरेंगे। और निस्संदेह, विसंस्कृतिकरण के थूहर-जंगल के खिलाफ नई संस्कृति का तूफान खड़ा करते हुए, ओ ''लोहे के शहर'' दिल्ली, हम तुमसे मनुष्यता की हत्या का बदला जरूर लेंगे...

5/24/15

डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी के बहाने कुछ बिखरे ख्याल

[साथी दिनेश का एक बहसतलब लेख। जरूरी नहीं कि आप इस लेख के निष्कर्षों से सहमत हों, पर लेख से गुजरते हुए उनकी वाजिब चिंताओं में साझा जरूर कर सकते हैं।]

समाज के दर्पण वाली बात को ध्यान में रखें तो यूँ प्रत्येक फिल्म का कथानक समाज में होने वाले कार्य-व्यवहारों से ही प्रेरित होता है और इस तरह सभी फ़िल्में सत्य घटनाओं पर आधारित मानी जा सकती हैं. परन्तु इस तरह की किसी धारणा की निर्मिति करना निश्चय ही प्रश्नों के दायेरे में आ जाना है क्योंकि कुछ फ़िल्में घोषित रूप से सत्य घटना पर आधारित होती हैं कुछ फ़िल्मी तत्वों से भरी हुई, जिनमें हमें यहाँ-वहाँ बिखरे हुए जिन्दगी के टुकड़े दिख जाते हैं. इसलिए इस तरह की किसी बात के लिए कोई ठोस धरातल हमारे पास नहीं है. लेकिन जब पचास-साठ के ‘सिनेमाई राष्ट्रनिर्माण’ युग से होते हुए सत्तर-अस्सी के ‘एंग्री यंगमैन’ व नब्बे के ‘मेलोड्रामाई’ युग को ध्यान से देखते हैं और तब सिनेमा में जिस चीज की कमी महसूस होती है, उस कमी की भरपाई करने की कोशिश दिवाकर की फिल्म ‘व्योमकेश बख्शी’ करती है.

ऊपर कही गई बात शायद ज्यादा समझ में आये यदि यह याद की जाने की कोशिश की जाये कि हमारे लोकप्रिय हिंदी सिनेमा में ऐसी कितनी फ़िल्में बनी हैं जिनमें हमारे भारतीय तवारीखों के अहम् पड़ाव व भारतीय जिंदगियों में घटित होने वाली अहम् घटनाएँ विषय बने हों. विश्व सिनेमा में हम ऐसी समृद्ध परम्परा जरूर देखते हैं. कोई आजादी के आन्दोलन के खास नायक को केंद्र में रखकर बनाई फिल्मों व ‘समानांतर सिनेमा’ दौर की फिल्मों को धड़ल्ले से गिना सकता है, लेकिन क्या आज़ादी आन्दोलन पर केन्द्रित मुख्यधारा की फ़िल्में महज दयनीय महानता की फ़िल्में नहीं कही जा सकती हैं? जो गुबार गुजर जाने के बाद भावुक फ़िल्मी गानों और काल्पनिक नायकों को रचकर झूठी आश्वस्ति और तसल्ली ही देती हैं, इशारा बहुत बाद में आई राजकुमार संतोषी की ‘द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ जैसी फिल्मों की तरफ नहीं है हालाँकि इस फिल्म से बहुत पहले आई एटनबरो की ‘गांधी’ के बरक्स देखने पर उसकी सीमाएं जाहिर हो जाती हैं, और क्या ‘समानांतर सिनेमा’ को पचास-साठ के दौर के सिनेमा से छूटे हुए कामों को पूरा करने और विस्तार देने वाला आन्दोलन नहीं कहा जा सकता? आज़ादी के बाद एक तरफ राजकपूर ने अपनी फिल्मों से शहरों के एक कोने में सिमटे वैभव के साम्राज्य और उसी शहर के दूसरे कोने में फैले घटाटोप अँधेरे, और तरक्की के लिए गावों से शहरों की ओर आने वाले नौजवानों-मजदूरों की दुर्गति, साथ ही साथ संपत्ति इकठ्ठा करने के लिए, सामाजिक असमानता के लिए जिम्मेदार, होने वाले गैरकानूनी धंधों और काला बाजारी की तस्वीरें दिखाई. गुरुदत्त पतनशील सामंती ध्वंसावशेषों की आखिरी तिलमिलाती हुई अकड़ और क्रूरता के साथ सामाजिक विसंगतियों को सामने लाते हैं वहीँ दूसरी तरफ दिलीप कुमार आज़ादी के बाद के उस रोबीले, उर्जा से भरे नौजवान के रूप में हमारे सामने आते हैं जो हर तरह की मुसीबतों से अकेले ही टक्कर लेने का माद्दा रखता है. इस दौर की फिल्मों के केंद्र में महानगर और कस्बे हैं. गावों पर केन्द्रित फिल्मों का नायक अवास्तविक है जो एक सीमा तक सामंती अत्याचार सहने के बाद अकेले ही सामंत से टक्कर लेता है जो वायवीय सा ही प्रतीत होता है. यहाँ गाँव का खुरदरापन नहीं है, जाति की समस्या नहीं है, भूमि की समस्या नहीं है, बंधुवा मजदूरी की समस्या नहीं है, गाँवों के सवर्णों द्वारा गाँव के दलितों पर किये जाने वाले अत्याचार नहीं हैं, महिलाओं पर होने वाले अत्याचार नहीं हैं. इस सब को पर्दे पर लाने की जिम्मेदारी पहले-पहल लेता है समानान्तर सिनेमा, लेकिन इस दौर में भी किसी एक कड़ी को पकड़कर कथा विकसित कर फ़िल्में नहीं बनाई गईं, पूरे भारतीय समाज में फैली विसंगतियों को बाहर लाना और मनुष्य की मनुष्यता को बचा लेना ही इस दौर की फिल्मों का उद्देश्य रहा है.

बात कुछ भटकती हुई सी लग सकती है लेकिन अपनी बात स्पष्ट करने के लिए इतनी बाते जरुरी थीं. अब वह बात जिसका मैंने ऊपर इशारा किया था कि विश्व सिनेमा में बायोपिक, किताबों पर निर्मित होने वाली फिल्मों, किसी खास दौर में घटी किसी घटना की कड़ी को पकड़कर कथा विकसित कर फिल्में बनाए जाने की जो समृद्ध परंपरा है उसकी शुरुआत ‘व्योमकेश बख्शी’ से मानी जा सकती है. हालाँकि इस बात से कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, मैं भी किताबों पर आधारित फ़िल्में मसलन ‘साहब बीबी और गुलाम’, ‘गाइड’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और अन्य दूसरी फिल्मों को भूल नहीं रहा हूँ, लेकिन कई बार यह देखा गया है कि मूल किताब को पढ़कर होने वाला असर उन पर बनने वाली हिंदी फिल्मों को देखकर वही असर नहीं पैदा हो पाता. ‘गाइड’ कई अन्य वजहों से एक कालजयी फिल्म हो सकती है लेकिन इस फिल्म में बरसात कराकर अंत को जिस तरह से बदला गया है उससे सन्यासी बने राजू गाइड के मृत्यु के दृश्य से, किताब पढ़कर जो भाव पैदा होते हैं, एक अनास्था जगती है वह फिल्म में बरकरार नहीं रह पाती. वैसे तो विश्व सिनेमा में किताबों पर आधारित कई फिल्मों का निर्माण हुआ है लेकिन मैं विशेष रूप से जर्मनी में नाजी शासन काल में यहूदियों के कत्लेआम पर बनी ‘मार्क हर्मन’ की फिल्म ‘द बॉय इन द स्ट्रिप्ड पेजामा’ का उदाहरण देना चाहूँगा. फिल्म जर्मन लेखक ‘जॉन बोयने’ की इसी नाम की किताब पर बनी है. यह फिल्म एक नाजी अफसर के छोटे बच्चे की कहानी है जिसकी मुलाकात उसके घर से कुछ दूरी पर स्थित यातना गृह में कैद एक यहूदी छोटे बच्चे से होती है, वे दोनों दोस्त बन जाते हैं, जिसकी खबर बच्चे के नाजी अफसर पिता और माँ को नहीं है, बच्चे की माँ घर के पास स्थित यातना घर में यहूदियों के जलाए जाने से उठते धुएं और दुर्गन्ध से बच्चों पर विपरीत असर पड़ने का हवाला देकर वहां से अपने बच्चों को दूर ले जाने के लिए अपने पति को राजी करती है, उधर उनका बेटा अपने नए बने दोस्त यहूदी लड़के से उसके पिता के बारे पूछता है, वह अपने पिता के खो जाने की बात बताता है, वह छोटा बच्चा अपने यहूदी दोस्त को उसका पिता ढूँढने में मदद करने के लिए कहता है. इधर उस बच्चे की माँ जाने की सारी तैयारी कर चुकी होती है उधर उसका बेटा अपने यहूदी दोस्त के साथ उसके पिता को ढूँढने में मदद करने के लिए किसी तरह कंटीले बाड़े के बीच से यातना घर में घुसने में सफल हो जाता है, लेकिन अन्दर घुसते ही नाजी सैनिक सभी यहूदियों को भट्टियों में भेजना शुरू कर देते हैं. जलाए जाने के लिए भेजे जाने वाली यहूदी कतारों में वे दोनों छोटे बच्चे भी हैं. जब तक नाजी अफसर अपने बेटे को बचाने के लिए यातना घर में पहुँचता है उन दोनों बच्चों को भट्टियों में डाला जा चुका होता है. फिल्म का यह अंत सामान्य नहीं रहने देता. फिल्म का यह अंत बहुत देर तक पीछा करता है, आसानी से बाहर नहीं निकलने देता. सवाल किया जा सकता है हिंदी फिल्मों में कितनी ऐसी फ़िल्में हैं? कितनी फ़िल्में गुजरात नरसंहार पर बनी? कितनी फ़िल्में बाथे, बथानी, मिर्चपुर के दलित नरसंहार और हाशिमपुरा, मुजफ्फरनगर में मुस्लिमों के कत्लेआमों पर बनीं? यहाँ से देखने पर लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के बरक्स दस्तावेजी फ़िल्में ज्यादा आश्वस्त करती हैं. हिंदी के लोकप्रिय सिनेमा में बनने वाले बायोपिक में भी, खास तटस्थता के साथ समबन्धित व्यक्ति की जिन्दगी को सामने लाने के बजाए एक जबर्दस्ती की हीरोइक छवि का निर्माण कर और किसी के जीवन के नितांत व्यक्तिगत को मसालेदार बनाकर मुनाफा कमाने की मंशा ही प्रबल होती है.

पहले भी कहा जा चुका है कि घटना विशेष के किसी सूत्र को पकड़कर व उसपर कथा विकसित कर इतनी तैयारी के साथ हिंदी में कोई फिल्म पहली बार बनाई गई है तो शायद वह ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी’ है. दूसरे विश्वयुद्ध की छाया में कोलकाता में चीनियों और जापानियों के अफीम व हेरोइन के बढ़ रहे कारोबार के सूत्र को पकड़कर बड़ी बारीकी से दिवाकर और उर्मि मिलकर जासूसी पृष्ठभूमि वाली कथा को विस्तार देते हैं. पहली बार हिंदी फिल्मों में ‘दूसरे विश्व-युद्ध’ का प्रसंग देखकर फिल्मों की सोहबत में रहने वाले एक आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी महसूसते हैं कि जो क्षेत्र लोकप्रिय हिंदी फिल्मों के लिए अछूते थे वे अब हिंदी फिल्मों का हिस्सा बन रहे हैं. हिंदी सिनेमा का कथानक व्यापक होने लगा है. भारत विश्व-युद्ध से अछूता देश नहीं था, विश्व-युद्ध का क्या प्रभाव देश में पड़ा, सिनेमा में यह प्रभाव अभी मुकम्मल तौर पर अलग-अलग कोणों से आना बाकी है.

दिवाकर 1942 के विंटेज युग का, दूसरे विश्वयुद्ध की गहमागहमी से भरे कोलकाता को उसी खूबी से पर्दे पर उतारते हैं जिस खूबी के साथ शेर्लोक होम्स श्रृंखला की फिल्मों में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के इंग्लैंड का कोई शहर पर्दे पर दिखा था. कैमरे का प्रत्येक फ्रेम क्लासिक दौर की एक पेंटिंग सरीखा है जहाँ रंग बहुत चटकीले तो नहीं हैं लेकिन अपनी पूरी भव्यता के साथ मौजूद हैं. चूँकि फिल्म का कथानक एक जासूसी पात्र पर आधारित है तो फिल्म की शुरुआत भी खून-खराबे से शुरू होती है जैसे कि शेर्लोक होम्स श्रृंखला की फ़िल्मों की शुरुआत रहस्यमय तरीके से होने वाली मौतों से होती है. फिर डिटेक्टिव नायक के कॉलेज में ही पढ़ने वाले अजित बैनर्जी (आनंद तिवारी) के गायब पिता को खोजने के दौरान नायक के साथ-साथ जब दर्शक दृश्य-दर-दृश्य से गुजरता है तो हिंदी फ़िल्म देखते हुए वह एक अपनी तरह का अनुभव है.

पहले ही दृश्य में 1942 का कोलकाता पूरी रवानगी के साथ मौजूद होता है, सामने से आती हुई विंटेज कार, सड़क किनारे नहाते और दातून करते हुए लोग, सड़क को पार करते हुए बंगाली पोशाक में लोग, ‘जय बंगाल’ के चिपके हुए पोस्टर, पीछे तांगा, उसके पीछे ट्राम, ट्राम की खिड़की से दिखती बाजार की जीवंतता, सर पर कनस्तरों का बोझ लिए जाता हुआ मजदूर, सामान गाडी, फूलों की टोकरी सर पर रखे गुजरता हुआ माली, कार, जीप, डबल डेकर बस व ट्राम के जाम के बीच से सड़क पार करता हुआ डिटेक्टिव नायक, बाजार में चीनी नामों के साइन बोर्ड, बाजार से खरीददारी करते चीनी नागरिक, यह सब मिलकर एक असामान्य दृश्य रचते हैं. ऐसी ही दृश्यों का रचाव इस फिल्म को अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों के बराबर लाकर खड़ा कर देते हैं. याद कीजिये उस दृश्य को जहाँ व्योमकेश बक्शी एक प्राइवेट प्रॉपर्टी में भुवन बाबू के क़त्ल के सिलसिले में जांच करने आता है लेकिन पीछे से नदी किनारे साड़ी पहने खड़ी दिखती है एक औरत जो धीरे-धीरे अपनी साड़ी उतारकर स्विम सूट में प्रकट होती है, वह औरत जब तैरकर बाहर निकलती है तब दर्शकों का वाबस्ता होता है एक गरिमामय, असीम सुन्दर व रहस्यमयी पात्र अंगूरी देवी (स्वास्तिका मुखर्जी) से. किसी हिंदी फिल्म में इतनी निरपेक्षता के साथ फिल्म के किसी महत्वपूर्ण किरदार, जो पूरी कांसिपिरेसी का एक महत्वपूर्ण अंग है, का परिचय हुआ हो याद नहीं पड़ता. फिल्म में शहर की गलियों, इमारतों, कहवा घरों, पुलिस हेडक्वार्टर और ‘गजानन सिकदार’ के घर के अन्दर के दृश्यों का संयोजन जहाँ हर व्यक्ति और वस्तु पर संदिग्धता पसरी हुई है, दर्शकों को कायल बना लेती है. रहस्यमय वातावरण को बनाए रखने के लिए फिल्म का जरुरत से ज्यादा डार्क कलर थोड़ा परेशान करता है लेकिन दर्शकों को बांधे भी रखता है.

जैसा कि कहा गया है एक व्यापक कथानक को समेटे हुए ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी’ हिंदी लोकप्रिय सिनेमा में आगाज है, तो जाहिर है अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मानकों को छूती हुई इस फिल्म के कुछ दृश्यों में हल्कापन भी होगा ही. फिल्म के आखिरी हिस्से में जहाँ व्योमकेश बक्शी, योंग वांग और भुवन बाबू के क़त्ल की गुत्थी डॉ. गुहा (नीरज काबी) के सामने खोल रहा है तो वहां डॉ. गुहा का हँसते हुए उतावलेपन के साथ व्योमकेश बक्शी को बताते रहने को कहते जाना दृश्य को सामान्य बना देता है. वैसे ही एक जासूसी पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में जब सारी गतिविधियाँ, सारी घटनाएँ अपने जासूस नायक के मदद करने के लिए गढ़ी गई प्रतीत होने लगें तो वह असर बना नहीं रह पाता क्योंकि ऐसे दृश्य जासूस द्वारा घटनाओं की परतें खोले बगैर ही रहस्य के सूत्र दर्शकों को पकड़ा देते हैं. मसलन ‘अश्वनी बाबू’ आलमारी में छिपाकर रखे पान के डिब्बे की तरफ बार-बार इस तरह देखते हुए प्रतीत होते हैं जैसे वे ‘व्योमकेश’ को पान के डिब्बे के बारे में बताना ही चाह रहे हों. ऐसे ही जब ‘अंगूरी देवी’ ‘व्योमकेश’ से यह बताती है कि ‘योंग वांग’ ने मुझे तुमसे बचकर रहने के लिए कहा था, क्योंकि मैं जब कुछ छुपाने की कोशिश करुँगी तो पीछा नहीं छोड़ोगे, उसी तरफ जाओगे. ऐसे दृश्य डिटेक्टिव और दर्शकों दोनों का ही काम आसान करते प्रतीत होते हैं.

दिवाकर ने इस हिंदी फिल्म से जिस वैश्विक सिनेमा भाषा से भारतीय दर्शकों को परिचित कराते हैं उनके कुछ समकालीन भी लगभग वैसी ही भाषा वाले सिनेमा के निर्माण में सक्रिय हैं. यहाँ दूसरी अन्य लोकप्रिय हिंदी फिल्मों की तरह सब सापेक्ष ही नहीं है. यहाँ घटनाओं और दृश्यों में अनिश्चतता है, निरपेक्षता है जो हिंदी फिल्मों के दर्शकों के लिए नितांत नई चीज है. आने वाले समय में ये फ़िल्में भारतीय दर्शकों के फिल्म संस्कार को बदलने में भी जरूर कामयाब होंगी. वृहत कथानक को समेटने वाली फिल्मों की शुरुआत ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी’ से हुई है यही इसका महत्व भी है.

---  दिनेश 
आइसा नेता व
शोधछात्र ,दिल्ली विश्वविद्यालय

1/19/15

मुरुगन पुनरुज्जीवित होंगे... प्रणय कृष्ण

मैं भी मुरूगन                      

तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने 14 जनवरी को फेसबुक पर लिखा, "लेखक पेरूमल मुरुगन मर गया. वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता. वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता. आगे से, पेरूमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर ज़िंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है." अब तक मुरुगन के खिलाफ धर्म और जाति के स्वयंभू ठेकेदारों से लेकर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक़ में आवाज़ उठाने वाले लोगों ने लाखों शब्द व्यय किए होंगे, लेकिन लेखक की पीड़ित अंतरात्मा की यह तीन पंक्तियां सब पर भारी हैं. लेखक मर गया, लेकिन 2015 के हिन्दुस्तान के राज और समाज की हिंसक दयनीयता जी रही है. मुरुगन का वक्तव्य ऐसे वक्त पर टिप्पणी है जिसमें जनता की वंचनाओं और हाहाकार को एक सामूहिक पागलपन की ओर मोड़ देने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं. अतीत की रमणीय कपोल-कल्पनाओं और भविष्य के मादक सपनों की गरज के बीच आज के भारत की कराह सुनाई देनी बंद होती जा रही है. वे सारे परदे जिनपर चित्र और चलचित्र दिखाई देते हैं और वे सारे यंत्र-तंत्र जिनसे आवाजें सुनी जाती है, झपट लिए गए हैं. मानव विकास सूचकांक में दुनिया के 135वें पायदान पर खड़े भारत की वर्तमान वास्तविकता, वास्तविक अतीत तथा यथार्थपरक भविष्य के चित्र और स्वर अदृश्य और गूंगे बनाए जा रहे हैं. 

आस्था में चार साल की देरी से आए उबाल के तहत मुरुगन के जिस उपन्यास को पिछले दिसंबर महीने से निशाना बनाया गया है, वह 2010 में प्रकाशित हुआ था जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद 'वन पार्ट वुमन' के नाम से 2013 में पेंग्विन से छप कर आया. रोचक यह है कि इस उपन्यास में न तो ईशनिंदा है और न ही किसी धर्म या उसकी प्रथाओं का विरोध. उपन्यासकार ने उनपर व्यंग्य भी नहीं किया है, न कोई भंडाफोड़ किया है. उपन्यास का संवेदनात्मक उद्देश्य ही अलग है. मुरुगन की इतिहास-दृष्टि और सामाजिक चेतना मिथकों और आस्थाओं में लिपटे जीवन की वास्तविक धड़कनों और मर्म को इस उपन्यास में प्रत्यक्ष कर देती है, उनके दुश्मनों की निगाह में यही उनका अपराध है. उन्हें मुरुगन की कथा-सृष्टि भी सच की तरह डराती है. सच से ऐसा डर ही उन्हें सामाजिक सच्चाइयों के हर अनुसंधान या साहित्यिक पुनर्रचना को आस्था की तोपों से मार गिराने का अभ्यस्त बनाता है. सत्य से सत्ता का युद्ध बड़ा पुराना है, लेकिन हम जिस 2015 के भारत में रह रहे हैं, वहां सच के आखेटक पहले से अधिक मूर्ख, किन्तु प्रशिक्षित हैं. 

घटनाएं                        

27 दिसंबर, 2014 के 'द हिन्दू' अखबार के अनुसार तिरुचेंगोडे नगर की आर.एस.एस. इकाई के अध्यक्ष महालिंगम ने 26 दिसंबर के दिन 50 से अधिक लोगों का जुलूस निकाला और मुरुगन के इस उपन्यास की प्रतियां जलाई. भाजपा, आर.एस.एस. तथा कुछ अन्य हिंदूवादी संगठनों ने लेखक की गिरफ्तारी की मांग भी की (हालांकि अब जबकि लेखक के समर्थन में भी आवाजें तेज़ हो रही हैं, ये संगठन समूचे घटनाक्रम में अपनी भूमिका नकार रहे हैं). इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ बीस दिन पहले से मुरुगन को धमकियां मिल रही थीं. बाद में उपन्यास के विरोधस्वरूप शहर बंद भी कराया गया. 12 जनवरी को नमक्कल के जिला प्रशासन ने लेखक को उनके विरोधियों के साथ शान्ति वार्ता के लिए बुलाया. यहाँ प्रशासन ने मुरुगन को 'बिनाशर्त माफी' माँगने, अगले संस्करण में उपन्यास में वर्णित स्थानों का नाम बदलने और उसके 'आपत्तिजनक अंशों' को हटाने, वर्तमान संस्करण की अनबिकी प्रतियों को बाज़ार से वापस लेने और भविष्य में ऐसी कोई हरकत न करने का वचन देने संबंधी हलफनामे पर दबाव देकर दस्तखत कराया. इस प्रकार सरकारी देख-रेख में संविधान की धारा 19(1) (ए) की धज्जियां उड़ाई गयीं. ध्यान रहे मुरुगन जिस अंचल के लेखक हैं, उसी अंचल के एक सपूत थे 'पेरियार'. जातिप्रथा-विरोधी, अंधश्रद्धा-विरोधी, सेक्युलर और नास्तिक 'पेरियार' की कर्मभूमि पर एक लेखक के साथ यह सब कुछ होना भारी विडम्बना है. द्रविड़ आन्दोलन के साथ पेरियार की विरासत जुडी हुई है, लेकिन उसी आन्दोलन से निकली एक पार्टी तमिलनाडू की सत्ताधारी पार्टी है और दूसरी मुख्य विपक्षी पार्टी. सत्ताधारी पार्टी की भूमिका नमक्कल प्रशासन की हरकतों से ज़ाहिर है और विपक्षी पार्टी की भूमिका इस प्रकरण पर उसकी चुप्पी से. ( मामला तूल पकड़ने पर इस पार्टी ने लेखक के पक्ष में एक-दो बयान जारी करके छुट्टी पा ली है) अनेक लेखकों ने ठीक ही लक्ष्य किया है यह प्रकरण द्रविड़ पार्टियों की पस्ती के दौर में हिंदुत्व की ताकतों द्वारा तमिलनाडू में पाँव पसारने की कवायद का सूचक है. एक जागरूक नागरिक के रूप में मुरुगन अपने इलाके में शिक्षा की दुकानदारी के खिलाफ लिखते रहे हैं और पर्यावरण की धज्जियां उड़ानेवालों के खिलाफ भी. यह सारे निहित स्वार्थ भी उनके खिलाफ परदे के पीछे सक्रिय हैं. 

48 वर्षीय मुरुगन नमक्कल में शासकीय कला विद्यालय में तमिल पढ़ाते हैं. उन्होंने अबतक 35 पुस्तकें लिखीं है जिनमें 07 उपन्यास और तमिलनाडु के कोंगू (पश्चिम) क्षेत्र की बोलियों का शब्दकोष भी शामिल है. 

उपन्यास का कथानक                       

यह उपन्यास कोंगू अंचल के जन-जीवन का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करता है. इस अंचल के जंगल, पहाड़, वनस्पति, पशु-पक्षी, मेले, नृत्य, संगीत, खेल-तमाशे, हाट-बाज़ार, खान-पान, पहनावा, देवस्थान और उनसे जुडी आस्थाएं, लोकविश्वास और किसान जीवन को कथा में जीवंत इसीलिए किया जा पाया है कि उपन्यासकार उस अंचल का मार्मिक जानकार ही नहीं, गंभीर अध्येता भी है. 

उपन्यास के इसी आंचलिक परिवेश में निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना(पत्नी) और काली(पति) की कोमल कथा प्रवाहित है. दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं. लेकिन उनके paraparpapअकुंठ प्यार पर निस्संतान होने का ग्रहण लग जाता है. रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के ताने पोन्ना को ज़्यादा सुनने पड़ते है. तीज-त्यौहार और मांगलिक अवसरों पर कर्मकांडों के वक्त 'बाँझ स्त्री' के प्रति अपमानजनक व्यवहार के चलते वह धीरे-धीरे अपने घर की चहारदीवारी में सिमटती चली जाती है. काली को भी समय समय पर किसी न किसे प्रकरण में लज्जित होना पड़ता है. उसका भी सामाजिक जीवन सीमित होता जाता है. उसकी नपुंसकता की चर्चाएँ भी होती हैं. निस्संतान दंपत्ति की संपत्ति पर रिश्ते-नातेदारों ही नहीं, पड़ोसियों की भी निगाह है. काली को उसकी मां और दादी दूसरा विवाह करने की सलाह देती हैं. इस प्रस्ताव पर पोन्ना के मां- बाप को भी कोई ऐतराज़ नहीं है, वे इतने में ही संतुष्ट हैं कि दूसरी स्त्री के साथ उनकी बेटी भी उसी घर में रहे, निकाली न जाए. पोन्ना और काली भी कभी कभी एक दूसरे का मन टोहने या चिढाने के लिए आपस में दूसरे विवाह की बात करते हैं. पोन्ना सदैव ही भारी मन से ही सही, यह कहती है कि काली की खुशी के लिए वह इसके लिए भी तैयार है. वास्तव में दोनो ही एक दूसरे से इतना प्यार करते हैं कि मन बांटने के लिए इस प्रस्ताव पर चाहे जो चर्चा करते हों, उसकी वास्तविक संभावना को कभी मन में स्वीकार नहीं करते. काली की मां और दादी उनके परिवार पर देवी -देवताओं का श्राप मानती हैं. निर्वंश होने के श्राप से मुक्ति के लिए काली और पोन्ना वर्षानुवर्ष न जाने कितने देवी-देवताओं, मंदिरों-मठों का चक्कर लगाकर, न जाने कितनी पूजा-पाठ, व्रत-अनुष्ठान करके थक चुके हैं. काली की मां और दादी के पास परिवार पर श्राप के अलग अलग किस्से हैं. वे हर किस्से के अनुरूप श्रापमुक्ति के उपाय करते हैं. पाठक इन किस्सों में उस अंचल के तमाम सामाजिक संबंधों की भी झांकी पाता है. ये किस्से अलग-अलग जातियों के बीच, अलग अलग तबकों के बीच, आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, औपनिवेशिक समय में अंग्रेजों और देशियों के बीच, मनुष्य और देवता के बीच संबंधों की झलक दिखलाते है. ये किस्से उस अंचल के ऐतिहासिक-सामाजिक जीवन की मिथकीय अभिव्यक्तियाँ हैं. ऐसे किस्सों और लोकविश्वासों को पिरोने और अंचल के जीवंत नृवंशीय चलचित्र प्रस्तुत करने का हुनर मुरुगन अपने अनेक उपन्यासों में पहले भी दिखला चुके हैं. अपने अंचल के प्रति गंभीर ऐतिहासिक दायित्व का निर्वाह करते हुए उन्होंने अतीत के लेखकों द्वारा उस अंचल पर लिखी गई चीज़ों की खोज की और उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित किया. उन्होंने टी.ए. मुथूसामी कोनार द्वारा इस अंचल पर लिखे इतिहास-ग्रन्थ जिसे लुप्त मान लिया गया था, उसे खोजकर पुनर्प्रकाशित कराया. (देखें ए.आर. वेंकट चेलापति का लेख, 'द हिंदू', 12 जनवरी) 

एक भरा-पूरा, सुन्दर और संतुष्ट वैवाहिक जीवन सामाजिक मान्यताओं के चलते किस तरह अवसादग्रस्त होता है, लेकिन अवसाद के आगे पराजय नहीं मानता, इसे मुरुगन ने बहुत कोमल और संवेदनशील रंग-रेखाओं में अंकित किया है. काली और पोन्ना का निश्छल और उन्मुक्त प्यार समाज की मान्यताओं के टकराकर कैसे कैसे अंतर्द्वंद्वों से गुज़रता है, उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म कंपन को उपन्यासकार की लेखनी पकड़ लेती है. वे तत्व जो इन पात्रों के मन की सुन्दर गहराइयों में लेखक की उंगली पकड़ कर उतरने की जगह उन सुन्दर उँगलियों को ही तोड़ देने को पुरुषार्थ समझे बैठे हैं, उनका कलेजा सचमुच काठ का बना है. उपन्यास का अंत ट्रैजिक है. काली के दूसरे विवाह के प्रस्ताव और श्रापमुक्ति के सभी उपाय विफल होने पर पोन्ना और काली दोनों की मांएं एक अलग योजना बनाती हैं. अर्द्धनारीश्वर के स्थानीय मंदिर में हर साल तमिल वैकासी महीने ( मई-जून) में १४ दिन का मेला लगता है. चौथे दिन पहाड़ों से देवता उतरते हैं और उनकी रथ की सवारी अगले दस दिन निकलती रहती है, अंतिम दिन वे वापस चले जाते हैं. अंतिम दिन मेले में भारी भीड़ होती है और माना जाता है कि इस दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता होते हैं. निस्संतान स्त्रियों के लिए यह दिन भाग्यशाली होता है, जहां वे किसी देवता से समागम कर संतान-प्राप्ति कर सकती हैं. ऐसी संतानें देवता का प्रसाद या देव-संतानें मानी जाती हैं. काली की मां इस दिन पोन्ना को मेले में भेजे जाने के लिए काली को सहमत नहीं कर पाती. एक साल बीत जाता है. अगले साल मेला शुरू होने के समय काली का साला मुथु (जो उसका बाल-सखा भी है) बहन-बहनोई को इसके लिए राजी करने उनके घर आता है. मंदिर पोन्ना के घर से नज़दीक है. हर साल मेले के समय काली पोन्ना को लेकर अपने ससुराल जाया करता था और वहीं से वे मेला घूमने जाते थे. ऐसे में मुथु के आग्रह पर काली पोन्ना को तत्काल उसके साथ भेजने को राजी हो जाता है और खुद मेले के १४वे दिन आने का वादा करता है. लेकिन पोन्ना को देव-समागम के लिए भेजे जाने से वह इनकार कर देता है. मुथु बहन से झूठ बोलता है कि बहनोई काली ने इस बात की अनुमति दे दी है. पोन्ना को इसकी तस्दीक खुद काली से करने का वक्त नहीं मिलता, फिर भाई की बात पर अविश्वास का कोई कारण नहीं था क्योंकि काली और मुथु साले-बहनोई ही नहीं बाल-सखा भी थे. एक नाटकीय घटनाक्रम में चौदहवें दिन काली के ससुराल पहुँचाने के बाद मुथु सदा की तरह काली को लेकर खाने-पीने, मौज-मस्ती करने घर से खूब दूर ले जाता है, ताकि अगली सुबह तक दोनों लौट न पाएं. उधर पोन्ना के मां-बाप उसे लेकर बैलगाड़ी में मेले की ओर चल देते है. काली और मुथु दूरस्थ स्थान पर खाने-पीने के बाद सो जाते हैं. लेकिन काली की नींद आधी रात के बाद खुल जाती है. वह वापस ससुराल की ओर चल पड़ता है. भोर में वहां पहुँच कर जब उसे ताला जडा मिलता है, तो उस पर वज्रपात सा होता है. उसकी भावनाएं पछाड़ खाकर गिरती हैं. उसे लगता है कि पोन्ना ने उसके साथ धोखा किया है. यहीं उपन्यास ख़त्म होता है. 

ट्रेजेडी का भाव सघन इसलिए होता है कि दरअसल किसी ने किसी को धोखा नहीं दिया. मुथु, काली की माँ, उसके सास-ससुर- सभी काली और पोन्ना का दुःख दूर करना चाहते हैं. मुथु ने इसी खातिर बहन से झूठ बोला. पोन्ना मेले में जाने को खुद तत्पर नहीं है. वह काली को खुश देखना चाहती है, उसके किए बड़ा से बड़ा त्याग करने को तैयार है, ऐसे में उसकी रजामंदी जानकार वह मेले में जाने को तैयार होती है. यह निश्छल भावनाओं की ऐसी दुनिया है जहां हरेक व्यक्ति जो कर रहा है वह दूसरे की खुशी के लिए कर रहा है, लेकिन परिणाम वह निकलता है जो किसी ने न चाहा था. मेले की भीड़ में 'देवता' से उसकी भेंट सुगम हो सके, इसके लिए पोन्ना को अकेला छोड़ जब उसकी माँ गायब हो जाती है, तब के बाद का वर्णन उपन्यासकार की सामर्थ्य का सबसे ताकतवर साक्ष्य है. पोन्ना की मार्फ़त पाठक तमाम स्थानीय सांस्कृतिक कला-रूपों, नाटकों और रिवाजों की दृश्यावली से गुज़रता है, लेकिन सबसे बड़ा नाटक तो पोन्ना के मानसपटल पर अभिनीत हो रहा है. भारी भीड़ में अकेले होने के भय से शुरू करके अपरिचितों के बीच अनाम होने की खुशी तक उसके मन में अनेक भाव आते और जाते हैं. परिचय की दुनिया की हर नज़र उसे छेदती थी, क्योंकि वह निस्संतान थी. मेले में भीड़ का हिस्सा होकर वह ऐसी हर नज़र से आज़ाद थी, जहां न वह किसी को जानती थी और न कोई उसे. लेकिन अवचेतन के सह-सम्बन्ध और संस्कार उसकी निगहबानी बदस्तूर कर रहे थे. जब भी कोई 'देवता' उसकी ओर रुख करता, उसके और अपरिचित देवता के बीच काली का चेहरा परिचिति या स्मृति की छाया सा झिलमिला उठाता, क्योंकि पति से भी ज़्यादा काली वह व्यक्ति है जिससे वह सबसे ज़्यादा प्यार करती है. एक छोटे से स्वप्न-दृश्य में बचपन के प्यार का एक चेहरा भी कौंधता है. यह कोई नैतिक द्वंद्व नहीं है. काली के विपरीत पोन्ना के मन में इस प्रथा पर आस्था का कोई संकट नहीं है. काली की खुशी के लिए और अपने जानते में उसकी 'अनुमति' से ही वह 'देवता' की खोज में आई है, लेकिन क्या एक क्षण को भी काली को भूले बगैर 'देवता' से मिलन संभव हो पाएगा? इस द्वंद्व को उपन्यासकार ने चेतन और अचेतन के बीच, परिचित और अनजाने के बीच, सम्बन्ध-भावना और स्वातंत्र्य-कामना के बीच, मानवीय भाव-यंत्र और देवत्व के तसव्वुर के बीच - एक साथ अनेक स्तरों पर अभूतपूर्व संवेदनशीलता से अंकित किया है. अंततः पोन्ना इस द्वंद्व से पार जाती है, इसका संकेत करके उपन्यासकार आगे बढ़ जाता है. समागम का दृश्य उपस्थित करने और पाठक को गुदगुदाने की उसकी कोई इच्छा ही नहीं है. 

कहानी का अंत नहीं हुआ, लौटेगा कहनेवाला                  

उपन्यास के अंतिम दृश्य में काली को तड़पता देख पाठक की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है, लेकिन उपन्यास ख़त्म हो जाता है. पाठक के ज़ेहन में ढेरों सवाल हैं? क्या पोन्ना और काली का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाएगा? क्या काली यह जान कर कि पोन्ना को उसकी 'अनुमति' की झूठी जानकारी थी, उसे अपना लेगा? क्या पोन्ना यह जानकार कि उससे झूठ बोला गया था, अपराधबोध या आत्महंता भाव से ग्रस्त हो जाएगी? ऐसे में अपने माँ-बाप और भाई के प्रति उसका क्या रुख होगा? यदि वह अपने माँ-बाप और भाई को क्षोभ में त्याग दे और काली उसे फिर से न अपनाए, तो वह कहाँ जाएगी? यदि उसे देव-संतान होती है, तो उस संतान का भविष्य क्या है? श्री चेलापति ने अपने लेख में लिखा है कि ढेरों पाठकों ने लेखक को पोन्ना और काली की आगे की कहानी बताने के लिए अनेक पत्र लिखे. जवाब में लेखक ने उपन्यास को आगे के दो खण्डों में जारी रखने का वादा किया है, दोनों खण्डों के शीर्षक भी बताए हैं. मुरुगन को यह वादा निभाना ही पडेगा. लेखक की मृत्यु की घोषणा के बावजूद उसे खुद को पुनरुज्जीवित करना होगा. पाठक ज़रूर उन ताकतों से लड़ेंगे और जीतेंगे जो कि लेखक के पुनरुज्जीवन में बाधा हैं. 

मुरुगन के लेखक को मार देनेवाली ताकतों को इस उपन्यास की मूल संवेदना से कुछ लेना लादना नहीं है. उनके लिए निस्संतान स्त्रियों द्वारा एक स्थानविशेष के मंदिर के मेले में आपसी सहमति से विवाह-बाह्य, धर्मानुमोदित और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त यौन-सम्बन्ध बनाने की प्रथा का उपन्यास में कथात्मक विनियोग 'आपत्तिजनक' है. इसे वे धर्मविरुद्ध, स्त्रियों की मर्यादा के विरुद्ध और उस इलाके के लिए अपमानजनक मानते हैं. क्या उपन्यासकार ने इस प्रथा की वकालत की है या उसका अनुमोदन किया है? ज़ाहिर है 'नहीं'. कहानी की तर्क-योजना और संवेदनात्मक उद्देश्य में उक्त प्रथा की हिमायत या आलोचना का कोई काम ही नहीं है. लेकिन ज़रा प्राचीन ग्रंथों पर नज़र डालें और देखें कि 'नियोग' की प्रथा को कितने धर्मशास्त्रों की सम्मति प्राप्त थी. भारतरत्न पंडित पांडुरंग वामन काणे ने गौतम, वसिष्ठ, बौधायन, याज्ञवल्क्य, नारद, कौटिल्य आदि धर्मसूत्रकारों की सम्मतियों उद्धृत की है तथा महाभारत के आदिपर्व, अनुशासनपर्व और शांतिपर्व में नियोग के उदाहरणों और संकेतों की चर्चा की है. (धर्मशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग) मुरुगन की पुस्तक जलानेवाले तत्व इन धर्मसूत्रों और महाभारत के बारे में क्या ख्याल रखते हैं? शास्त्र और लोक की बात छोड़ भी दें, तो क्या मानवशास्त्र का अध्ययन यह नहीं बताता कि ऐसी प्रथाएं लगभग सभी प्राक-आधुनिक समाजों में रही आई हैं? यह भी कि आधुनिक समय में भी तमाम प्राक-आधुनिक प्रथाएं रूप बदलकर क्या अपनी निरंतरता नहीं बनाए रखतीं? मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा.