12/31/10

नए साल क़ी शुभकामनाएं- सर्वेश्वर


खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को,
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को,
नए साल की शुभकामनाएं.

जांतें के गीतों को, बैलों की चाल को,
करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को,
नए साल की शुभकामनाएं.


इक पकती रोटी को, बच्चों के शोर को,
चौके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को,
नए साल की शुभकामनाएं.

वीराने जंगल को, तारों को, रात को,
ठंढी दो बंदूकों में घर की बात को,
 नए साल की शुभकामनाएं.


इस चलती आंधी में, हर बिखरे बाल को,
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़्वाब को,
हर नन्हीं याद को, हर छोटी भूल को,
नए साल की शुभकामनाएं.



कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को,
उनको, जिन्होंने चुन-चुन कर ग्रीटिंग कार्ड लिखे,
उनको, जो अपने गमलों में चुपचाप दिखे,
नए साल की शुभकामनाएं.
...सर्वेश्वर

12/28/10

लोकतंत्र को उम्रकैद- प्रणय कृष्ण

'देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की'
(बिनायक सेन की गिरफ्तारी के पीछे की हकीकतें और सबक )

'नई आज़ादी के योद्धा' बिनायक सेन की गिरफ्तारी के पीछे की राजनीति और संकट की जरूरी पड़ताल करता, जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण का यह लेख मुझे मिला. पढ़िए, और आईये, बिनायक जी के साथ हर संभव तरीके से मजबूती से खड़े हों.

25 दिसम्बर, २०१०

ये मातम की भी घडी है और इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी. मातम इस देश में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और लडाई- न पाए गए इंसाफ के लिए जो यहां के हर नागरिक का अधिकार है. छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और एक खूबसूरत इंसान डा. बिनायक सेन को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3) और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश करने के आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी.

यहां कहने का अवकाश नहीं कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं. डा. सेन को इन आरोपों में 24 मई, 2007 को गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितिओं में जेल में रहने के बाद, उन्हें ज़मानत दी गई. मुकादमा उनपर सितम्बर 2008 से चलना शुरु हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी 2011 तक कर दिया जाए, तो छत्तीसगढ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें. बहरहाल जब यह सज़िश नाकाम हुई और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को पेश होना पडा, तो उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए.

डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच मिले. सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों की अनुमति से, जेलर की उपस्थिति में हुईं. डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके माओंवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की. पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था. गुहा को पुलिस ने 6 मई,2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया. गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को गिरफ्तार हुए. बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो कि एक कपडा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था. इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर, न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके सम्बंधों पर कोई प्रकाश पडता है. पुलिस आजतक भी गुहा और डा़. सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल,किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई. एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के दौरान टूटते गए.

पुलिस ने डा.सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों के दस्तावेज़, मानवाधिकार रिपोर्टें, सी.डी़ तथा उनके कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं. इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो किसी भी सामान्य पढे लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त नहीं हो सकतीं. घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश किया जो उसके अनुसार डा. सेन के घर से मिला था. मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के दस्तखत नहीं हैं. दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके घर से प्राप्त वस्तुओं की लिस्ट में न तो चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में. घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के हस्ताक्षर लिए गए थे. लेकिन इस पत्र पर उनके दस्तखत भी नहीं हैं. ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है. साक्ष्य के अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को डा.सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस. आई.),को लिखे एक ई-मेल को पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को हंसी का पात्र बनाया. मुनव्वर राना का शेर याद आता है-

“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”

इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द व्हाइट हाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड बताया गया.(आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.) पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा.सेन के घर से मिले एक दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें शहरों में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया. यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है. यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट के रूप में मौजूद है. कोई भी चाहे इसे देख सकता है. कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के एक एक झूठ का पर्दाफाश होता गया. लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो आजकल आम बात है. भोपाल गैस कांड् पर अदालती फैसले को याद कीजिए. याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को. क्या कारण हे कि बहुतेरे लोगों को तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब इस देश के सारे भ्रश्टाचारी, गुंडे, बदमाश और बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?

याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह की धाराएं कब की हैं. राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है, 1870 में लाई गई. जिसके तहत सरकार के खिलाफ "घृणा फैलाना", "अवमानना करना" और "असंतोष पैदा" करना राजद्रोह है. क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के काबिल नहीं जिनके मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बरखा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं? क्या ऐसी सरकारों के प्रति हम और आप असंतोष नहीं रखते जो आदिवसियों के खिलाफ "सलवा जुडूम" चलाती हैं, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और अमरीका के हाथ इस देश की सम्पदा को दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं. अगर यही राजद्रोह की परिभाषा है जिसे गोरे अंग्रेजों ने बनाया था और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो राजद्रोही न हों. याद रहे कि इसी धारा के तहत अंग्रेजों ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को कैद रखा.

डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश के उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के छत्तीसगढ में आदिवसियों के जीवन में रच बस गए. बिनायक ने पी.यू.सी.एल के सचिव के बतौर छत्तीसगढ सरकार को फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों पर घेरा, उन्होंने सवाल उठाया कि जो इलाके नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों इतनी गरीबी,बेकारी, कुपोषण और भुखमरी है? एक बच्चों के डाक्टर को इससे बडी तक्लीफ क्या हो सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों को तडपकर मरते देखे?

इस तक्लीफकुन बात के बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा. सेन के घर से कथित रूप से बरामद माओंवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित किए जाने पर कहा कि "कामरेड उसी को कहा जाता है, जो माओंवादी होता है". तो आप में से जो भी कामरेड संबोधित किए जाते हों (हों भले ही न), सावधान रहिए. कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के सौ पदों का अनुवाद किया था. कबीर की पंक्ति थी, ”निसि दिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades' मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के इस्तेमाल के लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?

अकारण नहीं है कि जिस छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के हत्यारे कानून के दायरे से महफूज़ रहे, उसी छत्तीसगढ में नियोगी के ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को उम्र कैद दी गई है. 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था-

“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे--
बंब संब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “

ऊपर की पंक्तियों में ब़स कांग्रेस के साथ भाजपा और जोड़ लीजिए.

आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड के दोषी, निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है.

मित्रों मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो, जितनी दूर तक हो, हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों जिसके खिलाफ नई आज़ादी के एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन.

12/25/10

रंग ए बनारस

प्रकाश उदय भोजपुरी के जाने पहचाने कवि हैं. वे बनारस में रहते हैं. उनकी कविता में वह ख़ास पन है जो सिर्फ और सिर्फ बनारस में ही मौजूद होता है.
आज पढ़िए उनकी कविता- "दुःख कहले सुनल से घटल बाड़े". इस कविता में शिव एक सामान्य गृहस्थ की तरह आते हैं, ज्ञानवापी में अल्ला के बगल में रहते हुए वे भी ज़िंदगी की सामान्यताओं में परेशान हैं. और सबसे बड़ी समस्या है कलश के छेद से सर पर टपकता पानी.




आवत आटे सावन शुरू होई नहवावन
भोला जाड़े में असाढ़े से परल बाड़ें

एगो लांगा लेखा देह, रखें राखी में लपेट
लोग धो-धा के उघारे पे परल बाड़ें
भोला जाड़े में...

ओने बरखा के मारे, गंगा मारे धारे-धारे
जटा पावें ना संभारे, होत जाले जा किनारे
शिव शिव हो दोहाई, मुंह मारी सेवकाई
उहो देवे पे रिजाईने अड़ल बाड़ें
भोला जाड़े में...

बाटे बड़ी बड़ी फेर, बाकी सबका ले ढेर
हई कलसा के छेद, देखा टपकल फेर
गौरा धउरा हो दोहाई, अ त ढेर ना चोन्हाईं
अभी छोटका के धोवे के हगल बाटे
भोला जाड़े में...

बाडू बड़ी गिरिहिथीन, खाली लईके के जिकिर
बाड़ा बापे बड़ा नीक, खाली अपने फिकिर
बाडू पथरे के बेटी, बाटे ज़हरे नरेटी
बात बाते-घाटे बढ़ल, बढ़ल बाटे
भोला जाड़े में...

सुनी बगल के हल्ला, ज्ञानवापी में से अल्ला
पूछें भईल का ए भोला, महकउला जा मोहल्ला
एगो माइक बाटे माथे, एगो तोहनी के साथे
भांग बूटी गांजा फेरू का घटल बाटे
भोला जाड़े में...

दुनू जना के भेंटाइल, माने दुःख दोहराइल
इ नहाने अंकुआइल, उ अजाने अउंजाइल
इ सोमारे हलकान, उनके जुम्मा लेवे जान
दुःख कहले सुनल से घटल बाड़े
भोला जाड़े में...

...प्रकाश उदय

शब्दार्थ:
1- आषाढ़ = बारिश का पहला महीना
2- लांगा लेखा = छरहरी
3- चोन्हाईं = अदा दिखाना
4- नरेटी = गला
5- ज्ञानवापी = बनारस में शिव मंदिर से लगी हुई मस्जिद
6- अंकुवाईल = अंकुरित होना
7- अउंजाइल =  परेशान होना  

12/8/10

दाढी के बहाने मूर (मार्क्स) से गपशप - विद्रोही

मूर है मेरा सनम

मूर है सेहरा मेरा, और मूर है मेरा सनम,
और वाह रे दाढ़ी तेरी, और वाह रे तेरी कलम।
एक किताबत पसरकर है छा गई संसार पर,
अंटार्टिका, अर्जेंटिना और चीन की दीवार पर।
यूरोप का पूर्वी किनारा,
लाल फिर भी लाल है,
कीर जैसे एशिया का पश्चिमी सिर लाल है।

लाल है पोलैण्ड और बाल्टिक सागर लाल है,
लाल है बर्लिन और जर्मन, फ्रांस-पेरिस लाल है।
ठेठ, बिलकुल ठेठ देखो, चाइना भी लाल है,
लाल है तिब्बत-ल्हासा, काठमांडू लाल है।
हिंदुओं का हिंदू ये नेपाली हिंदू लाल है,
और लाल मुस्लिम दुनिया देखो, लीबिया भी लाल है।
लाल है कर्नल गदाफी, ये गुरिल्ला लाल है.

तो लाल झंडा चढ़ गया है,
मंदिरों पर मस्जिदों पर,
लाल हैं पंडे-पुरोहित, मुल्ला-टुल्ला लाल हैं।
लाल हैं प्रोटेस्टेंट, क्रिश्चियन और कैथोलिक लाल हैं,
लाल है कट्टर यहूदी और पारसी लाल हैं।
और आपके भी राष्ट्रध्वज का एक तिहाई लाल है!
ये भगतसिंह की जमीं हिंदोस्तां भी लाल है,
और उधर आस्ट्रेलिया के सब गड़रिये लाल हैं।
कहा तक वर्णन करूं भेड़ों की पूछें लाल हैं,
अफ्रीका के काले वनों के लकड़हारे लाल हैं।
लाल है नेल्सन मंडेला, सारे काले लाल हैं,
लाल है मिस्री पिरामिड, नील का जल लाल है।
लाल है काबुल का किशमिश, तुर्की छुहारा लाल है,
लाल है अरबी कबीले और सहारा लाल है।
खून से लथपथ ये रेगिस्तान का बच्चा लाल है,
लाल है बेरुत और लेबनान देखो लाल है।
आज का नैसेरवां यासर अराफात लाल है,
लाल हैं बंजारा कौमे बद्दू कबीले लाल हैं।
और जात का बदजात ये आभीर बच्चा लाल है!

लाल तो अमरीका का सारा पिछवाड़ा लाल है,
नाक के नीचे उसी के क्यूबा भी लाल है।
क्यूबा का लाल कास्त्रो, लालों का भी लाल है,
ये लाल अपनी मां का नहीं, दुनिया की मां का लाल है।
उसकी दाढ़ी का नजारा, शौक है संसार का,
ये भी औलाद है उसी मूर दाढ़ीजार का।
आगे, तो हां लोगों, बिना दाढ़ी बिना मूंछ,
और कर गये लड़के करिश्मा, दढ़ियलों से पूछ-पूछ।

करने को तो औरतों ने क्रांति कर डाला जहां में,
फिर भी पूछेंगे बेहूदे, कि बताओ कि कहां में?
मैं बताता हूं, नहीं चलकर दिखाता हूं, वहीं,
आप चाहोगे तो बाबूजी दिखा दूंगा यहीं।

पर छोड़िये जी!
उनकी बातें फिर कभी जब फिर मिलेंगे,
आज की तो बात दाढ़ी-मूंछ के ही सिलसिले में।
फेरहिस्त लम्बी है लोगों, मेरे दाढ़ीबाजों की,
हो ची मिन्ह चाचा की दाढ़ी, दाढ़ी-ए-नव्वाब थी,
सिर झुका दाढ़ी हिला दे, तो हिल उठे लेदुआन,
दाढ़ी हिलाकर हंस दिए तो हिल गया वाशिंगटन ,
गिर गया गश खा कनेडी, रो पड़ा सच में निक्सन।

बात दाढ़ी की चली तो याद लेनिन की है आई,
सोचता हूं लेनिन, लेनिन था कि वह दाढ़ी था भाई!
क्या गजब की दाढ़ी इस ब्लादीमिर इल्यीच की थी,
यही लौंडा आगे चलकर दोस्तों लेनिन हुआ,
क्या कट थी दाढ़ी,
रूस कट या फ्रेंच कट या अन्य कट,
पर गौर से देखोगे तो लगती है
इंटरनेषनल कट।

और स्टालिन की मूंछों को कहोगे कौन कट ?
जाट कट या लाट कट याकि थीं कज्जाक कट,
पर ताव दे दो तो लगें
पूरी तरह उजबेक कट।
माउरा नहर के वेग कट,
मध्य युग के नाइटों कट,
नटों के उस्ताद कट,
मार्शल कट, जनरल कट और सिपहसालार कट,
पूर्वी सरदार कट, क्षत्रिय कट, तलवार कट
मूंछ स्टालिन की थी अकबर महान सम्राट कट,
जिसके आगे सीजर की मूंछें लगेंगी गिरहकट।
मूंछ तो बाबूजी रख लेते,
डाकू और चोरकट,
पर नाम जोसेफ का नहीं यूं ही स्टालिन पड़ा था,
उसकी मूंछें उस वक्त दुनिया का अमन-ओ-चैन थीं,
युद्ध के उपरांत उपजे
राष्ट्रसंघ कट थी।

इंसान की पहचान आदत से है, फैशन से नहीं,
क्या कहोगे भगत सिंह के हैट का क्या कट था ?
सिख कट या हिंदू कट याकि था अंग्रेज कट?
बराबरी का ताज था, बिरादरी का तख्त था,
समाजवाद का निशान, हैट क्रांति कट था।

कामरेड कट था-

दोस्ती का हाथ, दोस्त इंकलाब के लिए,
गया, गया चला गया,
तभी तो याद आ रही,
तभी सदा सता रही
भगत सिंह, भगतसिंह, कामरेड!
तुम्हारी मातृभूमि आर्तनाद कर रही है अर्द्धरात्रि में,
भगत सिंह, भगत सिंह, कामरेड!
तुम्हारी मातृभूमि रो रही
भूख-प्यास, दुख-शोक से,
कि वीरवर! उसे तुम्हारे खून की पुकार है,
उसे तुम्हारे बस उसी विचार की पुकार है,
जो विचार तेरा भी है मेरा भी है,
फिदेल, चे ग्वेरा का है,
जो विचार मूर का, मजूर का है,
हमें हमारे देश को वही विचार चाहिए,
हमें हमारे देश को वही किताब चाहिए।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को अवश्य।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को अटल।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को सहज।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को सरल।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब साध्य है।
कि जो किताब इंकलाब का ही इंतखाब है।
हमें हमारे देश को वही किताब चाहिए,
हमें हमारे देश को इंकलाब चाहिए।

क्योंकि इंकलाब से भला,
क्योंकि इंकलाब से बड़ा,
कुछ नहीं है
कुछ नहीं है
कुछ नहीं है
जहान में।

...रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

12/1/10

कानून - गोरख पाण्डेय

अरुंधति रॉय के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की घटना ने एक हिन्दुस्तानी के बतौर हमारा सिर शर्म से झुका दिया है. सरकार की परिभाषाओ के हिसाब से आज तीन चौथाई से ज्यादा देश राजद्रोह का अपराधी ठहरेगा. नैतिक उच्चासन पर बैठ कर पूरे देश को देशभक्ति का प्रमाणपत्र देने वाले मीडिया के भीतर की सडान्ध का बहुत थोडा हिस्सा सामने आया है. जजों का भ्रष्टाचार अब पुरानी बात हो चुकी है.
कवि गोरख पाण्डेय की कविता 'कानून'1980 में लिखी गयी थी, भारतीय राष्ट्र के दमनकारी रुख को साफ़ बेनकाब करती है.

कानून

लोहे के पैरों में भारी बूट
कन्धो से लटकती बन्दूक
कानून अपना रास्ता पकड़ेगा
हथकड़ियाँ डालकर हाथों में
तमाम ताकत से उन्हें
जेलों की ओर खींचता हुआ
गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से
श्रम से फल को अलग करता
रखता हुआ चीजों को
पहले से तय की हुई
जगहों पर
मसलन अपराधी को
न्यायधीश की, ग़लत को सही की
और पूँजी के दलाल को
शासक की जगह पर
रखता हुआ
चलेगा
मजदूरों पर गोली की रफ्तार से
भुखमरी की रफ्तार से किसानों पर
विरोध की जुबान पर
चाकू की तरह चलेगा
व्याख्या नहीं देगा
बहते हुए ख़ून की
कानून व्याख्या से परे कहा जायेगा
देखते-देखते
वह हमारी निगाहों और सपनों में
खौफ बनकर समा जायेगा
देश के नाम पर
जनता को गिरफ्तार करेगा
जनता के नाम पर
बेच देगा देश
सुरक्षा के नाम पर
असुरक्षित करेगा
अगर कभी वह आधी रात को
आपका दरवाजा खटखटायेगा
तो फिर समझिये कि आपका
पता नहीं चल पायेगा
खबरों से इसे मुठभेड़ कहा जायेगा


पैदा होकर मिल्कियत की कोख से
बहसा जायेगा
संसद में और कचहरियों में
झूठ की सुनहली पालिश से
चमकाकर
तब तक लोहे के पैरों
चलाया जायेगा कानून
जब तक तमाम ताकत से
तोड़ा नहीं जायेगा।

- गोरख पाण्डेय