12/31/10

नए साल क़ी शुभकामनाएं- सर्वेश्वर


खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को,
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को,
नए साल की शुभकामनाएं.

जांतें के गीतों को, बैलों की चाल को,
करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को,
नए साल की शुभकामनाएं.


इक पकती रोटी को, बच्चों के शोर को,
चौके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को,
नए साल की शुभकामनाएं.

वीराने जंगल को, तारों को, रात को,
ठंढी दो बंदूकों में घर की बात को,
 नए साल की शुभकामनाएं.


इस चलती आंधी में, हर बिखरे बाल को,
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़्वाब को,
हर नन्हीं याद को, हर छोटी भूल को,
नए साल की शुभकामनाएं.



कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को,
उनको, जिन्होंने चुन-चुन कर ग्रीटिंग कार्ड लिखे,
उनको, जो अपने गमलों में चुपचाप दिखे,
नए साल की शुभकामनाएं.
...सर्वेश्वर

12/28/10

लोकतंत्र को उम्रकैद- प्रणय कृष्ण

'देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की'
(बिनायक सेन की गिरफ्तारी के पीछे की हकीकतें और सबक )

'नई आज़ादी के योद्धा' बिनायक सेन की गिरफ्तारी के पीछे की राजनीति और संकट की जरूरी पड़ताल करता, जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण का यह लेख मुझे मिला. पढ़िए, और आईये, बिनायक जी के साथ हर संभव तरीके से मजबूती से खड़े हों.

25 दिसम्बर, २०१०

ये मातम की भी घडी है और इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी. मातम इस देश में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और लडाई- न पाए गए इंसाफ के लिए जो यहां के हर नागरिक का अधिकार है. छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और एक खूबसूरत इंसान डा. बिनायक सेन को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3) और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश करने के आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी.

यहां कहने का अवकाश नहीं कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं. डा. सेन को इन आरोपों में 24 मई, 2007 को गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितिओं में जेल में रहने के बाद, उन्हें ज़मानत दी गई. मुकादमा उनपर सितम्बर 2008 से चलना शुरु हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी 2011 तक कर दिया जाए, तो छत्तीसगढ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें. बहरहाल जब यह सज़िश नाकाम हुई और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को पेश होना पडा, तो उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए.

डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच मिले. सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों की अनुमति से, जेलर की उपस्थिति में हुईं. डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके माओंवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की. पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था. गुहा को पुलिस ने 6 मई,2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया. गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को गिरफ्तार हुए. बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो कि एक कपडा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था. इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर, न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके सम्बंधों पर कोई प्रकाश पडता है. पुलिस आजतक भी गुहा और डा़. सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल,किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई. एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के दौरान टूटते गए.

पुलिस ने डा.सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों के दस्तावेज़, मानवाधिकार रिपोर्टें, सी.डी़ तथा उनके कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं. इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो किसी भी सामान्य पढे लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त नहीं हो सकतीं. घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश किया जो उसके अनुसार डा. सेन के घर से मिला था. मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के दस्तखत नहीं हैं. दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके घर से प्राप्त वस्तुओं की लिस्ट में न तो चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में. घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के हस्ताक्षर लिए गए थे. लेकिन इस पत्र पर उनके दस्तखत भी नहीं हैं. ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है. साक्ष्य के अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को डा.सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस. आई.),को लिखे एक ई-मेल को पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को हंसी का पात्र बनाया. मुनव्वर राना का शेर याद आता है-

“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”

इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द व्हाइट हाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड बताया गया.(आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.) पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा.सेन के घर से मिले एक दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें शहरों में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया. यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है. यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट के रूप में मौजूद है. कोई भी चाहे इसे देख सकता है. कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के एक एक झूठ का पर्दाफाश होता गया. लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो आजकल आम बात है. भोपाल गैस कांड् पर अदालती फैसले को याद कीजिए. याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को. क्या कारण हे कि बहुतेरे लोगों को तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब इस देश के सारे भ्रश्टाचारी, गुंडे, बदमाश और बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?

याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह की धाराएं कब की हैं. राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है, 1870 में लाई गई. जिसके तहत सरकार के खिलाफ "घृणा फैलाना", "अवमानना करना" और "असंतोष पैदा" करना राजद्रोह है. क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के काबिल नहीं जिनके मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बरखा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं? क्या ऐसी सरकारों के प्रति हम और आप असंतोष नहीं रखते जो आदिवसियों के खिलाफ "सलवा जुडूम" चलाती हैं, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और अमरीका के हाथ इस देश की सम्पदा को दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं. अगर यही राजद्रोह की परिभाषा है जिसे गोरे अंग्रेजों ने बनाया था और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो राजद्रोही न हों. याद रहे कि इसी धारा के तहत अंग्रेजों ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को कैद रखा.

डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश के उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के छत्तीसगढ में आदिवसियों के जीवन में रच बस गए. बिनायक ने पी.यू.सी.एल के सचिव के बतौर छत्तीसगढ सरकार को फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों पर घेरा, उन्होंने सवाल उठाया कि जो इलाके नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों इतनी गरीबी,बेकारी, कुपोषण और भुखमरी है? एक बच्चों के डाक्टर को इससे बडी तक्लीफ क्या हो सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों को तडपकर मरते देखे?

इस तक्लीफकुन बात के बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा. सेन के घर से कथित रूप से बरामद माओंवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित किए जाने पर कहा कि "कामरेड उसी को कहा जाता है, जो माओंवादी होता है". तो आप में से जो भी कामरेड संबोधित किए जाते हों (हों भले ही न), सावधान रहिए. कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के सौ पदों का अनुवाद किया था. कबीर की पंक्ति थी, ”निसि दिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades' मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के इस्तेमाल के लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?

अकारण नहीं है कि जिस छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के हत्यारे कानून के दायरे से महफूज़ रहे, उसी छत्तीसगढ में नियोगी के ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को उम्र कैद दी गई है. 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था-

“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे--
बंब संब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “

ऊपर की पंक्तियों में ब़स कांग्रेस के साथ भाजपा और जोड़ लीजिए.

आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड के दोषी, निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है.

मित्रों मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो, जितनी दूर तक हो, हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों जिसके खिलाफ नई आज़ादी के एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन.

12/27/10

मैं नहीं मानता... हबीब जालिब

जहां बिनायक जैसे देशद्रोही और नीरा राडिया व राजा जैसे देशभक्त हैं, जहां ये दस्तूर है कि इंसानियत की बात करने वाले को हथकड़ी मिलती है, जहां न्याय आकाश कुसुम है, बालू का तेल है , जहां संतरी से लेकर मंतरी तक, कोर्ट से लेकर मीडिया तक अखंड भ्रष्टाचार व्याप्त है, जहां नदियों से जल, वृक्षों से फल और जमीन से उसका आँचल छीन लिया गया है, उस देश को मेरा नमस्कार!
और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान, दोनों मुल्कों में यही हालात हैं. फहमीदा रियाज़ ने ठीक ही लिखा था- तुम बिलकुल हम जैसे निकले, अब तक कहाँ छुपे थे भाई....

सुनिए हबीब जालिब से ये नज़्म, जो दोनों मुल्कों के हुक्मरानों के लिए मौजूं है. ऐसे दस्तूर को, सुब्हे बेनूर को, मैं नहीं मानता...

12/25/10

रंग ए बनारस

प्रकाश उदय भोजपुरी के जाने पहचाने कवि हैं. वे बनारस में रहते हैं. उनकी कविता में वह ख़ास पन है जो सिर्फ और सिर्फ बनारस में ही मौजूद होता है.
आज पढ़िए उनकी कविता- "दुःख कहले सुनल से घटल बाड़े". इस कविता में शिव एक सामान्य गृहस्थ की तरह आते हैं, ज्ञानवापी में अल्ला के बगल में रहते हुए वे भी ज़िंदगी की सामान्यताओं में परेशान हैं. और सबसे बड़ी समस्या है कलश के छेद से सर पर टपकता पानी.




आवत आटे सावन शुरू होई नहवावन
भोला जाड़े में असाढ़े से परल बाड़ें

एगो लांगा लेखा देह, रखें राखी में लपेट
लोग धो-धा के उघारे पे परल बाड़ें
भोला जाड़े में...

ओने बरखा के मारे, गंगा मारे धारे-धारे
जटा पावें ना संभारे, होत जाले जा किनारे
शिव शिव हो दोहाई, मुंह मारी सेवकाई
उहो देवे पे रिजाईने अड़ल बाड़ें
भोला जाड़े में...

बाटे बड़ी बड़ी फेर, बाकी सबका ले ढेर
हई कलसा के छेद, देखा टपकल फेर
गौरा धउरा हो दोहाई, अ त ढेर ना चोन्हाईं
अभी छोटका के धोवे के हगल बाटे
भोला जाड़े में...

बाडू बड़ी गिरिहिथीन, खाली लईके के जिकिर
बाड़ा बापे बड़ा नीक, खाली अपने फिकिर
बाडू पथरे के बेटी, बाटे ज़हरे नरेटी
बात बाते-घाटे बढ़ल, बढ़ल बाटे
भोला जाड़े में...

सुनी बगल के हल्ला, ज्ञानवापी में से अल्ला
पूछें भईल का ए भोला, महकउला जा मोहल्ला
एगो माइक बाटे माथे, एगो तोहनी के साथे
भांग बूटी गांजा फेरू का घटल बाटे
भोला जाड़े में...

दुनू जना के भेंटाइल, माने दुःख दोहराइल
इ नहाने अंकुआइल, उ अजाने अउंजाइल
इ सोमारे हलकान, उनके जुम्मा लेवे जान
दुःख कहले सुनल से घटल बाड़े
भोला जाड़े में...

...प्रकाश उदय

शब्दार्थ:
1- आषाढ़ = बारिश का पहला महीना
2- लांगा लेखा = छरहरी
3- चोन्हाईं = अदा दिखाना
4- नरेटी = गला
5- ज्ञानवापी = बनारस में शिव मंदिर से लगी हुई मस्जिद
6- अंकुवाईल = अंकुरित होना
7- अउंजाइल =  परेशान होना  

12/24/10

अलबर्ट ब्लोक के कुछ चित्र

अमरीकी आधुनिकतावादी चित्रकार अलबर्ट ब्लोक जर्मनी के ब्लू रेटर ग्रुप से के संस्थापकों में से एक थे. घनवाद के खिलाफ जाते हुए ब्लोक भी अपने साथियों की तरह अमूर्तन की तरफ बढे. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इस ग्रुप के कई सदस्यों को अपने देश छोड़ने पड़े,कुछ मार दिए गए और ग्रुप बिखर गया.
ब्लोक आधुनिकता को जीने वाले चित्रकार हैं. उनके चित्रों में गहरे रंग हैं, गाढी रेखाएं हैं और है विश्वयुद्ध की विभीषिका की गहरी छाया. समय के चंचल हाथों से साने गए यथार्थ के इस युद्धों वाले दौर में सीधी रेखाएं लगभग असंभव हो गयीं थीं, ब्लोक के चित्रों को देखकर ये शिद्दत से महसूस होता है.
आइये उनके कुछ चित्रों से मुखातिब होते हैं-













12/23/10

चित्रों की दुनिया में-1

चित्रों की दुनिया में-1
अब कुछ महत्वपूर्ण चित्रकारों और उनके काम से हम यहाँ रू ब रू होंगे. इस कड़ी में मैं क्रमशः आप की मुलाक़ात दुनिया के जाने माने चित्रकारों से करवाने की कोशिश करूंगा.

पहली कड़ी के रूप में महान पक्षी प्रेमी चित्रकार चार्ल्स फ्रेडरिक टूनीक्लिफ के बनाए कुछ चित्र पेश कर रहा हूँ. वुड कट, जलरंग, तैल और इचिंग सहित अनेक माध्यमों में काम करने वाले टूनीक्लिफ का काम 'नेचुरलिस्टिक' माना जता है.आपने चिड़ियों के फोटो बहुत देखे होंगे पर टूनीक्लिफ के चित्रों में भावमुद्राएं हैं, जो उन्हें ख़ास बनाती हैं.
देखिये उनके कुछ चित्र-

और हाँ, चित्रों को बड़ा कर के देखने के लिए उनपर क्लिक करें.



तीन ठुमरियां - बेगम अख्तर, गिरिजा देवी और छन्नूलाल मिश्र

ठुमरी का अर्थ बताते हुए पंडित छन्नूलाल मिश्र बताते हैं की ठुमरी वह जहां ठुमक हो. आम तौर पर ठुमरी स्त्रियों का गायन मानी जाती रही है. प्रेम की अभिव्यक्ति का माध्यम. नृत्य के साथ इस विधा का गहरा रिश्ता है. नृत्य के साथ की ठुमरी को बोल बाँट की ठुमरी, और सिर्फ गायकी को बोल बाँट की ठुमरी के नाम से जानते हैं.
वाजिद अली शाह का नाम आपने सिर्फ एक ऐयाश बादशाह के रूप में ही जाना हो तो आप उस व्यक्तित्व की एक बड़ी खूबी से अछूते हैं. वाजिद अली शाह को ही ठुमरी के आविष्कार का श्रेय जाता है, या कम से कम यह तो कह ही सकते हैं कि उन्हीं के समय में ठुमरी की पहचान विधा के रूप में हुई.

आज सुनिए तीन बड़े उस्तादों से ठुमरी-



12/22/10

कूपहि में इहाँ भांग परी है

क्या आपने कभी सल्वाडोर डाली की वह मशहूर पेंटिंग देखी है, जिसमें उन्होंने पिघलती हुई घड़ी बनाई हैं? इसमें कई घड़ियां पिघल रही हैं, लगभग बहने की हालत में हैं. हालाँकि यह पेंटिंग समय के बारे में है पर आज तो भारतीय मीडिया के बारे में सोचते हुए यही पेंटिंग बारहा याद आ रही है. मीडिया की तमाम छवियां पिघल रही हैं. यथार्थ से अति- यथार्थ की और! जैसे पिघलती हुई घड़ी से सही वक्त की उम्मीद नहीं की जा सकती वैसे ही मीडिया से किसी भी सच्चाई की उम्मीद बेमानी हो गयी है. अब विश्वसनीयता और मीडिया दो ऐसे शब्द लगते हैं मानो इनका कभी आपस में कोई संबंध ही न रहा हो.
पहले मजाक में कहा जाता था कि मीडिया का संबंध गंभीर अध्ययन और विश्लेषण से नहीं, ‘मीडियाक्रिटी’ (सतहीपन) से है. लेकिन तब भी मीडिया का संबंध ‘दलाली’ से है, मजाक में भी नहीं कहा जाता था.
फिलहाल मीडिया ऐसी पिघलती हुई घड़ी है, जिसकी मजबूरी है कि चैबीसों घंटे (24-7) सही वक्त दिखाने का नाटक करे. जाहिर है, वह ऐसा नहीं कर सकती. यह देखने वालों का भोलापन ही कहा जायेगा कि मीडिया द्वारा जो कुछ भी परोसा जा रहा है, उसे सच्चाई मान लें.
कारपोरेट मीडिया की जो शक्ल आज हमारे सामने है, वह नयी नहीं है. फर्क सिर्फ यह है कि पहली बार हम उसे नंगे रूप में देख रहे हैं. जैसे भारत की आजादी का किस्सा 1947 से शुरू होता है, वैसे ही मौजूदा दौर की हर विकृति के पांव पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में गड़े हुए देखे जा सकते हैं. चैबीसों घंटे वाले नये-नये तमाम खबरिया चैनलों की जंग में बढ़त हासिल करने के लिए इसी दौर में अंधविश्वासों और स्कैंडलों का बाजार निर्मित किया गया. लेकिन स्वाभाविक तौर पर ये सब भी चैनलों की अनंत भूख को शांत करने के लिये पर्याप्त न थे.
दूसरी तरफ एक दूसरा भारत भी था, जहां खबरें ही खबरें थीं. अकाल था पर चैनलों में अकाल की खबरें न थीं. भूखों मरते और आत्महत्या करते भारत की खबरें नादारद थीं. क्योंकि यह भारत आत्महत्या खुद नहीं कर रहा था, उसे सरकारी नीतियों के जरिये आत्महत्या की ओर धकेल दिया गया था. और ऐसा करने वाले लोग खबरिया चैनलों के मालिकों के साथ गठजोड़ किये हुये थे. इसलिए खबरों में परमाणुशक्ति संपन्न होते भारत का उत्सव था. अपनी सत्तर फीसदी आबादी को बीस रुपये से कम मुहैया करा सकने वाली खोखली महाशक्ति के जैकारे के बीच सच बोलने वाला देशद्रोही होना और कम से कम विकास विरोधी होना था. बहुराष्ट्रीय पूंजी ने इसी दौर में लील लिये पहाड़ के पहाड़ और हांका लगाकर मारे जा रहे थे आदिवासी, लेकिन मीडिया नजर उतारने के रक्षा कवच बेच रहा था. ऐसे ही असुन्दर समय में खबरों के जरिये तैयार किया जा रहा था ऐसा सौन्दर्य, जो विदेशी सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग के सामानों को खपाने का बाजार तैयार कर सके. इसीलिए मीडिया के जरिये रची जा रही थीं, विश्वविजेता भारतीय सुन्दरियां. इनमें हर घंटे बलात्कार का शिकार होती महिलाओं की चीख गायब थी. सर्वेश्वर के शब्दों में ‘दुनिया आंसू पसंद करती है/मगर शोख चेहरों के’. इतनी लंबी कहानी इसलिए कि अगर इन पर ध्यान दें तो आज मीडिया के हश्र पर हमें धक्का नहीं लगेगा.
जब खबरों का दायरा बहुत सीमित हो और खबरें चैबीसों घंटे की जरूरत हों तो खबरों को दिखाने वाले खबरों के निर्माता भी बन जाना चाहते हैं. एक समाचार चैनल के पत्रकार ने तो बाकायदा नेपाल से लगे पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाके में अपने लोगों को कपड़ा पहनाकर पुलिस और माओवादी बनाया और उनके बीच की मुठभेड़ रिकार्ड की. खबरों के निर्माण के बीच ही पत्रकारिता के नाम पर लोगों के पास ब्लैकमेल करने की ताकत भी आने लगी. प्रसिद्ध रोंक गायक जिम मारिसन ने कहा था कि ‘मीडिया पर नियंत्रण करने का मतलब है, जनता के जेहन पर नियंत्रण कर लेना’. क्योंकि मीडिया जन-जीवन के तमाम सांस्कृतिक प्रतीकों का इस तरह इस्तेमाल करता है कि लोग शोषण को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मानने लगें. भारत में कारपोरेट मीडिया ने अपनी इस ताकत को ठीक-ठीक पहचानते हुए इसका भरपूर इस्तेमाल किया और अपने आप को कारपोरेट जगत की सेवा में अर्पित कर दिया.
जो फोन टैप हुए उनके बारे में हमें थोड़ा-बहुत पता चला है, लेकिन ज्यादातर लोगों के फोन तो टैप ही नहीं हुए होंगे, उनके बारे में क्या? यदि सारे चलते-पुर्जे के पत्रकारों के फोन के रिकार्ड हमारे सामने हों तो हमें न जाने कितनी बरखायें, न जाने कितने सांघवी और चावला मिल जायेंगे.
सवाल नैतिकता या पत्रकार-नैतिकता का नहीं, पूंजी के चरित्र का है. बड़ी पूंजी के बड़े खेल में मीडिया का मोहरे की तरह शामिल होना नीतिशास्त्र नहीं राजनीतिक-अर्थशास्त्र का तकाजा था. इसलिये इस पर जार-जार रोने और हाय-हाय करने का बहुत औचित्य नहीं दिखायी पड़ता. इस दौर में उन पत्रकारों के लिए अफसोस जरूर किया जा सकता है, जो ईमानदार रह गए और इसी वजह से बेचारे भी. वे मौजूदा दौर के पत्रकारिता के उसूलों से तालमेल न बिठा सके, इसलिए पिछड़ गए, वैसे आकांक्षा उनमें न रही होगी, अब तो दावे के साथ यह कहना भी मुश्किल ही है.
आइने के बारे में कहा जाता है कि जो कुछ भी उसके सामने हो, ठीक वैसी ही तसवीर वह दिखाता है, लेकिन अगर आइने पर 'तेल लगा' हो तब! तब तसवीर विकृत हो जायेगी. मीडिया के ऊपर कारपोरेट धन स्नेह (तेल) है. वह लालच के कीचड़ में धंसा हुआ है. इसलिये इसमें दिखने वाली हर तसवीर विकृत है. नैतिक आक्रोश से भरा 'सीधी बात' करने का दम भरने वाला पत्रकार झूठा है.

(ये आलेख मेरे मित्र अवधेश का है.)

झूठ और लूट की संस्कृति के खिलाफ

आजकल भ्रष्टाचार पर जिसे देखिये, वही कुछ न कुछ बोले जा रहा है. कांग्रेस वाले भाजपा को बड़ा घूसखोर बता रहे हैं, भाजपा वाले कांग्रेस को. और दोनों मिलकर एक ऐसा हिन्दुस्तान बना रहे हैं जहाँ लुटेरों की चांदी है. कुछ खुद लूटें, कुछ लुटवा दें. और तो और सुश्री नीरा राडिया न्याय पालिका के भ्रष्टाचार पर अचरज व्यक्त कर रही हैं. तो लीजिये साहेबान, भारत का दरवाजा फिर खुल गया है. लुटेरे आ रहे हैं, बुलाये जा रहे हैं. गाँव की एक कहावत के मुताबिक़ "चामे के बेर्हा है, और कुकुर की रखवारी".
मुझे लगता है कि कोई नया तरीका जब तक नहीं निकलता तब तक पुराने से ही लड़ना होगा, क्यूंकि नया तरीका भी तो आखिरकार लड़ने से ही निकलेगा. जबकि कुछ लोग तो नए तरीके के नाम पर अमूर्त विरोध में संलग्न हैं.


पढ़िए अवधेश प्रधान की कविता जो गा कर पढ़ने पर और ही बढ़िया बन पड़ेगी-

कइसा खुला दरवाजा, लुटेरा झुंड-झुंड आवें...
भारत का बज गया बाजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

गैस निकालें, तेल निकालें
कोयला भरि भरि रेल निकालें
बेचि बेचि भए राजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

भूमि हमारी, ई गांव हमारा
जंगल परबत ठांव हमारा
हमहीं से कहें अब- ‘‘जा, जा’’, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

पुलिस बोलावें, मलेटरी बोलावें
दन दन दन बंदूक चलावें
बाजे विकास के बाजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

जमींदार जुलुमी, दलाल पुंजीपतिया
बहरा से आपन बोलाके संघतिया
मिलि-जुलि मार तान माजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

आव गरीबवा मजूर किसनवा
औरत-मरद सब बूढ़-जवनवा
छेड़ लड़इया तू साझा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

अब सब मिलि आवाज उठाव
ई अनेत के राज मेटाव
ईहे बखत के तकाजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

12/18/10

मेरो अल्ला मेहरबान- पंडित जसराज


सुनिए
पंडित जसराज से
ये बंदिश-
मेरो अल्ला मेहरबान

12/16/10

बागेश्री धमार और भैरवी- उदय भवालकर

ध्रुपद शैली की गायकी हिन्दुस्तान की पुरानी गायकी है. संगीत के अध्येताओं सहित रामविलास शर्मा ने भी इसे ही मूल भारतीय शास्त्रीय संगीत माना है. कहते हैं, इसकी उत्पत्ति बेहद पुरानी है पर 1000 ईसवी के पहले का कोई प्रमाण हमारे पास नहीं है. इतना तो तय है कि ख़याल गायकी से इसकी परम्परा पुरानी है. मृदंग या पखावज यहाँ मूल वाद्य के रूप में इस्तेमाल किये जाते हैं.

आज सुनिए उदय भवालकर से बागेश्री धमार और भैरवी-

12/15/10

कुमार गन्धर्व- राग श्री- मध्य लय और तराना
















कुमार साहब से कबीर सुनना एक ज़बरदस्त अनुभव तो है ही, उनसे अन्य बंदिशें सुनना भी हमेशा ही नए, उर्जस्वित कर देने वाले अनुभवों से भर देता है. ऐसा लगता है कि एक आवाज़ है, जो इंसानी पहुँच के सभी आयामों को खोल रही है. आप उनसे कुछ भी सुनते हुए अपनी संभावनाओं के सभी दरवाजे खुला पाते हैं. वे आपको ऐसी दुनिया की और ले जाते हैं जहां शब्द अपने परिचित अर्थों के अलावा दूसरे बहुत से अर्थ भी साथ लेकर आते हैं. अपने प्रिय कवि कबीर की तरह वे भी 'सुरों के डिक्टेटर' हैं.
सुनिए उनसे राग श्री-


12/14/10

बेगम साहिबा- ग़ालिब- भाग दो

बेगम अख्तर से ग़ालिब को सुनना हमेशा बेहतर लगता है, ऐसा क्यों है?
मेरे ख्याल से ग़ालिब अपनी शायरी में एक ऐसे जमाने की नुमाईंदगी करते हैं, जो क्लासिक नहीं है. मीर और उनकी शायरी में यही फरक है. भयानक उथल-पुथल भरे एक जमाने में ग़ालिब की शायरी ध्वस्त हो रहे मुगलिया जमाने की आवाज़ है. 'न गुल ए नगमा हूँ न पर्द ए साज़/ मैं हूँ अपनी शिकश्त की आवाज़'. जबकि मीर उसके समूचे वैभव के शायर हैं. मीर क्लासिक कवि हैं, ग़ालिब उस मामले में क्लासिक नहीं हैं. ग़ालिब आधुनिक कवि हैं.
क्लासिक और आधुनिक के अंतर्विरोध को यहीं छोड़ें तो कह सकते हैं कि लगभग हमेशा ही मीर, मेहदी हसन की आवाज़ ओ अदायगी में बेहतर होते हैं, और ग़ालिब बेगम साहिबा के. तो क्या यह नहीं है कि मेहदी हसन बेगम साहिबा से जियादा क्लासिकल हैं?

अपनी किसी बातचीत में मेहदी साहब ने कहा था कि जिस ग़ज़ल को बेगम साहिबा ने गा दिया, उसे छोड़ ही देना अच्छा.
मेहदी हसन की इस महान सिफारिश के बाद और कहने को क्या रह जाता है!!
सुनिए ग़ालिब की कही दो और गज़लें, बेगम अख्तर की आवाज़ में-


12/12/10

बेगम साहिबा- ग़ालिब

मलिका-ए-ग़ज़ल अख्तरी बाई फैजाबादी उर्फ़ बेगम अख्तर, ग़ज़ल सुनाने वालों के लिए ऐसा ज़बरदस्त नाम है जिनको सुनते हुए हमेशा यह महसूस होता है की काश दुनिया की बेहतरीन गज़लें बेगम साहिबा की आवाज़ में हम सुन पायें. एक पूरी पीढी के लिए ग़ज़ल का मतलब बेगम साहिबा ही होता था, और आज भी है. ग़ज़ल हमेशा कही जाती है, पढी जाती है, लिखी नहीं जाती, इस का ऐतबार और पुख्ता हो जता है जब हम बेगम साहिबा की आवाज़ में ग़ज़ल सुनते हैं. उनकी मकबूलियत की एक झलक आप इस से हासिल कर सकते हैं-

पिछली बार जब मैं गाँव गया, जोकि आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में है, मैं अपने मोबाइल पर मेहदी हसन की गाई एक ग़ज़ल सुन रहा था. एक बुजुर्गवार बगल में बैठे थे, फरमाया, अरे ये नए लड़के (उनका इशारा मेहदी साहब की और था) भी अच्छा पढ़ते हैं. फिर क्या था, बातचीत बढ़ चली, और बेगम साहिबा के कसीदे कितनी तो देर चलते रहे. और मैं सुनता ही रहा.

सुनिए बेगम साहिबा से ग़ालिब-


12/10/10

बहुत कठिन है डगर पनघट की- ज़फर हुसैन बंदायूनी और मंडली



आज सुनिए
ज़फर हुसैन बंदायूनी और मंडली से

'बहुत कठिन है डगर पनघट की'
और
'ए री सखी, मोरे ख्वाज़ा घर आये' -


12/8/10

दाढी के बहाने मूर (मार्क्स) से गपशप - विद्रोही

मूर है मेरा सनम

मूर है सेहरा मेरा, और मूर है मेरा सनम,
और वाह रे दाढ़ी तेरी, और वाह रे तेरी कलम।
एक किताबत पसरकर है छा गई संसार पर,
अंटार्टिका, अर्जेंटिना और चीन की दीवार पर।
यूरोप का पूर्वी किनारा,
लाल फिर भी लाल है,
कीर जैसे एशिया का पश्चिमी सिर लाल है।

लाल है पोलैण्ड और बाल्टिक सागर लाल है,
लाल है बर्लिन और जर्मन, फ्रांस-पेरिस लाल है।
ठेठ, बिलकुल ठेठ देखो, चाइना भी लाल है,
लाल है तिब्बत-ल्हासा, काठमांडू लाल है।
हिंदुओं का हिंदू ये नेपाली हिंदू लाल है,
और लाल मुस्लिम दुनिया देखो, लीबिया भी लाल है।
लाल है कर्नल गदाफी, ये गुरिल्ला लाल है.

तो लाल झंडा चढ़ गया है,
मंदिरों पर मस्जिदों पर,
लाल हैं पंडे-पुरोहित, मुल्ला-टुल्ला लाल हैं।
लाल हैं प्रोटेस्टेंट, क्रिश्चियन और कैथोलिक लाल हैं,
लाल है कट्टर यहूदी और पारसी लाल हैं।
और आपके भी राष्ट्रध्वज का एक तिहाई लाल है!
ये भगतसिंह की जमीं हिंदोस्तां भी लाल है,
और उधर आस्ट्रेलिया के सब गड़रिये लाल हैं।
कहा तक वर्णन करूं भेड़ों की पूछें लाल हैं,
अफ्रीका के काले वनों के लकड़हारे लाल हैं।
लाल है नेल्सन मंडेला, सारे काले लाल हैं,
लाल है मिस्री पिरामिड, नील का जल लाल है।
लाल है काबुल का किशमिश, तुर्की छुहारा लाल है,
लाल है अरबी कबीले और सहारा लाल है।
खून से लथपथ ये रेगिस्तान का बच्चा लाल है,
लाल है बेरुत और लेबनान देखो लाल है।
आज का नैसेरवां यासर अराफात लाल है,
लाल हैं बंजारा कौमे बद्दू कबीले लाल हैं।
और जात का बदजात ये आभीर बच्चा लाल है!

लाल तो अमरीका का सारा पिछवाड़ा लाल है,
नाक के नीचे उसी के क्यूबा भी लाल है।
क्यूबा का लाल कास्त्रो, लालों का भी लाल है,
ये लाल अपनी मां का नहीं, दुनिया की मां का लाल है।
उसकी दाढ़ी का नजारा, शौक है संसार का,
ये भी औलाद है उसी मूर दाढ़ीजार का।
आगे, तो हां लोगों, बिना दाढ़ी बिना मूंछ,
और कर गये लड़के करिश्मा, दढ़ियलों से पूछ-पूछ।

करने को तो औरतों ने क्रांति कर डाला जहां में,
फिर भी पूछेंगे बेहूदे, कि बताओ कि कहां में?
मैं बताता हूं, नहीं चलकर दिखाता हूं, वहीं,
आप चाहोगे तो बाबूजी दिखा दूंगा यहीं।

पर छोड़िये जी!
उनकी बातें फिर कभी जब फिर मिलेंगे,
आज की तो बात दाढ़ी-मूंछ के ही सिलसिले में।
फेरहिस्त लम्बी है लोगों, मेरे दाढ़ीबाजों की,
हो ची मिन्ह चाचा की दाढ़ी, दाढ़ी-ए-नव्वाब थी,
सिर झुका दाढ़ी हिला दे, तो हिल उठे लेदुआन,
दाढ़ी हिलाकर हंस दिए तो हिल गया वाशिंगटन ,
गिर गया गश खा कनेडी, रो पड़ा सच में निक्सन।

बात दाढ़ी की चली तो याद लेनिन की है आई,
सोचता हूं लेनिन, लेनिन था कि वह दाढ़ी था भाई!
क्या गजब की दाढ़ी इस ब्लादीमिर इल्यीच की थी,
यही लौंडा आगे चलकर दोस्तों लेनिन हुआ,
क्या कट थी दाढ़ी,
रूस कट या फ्रेंच कट या अन्य कट,
पर गौर से देखोगे तो लगती है
इंटरनेषनल कट।

और स्टालिन की मूंछों को कहोगे कौन कट ?
जाट कट या लाट कट याकि थीं कज्जाक कट,
पर ताव दे दो तो लगें
पूरी तरह उजबेक कट।
माउरा नहर के वेग कट,
मध्य युग के नाइटों कट,
नटों के उस्ताद कट,
मार्शल कट, जनरल कट और सिपहसालार कट,
पूर्वी सरदार कट, क्षत्रिय कट, तलवार कट
मूंछ स्टालिन की थी अकबर महान सम्राट कट,
जिसके आगे सीजर की मूंछें लगेंगी गिरहकट।
मूंछ तो बाबूजी रख लेते,
डाकू और चोरकट,
पर नाम जोसेफ का नहीं यूं ही स्टालिन पड़ा था,
उसकी मूंछें उस वक्त दुनिया का अमन-ओ-चैन थीं,
युद्ध के उपरांत उपजे
राष्ट्रसंघ कट थी।

इंसान की पहचान आदत से है, फैशन से नहीं,
क्या कहोगे भगत सिंह के हैट का क्या कट था ?
सिख कट या हिंदू कट याकि था अंग्रेज कट?
बराबरी का ताज था, बिरादरी का तख्त था,
समाजवाद का निशान, हैट क्रांति कट था।

कामरेड कट था-

दोस्ती का हाथ, दोस्त इंकलाब के लिए,
गया, गया चला गया,
तभी तो याद आ रही,
तभी सदा सता रही
भगत सिंह, भगतसिंह, कामरेड!
तुम्हारी मातृभूमि आर्तनाद कर रही है अर्द्धरात्रि में,
भगत सिंह, भगत सिंह, कामरेड!
तुम्हारी मातृभूमि रो रही
भूख-प्यास, दुख-शोक से,
कि वीरवर! उसे तुम्हारे खून की पुकार है,
उसे तुम्हारे बस उसी विचार की पुकार है,
जो विचार तेरा भी है मेरा भी है,
फिदेल, चे ग्वेरा का है,
जो विचार मूर का, मजूर का है,
हमें हमारे देश को वही विचार चाहिए,
हमें हमारे देश को वही किताब चाहिए।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को अवश्य।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को अटल।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को सहज।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को सरल।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब साध्य है।
कि जो किताब इंकलाब का ही इंतखाब है।
हमें हमारे देश को वही किताब चाहिए,
हमें हमारे देश को इंकलाब चाहिए।

क्योंकि इंकलाब से भला,
क्योंकि इंकलाब से बड़ा,
कुछ नहीं है
कुछ नहीं है
कुछ नहीं है
जहान में।

...रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

12/6/10

6 दिसंबर की रात को - नैय्यरा नूर की आवाज़ में फ़ैज़

आज 6 दिसंबर की रात है. इसी तारीख को हिन्दुस्तान में जम्हूरियत के आख़िरी विरसे को जमींदोज किया गया था, बाबरी मस्जिद ढहाई गयी थी. एक पूरी विरासत को तफ़रके की सलाखों से बींध दिया गया. ये तुम थे दोस्त, जो ढहाए गए, मारे गए, तोड़ दिए गए, जमींदोज़ हुए. मुक्तिबोध के शब्दों में - जम गए, जाम हुए, अपने ही कीचड़ में धंस गए, फंस गए/ ... विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में!!

और अब तो फैसला भी आ गया.

ये एक गुनाह ऐसा है जिसमें इस मुल्क के साहबजादों से लेकर हरामजादों तक, सभी शामिल हैं. और ये मुल्क, ख़ुदा ख़ैर करे, ये किसका है! इस देश की अवाम का या इसके हुक्मरानों का? या अवाम की जुबान बोल रही सत्ता का? या उनका जिन्हें इस बात का हासिल है कि उन्होंने अवाम को इस बात के लिए तैयार किया!

आज सुनिए फ़ैज़ की वह ग़ज़ल, जिसे उन्होंने ढाका से लौटकर कहा था. इन दोनों कौमों के भीतर इससे बेहतर और क्या हो कि ये ग़ज़ल सुनी जाये, और कहा जाये कि 'तुम बिल्कुल हम जैसे निकले, अब तक कहाँ छुपे थे भाई!'

ग़ज़ल के बोल ये रहे-

हम के ठहरे अजनबी इतने मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद

कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिल-ए-शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद

हम के ठहरे अजनबी ...

थे बहुत बेदर्द लम्हें ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क के
थीं बहुत बेमेहर सुबहें मेहरबां रातों के बाद

हम के ठहरे अजनबी...

उन से जो कहने गए थे फैज़ जां सदका किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों केन बाद

हम के ठहरे अजनबी...

12/4/10

बारो घी के दिए ना (कव्वाली) - ज़फर हुसैन बंदायूनी और मंडली

ज़फर हुसैन बंदायूनी पुरानी शैली के कौवाली गायक हैं. वहां उस शैली में इतनी तड़क भड़क नहीं होती. कौवाली, जो की गायन की सबसे लोकतान्त्रिक विधा है, का असली रूप इसी शैली में निखर कर आता है. आजकल कुछ कौवाली गाने वाले ढेरों वाद्य यंत्रों और सुव्यवस्थित टीम के साथ गाते हैं. सुव्यवस्थित टीम माने लगभग कोरस जैसा. संगी गायकों की हालात इस शैली में कोरस गायकों जैसी होती है. जबकी कौवाली की मूल प्रकृति में ही यह बात नहीं है. संगी गायक इस विधा में मूल गायक से बंधा होकर भी अपनी स्वतंत्र हैसियत रखता है. अगुवा गायक को भी उनके लिए जगह छोड़नी पड़ती है.ज़फर साहब और उनके संगी इसी शैली के गायक हैं.

सुनिए इस मंडली से एक बहुचर्चित कौवाली 'बारो घी के दिए ना '. यह मोहम्मद साहब के जन्म पर सोहर है. हमारी साझी परम्परा और संस्कृति का वाहक.

12/1/10

कानून - गोरख पाण्डेय

अरुंधति रॉय के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की घटना ने एक हिन्दुस्तानी के बतौर हमारा सिर शर्म से झुका दिया है. सरकार की परिभाषाओ के हिसाब से आज तीन चौथाई से ज्यादा देश राजद्रोह का अपराधी ठहरेगा. नैतिक उच्चासन पर बैठ कर पूरे देश को देशभक्ति का प्रमाणपत्र देने वाले मीडिया के भीतर की सडान्ध का बहुत थोडा हिस्सा सामने आया है. जजों का भ्रष्टाचार अब पुरानी बात हो चुकी है.
कवि गोरख पाण्डेय की कविता 'कानून'1980 में लिखी गयी थी, भारतीय राष्ट्र के दमनकारी रुख को साफ़ बेनकाब करती है.

कानून

लोहे के पैरों में भारी बूट
कन्धो से लटकती बन्दूक
कानून अपना रास्ता पकड़ेगा
हथकड़ियाँ डालकर हाथों में
तमाम ताकत से उन्हें
जेलों की ओर खींचता हुआ
गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से
श्रम से फल को अलग करता
रखता हुआ चीजों को
पहले से तय की हुई
जगहों पर
मसलन अपराधी को
न्यायधीश की, ग़लत को सही की
और पूँजी के दलाल को
शासक की जगह पर
रखता हुआ
चलेगा
मजदूरों पर गोली की रफ्तार से
भुखमरी की रफ्तार से किसानों पर
विरोध की जुबान पर
चाकू की तरह चलेगा
व्याख्या नहीं देगा
बहते हुए ख़ून की
कानून व्याख्या से परे कहा जायेगा
देखते-देखते
वह हमारी निगाहों और सपनों में
खौफ बनकर समा जायेगा
देश के नाम पर
जनता को गिरफ्तार करेगा
जनता के नाम पर
बेच देगा देश
सुरक्षा के नाम पर
असुरक्षित करेगा
अगर कभी वह आधी रात को
आपका दरवाजा खटखटायेगा
तो फिर समझिये कि आपका
पता नहीं चल पायेगा
खबरों से इसे मुठभेड़ कहा जायेगा


पैदा होकर मिल्कियत की कोख से
बहसा जायेगा
संसद में और कचहरियों में
झूठ की सुनहली पालिश से
चमकाकर
तब तक लोहे के पैरों
चलाया जायेगा कानून
जब तक तमाम ताकत से
तोड़ा नहीं जायेगा।

- गोरख पाण्डेय