1/29/11

गोरख पाण्डेय की याद में



















एक नगमा था पहलू में बजता हुआ

(आज हिन्दी के प्रतिबद्ध और लोकप्रिय कवि गोरख पाण्डेय की पुण्यतिथि है. कभी शमशेर जी ने गोरख क़ी कविताओं के बारे में बात करते हुए कहा था क़ि कविता क़ी सबसे बड़ी ताकत उसका लोकगीत बन जाना होता है, और गोरख, उस मुकाम तक पहुंचने वाले कवि हैं. गोरख क़ी कविता सरल के सौंदर्य से अनुप्राणित है. पर ध्यान देने क़ी बात यह है क़ि यह सरलता गोरख क़ी कमाई हुई है. वस्तु और रूप दोनों स्तरों पर, गोरख भाव और बोध, संवेदना और विचार, अर्थवत्ता और प्रासंगिकता, समकालीन और कालजयी क़ी द्वंद्वात्मक एकता को अपनी कविता में घटित करते हैं. आज पढ़िए, उनकी कुछ कवितायें.)


आशा का गीत

आयेंगे, अच्छे दिन आयेंगें,
गर्दिश के दिन ये कट जायेंगे.
सूरज झोपड़ियों में चमकेगा,
बच्छे सब दूध में नहायेंगे.
सपनों क़ी सतरंगी डोरी पर
मुक्ति के फरहरे लहरायेंगे.


आँखे देखकर

ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समुन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो
बदल देना चहिये.


सपना

सूतल रहलीं सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया,
फूटलि किरनिया पुरुब असमनवा
उजर घर आँगन हो सखिया.

अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया,
गोसयाँ के लठिया मुरइआ अस तूरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया.

केहू नाहीं ऊँचा नीच केहू के न भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिया,
मेहनति माटी चारों ओर चमकवली
ढहल इनरासन हो सखिया.

बैरी पैसवा के रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया.


सात सुरों में पुकारता है प्यार

मां, मैं जोगी के साथ जाऊंगी

जोगी सिरीस तले
मुझे मिला

सिर्फ एक बांसुरी थी उसके हाथ में
आँखों में आकाश का सपना
पैरों में धूल और घाव

गाँव-गाँव वन-वन
भटकता है जोगी
जैसे ढूंढ रहा हो खोया हुआ प्यार
भूली-बिसरी सुधियों और
नामों को बांसुरी पर टेरता

जोगी देखते ही भा गया मुझे
मां, मैं जोगी के साथ जाऊंगी

नहीं उसका कोई ठौर ठिकाना
नहीं जात-पांत
दर्द का एक राग
गांवों और जंगलों में
गुंजाता भटकता है जोगी
कौन-सा दर्द है उसे मां
क्या धरती पर उसे
कभी प्यार नहीं मिला?
मां, मैं जोगी के साथ जाऊंगी

ससुराल वाले आयेंगे
लिए डोली-कहार बाजा-गाजा
बेशकीमती कपड़ों में भरे
दूल्हा राजा
हाथी-घोड़ा शान-शौकत
तुम संकोच मत करना मां
अगर वे गुस्सा हों मुझे न पाकर

तुमने बहुत सहा है
तुमने जाना है किस तरह
स्त्री का कलेजा पत्थर हो जाता है
स्त्री पत्थर हो जाती है
महल अटारी में सजाने के लायक

मैं एक हाड़ मांस क़ी स्त्री
नहीं हो पाऊँगी पत्थर
न ही माल-असबाब
तुम डोली सज़ा देना
उसमें काठ क़ी पुतली रख देना
उसे चूनर भी ओढ़ा देना
और उनसे कहना-
लो, यह रही तुम्हारी दुलहन

मैं तो जोगी के साथ जाऊंगी मां
सुनो, वह फिर से बांसुरी
बजा रहा है

सात सुरों में पुकार रहा है प्यार

भला मैं कैसे
मना कर सकती हूं उसे?

(रामजी राय से एक लोकगीत सुनकर)


बंद खिड़कियों से टकराकर

घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों में बंद खिड़कियाँ हैं
बंद खिड़कियों से टकराकर अपना सर
लहूलुहान गिर पडी है वह

नई बहू है, घर क़ी लक्ष्मी है
इनके सपनों क़ी रानी है
कुल क़ी इज्ज़त है
आधी दुनिया है
जहां अर्चना होती उसकी
वहां देवता रमते हैं
वह सीता है सावित्री है
वह जननी है
स्वर्गादपि गरीयसी है

लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पडी है वह

कानूनन सामान है
वह स्वतंत्र भी है
बड़े बड़ों क़ी नजरों में तो
धन का एक यन्त्र भी है
भूल रहे हैं वे
सबके ऊपर वह मनुष्य है

उसे चहिये प्यार
चहिये खुली हवा
लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पडी है वह

चाह रही है वह जीना
लेकिन घुट-घुट कर मरना भी
क्या जीना?

घर घर में श्मसान घाट है
घर घर में फांसी घर है घर घर में दीवारें हैं
दीवारों से टकराकर
गिरती है वह

गिरती है आधी दुनिया
सारी मनुष्यता गिरती है

हम जो ज़िंदा हैं
हम सब अपराधी हैं
हम दण्डित हैं.


एक झीना-सा परदा था

एक झीना-सा परदा था, परदा उठा
सामने थी दरख्तों की लहराती हरियालियां
झील में चांद कश्ती चलाता हुआ
और खुशबू की बांहों में लिपटे हुए फूल ही फूल थे

फिर तो सलमों-सितारों की साड़ी पहन
गोरी परियां कहीं से उतरने लगीं
उनकी पाजेब झन-झन झनकने लगी
हम बहकने लगे

अपनी नज़रें नज़ारों में खोने लगीं
चांदनी उंगलियों के पोरों पे खुलने लगी
उनके होठ, अपने होठों में घुलने लगे
और पाजेब झन-झन झनकती रही
हम पीते रहे और बहकते रहे
जब तलक हर तरफ बेखुदी छा गई

हम न थे, तुम न थे
एक नग़मा था पहलू में बजता हुआ
एक दरिया था सहरा में उमड़ा हुआ
बेखुदी थी कि अपने में डूबी हुई
एक परदा था झीना-सा, परदा गिरा
और आंखें खुलीं...
खुद के सूखे हलक में कसक-सी उठी
प्यास ज़ोरों से महसूस होने लगी।





गोरख पाण्डेय (1945 -1989) दर्शन, संस्कृति और कला के प्रश्नों से जूझने वाले हिन्दी के आर्गेनिक इंटलेक्चुअल (जन बुद्धिजीवी). जन संस्कृति मंच के संस्थापक महासचिव.

1/28/11

मेरे सपनों का भारत : एक कम्युनिस्ट की निगाह से

मेरे सपनों का भारत

समाज क़ी जटिलताओं क़ी अभिव्यक्ति क़ी माध्यम राजनीति के अलावा मेरी दिलचस्पी का इलाका खगोलशास्त्र (कास्मोलोजी) है. जहां ब्रह्माण्ड अनंत दिक्काल में प्रकट होता है ; जहां आकाशगंगाएं ब्रह्माण्ड क़ी सतत विलुप्त होती सरहदों में एक दूसरे से तेजी से दूर चली जाती हैं ; जहां तारे अस्तित्व में आते हैं, चमकते हैं और विस्फोट के साथ मृत्यु का वरण करते हैं और जहां एकदम सटीक रूप से गति, पदार्थ के अस्तित्व क़ी प्रणाली है.

गति, अर्थात परिवर्तन और रूपांतर. हमेशा नीचे से ऊपर क़ी ओर. यही इंसानी अस्तित्व की भी प्रणाली है. कोई विचार अंतिम नहीं होता, कोई समाज पूर्ण नहीं होता. जब-जब किसी समाज को किसी अंतिम विचार का मूर्तरूप माना गया, तब तब गहराईयों से उठे भूकंप के झटकों ने उस समाज क़ी बुनियाद को झकझोर कर रख दिया. और तब, चहुँओर पसरी निराशा के घुप्प अँधेरे के बीच नए सपने खिलखिला उठे. कुछ सपने कभी सच नहीं होते, क्योंकि वे इंसानी दिमाग मात्र (in itself) क़ी बेलगाम मौज होते हैं. जो थोड़े से सपने साकार होते हैं वे मूलतः इंसानी दिमाग की 'अपने लिए' (for itself) गढ़ी गयी निरपेक्ष कृतियाँ होते हैं.

मेरे सपनों का भारत निश्चय ही एक अखंड भारत है जहां एक पाकिस्तानी मुसलमान को अपनी जड़ें तलाशने के लिए किसी वीजा क़ी जरूरत न होगी. ऐसे ही किसी भारतीय के लिए महान सिन्धु घाटी सभ्यता विदेश नहीं रहेगी. जहां बंगाली हिन्दू शरणार्थी आखिरकार ढाका क़ी कड़वी याददाश्त के आंसू पोंछ लेंगे और बांग्लादेशी मुसलामानों को विदेशी कहकर चूहों क़ी तरह खदेड़ा नहीं जाएगा.

क्या मेरी आवाज भा ज पा से मिलती जुलती लग रही है? पर भा ज पा तो भारत के मुस्लिम पाकिस्तान और हिन्दू भारत, हालांकि यह उतना 'विशुद्ध' नहीं, के महा-बंटवारे पर फली-फूली. चूंकि भा ज पा इस बंटवारे को विनाशकारी नतीजों के साथ चरम तक ले जा रही है, ठीक इसीलिये इन तीनों देशों में यकीनन ऐसे महान विचारक पैदा होंगें जो इन तीनों देशों के बन्धुत्वपूर्ण एकीकरण के लिए जनमत तैयार करेंगे. खैर रखिये, वो दिन भाजपा जैसी ताकतों के लिए क़यामत का दिन होगा.

मेरे सपनों के भारत में गंगा औए कावेरी तथा ब्रह्मपुत्र तथा सिन्धु एक दूसरे से मुक्त मन मिलेंगी और सुबह क़ी रोशनी में महान भारतीय संगीत क़ी जुगलबंदी के साथ छा जायेंगी. और तब, कोई नायक अपने विवरणों को 'भारत क़ी पुनर्खोज' में संकलित करेगा.

मेरे सपनों का भारत राष्ट्रों के समुदाय में एक ऐसे देश के रूप में उभरेगा जिससे कमजोर से कमजोर पड़ोसी को भी डर नहीं लगेगा और जिसे दुनिया का ताकतवर से ताकतवर मुल्क भी धमका नहीं सकेगा और न ही ब्लैकमेल कर सकेगा. चाहे आर्थिक ताकत के मामले हों य ओलम्पिक पदक के, मेरा देश दुनिया के अव्वल पांच देशों में होगा.

मेरे सपनों का भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा, जिसकी आधारशिला 'सर्वधर्म समभाव' क़ी जगह 'सर्वधर्म विवर्जिते' के वसूल पर टिकी होगी. किसी क़ी व्यक्तिगत धार्मिक आस्थाओं में हस्तक्षेप किये बगैर राज्य वैज्ञानिक और तार्किक विश्व दृष्टिकोण को बढ़ावा देगा.

यह कहना बिलकुल माकूल है क़ि धर्म, अपने परिवेश के सामने इंसान क़ी लाचारी क़ी अभिव्यक्ति है. लिहाजा इसका उन्मूलन भौतिक और आध्यात्मिक जीवन दशाओं में आमूल तब्दीली क़ी मांग करता है, जहां इंसान परिवेश को अपने वश में करने के लिए खडा हो सके. भारत में जब कभी अनुदार दार्शनिक विचार प्रणालियाँ अवाम पर पहाड़ क़ी तरह लद गयीं, तब-तब यहाँ सुधार आंदोलनों का जन्म हुआ है. ऐसे ही, मैं वैज्ञानिक विचारों के पुनरुत्थान का सपना देखता हूं, जहां भगवान के रूप में पराई बन गयी आदमीयत को इंसान फिर से हासिल कर सकेगा. इंसानी दिमाग के इस महान रूपांतरण के साथ-साथ एक सामाजिक क्रान्ति होगी, जहां संपत्ति के उत्पादक, अपने उत्पादों के मालिक भी होंगें.

मेरे सपनों के भारत में अछूतों को हरिजन कहकर गौरवान्वित करने का अंत हो जाएगा और दलित नाम क़ी श्रेणी नहीं रहेगी. जातियां विघटित होकर वर्गों का रूप ले लेंगीं और उनके हर सदस्य क़ी अपनी व्यक्तिगत पहचान होगी.

मेरे सपनों के देश भारत के हर शहर में एक कोंफी हाउस होगा जहां ठंढी कोंफी क़ी घूंटों के साथ बुद्धिजीवी गर्मागर्म बहस करेंगे. वहां कुछ विरही जन धुएं के छल्लों में अपनी प्यारियों के अक्स तलाशेंगे तो कई अतृप्त ह्रदय कला और साहित्य क़ी विविध रचनाओं से मंत्रमुग्ध हो उठेंगे. तब कला और साहित्य क़ी किसी रचना पर राज्य क़ी ओर से कोई सेंसर न होगा. तमाम सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान सख्ती से मना होगा- बेशक- कोंफी हाउसों को छोड़कर.

शुरुआती बात पर लौटते हुए कहूँ तो मेरा सपना है क़ि भारतीय अंतरिक्ष यान गहरे आकाश को भेदता हुआ उड़ेगा और भारतीय वैज्ञानिक-गणितज्ञ प्रकृति क़ी मौलिक शक्तिओं को एक अखंड में समेटने के समीकरण हल करेंगें.

अंततः, मेरे सपनों क़ी मां मातृभूमि है, जिसके हर नागरिक क़ी राजनीतिक मुक्ति सबसे ज्यादा कीमती होगी. वहां असहमति क़ी वैधता होगी और थ्येन आमेन चौक जैसी घटनाओं को नैतिक रूप से शक्तिशाली नेता और जनमिलीशिया क़ी निहत्थी शक्तियां निपटाएंगी.

मेरे सपनों का भारत भारतीय समाज में कार्यरत बुनियादी प्रक्रियाओं पर आधारित है जिसे साकार करने के लिए मेरे जैसे बहुतेरे लोगों ने अपने खून क़ी आखिरी बूँद तक बहाने क़ी शपथ ले रखी है.





कॉमरेड विनोद मिश्र, (1947 -1998), प्रखर मार्क्सवादी चिन्तक और पूर्व महासचिव, भारत क़ी कम्युनिस्ट पार्टी (माले)

1/27/11

सीताकांत महापात्र - शब्द के आकाश में

सीताकांत महापात्र उड़िया के नामचीन कवि हैं. उनकी कविताओं में समय और मृत्यु के अनगिन अद्भुत बिम्ब हैं. उड़ीसा की प्रकृति का गहरा राग और मिथकों को परिभाषित करने की आदिम ललक उनकी कविता के केंद्र में है. पेश है उनकी कविता 'मुर्गा लड़ाई'. युद्ध की त्रासद विडम्बना को खोलती यह कविता अंत में एक गहरी व्यथा से हमारा साबका करवाती है. ऐसे दृश्य हमने सभ्यता के फलक पर देखे हैं- जब हंसी के लिए युद्ध आयोजित किये गए, युद्ध में मारे गए अनजान- नासमझ योद्धा किसी के काम आये और अंततः कुछ भी नहीं बदला. बच गयी सिर्फ एक उदासी.

मुर्गा लड़ाई

आमने सामने दो वीर
अस्त्र-शस्त्र सज्जित सर से पैर तक
अनजाने क्रोध से फूल उठती है पतली गर्दन
रण-दुन्दुभी का उदघोष : सम्मुख है समर.

अब कीचड़ में
कीड़े-मकोड़े नहीं ढूँढना है ;
भूखी बिल्ली और उससे भी भूखे
मनुष्य की लालच से
खुद को बचाकर
इधर-उधर छुपने की भी जरूरत नहीं
पूरी शताब्दी की नामर्दी को पीछे छोड़
सारा गाँव, युद्ध की हुंकार,
रिरियाहट, चीत्कार से काँप उठता है.
कुरुक्षेत्र छिड़ जाता है मेदिनी दहलाकर.

दोनों वीर कुछ नहीं समझते
क्यों है इस रण की सजावट, कौन है शत्रु
क्यों है यह घमासान युद्ध
किस कारण इस शांत धरती पर
छलकता है यह समुद्र गर्जन !

अस्त्र स्नायु को खींचता है, गर्दन फूल उठती है
खून में लगती है आग
लगता है पंख सारे उड़ जायेंगे
मांस की पकड़ से
क्रोध-द्वेष समा जाता है रग-रग में
पल भर में महायुद्ध
मारना मरना ही है अंत
सांझ उतर आती है धीरे-धीरे
खून से धुले पश्चिमी आकाश में.

वह भी पल-भर के लिए
उसके बाद सब कुछ समाप्त
गोधूलि का रंग मिट जाता है
आसमान में मंडराता है अन्धेरा
खून टपकता है,
रंग टपकता है
दिन बीत जाता है.

हाथ में लिए मांस का खामोश लोथड़ा
सारा गाँव चुपचाप लौट आता है
अभिशप्त शिशु सा
चारो और खामोशी,
गहरी साँसें .

1/22/11

परवल गाथा - प्रकाश उदय



(प्रकाश उदय भोजपुरी के बड़े रचनाकार हैं. आज पढ़िए उनका यह गीत जो परवल की जिन्दगी, उसके बारे में लोगों के बदलते रुख और बाज़ार में उसकी आमदरफ्त के साथ ही अवाम की जिन्दगी में परवल की घटती-बढ़ती खासियत की रोचक कथा बयां करती है. ठेठ भोजपुरी के कुछ शब्दों के अर्थ नीचे दिए गए हैं.)


परवल गाथा

आजु सट्टी में पहिल पहिल लउकल परोरा, हरियाइ गइल बा
देख परवर नयन से लखत चहुँओर, हरियाइ गइल बा

अभी कुछ दिन त टुकुर-टुकुर ताके के बा
फेरू कबो-कबो भाव-ताव थाहे के बा
अब तनी-तनी परस सरस होखे लागल
अब तुरहो जियत तनी जोखे लागल

अब तियना से भुजिया ले पहुँचल परोरा पटियाइ गइल बा
अब गवना बियाह तिलक थम्हलस परोरा पटियाइ गइल बा

अब अलुआ में परवर भुलावे के ना
अब परवर में अलुवा मिलावे के बा
अब देसी चलानी में बांटे के
पिया पकल पनसोह तनी छाँटे के

अब लायक बड़कवन के नइखे परोरा ससताइ गइल बा
देख गाँजल बा सट्टी में बोरा के बोरा ससताइ गइल बा

जबले पाव भर के भावे बिकात रहुए
तले बड़िए सवाद से खवात रहुए
अब भावे बिकाता पसेरी के
का दो के खाई खा-खा के छेरी के

अछा, कुछ दिन में रेयर हो जाई परोरा, पटुआइ गइल बा
तब फेरू तनी फेयर हो जाई परोरा, पटुआइ गइल बा

...प्रकाश उदय


1. सट्टी - सब्जी मंडी/बाज़ार
2. परोरा - परवल
3. तुरहो जियत - थोड़ा बढ़ा कर तौलना
4. जोखना - तौलना
5. तियना -रसेदार
6. पटियाना - पट जाना
7. चलानी - पड़ोस
8. पकल पनसोह - पका हुआ और पानी भरा
9. छेरना - पतली दस्त होना
10. पटुआ जाना - कड़ा हो जाना

1/18/11

बिनायक सेन के लिए एक गीत व एक और कविता


(यू-ट्यूब से साभार )

हमें जो तय करना है
सुधीर सुमन

इतने स्वप्न-दुःस्वप्न
इतने अगर-मगर
आजादी और विकास की
किस्म-किस्म की परिभाषाएं
गोल-गोल चक्करदार भाषाएं
आदमी होने के हक में खड़े
किसी झंडे से बड़ा
विराट मध्यवर्ग का अपना अहं
विशाल-सर्प सा फन काढ़े
विकास की रेस में सरपट भागता
अपनी रीढे़ गंवाकर।

ऐसे में जो भी आती आवाज सीधी
अपनी संवेदना के लिए
कोई भी कीमत चुकाने को तैयार
गलत को गलत कहने की ताकत
कहीं किसी अलंकार-उपमा की नहीं जरूरत
तो मानो कोई गहरा अर्थ मिलता है
जिंदगी का आदिम रोमांच लौटता है।

संशय है दोस्त
गहरा संशय
यहां सब कुछ बिक रहा है
हर चीज की कीमत लग रही है
सब कुछ खुला है
गोकि रंगीन फैशनेबल पर्दों की है भरमार
बुराइयां भी शान से बिकती हैं आज
आत्मसुरक्षा के नाम पर।

फिर तुम इतने संवेदनशील क्यों हो
क्यों तुम्हारी सहानुभूति इतनी गहरी
क्यों गहरा इस कदर तुम्हारा प्यार
क्यों उनके कायदे नहीं मानते
क्यों उनकी तहजीब नहीं मानते
क्यों डूबते सितारों से उम्मीद लगाए हो
क्यों उजड़ते लोगों को देखते हो
क्यों विकास और उद्धार के
इस सर्वव्यापी नाटक में
कोई चमकदार चेहरा बन
चुप्पी साध नहीं लेते?

एक भीषण क्रूर-मनमोहक खेल है
हम भी हैं जिसमें मौजूद।
किसके नाम पर हो रहा
हरियाली का शिकार
किसका जंगल छिनकर
किसे धकेला जा रहा सामानों के जंगल में
किसके बल पर बन रही बहुमंजिला इमारतें
एक दूसरे से होड़ लेती,
क्या हमारी लालसाओं की ईंटें
नहीं लगी उसमें?

ये रिलाइंस, ये वेदांता
ये आधुनिक इंद्र
सभ्यता के ठेकेदार
आज भी जिंदगियों से खेल रहे
ये जितना बोलते हैं
उससे ज्यादा चुप रहते हैं
और अपनी चुप्पियों में लगातार
साजिशें रचते रहते हैं।
हमारे लिए ही सुविधाएं जुटाने के नाम पर
हमारे स्वामी बनते जाते हैं
हमारे विवेक पर जड़के मजबूत ताला
हमारे दिलों पर काबिज हो
हमारी जबानें हमसे छिन लेते हैं।

हममें कितने हैं
जिन्होंने खुद अपनी जबानों पे
चाबुक नहीं चलाए
अंधेरे को आलोक कहते
पल भर भी सकुचाए?
लोहे के खतरनाक जूतों के
चांदी से चमकते एजेंट
हर ओर फिर रहे
वे हमें अकेला ही नहीं करते
हमसे ही हमको चुराके
किसी और समूह में
कर देते हैं शामिल
सलवा जुडूम बनाते हैं।

कत्ल के कई तरीके हैं उनके पास
मत कहिए कि फूल, रोशनी, कर्णप्रिय आवाजें
उन्हें पसंद नहीं,
उनकी कई किस्में लाए हैं वे
जिनसे सजे हैं बाजार,
हमारे घर-बार,
वे फूल से फूल को रौंदते हैं
रोशनी से रोशनी का कत्ल करते हैं
मधुरता से मधुरता को मिटाते हैं
उन्हें पता है कि
क्या है सुंदर और सुखद,
वे उसके पैकेज हमें भेंट करते हैं
और उसकी बड़ी कीमत वसूलते हैं
हमारे मन की सख्ती को गलाते हैं

वे चुनी हुई स्मृतियां फेंकते हैं
हमारे दामन में
बड़े गुणग्राही बनते वे
पर्व-त्योहार, रिवाज की रक्षा के लिए
हरदम हरवक्त वे रहते तैयार,
बस इतना चाहते हैं
लय-ताल उन्हीं का हो।
उनका उल्लास, उनकी मुस्कुराहटें
उनकी मस्ती, उनका आनंद
जादू की तरह पहुंचता है हम तक।

वे चाहते हैं
कानून का राज चले
उनके कानून का
जो जनता के लिए नहीं हो
बल्कि उसके लिए जनता हो
वे हिदायत देते कि
उनके कानून की नजाकत का हम रखें ख्याल
शिकायत करें, पर जरा कायदे से
कोई बयान तक न दें ऐसा
जिससे उसकी सेहत पर पर आए आंच।

इंकलाब की हर संभावना, हर कोशिश को
महज एक सनसनी में तब्दील कर
सूचना की विश्वव्यापी पालतू मशीन की खुराक बना
तत्पर हैं वे करने को हजम
चाहतें हैं विरोध की हर आवाज
हो जाए दफन।

मेरे प्यारे डाक्टर,
दवा के नाम पर देते हैं वे
कई तरह के नशे
कि जब दर्द हो
आदमी रोए नहीं
कहकहे लगाए।

खुशी उनका एक प्रचार है
उनके हित में कारोबार है
आनंद की गठरी लिए
उनके दरबारी हर कतार में हैं
भूखे से जबरन कहते कि
कहो, पेट भरा है।
मौत का जाल रचते और
कहते- यह लो जिंदगी
मौज करो।
कोई फरियाद नहीं सुनते,
कहिए कि हम तो ऐसे ही ठीक हैं, जी
जाइए हमें हमारे हाल पे छोड़िए
जाइए यहां से जाइए,
तो कहते हैं-
इतनी बेमिसाल जिंदगी दे रहे
यह भी नहीं संभलती
मूर्ख, असभ्य, पिछड़े।

वे बताते हैं
हम सबकी औकात
जैसे हम यूं ही बेजरूरत आवारा
आसमान से टपक आए हों
और सारी धरती, सारा इल्म, सारी संस्कृति
उनके बाप-दादाओं की जागीर हो।
उनके सिपहसलार घुमते हैं
हाथों में संस्कृति का धारदार हथियार लिए
चाहते हैं सब हो जाएं न्यौछावर
उनके चारण बन गाएं बस उनके गीत

संस्कृति और संस्कृति में
हरियाली और हरियाली में
फूल और फूल में
खुशी और खुशी में
संवेदना और संवेदना में
देश और देश में
फर्क है,
यह फर्क और गहरा होना चाहिए,।

हमने फिर यह जाना है
प्यारे विनायक सेन
कि सच और न्याय पर अड़ा
हर आदमी इनके लिए खतरनाक है
और यह कितनी अच्छी बात है कि
तुम अकेले नहीं हो।
हमें तो यही तय करना है बार-बार
सत्य, संवेदना और इंसाफ की खातिर
हम क्या और कितना खोने को तैयार
कितना मजबूत हमारा इनकार।

1/15/11

ओबामा चरित -आलोक कुमार श्रीवास्तव


ओबामा चरित

बन्धु ओबामा की सदा, खुली रहे दूकान।
फर्क मिटे दिन रात का, चला रहे अभियान।।

कोशिश है साम्राज्य का, सूर्य न होवे अस्त।
बुश से ऊबा विश्व हो, ओबामा से त्रस्त।।

श्वेत-अश्वेत की चांचर में निकस्यो बिजई हुइ के रंग स्यामा।
आस बंधी सब लोगन को मनो भागो अंधेरो अ निकस्यो घामा।
फीकी परी सब नीकी उजास ये जान कि काग उलूक को मामा।
अंतर का परितै मनमोहन, होत्यो बुश या कि आहै ओबामा।।

बुश को अराजक राज चल्यो बिनसायो अनेकन को धन-धामा।
तेल की प्यास बुझी न कभी और ना ही मिला कभी कोई ओसामा।
भूत भयंकर भय को बनायो, कबहुं आतंक कबहुं इसलामा।
सोई अराजकता को बढ़ावन आवत है दुरदांत ओबामा।।
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लाल गलीचे बिछाए, राह तकें दिन-रैन।
कृपा करो इस देश पर स्यामल अंकल सैम।।

श्वेत तुम्हारे पूर्वजों का हम पर एहसान।
दो सौ बरसों में बने हम कुछ सभ्य सयान।।

चीख पुकार बुलाव गुहार सुनात कछू न दिखात हो रामा।
सीस पे नीली पगा पर सोभत लकदक जैकेट और पजामा।
लूट को राज यहै मनमोहन, देस रहै जनु दीन सुदामा।
स्वागत को करबद्ध खड़े, लै जाहु जो चाहत होय ओबामा।।

मंदी की मार से बेकल यू एस त्रस्त नगर संत्रस्त हैं ग्रामा।
घोर अकाल परयो रोजगार को, आगे की राह पे लाग्यो विरामा।
मांस की भूखी औ खून की प्यासी, जो कौम उसे मत जानियो लामा।
युद्ध के सौदे की बात मनावन आवत आदमखोर ओबामा।।

-आलोक कुमार श्रीवास्तव

1/12/11

बिनायक सेन के लिए सात कवियों की कवितायेँ

बीर बिनायक
मृत्युंजय

बीर बिनायक बांके दोस्त !
थको नहीं हम संग तुम्हारे
झेल दुखों को जनता के संग
कान्धा भिड़ता रहे हमेशा
यही भरोसा यही भरोसा
बज्र कठिन कमकर का सीना
मज्जा मांस और रकत पसीना
मिलकर चलो जेल से बोलें
जिनकी काटी गयीं जुबानें
उनके मुंह के ताले खोलें

साथी देखो यही राज है
यही काज है
लोकतंत्र का पूर्ण नाश है
लोकसभा और राज सभा
की नूतन अभिनव बक्क वास है
देखो इनके लेखे पूरा
देश एक मैदाने घास है

देशभक्ति का दंगल देखो
रमन सिंह के छत्तीसगढ़ में
चिदंबरम के राज काज में
वेदांता के रामराज में
उगा हुआ है जंगल देखो
नियमगिरी क़ी नरम खाल से
नोच रहे हैं अभरक देखो

देखो बड़ा नमूना देखो
कैसे लगता चूना देखो
भ्रष्ट ज़ज्ज़ और भ्रष्ट कलेक्टर
सबकुछ अन्दर सबकुछ अन्दर
चूस रहे हैं बीच बाज़ार
नंगे नंगे बीच सड़क पर
खुल्लम खुल्ला खोल खालकर
नाच रहे हैं
देशभक्ति का प्रहसन देखो
टेंसन देखो
अनशन देखो

राडिया वाला टेप देख लो
बरखा जी और बीर सांघवी
नई नवेली खेप देख लो
देखो मिस्टर मनमोहन को
जे पी सी अभिनन्दन देखो
ही ही ही ही दांत चियारे
देखो मिस्टर देशभक्त जी
कौन जगह अब पैसा डारें
घूम रहे हैं मारे मारे
कलमाडी क़ी काली हांडी
देखो
अडवाणी क़ी मूंछ देखो
येदुरप्पा क़ी पूँछ देखो
रेड्डी क़ी करतूत देखो
लोकतंत्र के पूत देखो
भूत देखो

पैसा देखो
भैंसा देखो
ऐसा देखो
वैसा देखो
लाइन से सब देशभक्त हैं
इससे पूरा देश त्रस्त है
देखो

नक्सल देखो
डी जी पी के कुशल दांत में लगा हुआ है बक्कल देखो
सलवा जुडूम बनाने वाले
रक्त काण्ड रचवाने वाले
जल जंगल जमीन के भीतर
महानाश रचवाने वाले
देखो नए दलाल देखो
टमाटरी हैं गाल देखो
पी एम सी एम हाउस भीतर
कोर्ट के भीतर कोर्ट के बाहर
हंडिया भीतर
काली काली दाल देखो
देखो रोज़ कमाल देखो

जान बचाने वाले
लाज रखाने वाले
लड़ भिड जाने वाले
सत्य बोलने वाले
देखो
नए नए है देश दुरोहित
नयी नयी परिभाषा देखो
शासन क़ी अभिलाषा देखो
भाषा देखो
जेल देखो
सेल देखो
खनिज लादकर छत्तीसगढ़ से जाने वाली रेल देखो
जनता के अधिकार देखो
ह्त्या का व्यापार देखो

घी में सनी अंगुलियाँ देखो
हीरे क़ी झिन्गुलिया देखो
बड़े चोर का घाव देखो
विपक्षी का ताव देखो
लगे फिटकरी जियें गडकरी
चेहरा देखो संग मरमरी
कांग्रेस के मंतर देखो
बन्दर देखो
अभी अभी बिल से निकला है जनपथ पर छछुन्दर देखो
माल देखो
ताल देखो
डेमोक्रेसी क़ी टटकी टटकी उतरी है यह खाल देखो

ज़ज्ज़ के घर में नेता बैठा नेता घर अखबार
प्रजातंत्र का विकसित होता नव नव कारोबार

बीर बिनायक तुम जैसों से ही बाकी है देश
भिड़ बैठेंगे आयें जितने बदल-बदल कर भेष

वे हमें अकेला कर देना चाहते हैं
(कामरेड बिनायक सेन के लिए)
संतोष चतुर्वेदी

उन्हें हमारे एकजुट होने से डर लगता है
कहीं हम भीड़ बन कर बेलगाम न हो जाय
कहीं हम पत्थरों को ही न बना लें अपने हथियार
कहीं हम पत्थरों को ही न बना लें अपनी ढाल

खौफनाक अन्दाज वाली उनकी कहानी को
खत्म करते-कराते हुए
उनका अभेद्य दुर्ग ढहाते हुए

इसीलिए वे हमें
हमारे पत्थरों से भी महरूम कर देना चाहते हैं
बिल्कुल अकेला
बिल्कुल निहत्था
बिल्कुल निरूपाय

वे हमें अकेला कर देना चाहते हैं इतना
कि हमारे पैरों में कोई कांटा चुभे तो
हम आह भी न भर पायें
कि अगर कोई अपने हाथों में हमारा हाथ ले कर सहलाए
तो भी मन में प्यार की कोई अनुभूति न जगने पाए
कहीं कोई जख्म हो तो भी
हमारे चेहरे पर कोई शिकन न आने पाए

हमारी किसी भी खुशी, हमारे किसी भी गम पर
जुट न पाए हमारा कोई सगा संबंधी
नात रिश्तेदार भाई दयाद
हमारा दुख घेरे रहे हमें हमेशा
और हमें आसरा दिलाने वाला
कोई न हो दूर दराज तक
हम बीच फंसे रहें मझधार
और हमें बाहर निकालने वाला
कहीं कोई तिनका भी न दिखायी पड़े

जब जब हम उनके रंगीन झांसे में आए
तब तब बदरंग हो हम पछताए
अपना सब कुछ गवाए
उन्होंने रंगीन सपना दिखाया हमें षहर का
और जब अपना घर द्वार गाँव गिरान खेत बधार
छोड़ छाड़ कर हम गये षहर
तमाम चकाचैंध में बिल्कुल अकेले खुद को पाए
शहर जहां अपने अपने कोटरों में कैद लोगों का
कोई पड़ोसी तक नहीं
जहां हम तब्दील होते गये सिर्फ एक पते और एक नंबर में
मसलन क्वाटर और मिल का पता
घर का नंबर गली का नंबर
बस का नंबर कंपनी का हमारा लेबर नंबर
हमारा मोबाइल नंबर
और धीरे धीरे कम होता चला गया
इस जीवन में हमारा हम

हमारे पसीने से पुष्ट अनाजों को
हमारे बखार में जाने से रोक कर
उसे भेज दिया सस्ती कीमतों पर मंडियों में
अपने मनमाफिक दाम पर बेचने के लिए
हमारे रग रग में रची बसी कहानियों कविताओं को
करीने से हमारी स्मृति से किया विलग
हमारा कौड़ा अपने सारे खरपतवार समेत भस्म हो गया
इनकी दमन भट्ठियों में
और तो और
इन्होंने नहीं छोड़ा हमारी रामलीलाओं नौटंकियों
फाग बिरहा चैता सोहर तक को
इनकी महॅगाई से त्रस्त हो
हमें अकेला छोड़ चले गये न जाने कहाँ
हमारे सारे तीज त्यौहार

रोचक अन्दाज में बतलाते हैं वे
हमें अकेलेपन के फायदे
फिर जतन से सिखलाते हैं वे हमें
इससे जुड़े कानून कायदे
वे दार्शनिक अन्दाज में बतलाते हैं
अकेला ही आता है आदमी
और जाता है अकेला ही इस दुनिया से
सूरज अकेले ही अलख जगाता है सुबह की
धान की झूमती बालियां गाती हैं अकेले ही राग जीवन की
चाँद बिखेरता है आसमान में
अकेले ही अपनी चांदनी
और हमारी पृथिवी भी तो
काटती फिरती है चक्कर अकेले ही
फिर बराम जुटाने की क्या जरूरत

अब कौन उन्हें बतलाए
कौन उन्हें समझाए कि समवेत से ही बनता है
हमेषा अधूरा सा लगने वाला यह पूरम्पूर जीवन
सूरज सजा है अपने सौरमंडल से ही
धान पोढ हुआ है खाद पानी और मौसम को पहन ओढ कर ही
चाँद की चांदनी में कहीं न कहीं षामिल है
दूर आसमान में कहीं तड़कता भड़कता सूरज
और अपनी यह खूबसूरत धरती
आदमी आता है किसी की तमाम खुषियों
और अपने तमाम सपनों को पूरा करने की उम्मीद लिए
तमाम संभावनाओं के साथ
और जब जाता है
तो कर जाता है तमाम आँखों को नम
छोड़ जाता है अपने पीछे अछोर यादें

वे कुछ भी नहीं छोड़ना चाहते हमारे पास
जिससे हम बातें कर सकें
और गाहे बगाहे अपना दुखड़ा रो सकें
वे कुछ भी सुनना नहीं चाहते हमारी सलामती के बारे में
फिजूल लगता है उन्हें यह सब
बस हमारा दिमागी वहम
दरअसल वे तो हमसे हमारी परछाई तक छीनने पर आमादा हैं
वे कोई झुरमुट भी नहीं छोड़ना चाहते हमारे लिए
उन्हें डर है कि हम
इसमें छुप कर कर सकते हैं गुरिल्ला लड़ाई
मौका मिलने पर कर सकते हैं पलटवार
इसीलिए वे सब कुछ सपाट कर देना चाहते हैं
वे हमें अकेला कर देना चाहते हैं
इतना अकेला
कि वे जब जो जी में आए कर लें
और हम चूं तक न कर सकें
कि जब वे हमारी गरदन तक मरोड़ें
तब हम उफ तक न कर सकें
बल्कि उनके इस कारनामे पर ताली बजाए
हॅसे और शबासी दें
कि आंसू भी न हो साथ हमारे
जब कभी हम रोये
या जब कभी हम
अपनी किसी खुशी पर पुलकित होए

वे हमें इस कदर कोरा कर देना चाहते हैं कि
जब वे लिखना चाहें मौत
उन्हें तनिक भी असुविधा न हो
उन्हें कोई भी रोकने टोकने वाला न हो
और हम लाख चाहने के बावजूद
न लिख पाए
अपना मनपसन्द शब्द
जीवन.

हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं
(मानवाधिकार कार्यकर्ता और चिकित्सक डॉ. बिनायक सेन की रिहाई के लिए 27 दिसंबर 2010 को
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए धरने से लौटकर)
मुकुल सरल

हमारे राज में
फूलों में खुशबू!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
शम्मां है रौशन!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
कोयल भला ये
कैसे गाती है?
कोई ...जासूस लगती है
किसे ये भेद बताती है?

हमारे राज में
क्यों तारे चमके?
चांद क्यों निकला?
दिलों में रौशनी कैसी!
ये सूरज क्यों भला चमका?

हमारा राज है तो
बस अंधेरा ही रहे कायम
हरेक आंख में आंसू हो
लब पे चुप रहे हरदम

हमारे राज में
तारे बुझा दो
सूरज गुल कर दो
हवा के तेवर तीख़े हैं
हवा पे सांकले धर दो

हमारा लफ़्ज़े-आख़िर है
हमारी ही हुकूमत है
हमारे से जुदा हो सच कोई
ये तो बग़ावत है

हमारे राज में ये कौन साज़िश कर रहा देखो
हमारे राज में ये कौन जुंबिश कर रहा देखो

ये कौन लोग हैं जो आज भी मुस्कुराते हैं
ये कौन लोग हैं जो ज़िंदगी के गीत गाते हैं

ये कौन लोग हैं मरते नहीं जो मौत के भी बाद
ये कौन लोग हैं हक़ की सदा करते हैं ज़िंदाबाद

ज़रा तुम ढूंढ कर लाओ हमारे ऐ सिपाहियो
इन्हे जेलों में डालो और खूब यातनाएं दो
अगर फिर भी न माने तो इन्हे फांसी चढ़ा दो तुम
इन्हे ज़िंदा जला दो तुम, समंदर में बहा दो तुम

हमारा राज है आख़िर
किसी का सर उठा क्यों हो
ये इतनी फौज क्यों रखी है
ज़रा तो डर किसी को हो

हमारी लूट पर बोले कोई
ये किसकी जुर्रत है
हमें झूठा कहे कोई
सरासर ये हिमाक़त है

ये कौन जनता के वकील हैं
जनता के डाक्टर
ये कौन सच के कलमकार हैं
दीवाने मास्टर

हमारे से अलग सोचे जो वो सब राजद्रोही हैं
हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं


जिन पंखों के बारे में हमें क्लास में बताया गया था
गौरव सोलंकी

साँस आने के रास्ते में ही
इतनी बेहिसाब रोशनी है भाईसाहब
कि मुझे जीते हुए सब देखते हैं
सब देखते हैं मुझे नमक खाते हुए
आयोडीन की कमी से घेंघा न होते हुए

मेरे सामने खरीदी गई हैं सब पिस्तौलें
सब लड्डुओं को मेरे सामने तौला गया है
कोई बेईमानी नहीं कहीं
यह आपका प्रताप है
हमारे महाराणा प्रताप
सब सफेद है जिसमें, आसमान भी
और मैंने अपनी आवाज़ के पिछले अपमान को भूलते हुए
दिल की नोक पर
कोई प्यार का गीत गाने का फ़ैसला किया है
जिसके ख़िलाफ़ अपील होगी
जिसमें मैं मुस्कुराने, खाते रहने की फ़िराक़ में
जीते हुए आपको रोशनी में दिखाई दूँगा,
जीतते हुए नहीं।
ऐसे में आप रोएँ नहीं,
माना कि समय बहुत मेहरबान नहीं
पर दिल को न भर आने दें टंकी की तरह
इतना भी कूड़ा नहीं कानून
जेल में लोग खाते हैं अभी रोटी, बोलते हैं भाषा
अभी बहुत से लोग और होंगे तमाशे
बहुत सी कहानियाँ होंगी, जिनके बीच से उठकर भागेंगे हम
हम अपने बच्चों को देंगे सेब सा ग्लोब
यह उन्होंने तय किया है
इसलिए सेब और ग्लोब,
दोनों के दुश्मनों को पहले पहचानने का समय दो सरकार को
जबकि उसके पास बहुत से काम हैं,
उसे मूँगफली चबाने के पैसे नहीं मिलते तुम्हारी तरह,
उसे जंगल छानने हैं आटे की तरह
माँजने हैं तुम्हारे दिमाग जबकि तुम मूर्खों की तरह दूर भागते हो
उसे बताना है जजों को कि
किसकी आँखों में तेज़ाब डालना है
किस ओर से मँगाना है सूरज
किस ओर बुझाना है

और किसी दरवाज़े पर हम अपने सामान की चौकीदारी की नौकरी करते हुए
सो जाएँगे, पकड़े जाएँगे
बर्ख़ास्तगी तो मोम सी कोमल है मेरी जान
हम तो इसलिए माफ़ी माँगते हैं कि
अपने असली हाथों को हिलाते हुए
अपने पैरों पर लौट सकें
अपने घर, जिसके पते में हम केयर ऑफ उनके होंगे

अँधेरों के रंग
मुझसे पूछकर नहीं बदले गए साहब
हाँ, परदे ज़रूर मैंने खरीदवाए थे
मैं किताबों के खोने के बारे में
जानना तो चाहता था, लेकिन कुछ जानता नहीं माँ कसम,
इससे पिछली बार जब मैंने यह जानना चाहा था कि
बाघ क्यों बचाए जा रहे हैं,
तब मुझे एक खराब सपने में फेंक दिया गया था
जिसमें बच्चे चुन-चुनकर मारे जा रहे थे

मैं जो आख़िरी चीज जानता था
वह किसी झंडे पर नहीं लिखी थी
लेकिन अपने बदतमीज़ लहजे के लिए मुझे माफ़ कीजिए
कि हर बार उसे आज़ादी की तरह बताता हूँ
पछताता हूँ

जिन पंखों के बारे में हमें क्लास में बताया गया था सर,
वे हमारे बदन पर नहीं थे कभी भी
जबकि हम भी पैदा हुए थे

कचरे से नहीं उग आता कोई पूरा आदमी।


बिनायक सेन की शान में एक गीत
अशोक कुमार पाण्डेय

सुना है हाकिम सारे दीवाने अब ज़िंदां के हवाले होगे
सारे जिनकी आँख ख़ुली है
सारे जिनके लब ख़ुलते हैं
सारे जिनको सच से प्यार
सारे जिनको मुल्क़ से प्यार
और वे सारे जिनके हाथों में सपनों के हथियार
सब ज़िंदां के हवाले होंगे!

ज़ुर्म को अब जो ज़ुर्म कहेंगे
देख के सब जो चुप न रहेगें
जो इस अंधी दौड़ से बाहर
बिन पैसों के काम करेंगे
और दिखायेंगे जो पूंजी के चेहरे के पीछे का चेहरा
सब ज़िंदां के हवाले होंगे

जिनके सीनों में आग बची है
जिन होठों में फरियाद बची है
इन काले घने अंधेरों में भी
इक उजियारे की आस बची है
और सभी जिनके ख़्वाबों में इंक़लाब की बात बची है
सब ज़िंदां के हवाले होंगे

आओ हाकिम आगे आओ
पुलिस, फौज, हथियार लिये
पूंजी की ताक़त ख़ूंखार
और धर्म की धार लिये
हम दीवाने तैयार यहां है हर ज़ुर्म तुम्हारा सहने को
इस ज़िंदां में कितनी जगह है!

कितने जिंदां हम दीवानों के
ख़ौफ़ से डरकर बिखर गये
कितने मुसोलिनी, कितने हिटलर
देखो तो सारे किधर गये
और तुम्हें भी जाना वहीं हैं वक़्त भले ही लग जाये
फिर तुम ही ज़िंदां में होगे


जाने कितने विनायक सेन और चाहिए
प्रतिभा कटियार

हमें फख्र है
तुम्हारे चुनाव पर साथी
कि तुमने चुनी
ऊबड़-खाबड़
पथरीली राह.

हमें खुशी है कि
तुमने नहीं मानी हार
और किया वही,
जो जरूरी था
किया जाना.

तुम्हें सजा देने के बहाने
एक बार फिर
बेनकाब हुई
न्यायव्यवस्था.
जागी एक उम्मीद कि
शायद इस बार
जाग ही जाएं
सोती हुई आत्माएं.

तुम्हें दु:ख नहीं है सजा का
जानते हैं हम,
तुमने तो जानबूझकर
चुना था यही जीवन.
दु:ख हमें भी नहीं है
क्योंकि जानते हैं हम भी
सच बोलने का
क्या होता रहा है अंजाम
सुकरात और ईसा के जमाने से.

हमें तो आती है शर्म
कि लोकतंत्र में
जहां जनता ही है असल ताकत
जनता ही कितनी बेपरवाह है
इस सबसे.

न जाने कितने बलिदान
मांगती है जनता
एकजुट होने के लिए,
एक स्वर में
निरंकुश सत्ता के खिलाफ
बिगुल बजाने के लिए,
खोलने के लिए मोर्चा
न जाने कितने विनायक सेन
अभी और चाहिए.


बिनायक सेन के लिए
मुन्ना के पांडेय

बिनायक ! क्यों सोचते हो अधिक?
किसने कहा था कि स्वर्ण मृग के पीछे भागो,
तुम्हे पता था कि वह 'वह' नहीं,फिर भी!
यहाँ जबकि 'गुलगुली गिल्मों और
गलीचों के बीच सुरा,सुराही और जनता
के साथ खेला जाता है,यहाँ |
तुम्हारा हश्र तो यही होना था,

भुगतना था यही,जाओ और खड़े होवो आ-दि-वा-सि-यों के साथ
अरे डाक्टर साब !कैसे भूल गए आप?
कैसे गलती कर बैठे कि यह वह वनचरों का ज़माना ,युग नहीं
यह इक्कीसवीं सदी है और नैतिकता का पाठ यहाँ,
पान की गिलौरी है .

1/11/11

शंकर-शंभू - कव्वाली

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की अजमेर की दरगाह पर हर साल उर्स में ये दोनों कलाकार कव्वाली गाया करते थे.
हिन्दुस्तानी तहजीब के साझेपन की इससे मज़बूत मिसाल क्या होगी!
इसी शंकर-शम्भू की जोड़ी से सुनिए ये कव्वाली -

आज रंग है री...

1/10/11

द पीपुल यूनाईटेड शैल आलवेज बी विक्टोरिअस !

बिनायक सेन के पक्ष में कुछ और रपटें

बनारस में प्रतिरोध
डा. बिनायक सेन की गिरफ्तारी का बनारस में विरोध छत्तीसगढ़ न्यायालय द्वारा मनवाधिकार कार्यकर्ता और पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष डाक्टर बिनायक सेन को देशद्रोही बताने और आजीवन कारावास की सजा सुनाने के विरोध में वाराणसी के बुद्धिजीवियों ने 31 दिसंबर, 2010 को मौन जुलूस निकाला। जुलूस में जन संस्कृति मंच, ऐपवा, आइसा और भाकपा (माले) ने भी भागेदारी की। बीएचयू गेट से प्रारम्भ होकर दशाश्वमेध घाट तक निकले इस जुलूस में सौ से अधिक संख्या में विद्यार्थियों, शिक्षकों, साहित्यकारों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। घाट पर हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आज मानवाधिकारों के लिये आवाज उठाने वाले लोगों के लिये सांस लेने के लिये भी जगह नहीं बची है। वक्ताओं ने यह
भी कहा कि करोड़ो रुपयों के घोटालेबाजों पर सरकार और न्यायालय अकुंश नहीं लगा पा रही है लेकिन आदिवासी क्षेत्र में लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिये समर्पित डा. सेन जैसे लोगों को देशद्रोही सिद्ध करके यह चेतावनी देना चाह रही है कि जो भी सत्ता के विरुद्ध देश की खुशहाली व जनता के वाजिब हक के लिये आवाज उठायेंगे उन सभी के साथ डा. बिनायक सेन जैसा ही हस्र होगा। सभा में वक्ताओं ने एक हस्ताक्षर पत्र भी राष्ट्रपति को प्रेषित किया जिसमें डा. बिनायक सेन को तत्काल रिहा करने की मांग की गई हैं।
सभा को प्रो. दीपक मलिक, साहित्यकार काशीनाथ सिंह, पीयूसीएल के चितरंजन सिंह, जन संस्कृति मंच के प्रो. बलराज पांडे, प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. रामाज्ञा राय, डा. ताबिर कलाम, डा. ध्रुव, डा. बिंदा परांजये, डा. रीना सैटिन,
डा. ए.के. मुखर्जी, आइसा से शिखा, विशाल विक्रम, ऐपवा से कुसुम वर्मा, भाकपा माले के शहर सचिव का. मनीष शर्मा, का. नरेंद्र पांडे ने भी संबोधित किया। सभा का संचालन का. प्रशांत ने किया। जुलूस को 'बिनायक सेन देशद्रोही
नहीं!' , 'घोटालेबाजों का खुला खेल, दंगाईयों पर कानून फेल, बिनायक सेन को जेल?' सरीखे लाल पोस्टरों ने सड़क पर निकले जुलूस को सर्वसाधारण के लिये आकर्षित बना दिया था।

कुसुम वर्मा

बिनायक सेन को अन्यायपूर्ण सजा के खिलाफ संसद मार्ग पर
नागरिक-प्रतिरोध, दिल्ली
27 दिसंबर को दिल्ली में जंतर मंतर पर एकत्र सैकड़ों लोगों ने डॉ विनायक सेन के लिए आजीवन कारावास की सजा के हाल के फैसले पर आक्रोश व्यक्त करने से लिए जंतर मंतर पर एकत्रित हुए. प्रदर्शनकारियों में छात्रों, कामगारों, नागरिक 'स्वतंत्रता समूहों, महिला समूहों सहित अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने जंतर मंतर से संसद मार्ग तक प्रतिवाद मार्च निकाला. बिनायक सेना को सुनाई गई अन्यायपूर्ण सजा के खिलाफ नारे लगाते हुए जुलूस संसद मार्ग पहुँच कर एक विरोध सभा में तब्दील हो गया.
यह विरोध-प्रदर्शन AISA और AIPWA द्वारा संयुक्त रूप से PUCL, PUDR और अन्य मानव अधिकारों और लोकतांत्रिक समूहों के साथ मिलकर आयोजित किया गया .AISA ने 27 दिसंबर के ही दिन डॉ विनायक सेन की सजा के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था जो इलाहाबाद, बनारस, पटना, कोलकाता, हजारीबाग,बगोदर सहित कई अन्य स्थानों पर सफलातापुर्वाका आयोजित किया गया.
दिल्ली में विरोध के आह्वान को जीवन के सभी क्षेत्रों से आनेवाले लोगों का भारी समर्थाना मिला.जो कि इस सवाल परअपने सदमे और गुस्से के इज़हार को इच्छुक थे. जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, और जामिया मिलिया इस्लामिया से AISA के बैनर तले छात्र प्रदर्शनकारियों की बड़ी तादाद थी और अच्छी खासी संख्या में भाकपा (माले ) के कार्यकर्ता भी प्रदर्शन में शामिल थे. इस विराट प्रतिवाद सभा का सञ्चालन AIPWA की कविता कृष्णन करा रही थीं जिसे बुज़ुर्ग पत्रकार ओर मानवाधिकार नेता कुलदीप नैयर, इतिहासकार प्रोफेसर हरबंस मुखिया ,लेखिका अरुंधति रॉय, स्वामी अग्निवेश, जन संस्कृति मंच, दिल्ली के अध्यक्ष, कवि मंगलेश डबराल, डा. मीरा शिव, जेएनयू के प्रोफेसर के. जे मुखर्जी, PUDR के गौतम नवलखा, समाजकर्मी हर्ष मंदर,सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के केन्द्रीय समिति सदस्य प्रभात कुमार, AISA के महासचिव रवि राय के साथ साथ PUCL, राष्ट्रीय वन श्रमिक फोरम, नर्मदा बचाओ आंदोलन के प्रतिनिधियों सहित अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने संबोधित किया और लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए संयुक्त पहल को ज़रूरी बताया.
विरोध सभा को संबोधित करते हुए प्रतिभागियों ने रेखांकित किया कि रायपुर सत्र अदालत द्वारा राजद्रोह के आरोप में सजा डॉ विनायक सेन,नारायण सान्याल और पीयूष गुहा को आजीवन कैद की सज़ा के फैसले से हर कहीं लोकतांत्रिक जनमत को सदमा पहुंचा है. पूरे मुकदमे के दौरान, साक्ष्य के अभाव में फर्जी साक्ष्य गढ़े गए और सरकार की ओर से दलीलों के नाम पर महज एक स्वांग रचाया गया. सबूतों की जब्ती में प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के थोक उल्लंघन को अदालत ने नजरअंदाज किया. इतने सतही , निराधार और मनगढ़ंत सबूतों के आधार पर दी गयी सजा न्याय का गम्भीर उल्लंघन और लोकतंत्र के लिए एक झटका है.
वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि यह फैसला सिर्फ बिनायक सेन के खिलाफ ही नहीं , बल्कि सभी विरोध और असंतोष की आवाजों को, राज्य दमन, कारपोरेट लूट तथा और भूमि हड़पने की आलोचना कर रहे तमाम सार्वजनिक बुद्धिजीवियों को भयभीत करने और खामोश करने की एक सुचिंतित चाल है. विरोध में भाग लेने को कहा, "अगर डॉ विनायक सेन के मामले की तरह के बहुचर्चित मामले की यह नियति है तो हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि उन आम किसानों, आदिवासियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मजदूरों के सैकड़ों की तादाद में चलनेवाले अदालती मामलों का क्या हश्र होता होगा , जो असंतोष और विरोध की आवाज़ बुलंद करके, जन- आंदोलनों को संगठित करके , ऑपरेशन ग्रीन हंट को चुनौती देकर राजसता का कोपभाजन बन रहे हैं. "
प्रदर्शनकारियों ने उसी दिन रायपुर में एक और सत्र न्यायालय द्वारा भी "A World to win" के प्रकाशक असित सेन गुप्ता को उनके पास से बरामद कथित "प्रतिबंधित साहित्य " के लिए 11 साल की सजा सुनाए जाने पर भी गम्भीर चिंता व्यक्त की. इस मामले और इसी तरह के दूसरे मामलों में "प्रतिबंधित साहित्य" में मार्क्स की 'दास कैपिटल', कम्युनिस्ट घोषणापत्र, और अंबेडकर तथा भगत सिंह के साहित्य सरकार और अदालत की निगाह में प्रतिबंधित माने गए हैं.
सभा ने बिनायक सेन की रिहाई के लिए लगातार संघर्ष चलाए रखने का संकल्प लिया.साथ ही साथ छत्तीसगढ़ और दूसरी जगहों में विरोधी स्वरों को खामोश करने और फर्जी मामलों में फंसाए जाने की हर वारदात के खिलाफ संघर्ष जारी रखने, छत्तीसगढ़ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, UAPA और AFSPA जैसे काले कानूनो को समाप्त कराने के लिए संघर्ष के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की.

बिनायक सेन के पक्ष में इलाहाबाद में प्रदर्शन, इलाहाबाद.
मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन क़ी गिरफ्तारी और आजीवन कारावास क़ी सज़ा से क्षुब्ध होकर शहर के छात्र युवा और सामाजिक सांस्कृतिक संगठनो के कार्यकर्ताओं ने सोमवार दोपहर असहमति दिवस मनाते हुए प्रदर्शन किया. महात्मा गांधी मार्ग के सुभाष चौराहे पर प्रदर्शन के दौरान संस्कृतिकर्मियों, छात्रों, वकीलों, और मजदूर के संगठन के लोगों ने ' कार्पोरेट पूंजी का देखो खेल, बिनायक सेन को भेजे जेल!, बिनायक सेन क़ी गिरफ्तारी और सज़ा को रद्द करो!, लोकतंत्र का दमन हम नहीं सहेंगे!, आदि नारे लगा रहे थे.
असहमति सभा में वक्ताओं ने कहा क़ि बिनायक सेन क़ी गिरफ्तारी अभिव्यक्ति क़ी आज़ादी और नागरिक अधिकारों पर कुठाराघात है. भू संपदा से भरे छत्तीसगढ़ जैसे राज्य कारपोरेट और सरकारी लूट के गढ़ बने हैं. आदिवासियों का विस्थापन, वनों का विनाश और जमीनों पर अवैध कब्जे हो रहे हैं.
इस प्रदर्शन में आल इंडिया स्टुडेंट्स एसोसिएशन , शहरी गरीब मोर्चा, जान संसकृति मंच, स्त्री अधिकार संगठन, आज़ादी बचाओ आन्दोलन, पी यू एच आर, ए आई सी सी टी यू आदि संगठन शामिल थे. बनवारी लाल शर्मा, जिया उल हक़, सुधीर सिंह, के के पाण्डेय, अंशु मालवीय, विश्वंभर पटेल, कृष्ण मुरारी, रामायन राम, डी मंडल, अली अहमद फातमी, दूधनाथ सिंह, पद्मा सिंह, ज़फर बख्त, कमल उसरी, आलोक राय, संतोष मिश्रा, रमेश यादव, उत्पला, सुप्रिया, सुब्रत, सतीराम और अनिल सहित बड़ी तादात में लोगों ने इस कार्यक्रम में शिरकत क़ी.

उदयपुर, राज़स्थान में बिनायक सेन के समर्थन में प्रदर्शन
मानवाधिकार कार्यकर्ता, समर्पित चिकित्सक और पी.यूं.सी.एल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, डॉ. बिनायक सेन को राजद्रोह के आरोप में छत्तीसगढ़ सेशंस न्यायालय द्वारा आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाये जाने के विरोध में आज पी. यू. सी.एल., उदयपुर द्वारा एक सभा का आयोजन किया गया. सभा में वक्ताओं ने न्यायिक प्रक्रिया के खोखलेपन पर प्रहार करते हुए छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम जैसे काले क़ानून को फ़ौरन रद्द करने और डॉ. सेन को अविलंब उचित न्याय दिलाने की मांग की.
पी.यू.सी.एल., उदयपुर की अध्यक्ष श्रीमती चन्द्रा भंडारी ने कहा कि आज मानवाधिकारों के हनन की पराकाष्ठा को देखाकर प्रतीत होता है कि दूसरी आजादी के लिए लड़ाई लड़ने का वक्त आ गया है. सेवा मंदिर की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री नीलिमा खेतान ने कहा कि बिनायक सेन को प्रतीक बनाकर छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम जैसे दमनकारी कानूनों के विरुद्ध जनचेतना जागृत की जानी चाहिए. वरिष्ठ अधिवक्ता श्री. रमेश नंदवाना ने कहा, कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया संदेह के घेरे में है. राजस्थान में न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया में रिश्वत के आरोप लग रहे हैं. सी.पी. आय. के पूर्व विधायक कॉ. मेघराज तावड़ ने कहा कि इस दमन के खिलाफ सभी को संगठित होकर व्यवस्था पर चोट करनी होगी.
सी. पी एम्. के राज्य सचिव कॉ. बंसीलाल सिंघवी ने कहा कि पहले अयोध्या और अब बिनायक सेन - ये दोनों ही फैसले राज्य सत्ता के असली चरित्र को उजागर करते हैं. मीडिया और न्यायलय दोनों ही इस दमन तंत्र के पुर्जे बनकर आ रहे हैं. जनता दल (से.) के अर्जुन देथा ने कहा कि यह फैसला दरअसल सरकार द्वारा एक तरह की चेतावनी है कि जो भी जनता के बीच रहकर जन अधिकारों की बात करेगा, उसका यही हश्र किया जायेगा. प्रसिद्द चिन्तक और कवि श्री नन्द चतुर्वेदी ने कहा कि राज्य का ऐसा ही क्रूर चरित्र है .राज्यसत्ता के ऐसे ही चरित्र के कारण गांधी अराजकतावादी थे . विद्या भवन सन्दर्भ केंद्र के निदेशक श्री. हृदयकांत दीवान ने कहा कि आज अगर महात्मा गांधी जीवित होते तो राज्यसत्ता द्वारा माओवादी करार दिए जाते. जागरुक युवा संघटन के कॉ. डी. एस. पालीवाल ने कहा कि असली खतरा माओवाद नहीं बल्कि खनन माफिया है जिसके इशारे पर राज्यतंत्र जन अधिकारों की आवाज बुलंद करने वालों के दमन कर रहा है. आस्था संस्थान के श्री अश्विनी पालीवाल ने कहा कि राजस्थान में भी आदिवासियों से जल, जंगल जमीन हड़प लेने का खेल चल रहा है.
पी.यू.सी.एल., उदयपुर के श्रीराम आर्य ने सभी द्वारा इसके विरुद्ध साझे विरोध प्रदर्शन की बात रखी. अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन की श्रीमती सुधा चौधरी ने कहा कि इसके विरुद्ध रैली निकाली जानी चाहिए जिसमें उनका संगठन शामिल होगा .उपस्थित सभी व्यक्तियों और सगठनों ने इन दोनों वक्ताओं की बात का पुरजोर समर्थन किया. आस्था की श्रीमती जिनी श्रीवास्तव ने कहा कि दुनिया भर में इस के विरुद्ध प्रदर्शन हो रहे हैं और उदयपुर को भी इसमें अपनी आवाज़ मिलानी चाहिए.
सभा में सभी उपस्थित प्रतिभागियों ने बिनायक सेन को जन्मदिन की बधाई देते हुए केंद्रीय कारागार, रायपुर के पते पर उनके समर्थन में पोस्टकार्ड लिखे. ज्ञातव्य है कि ४ जनवरी को डॉ.सेन का जन्मदिन है. सभा में इस मुद्दे से सम्बंधित अनिल मिश्रा और प्रणय कृष्ण के आलेख भी वितरित किये गए और हिमांशु पंड्या ने इलाहाबाद के कवि मृत्युंजय की कविता 'बीर बिनायक बांके दोस्त' का पाठ भी किया. सभा में बड़ी संख्या में अन्य नागरिकों, विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों की भी भागीदारी रही.
सभा का संचालन कर रहे पी.यूं.सी.एल., उदयपुर के उपाध्यक्ष अरुण व्यास ने आव्हान किया कि नागरिकों एवं संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में होने वाले विरोध मार्च में सभी अधिक से अधिक संख्या में भाग लें .