4/26/11

पार्टनर की पालिटिक्स....?


हिन्दी पत्रकारिता को ऐसे दिन भी देखने थे... अमर उजाला के सम्पादकीय पन्ने पर एक लेख छापा है जिसमें बताया गया है कि हिन्दी के साहित्यकार और उनके संगठन आन्दोलनों में शरीक नहीं होते. मसलन भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना की अगुवाई वाले आन्दोलन में उन्होंने शिरकत नहीं की. यह सफ़ेद झूठ है. इसका मतलब यह है कि पत्रकार महोदय अपने इर्द-गिर्द कहीं नज़र नहीं डालते. वे आन्दोलनों में शरीक भी नहीं होते कि प्रत्यक्ष को प्रमाण माने, वे लोगों से बात नहीं करते कि अनुमान को प्रमाण मानें, वे कुछ पढ़ते भी नहीं कि शब्द को ही प्रमाण मान लें. वे सिर्फ लिखते हैं और मुक्तिबोध के जुमले को गैरजिम्मेदार तरीके से उछालते हैं- पार्टनरों की पालिटिक्स के बारे में पूछते हैं. अपनी पालिटिक्स तो वे सिर्फ लिख कर करते हैं. वे तीन टूटे हुए पैरों वाली लोकतंत्र की गाय का चौथा घायल पैर तोड़ने के इरादे से लिखते हैं. वे अगर देखते तो उन्हें पता होता कि सलवा जुडूम के प्रतिरोध से लेकर विनायक सेन की रिहाई तक और शर्मिला इरोम से लेकर जैतापुर तक साहित्यिक-सांस्कृतिक जमात आन्दोलनकारी जनता के साथ खड़ी है.

नीचे उनका लेख, लेख पर प्रणय कृष्ण की प्रतिक्रया, जसम का बयान और इस बाबत जनसत्ता की रिपोर्ट चिपका रहा हूँ. कृपया देखें और इस तरह के गैर जिम्मेदार लेखन के खिलाफ अपना प्रतिवाद दर्ज करें.

प्रणय कृष्ण का प्रतिवाद

प्रति
श्री यशवंत व्यास
अमर उजाला दैनिक

प्रिय यशवंत जी,

25 अप्रैल के अमर उजाला के सम्पादकीय पन्ने पर श्री श्याम विमल का लेख 'पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?' पढ़कर हतप्रभ रहा जाना पडा कि क्या हिन्दी पत्रकारिता अब इस काबिल भी नहीं रही कि अपने अगल-बगल के अखबारों को ही झाँक-ताक ले. विमल जी ने फरमाया है कि हिन्दी के लेखक और लेखक संगठन अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से नदारद थे. चूँकि विद्वान् लेखक ने हमारे संगठन जन संस्कृति मंच का भी नाम लिया है , लिहाजा हम इस लेख में की गई गलतबयानी के प्रतिवादस्वरूप कुछ तथ्यों की ओर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं. पहली बात तो यह कि सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, पटना, रांची, बनारस, गाजीपुर आदि तमाम स्थानों पर न केवल जन संस्कृति मंच इस आन्दोलन में सक्रिय रहा, बल्कि कई जगह तो हमारा संगठन ही केंद्रीय भूमिका में रहा. (इन जगहों पर हमारी शिरकत के लिए आप खुद अपने अखबार और वहां के दूसरे अखबारों के स्थानीय संस्करण देख सकते हैं).

दिल्ली में 8 अप्रैल के दिन जन लोकपाल विधेयक लागू करने के सवाल पर जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय के नेतृत्व में लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का समूह जंतर-मंतर पहुंचा और पिछले तीन दिन से जारी श्री अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति अपना समर्थन जताया। जंतर मंतर पर इस आंदोलन में शिरकत करने वालों में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मंगलेश डबराल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवयित्री शोभा सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मदन कश्यप, कवि-पत्रकार अजय सिंह, कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, द ग्रुप संस्था के संयोजक फिल्मकार संजय जोशी, संगवारी नाट्य संस्था के संयोजक कपिल शर्मा, युवा चित्रकार अनुपम राय, रंगकर्मी सुनील सरीन, संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन, श्याम सुशील, मीडिया प्रोफेशनल रोहित कौशिक, संतोष प्रसाद और रामनिवास आदि प्रमुख थे। सच तो यह है कि दिल्ली में हमारे संगठन के लगभग सभी राष्ट्रीय पदाधिकारी इस दिन सत्याग्रह के समर्थन में वहां मौजूद थे और श्याम विमल लिख रहे हैं कि 'किसी भी संघ का कोइ भी पदाधिकारी इस जनांदोलन में नज़र नहीं आया'. लेखक-संस्कृतिकर्मियों ने जंतर मंतर पर उपस्थित जनसमूह के बीच पर्चे भी बांटे।

हमने इस आशय का प्रेस वक्तव्य भी जारी किया जिसे कुछ अखबारों ने छापा भी. जनसता और दैनिक लोकसता की 09 अप्रैल की कटिंग मैं श्री विमल जी के आलेख के साथ एक कागज़ पर चिपकाकर आपके अवलोकनार्थ अटैच कर रहा हूँ. साथ ही उस समय भेजी गई प्रेस विज्ञप्ति भी अटैच कर रहा हूँ जिसे छापने या कम से कम पढ़ लेने या दूसरे अखबारों और ब्लाग जगत में उसके छपे संस्करणों पर ही ने नज़र डालने की ज़हमत यदि श्री विमल ने उठा ली होती तो इतना गैर-ज़िम्मेदारान और अहम्मन्य लेख लिखने से बाज़ आ गए होते . जनसत्ता वाले समाचार में आप यह भी देख सकते हैं मेरे संगठन के अलावा भी वहां शरीक हुए लेखकों का उसमें ज़िक्र है. लेकिन विमल जी लिखते हैं कि,' इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है कि हिन्दी के अमुक अमुक साहित्यकारों ने जंतर मंतर पधारकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल के समर्थन में अन्ना हजारे के आन्दोलन को अपना समर्थन दिया." ज़ाहिर है कि आप साहित्यकारों या उनके संगठनों की विज्ञप्ति न पढेंगे, न छापेंगे,न दूसरे अखबारों/ब्लागों में छपी उनकी शिरकत की खबर से अवगत होने का कष्ट करेंगे,न खुद वहां जाकर मौक़ा-मुआयना करेंगे, फिर वैसी ही चर्चा तो होगी जैसी विमल जी ने अपने लेख में की है. क्या पलटकर विमल जी से ही नहीं पूछा जा सकता कि 'पार्टनर , आपकी पालिटिक्स क्या है.?'

बहरहाल हम उम्मीद करते हैं कि आप सम्पादकीय पृष्ठ पर हमारा यह पत्र ज़रूर छापेंगे और भूल सुधार/खेद प्रकाश भी कर लेंगे. आप के अखबार का मैं लेखक भी रहा हूँ , इसलिए ये लेख देख और भी पीड़ा हुई.

प्रणय कृष्ण,
महासचिव ,
जन संस्कृति मंच

जन संस्कृति मंच का बयान
जन संस्कृति मंच

जन लोकपाल विधेयक बनने से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को बल मिलेगा: प्रो. मैनेजर पांडेय

दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पटना में आज जसम से जुड़े लेखक-संस्कृतिकर्मी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल हुए
जनविरोधी अर्थनीति और भ्रष्ट राजनीति के खिलाफ आंदोलन जारी रहेगा : जन संस्कृति मंच

नई दिल्ली: 8 अप्रैल

जन लोकपाल विधेयक लागू करने के सवाल पर आज जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय के नेतृत्व में लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का समूह जंतर-मंतर पहंुचा और पिछले तीन दिन से जारी श्री अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति अपना समर्थन जताया। जन संस्कृति मंच से जुड़े कलाकारों ने इसी तरह उत्तर प्रदेश के लखनऊ और गोरखपुर समेत कई दूसरे शहरों और बिहार की राजधानी पटना में इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में आज शामिल हुए। जंतर मंतर पर इस आंदोलन में शिरकत करने वालों में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मंगलेश डबराल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवयित्री शोभा सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मदन कश्यप, कवि-पत्रकार अजय सिंह, कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, द गु्रप संस्था के संयोजक फिल्मकार संजय जोशी, कवि रंजीत वर्मा, संगवारी नाट्य संस्था के संयोजक कपिल शर्मा, युवा चित्रकार अनुपम राय, रंगकर्मी सुनील सरीन, संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन, श्याम सुशील, मीडिया प्रोफेशनल रोहित कौशिक, संतोष प्रसाद और रामनिवास आदि प्रमुख थे। लेखक-संस्कृतिकर्मियों ने जंतर मंतर पर उपस्थित जनसमूह के बीच पर्चे भी बांटे।

इस मौके पर जसम अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि इस देश में जिस पैमाने पर बड़े-बड़े घोटाले सामने आए हैं और भ्रष्टाचार जिस कदर बढ़ा है, उससे आम जनता के भीतर भारी क्षोभ है। यह गुस्सा इसलिए भी है कि कांग्रेस-भाजपा समेत शासकवर्ग की जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं, वे इस भ्रष्टाचार को संरक्षण और बढ़ावा दे रही हैं। अगर यूपीए सरकार श्री अन्ना हजारे की मांगों को मान भी लेती है, तो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी इस मुहिम को और भी आगे ले जाने की जरूरत बनी रहेगी।

उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में होने वाले घोटाले पहले के घोटालों की तुलना में बहुत बड़े हैं, क्योंकि निजीकरण की नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए संसाधनों की बेतहाशा लूट का दरवाजा खोल दिया है. देश के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों- जमीन, खनिज, पानी- ही नहीं लोगों की जीविका के साधनों की भी लूट का सिलसिला बेरोक-टोक जारी है। राडिया टेपों और विकीलीक्स के खुलासों ने साफ कर दिया है कि साम्राज्यवादी ताकतें कारपोरेट हितों और नीतियों के अनुरूप काम करने वाले मंत्रियों की सीधे नियुक्ति करवाती हैं। सभी तरह के सवालों से परे रखी गयी सेना के उच्चाधिकारी न सिर्फ जमीन घोटालों में लिप्त पाये गये हैं, बल्कि रक्षा सौदों में भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होने का नियमित खुलासा हो रहा है। न्यायपालिका के शीर्ष पर विराजमान न्यायधीशों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की खबरें प्रामाणिक तौर पर उजागर हो चुकी हैं। कांग्रेस के कई नेता भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद अपने पदों पर जमे हुए हैं। केंद्र ही नहीं राज्य सरकारों में भी भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। कर्नाटक में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री भूमि घोटाले में संलिप्त हैं और पूरे प्रदेश की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से जितनी अपनी अवैध अर्थव्यवस्था चलाने वाले रेड्डी बंधु सरकार के सम्मानित और प्रभावशाली मंत्री हैं। इन स्थितियों में कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को लाठी-गोली का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें देशद्रोही बताकर जेलों में बंद किया जा रहा है, जबकि भ्रष्टाचारी खुलेआम घूम रहे हैं।

प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि ऐसे कठिन हालात में प्रभावी लोकपाल कानून बनाने के लिए शुरू हुई भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को और भी ऊंचाई पर ले जाने की जरूरत है, ताकि जनता की भावनाओं के अनुरूप भ्रष्टाचार से मुक्त देश बनाया जा सके।
जन संस्कृति मंच की मांग है कि

1. सरकार द्वारा तैयार किये गये नख-दंत विहीन लोकपाल कानून के मसविदे को रद्द किया जाये और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्षरत कार्यकर्ताओं की भागीदारी से एक प्रभावशाली लोकपाल कानून बनाया जाये।

2. टाटा, रिलायंस, वेदांत और दाउ जैसे भ्रष्टाचार और कानून के उल्लंघन में संलिप्त कारपोरेट घरानों को काली सूची में डाला जाये।

3. स्विटजरलैंड के बैंकों में अपनी काली कमायी जमा किये लोगों के नाम सार्वजनिक किये जायें, काले धन की एक-एक पाई को देश में वापस लाया जाये और इसका इस्तेमाल समाज कल्याण के कामों में किया जाये। हम यह भी मांग करते हैं कि तमाम अंतरराश्ट्रीय कानूनों की आड़ में काले धन को विदेश ले जाने के सभी दरवाजे निर्णायक तौर पर बंद किये जायें।

4. आदर्श घोटाले व अन्य रक्षा घोटालों में लिप्त सैन्य अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाये और उन्हें कड़ी सजा दी जाये.

5. कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के लिए उर्वर जमीन मुहैया कराने वाली निजीकरण और व्यावसायीकरण की नीतियों को उलट दिया जाये।

6. कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए उनके दबाव में लिये गये सभी सरकारी निर्णयों की समीक्षा की जाये और उन्हें उलट दिया जाये।

जन संस्कृति मंच
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से
सुधीर सुमन द्वारा जारी


नीचे विमल जी का मूल आलेख और अखबारों में छपी खबरें देखी जा सकती हैं.



4/25/11

‘बावरे अहेरी’ का महाप्रयाण -महेश्वर

आजकल अज्ञेय जन्मशताब्दी के बहाने लगातार उनके जीवन और साहित्य पर बहसें गरम हैं. जनसत्ता और समयांतर में इस पर लगातार लिखा जा रहा है. इन बहसों में कोई अज्ञेय को सी आई ए का एजेंट बता रहा है तो कोई उन्हें अभूतपूर्व क्रांतिकारी. किसी कृतिकार के जीवन पर रोशनी डालने की छीछालेदर पद्धति से अलग उसके व्यक्तित्व और कृतित्व की उलझनों की पड़ताल करने का माद्दा इस बहस में बार-बार हाशिये पर पहुँच जा रहा है. इस रोशनी में महेश्वर का यह पुराना आलेख फिर से पढ़े जाने की मांग करता है जो अज्ञेय के रचनाकर्म और जीवन के रेशे खोलता है. यह टिप्पणी समकालीन जनमत, 12-18 अप्रैल, 1987 से ली गयी है.


‘बावरे अहेरी’ का महाप्रयाण












जितनी स्फीति इयत्ता मेरी दिखलाती है
उतना ही मैं प्रेत हूं
जितना रूपाकार-सारमय दीख रहा हूं-
रेत हूं.

कभी उन्होंने कहा था. और अब........ अब वह नहीं हैं. राष्ट्रीय मुक्ति के क्रांतिकारी आदर्शों से ‘स्वयं की खोज’ तक, स्वयं की खोज से ‘निस्सारता’ के दर्शन तक, और निस्सारता के दर्शन से ‘निजता के विस्तार’ तक एक ‘‘बावरे अहेरी’’ की तरह ‘सत्य का शोध’ करनेवाले कवि ‘अज्ञेय’ अब नहीं हैं. एक लंबी काव्य-यात्रा का समापन करते हुए गत 4 अप्रील को उन्होंने दुनिया से विदा ले ली.

‘अज्ञेय’ का अवसान एक युग का अवसान है. इस युग को खुद उन्होंने अपनी अंतरात्मा की व्याकुलता से गढ़ा था। इस व्याकुलता में सामाजिक अनुशासन की ‘विवशता’ से पीडि़त ‘व्यक्ति’ का आर्तनाद था और उसकी ‘लघुता के गर्व’ का घोषणापत्र भी. जब देश में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, 1946 के नौसेना-विद्रोह और तेभागा-तेलंगाना-आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी, तब उन्होंने ‘अपने’ नए युग की शिनाख्त करते हुए कहा था- ‘‘यह युग संदेह, अस्वीकार, कुंठा और अनास्था का युग है. किसी भी नयी-पुरानी विचारधारा को मानना और किसी भी नये-पुराने जीवन-मूल्य से संबद्ध होना अब हास्यास्पद हो गया है. तमाम टूटन, विघटन और आस्थाहीनता से उत्पन्न निराधारता और निस्सारता को देखकर लोग अपने ‘स्वयं’ की खोज कर रहे हैं.’’ आज तक की काव्य-यात्रा में ‘अज्ञेय’ ने जो ‘युग-सत्य’ हमारे सामने पेश किया है, उसकी बुनियाद अंत-अंत तक इसी मान्यता पर दृढ़ता से टिकी रही. दरअसल, इसी दृढ़ता से उन्हें लंबे समय तक आधुनिकतावादी काव्य-आंदोलन का मसीहा बनाए रखा. आधुनिक हिंदी कविता के सुप्रसिद्ध तीन ‘सप्तक’ उनका इस मसीहाई भूमिका के प्रमाण हैं.

साहित्य-रचना के क्षेत्र में वह यायावर थे. अपने व्यक्तित्व की शोध-यात्रा में उन्होंने ‘रेतपन’ के एहसास से लेकर ‘जो मेरा है वही ममेतर है’ के बोध तक- ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ के आयातित आधुनिकता से लेकर ‘राम-जानकी शोध-अभियान’ के पंरपरावाद तक- पहुंचने में उन्होंने जितने पड़ाव डाले, उनकी साहित्यिक कृतियां उन पड़ावों के भव्य स्मारक हैं. वे सब उनके ‘आत्मचैतन्य’ और उनकी निजी संवेदनात्मक समृद्धि के दस्तावेज हैं. इन दस्तावेजों में सामाजिक यथार्थ की विषमताओं और जटिलताओं का कड़वा शोर-शराबा नहीं मिलेगा, अपनी निजता के प्रभामंडल में डूबे वैयक्तिक सन्नाटे का ‘सौंदर्य’ मिलेगा. चाहे चरम व्यक्तिवाद, बंधनमुक्त निरानंद प्रेम तथा अलगाव, त्रास और वरण की अस्वतंत्रता के तनाव से भरे काव्य-ग्रन्थ हों, चाहे निजी संवेदनाओं की छटा से दमकते विश्व-भ्रमण के सजीव वृत्तांत हों- हर जगह ‘अज्ञेय’ का यह विशिष्ट सौंदर्य-बोध मौजूद है. सन्नाटे का यही सौंदर्य-बोध शायद उनके जीवन-मूल्य का वास्तविक स्रोत रहा है.

उन्होंने अपने इस सौंदर्य-बोध का पत्रकारिता के क्षेत्र में एक हद तक सामाजीकरण किया था. ‘दिनमान’ के प्रथम संपादक के रूप में उन्होंने न केवल हिंदी की, बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया. उन्होंने पत्रकारिता की एक ऐसी शैली विकसित की, जिसमें साधारण-से दिखने वाले समाचार भी खबरों के अंदर छुपी अर्थ की परतों को खोलने का जरिया बन गए और लेखक की मानवीय प्रतिक्रियाएं उसका जरूरी हिस्सा बन गयीं.

‘अज्ञेय’ के बहुमुखी जीवन में अच्छाई-बुराई से भरा एक पूरा इतिहास निहित है. और इतिहास को आंसुओं से धुंधला नहीं किया जाता, उससे सबक सीखा जाता है. आइये, हम इस दिवंगत ‘इतिहास-पुरुष’ को श्रद्धांजलि देते हुए मैक्सिम गोर्की का यह कथन दुहरायें: ‘‘ हमें प्रकृति की अक्लमंदी का शुक्रगुजार होना चाहिए कि निजी या व्यक्तिगत किस्म का अमरत्व नहीं होता. हम सभी अनिवार्यतः मर जाएंगे, ताकि इस पृथ्वी पर हमसे अधिक बलवान, हमसे अधिक सुंदर और हमसे ज्यादा ईमानदार लोग हमारा स्थान ले सकें- ऐसे लोग जो एक नयी और शानदार जिंदगी का निर्माण करेंगे और जो समष्टि के संयुक्त संकल्पों से मृत्यु की शक्तियों पर विजय प्राप्त करेंगे।’’

4/20/11

उदय प्रकाश की कहानी मोहनदास की नाट्य प्रस्तुति


एक ऐसे समय में जब आम आदमी के विकास और न्यायपूर्ण सोशल इंजीनियरिंग के खूब सरकारी दावे किए जा रहे हैं, बिहार की चर्चित नाट्य संस्था ‘हिरावल’ ने अपनी नवीनतम नाट्य प्रस्तुति ‘मोहनदास’ के जरिए इस तरह के शासकवर्गीय पाखंड का पर्दाफाश किया और समाज में मौजूद अन्याय, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी की हकीकत को बड़े ही मार्मिक तरीके से उजागर किया। कांग्रेस के राहुल गांधी का दलित व आम आदमी प्रेम हो, सर्वजन या बहुजन के मुखौटे वाली मायावती की तथाकथित दलितवादी राजनीति हो या नीतीश कुमार का महादलित प्रेम हो, इससे गरीब, भूमिहीनों और दलितों की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया है, बल्कि उनके जीवन का संकट निरंतर बढ़ता जा रहा है, इस नाटक में यह सच बड़े ताकतवर तरीके से सामने आया। नाटक में कोई राजनीतिक प्रसंग तो नहीं था, लेकिन आम आदमी का जो सच है उसकी तासीर कितनी राजनीतिक हो सकती है, यह इसे देखते हुए महसूस किया जा सकता था।

यह नाटक राजधानी पटना के सिद्धार्थनगर में हाल में महादलितों पर की गई भूमाफियाओं की गोलीबारी में मारी गईं शहीद बुट्टी देवी को समर्पित था। बिहार या पूरे देश में भूमाफिया और बिल्डर्स किस तरह से स्थानीय प्रशासन, पुलिस और सरकार को अपने हित में इस्तेमाल करते हैं, इस सच से पूरे देश की जनता वाकिफ है। इस घटना में भी ऐसा ही हुआ, जिसमें महादलित जब अपनी जमीन के लिए विरोध में उतरे तो उन पर हमला हुआ। लेकिन एक महिला की मौत के बाद भी जिस तरीके से उन्होंने प्रतिरोध जारी रखा, वह निरीह और निर्बल मानी जाने वाली जनता के भीतर छिपी हुई ताकत की बानगी था। गरीब और मेहनतकश लोग इस तरह क्यों विद्रोह और प्रतिरोध करने को मजबूर होते हैं, नाटक ‘मोहनदास’ में मोहनदास की त्रासद दास्तान को देखते हुए दर्शकों ने इसे बखूबी महसूस किया।

19-20 अप्रैल 2011 को पटना के कालिदास रंगालय में मंचित नाटक ‘मोहनदास’ हिंदी के चर्चित कथाकार और कवि उदय प्रकाश के इसी नाम की कहानी पर आधारित था। निर्देशक और नाट्य रूपांतरकार संतोष झा का स्पष्ट तौर पर कहना है कि ‘‘धनवान और ताकतवर लोगों के लिए यह समय पहले किसी भी वक्त की तुलना में ज्यादा मुफीद और मौजमस्ती भरा है, जबकि वंचित व कमजोर तबके का इंसान निरंतर असहाय और मजबूर होता चला जा रहा है। यह मंजर पूरे देश में है। कया शहर और क्या गांव, हर जगह यही हाल है। नाटक इसी यथार्थ की एक झलक दिखाता है। जिन सवालों को यह नाटक उठाता है, दर्शक उनके बारे में सोचें और उनका उत्तर तलाशने की कोशिश करें, यही इसका मकसद है।’’

हंस पत्रिका में जब उदय प्रकाश की यह कहानी छपी थी, तब इसके नायक, उसके परिवार और गांव आदि के नामों का महात्मा गांधी के परिवार और जन्मस्थान के नाम से जुड़े होने तथा न्यायिक प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों का नाम मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, हरिशकर परसाई जैसे हिंदी के चर्चित साहित्यकारों के नाम पर होने के कारण साहित्यिक दायरे में वाद-विवाद भी हुआ था। उदय प्रकाश की कहानी कला और कहानी के प्रतीकों को लेकर तरह-तरह की व्याख्याएं भी हुई थीं। लेकिन उस वक्त भी हिरावल ने उन प्रतीकों और बहसों के बजाए इस कहानी के नायक की इस पीड़ा को केंद्र में रखकर नाटक किया था, कि किस तरह एक प्रतिभावान दलित नौजवान की आइडंटिटी ही उससे छीन ली जाती है और बिसनाथ जैसे नकली और प्रतिभाहीन को यह सामाजिक व्यवस्था और यह तंत्र मोहनदास साबित कर देता है। उदय प्रकाश के अनुसार ‘मोहनदास वास्तव में एक जीता-जागता असली आदमी है और उसकी जिंदगी इस समय दरअसल संकट में है।.....मोहनदास एक असलियत है। इसकी पुष्टि आप चाहें तो हमारे गांव ही नहीं, इस देश के किसी गांव के किसी बाशिंदे से पूछकर कर सकते हैं।’’

दरअसल ‘मोहनदास’ उस तंत्र का एक रूपक है, जहां जोर-जबरदस्ती, तिकड़म, संबंध के जरिए योग्य की जगह अयोग्य लोग काबिज होते हैं, जहां लोकतंत्र के ठेकेदार सबसे ज्यादा अलोकतांत्रिक होते हैं, जहां जनता का विकास करने वाले सिर्फ अपनी समृद्धि के लिए जनता के विनाश की कार्रवाइयां संचालित करते हैं, जहां जनता के प्रति उनका प्रेम, दया और सहानुभूति सिर्फ पाखंड होता है, जहां भेदभाव की तमाम सामाजिक परंपराएं और मजबूत की जाती हैं, जहां शोषण, गुलामी, अन्याय, उत्पीड़न की तमाम प्रवृत्तियों का शासकवर्ग संरक्षण और संवर्धन करता है। नाटक एनजीओ मार्का समाजसेवियों पर भी कटाक्ष करता है, जो गरीबों की बस्तियों में जाकर उनकी मुक्ति की उम्मीद तो बंधाते हैं, लेकिन उनके जीवन संघर्षों के साथी नहीं होते, बल्कि वे खुद इसी व्यवस्था में अपने लिए कुछ खास हासिल कर लेने की जुगाड़ में रहते हैं।

नाटक में कई पात्रों के नैरेशन के जरिए मोहनदास और उसके परिवार की कहानी आगे बढ़ती है। मोहनदास के पिता काबा दास कबीरपंथी हैं, साईं इतना दीजिए जामे कुटंब समाय जैसी प्रवृत्ति के। उनके बेटे मोहनदास ने फस्र्ट डिवीजन से ग्रेजुएट किया था और विश्वविद्यालय की टापर सूची में उसका दूसरा स्थान था। ग्रेजुएट के बाद मोहनदास नौकरी की तलाश में जुटता है, लेकिन लिखित परीक्षा में सबसे ऊपर रहने के बावजूद हर बार इंटरव्यू में वह असफल हो जाता है। हर बार अफसर, नेता या किसी बड़े आदमी का कोई रिश्तेदार उसकी जगह चुन लिया जाता है। एक कोइलरी में नौकरी की उम्मीद जगती है, लेकिन उसके ज्वाइनिंग लेटर का वह इंतजार ही करता रह जाता है। हद हो जाती है, जब उसे अचानक पता चलता है कि उसकी जगह उसी के नाम से उसी के प्रमाणपत्रों के आधार पर एलआईसी में काम करने वाले एक बड़े किसान नगेंद्रनाथ का बेटा विश्वनाथ उर्फ बिसनाथ उसकी जगह नौकरी कर रहा है। बिसनाथ के तरफदार मोहनदास को इसके लिए मजबूर करते हैं कि वह खुद को मोहनदास नहीं, बल्कि विश्वनाथ बताए। वह कानून की शरण में जाता है, लेकिन न्यायपालिका, पुलिस और समाज हर जगह से अपमान, उत्पीड़न और यातना झेलता है। व्यवस्था में मौजूद मुक्तिबोध, परसाई और शमशेर जैसे ईमानदार और संवेदनशील अधिकारियों की सहानुभूति और मदद के बावजूद उसे अपना नाम और नौकरी नहीं मिल पाती। ईमानदार अधिकारियों को शिकस्त मिलती है और अन्यायी जीत जाते हैं।

चरम निराशा और पुलिसिया यातना से गुजरते हुए अंत में मोहनदास गुहार लगाता है कि ‘‘मैं किसी भी अदालत में चलकर हलफनामा देने के लिए तैयार हूं कि मैं मोहनदास नहीं हूं। ...बस मुझे चैन से जिंदा रहने दिया जाए।....जो लूटना हो लूटो। अपना अपना घर भरो। लेकिन हमें अपनी मेहनत से जीने दो।’ जाहिर है अपनी मेहनत से कोई सम्मानजनक ढंग से जी पाए, इसके अवसर भी आज का तंत्र नहीं दे रहा है। नाटक के इस अंतिम दृश्य के कंट्रास्ट में निर्देशक ने विश्वकप में भारत की जीत पर बौराए लोगों के जश्न का एक दृश्य संयोजित किया था, जो एक तरह से राष्ट्रवाद को भी बहस के दायरे में समेट लेता है। यह एक प्रायोजित राष्ट्रवाद है जिसके जुनून और नशे में मोहनदास जैसे करोड़ों लोग, जो बेरोजगारी, अवसरों के अभाव, भ्रष्टाचार और भेदभाव झेल रहे हैं, जो अपने वाजिब लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित हैं, उनकी पीड़ाजनक सचाई को लोगों की निगाह और चेतना से गायब करने की कोशिश की जाती है।

नाटक में नुक्कड़ नाटकों और मनोशारीरिक नाटकों की कुछ युक्तियों का भी सहारा लिया गया था। मोहनदास जैसी लंबी कहानी, जिसमें अपने समय की यथार्थ संबंधी सूचनाओं को एक ही कहानी में समेट लेने का जो खास उदय प्रकाशीय स्टाइल और आग्रह है, वह भी है और जिसमें मौजूद प्रतीकों के अर्थों में उलझने के पर्याप्त अवसर भी हंै, उसके बीच से डेढ़ घंटे में आम आदमी, खासकर दलित-वंचित-मेहनतकश समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर मोहनदास की त्रासदी को मंच पर पेश कर देना एक निर्देशकीय कौशल ही कहा जाएगा। कुशलता यह भी है कि नाटक कहानी के मूल कथ्य को कहीं भी नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि उसे और ताकतवर तरीके से पेश करता है। नैरेशन में लगे पात्र ही नाटक के चरित्रों की भूमिकाएं भी निभाते हैं और कई बार मोहनदास के पीछे चलते हुए वे उस विशाल जनसमूह को भी मूर्त करते हैं, जो बेरोजगारी और भेदभाव की समस्या को झेल रहा है, जिन प्रतिभाओं को कुचला जा रहा है या जिनकी उपेक्षा हो रही है। त्रासदी के रंग को और गाढ़ा करने में कहानी को नैरेट करने वाले पात्रों की काले वेशभूषा की भी अहम भूमिका थी।

सुमन कुमार ने मोहनदास के टूटन की प्रक्रिया को अपनी शारीरिक भाव-भंगिमा और डायलाग डिलिवरी के जरिए बड़े ही प्रभावशाली तरीके से व्यक्त किया। पुलिस और दबंग-लंपट नौजवान की भूमिका में रोहित विकास और अफसर की भूमिका में दीपक कुमार का अभिनय काबिल-ए-तारीफ था। विश्वनाथ और उसकी पत्नी की मूमिका में रामकुमार तथा अंकिता ने जीवंत अभिनय किया। कुमार परवेज न्यायिक दंडाधिकारी मुक्तिबोध की भूमिका में थे, उन्होंने उनके वैचारिक व्यक्तित्व को मूर्त करने की कोशिश की। समता राय ने मोहनदास की पत्नी कस्तुरीबाई की भूमिका का बखूबी निर्वाह किया। कथा को नैरेट करने में भी उनकी भूमिका प्रभावशाली रही। राजन कुमार, चांदनी, युसूफ, हिमांशु शेखर,, संजीव गुप्ता, रूनझुन और संतोष झा ने भी अपनी भूमिकाओं का कुशलता से निर्वाह किया। प्रकाश परिकल्पना विज्येंद्र कुमार टांक की थी।

नाटक ने मानो दर्शकों की दुखती रग को छू लिया। नौजवान दर्शक खासे प्रभावित नजर आए। पहले दिन प्रस्तुति के दौरान ही एक दर्शक की आवाज सुनाई पड़ी- बिल्कुल ऐसा होता ही है। दूसरे ने कहा कि एकदम सही फैक्ट है। दूसरे दिन ब्रगल में बैठे मैथिली के कथाकार अशोक की टिप्पणी थी, कि कहानी जितना मोहनदास की पीड़ा के प्रति पाठकों को संवेदनशील करती है, यह नाटक उससे कहीं ज्यादा उसकी संवेदना को झकझोरता है। यह नाटक ज्यादा धारदार है। सीपीआई (एमएल) के केंद्रीय कमेटी सदस्य श्यामचंद्र चैधरी की प्रतिक्रिया यह थी कि नाटक सच को सामने लाता है और इसका त्रासद अंत दर्शकों को आक्रोश से भर देता है, यही इसकी सफलता है।


सुधीर सुमन

4/8/11

4/6/11

भोजपुरी जन के दरवाजे पर

प्रकाश उदय की तीन कवितायें

(प्रकाश उदय की दो कवितायें आप यहीं पहले भी पढ़ चुके हैं. भोजपुरी एक समृद्ध बोली/भाषा का नाम है जो आजकल बाज़ार की नज़ारे-इनायत से मलबूस है. इसे बेचने वाले हमारे-आपके बीच के गद्दार हैं और खरीदने वाले यहाँ से लेकर बिलायत तक चहुँओर बिलबिलाये हुए हैं. और तो और चामे के बेर्हा की रखवारी कुक्कुर साहब कर रहे हैं. क्या होगा इसका! खुदा खैर करे. पर नज़र न लगे इस बोली को, आज भी इसमें प्रकाश उदय हैं, अष्टभुजा शुक्ल हैं और इसके लोकगीत हैं. बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय!
पर अभी तो छोड़िये इन मसाइल को, फिर कभी के लिए. और पढ़िए ये तीन कवितायें.)

















आहो आहो
रोपनी के रऊँदल देहिया, संझही निनाला तनि जगइह पिया
जनि छोडि़ के सुतलके सुति जईह पिया
आहो आहो
हर के हकासल देहिया, सांझही निनाला तनि जगइह धनी
जनि छोडि़ के सुतलके सुति जईह धनी
आहो आहो
चुल्हा से चऊकिया तकले, देवरू ननदिया तकले
दिनवा त दुनिया भरके, रतिये हऊवे आपन जनि गंवईह पिया
धईके बहिंया प माथ, बतिअइह पिया
आहो आहो
घर से बधरिया तकले, भइया भउजईया तकले
दिनवा त दुनिया भरके, रतिये हऊवे आपन जनि गंवईह धनी
धईके बहिंया प माथ, बतिअइह धनी
आहो आहो
दुखवा दुहरवला बिना, सुखवा सुहरवला बिना
रहिये ना जाला कि ना, कईसन दो त लागे जनि संतईह पिया
कहियो रुसियो फुलियो जाईं, त मनइह पिया
आहो आहो
काल्हु के फिकिरिये निनिया, उडि़ जाये जो आंखिन किरिया
आ के पलकन के भिरिया, सपनन में अँझुरइह-सझुरइह धनी
जनि छोडि़ के जगलके सुति जइह धनी
जनि छोडि़ के जगलके सुति जइह पिया
जनि छोडि़ के जगलके सुति जइह धनी


















नेवता - हकारी
आजु तिलक में छौड़ा के, कल छौड़ी के बरियात में
दिनभर मंड़वाने-भतवाने जबरन जगरम रात में

नेवता पर नेवता पर नेवता एक लगन में चरि चरि गो
एने लूक लहरिया मारे रोके पत पीपर-बर हो
ए चाचा तू ओहिजा होल, ए बाचा तू होहिजा में
दिनभर मंड़वाने-भतवाने....

ओइजा नेवता नगद चलेला, होइजा धोती आ साड़ी
हो हितई त चहुँपावे के बाटे दही भरल हांड़ी
छूटे मत हिल हिंड़ा न जाये भुला न जाए बात में
दिनभर मंड़वाने-भतवाने....

पाँच बजियवा बस के सट्टा, सात बजियवा बिगड़ल बा
आठ बजियवा दस पर पहुँचल, चवा-चूल ले ठकचल बा
जिपिया मांगे एबरी-दोबरी दे द जिउआ जाँत के
हब उहँवा नस्ता संपरा के, हुंहवा पहुँचब पाँत में

लागल खोंच नया कुत्र्ता में, फाटल गंजी झांकत बा
कवन सफाई लंगड़इला के, मांगल पनही काटत बा
ई सुख का जाने जे सरवा, खेलत बा अफरात में
दिनभर मंड़वाने-भतवाने....

















पंचर के दुकान
हैण्डिल पैडिल टायर चक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

ना कवनो पोस्टर ना कवनो पलानी
काठे के बाक्सा बा नादे में पानी
लागे के दुई-चार टक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

ओ से भरइब चवन्नी लगइब
अपने से भरब त उहो बचइब
पंप बदे भइल धरमधक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

डकटर वकील अफसर हीरो भा नेता
लाखन करोड़न में लेता आ देता
सुनियो के खाय ना सनक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

दुइ चेला एक भैने एगो भतीजा
तनी-तनी गलती प नौ-नौ नतीजा
बुढ़वा लगी मम्मा कक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

देसवा बंटा देले नेतवा अभागा
एके में बान्हे इ धन्धा के धागा
दिल्ली लाहौर चाहे ढक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का