6/26/11

या हइयो, या कय्यूम- नुसरत साब


नुसरत साब को सुनते-सुनते तो सूफीपना तारी हुआ जाता है. फानी दुनिया में टिकने का भरोसा हासिल हुआ. शुक्रिया नुसरत साब ...

6/21/11

जनता के बीच जनकवि नागार्जुन- लाइव रिपोर्टिंग

  आरा स्टेशन पर नागार्जुन जन्मशती कार्यक्रम की तैयारी 

(बाबा नागार्जुन का जन्मशताब्दी वर्ष है यह. बाबा जनकवि थे और एक जनकवि को याद करने का इससे बेहतर तरीका क्या होगा, कि सीधे जनता के बीच उनकी कविताओं का पाठ हो. ज स म की पहल पर सभी लोकतांत्रिक-प्रगतिशील संगठन मिलकर आरा में जन्मशती मना रहे है. तैयारी कुछ झलकियाँ सुधीर सुमन की कलम से. आप चाहें तो इसे लाइव रिपोर्टिंग भी कह सकते हैं.)

तीन दिन से बारिश हो रही है। बादल बड़े प्रिय थे नागार्जुन को। बादल को हम घिरते हुए ही नहीं, बल्कि लगातार घेरा-डेरा डाले हुए देख रहे हैं। मौसम बदल गया है। आरा शहर में वार्ड पार्षद नगर निगम के गेट पर लगातार भ्रष्टाचार के सवाल पर धरना दिए हुए हैं, पूरे शहर की सफाई की मांग कर रहे हैं। बारिश होते ही नगर की नालियां सड़कों पर उमड़ पड़ी हैं। मुहल्लों में कीचड़ से होकर पहले भी गुजरना पड़ता था, आज भी गुजरना पड़ रहा है। बिजली तो वैसे भी किसी एहसान जताने वाले दोस्त की तरह आती है, जब तेज हवा के साथ बारिश हो, तब उसकी आंख-मिचैली देखने लायक होती है। मोबाइल भी पूरी तरह चार्ज नहीं हो पा रहा है। लेकिन गरमी से निजात मिली है, हरियाली से मन को सुकून मिल रहा है। बारिश अच्छी लग रही है, पर थोड़ी चिंता भी बढ़ रही है।

25 जून को यहां के नागरी प्रचारिणी सभागार में बाबा नागार्जुन का जन्मशताब्दी समारोह होना है। पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा के गांव तरौनी से समारोहों के सफर की जो शुरुआत हुई थी, उसकी मंजिल हमने भोजपुर ही तय की थी। समारोह की तैयारी बाधित हो रही है, क्या करें! कितना अच्छा होता कि बादल रात में बरस के चले जाते और दिन हमारे लिए छोड़ देते, मगर उनकी तो अपनी गति है, अपना चाल है, अपनी मर्जी है।

आज 20 जून है। आज से बाबा की कविताओं का नुक्कड़ों पर पाठ करना है। कल रविवार था। किसी भी आयोजन के लिए रविवार का दिन बड़ा अहम होना होता है। सहयोग जुटाने के लिए लोगों से मिलने जाइए, तो उनसे मुलाकात की संभावना रहती है। लेकिन रविवार की झमाझम बारिश, उसी में एक प्रेस कांफ्रेस। हम चाहते थे कि भोजपुर के तमाम सांस्कृतिक संगठनों और स्वंतत्र लेखक-बुद्धिजीवी भी जनता को संबोधित करें, लेकिन बारिश में किस पर जोर डालें। हम आयोजक हैं, लिहाजा हमें तो किसी तरह पहुंचना ही था। अब बाबा की कविताओं को लेकर सीधे जनता के बीच जाना है और बारिश है कि होड़ लिए हुए है! दोपहर बाद तीन बजे का समय तय है, आरा रेलवे स्टेशन के परिसर में पहुंचना है।

अरे वाह! बारिश तो थम गई। रेलवे स्टेशन से करीब मैं ही हूं। अभी-अभी वरिष्ठ आलोचक रवींद्रनाथ राय का काल आया- मैं घर से निकल रहा हूं। तीन तो बज गए। पता नहीं, कोई आया है या नहीं, आएगा तो काल तो करेगा ही, लपककर निकल लूंगा, यही सोचकर मुख्य समारोह के आमंत्रण पत्र को लिफाफे में डालने में व्यस्त हो गया। अरे, साढ़े तीन बज गए, बारिश के कारण शुरुआत ही गड़बड़ाएगी क्या! चलो चला जाए, शायद लोग थोड़ी देर में आएं। बैनर उठाया और चल दिया। स्टेशन पर भारी भीड है़, लग रहा है, देर से कोई ट्रेन नहीं आई। इतनी भीड़ में कौन कहां है, कैसे पता चले। अचानक किसी का हाथ कंधे पर पड़ता है। अरे, मुझसे भी पहले जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन हाजिर हैं, एकदम हमेशा समय पर पहुंचने के अपने रिकार्ड को बरकरार रखते हुए। बाकी लोग कहां हैं, भाई। मिस्ड काल मारता हूं। 5 मिनट हो गए, किसी ने पलटकर काल नहीं किया।

अरे यार तुम यहां क्या कर रहे हो, तुम्हें तो नगर निगम के गेट पर होना चाहिए था- अचानक सत्यदेव दिखाई पडत़े हैं, तो उनकी ओर लपकता हूं। छात्र राजनीति में रहे, हमलोगों के साथ नाटक भी किया। तो हम दो से तीन हो गए। और अब चार भी हो गए, दूर से ही नजर आने वाले हमारे लंबू साथी शमशाद प्रेम अपनी बाइक से उतरकर हमारी ओर आ रहे हैं। सबके पहुंचने के बाद पहुंचने के अपने रिकार्ड को उन्होंने ध्वस्त कर दिया। आखिरकार हमारे उत्साही साथी सुनील चैधरी भी आ गए। रवींद्रनाथ राय भी पहुंच गए। कवि सुमन कुमार सिंह कहां हैं, जल्दी बुलाइए भाई, बारिश थमी है, वर्ना फिर शुरू हो गई तो बड़ी मुश्किल होगी। सुमन तो स्कूल से घर गए होंगे, खाना खाकर चले होंगे। मोबाइल से बात होती है- आ रहे हैं, रास्ते में हैं। आखिर वह भी आ गए, लेकिन उनके पीछे-पीछे बारिश की हल्की फुहार भी आई। हम सब प्लेटफार्म की ओर भागे। लेकिन पांच मिनट बाद ही वापस बाहर आ गए। बारिश ने हमें मोहलत दे दी। एक और शख्स का इंतजार है, उनकी नागार्जुन से मुलाकात हुई थी। काॅल करिए भाई, देखिए कहां हैं। सुनील बताते हैं- स्विच आफ है। तो चलिए शुरू किया जाए।

रेलवे स्टेशन परिसर में दो पेड़ों से बैनर को बांध दिया जाता है। थोड़ी देर विचार-विमर्श चलता है। नागार्जुन के किसी गीत से शुरुआत की जाए या उनके बारे में कुछ बताते हुए कविता पाठ का सिलसिला शुरू किया जाए। दूसरा तरीका ही अपनाया जाता है। सुनील संचालन शुरू करते हैं- आज जबकि देश के हुक्मरान भ्रष्टाचार और लूट में डूबे हुए हैं और उसे बरकरार रखने के लिए हर किस्म की तिकड़म और दमन पर उतारू हैं, तब नागार्जुन जैसे जनकवि नए सिरे से प्रासंगिक लगने लगते हैं। इसी तिकड़म, भ्रष्टाचार और दमन के खिलाफ तो उन्होंने आजीवन लिखा। सुनील बोल रहे हैं, लोग धीरे-धीरे हमारे आस-पास जुट रहे हैं। सत्यदेव जन्मशताब्दी समारोह में लोगों के शामिल होने की अपील वाला पर्चा लोगों के बीच बांटने लगते हैं।

इसी बीच वे पहुंच जाते हैं, जिनका हमें इंतजार था। माथे पर लाल पगड़ी बांधे, उघारे बदन, हाथ में एक छोटा डंडा लिए। थैला भी लाल रंग का। ये किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनुयायी हैं, हमेशा इसी वेशभूषा में रहते हैं। अपने हर भाषण में वे नागार्जुन की कविता ‘किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है’ का बड़े प्रभावशाली अंदाज में इस्तेमाल करते हैं। किसान नेता आग्रेनंद चैधरी बोलना शुरू करते हैं, लोगों की तादाद बढ़ने लगती है। आग्रेनंद जी बताते हैं कि 1982 में पहली बार उनकी मुलाकात नागार्जुन जी से हुई थी। वे बताते हैं कि वे किसान मजदूर के कवि थे और उन्हीं की तरह रहते थे। सचमुच जनता के कवि थे। हमारे इर्द-गिर्द जो जनसमूह मौजूद है, मानो उसके दुख-दर्द, उसके मन की बात, उसके ही अनुभवों को आग्रेनंद जी के भाषण में सामने आ रहा है, यह उनके चेहरे और प्रतिक्रियाओं से जाहिर हो रहा है। आग्रेनंद जी कहते हैं कि जितनी भी सरकारें हैं वे किसान विरोधी हैं। वे अमीरों और गरीबों के बीच भेदभाव को बढ़ा रही हैं। बाबा नागार्जुन ने इसी भेदभाव के खिलाफ लिखा था। जनता के इतने बड़े कवि के जन्म की सौंवी वर्षगांठ की याद सरकारों को नहीं आती। जनता के लिए वे जरूरी हैं, इसलिए वह उनको याद कर रही है। आग्रेनंद जी, अपने छोटे-से वक्तव्य में भारत में व्यवस्थाजनित व्यवस्थाओं पर बड़े प्रभावशाली ढंग से सवाल उठाते हैं।

इस सिलसिले को प्रलेस, बिहार के राज्य उपाध्यक्ष रवींद्रनाथ राय आगे बढ़ाते हैं। बाबा को जनता का महान राजनैतिक कवि बताते हुए वे लोगों को याद दिलाते हैं कि नागार्जुन ने हमेशा भारतीय राजनीति के गरीब-विरोधी प्रवृत्तियों, परिवारवाद, मौकापरस्ती, लूट, भ्रष्टाचार और तानाशाही का विरोध किया। अपने वक्तव्य के अनुरूप ही वे बापू के बंदरों के कारनामों को लेकर लिखी गई नागार्जुन की कविता सुनाते हैं। भाषण तो हमने उनका प्रायः सुना है नुक्कड़ों और चैराहों पर, पर इतने प्रभावी ढंग से कविता का पाठ करते हुए पहली बार सुन रहे हैं।

सामने जनता है और रचनाकार जैसे अपने जकड़न को झाड़कर नए आवेग से खड़े हो रहे हैं। सुमन कुमार सिंह पाठ के लिहाज से एक कठिन कविता चुनते हैं- मंत्र और उसी पूरी ताकत से प्रस्तुत करते हैं। वे ध्यान दिलाते हैं कि बाबा हर तरह के पाखंड और छद्म के विरोधी थे। युवा कवि ओमप्रकाश मिश्र मानो नई पीढ़ी के रचनाकारों की तरफ से हिंदी कविता और समाज को आश्वासन देते हैं कि उसने अपनी प्रगतिशील-जनवादी परंपरा से नाता नहीं तोड़ा है, उसके प्रेरणास्रोत नागार्जुन जैसे कवि ही है। वे सुनाते हैं- जो नहीं हो सके पूर्ण काम, मैं उनको करता हूं प्रणाम।

संचालक मुझे भी मौका देते हैं और मैं मेहनतकश जनता के राष्ट्र निर्माण के लिए इंकलाब का सपना देखने वाले इस कवि की मशहूर कविता ‘भोजपुर’ सुनाता हूं। जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन नागार्जुन पर केंद्रित अपनी कविता सुनाते हैं, जिसमें उनकी कई रचनाओं के पात्रों का नाम भी आता है। गुंजन जी उनको हमारे वर्तमान दौर के लिए बेहद प्रासंगिक कवि बताते हैं।

हम सब लगातार लोगों से अपील करते हैं कि वे 25 जून को बाबा नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में ज्यादा से ज्यादा संख्या में शामिल हों। कोई माइक और लाउडस्पीकर नहीं है, पूरी ताकत से बोलना पड़ता है। उसी उंची पिच पर कविता का पाठ भी किया गया। बीच-बीच में रेलवे की उद्घोषणाएं भी होती रहीं, लेकिन कोई बाधा कविता और जनता के बीच के रिश्ते के आड़े नहीं आ पाई।

कविता पाठ अपनी मंजिल पर पहुंचता है और बादलों द्वारा तय समय सीमा मानो खत्म होती है। मेघ बज नहीं रहे, बरस रहे हैं। ‘अलाव’ पत्रिका में छपे एक सज्जन का लेख की याद हो आती है, जिसमें उन्होंने साबित करने की कोशिश की है कि नागार्जुन जनकवि होने पर बार-बार जोर देते हैं, पर वे जनकवि नहीं हैं। सवाल तो यह भी है कि वे किस तरह के जनकवि हैं। अगर ऐसी परिस्थितियां हैं जो जनता को उसके लिए हितकर कविता से दूर करती हैं, तो मामला तो उन परिस्थितियों को बदलने का और उस कविता को जनता तक ले जाने का भी है। लौटते वक्त एक पढ़े-लिखे परिचित मित्र धीरे से बताते हैं कि इतनी बार ‘किसकी जनवरी है किसका अगस्त है' सुना था, पर नहीं पता था कि यह बाबा का लिखा हुआ है।

कविता पाठ सफल रहा, पर अभी बहुत कुछ करना है। समारोह के लिए जो धन जुटा है, वह अभी बिल्कुल अपर्याप्त लग रहा है। सारे लोग सोच रहे हैं कि और सहयोग कैसे जुटाया जाए। कल से सीधे लोगों के बीच चंदे का डब्बा लेकर जाना है और हर छोटा-बड़ा सहयोग जुटाना है। जनता के कवि के लिए समारोह तो जनसहयोग से ही होगा। हमारे लिए यह कोई रस्मी आयोजन नहीं है। बेशक मौका बाबा के जन्मशताब्दी वर्ष के समापन का है। मगर हमारा मकसद तो जनता की कविता को जनता तक ले जाना है, इस दिशा में मिली हर सफलता हमारे लिए सार्थकता है। अखबार हमारे इस अभियान को महत्व दे रहे हैं, यह सुखद लग रहा है। पिछले दो तीन दिन से लगातार जन्मशताब्दी समारोह की खबरें अखबारों में आ रही हैं। आखिर बाबा सिर्फ जन संस्कृति मंच के तो हैं नहीं, वे तो सबके हैं, उन सबके जो इस व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, जो इस देश और देश की मेहनतकश जनता की जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते हैं, जिन्हें इस धरती से सचमुच प्यार है। पहलकदमी जरूर जसम की है, लेकिन भोजपुर में यह आयोजन जनता का अपना आयोजन बन जाए, इसके लिए हम सब प्रयासरत हैं। हम तो चाहते हैं कि अखबार खुद बाबा नागार्जुन के महत्व पर अपनी ओर से कुछ दें, उनके जमाने के लोगों के संस्मरणों को प्रकाशित करे, उनकी प्रासंगिकता पर परिचर्चा करवाएं। हमें तो जो करना है, अपनी क्षमता अनुसार कर ही रहे हैं।

आरा से सुधीर सुमन

6/19/11

अनुराग के लिए वीरेन डंगवाल की चार कवितायें

दोस्त अनुराग के पिताजी नहीं रहे. यह अनुभूति अपने में भयानक है. एक विचित्र सा वाक्य है- धीरज धरो! दूसरा और बेबस सा वाक्य है- जो कर सकते थे किया, अब कर ही  क्या सकते थे. पर ऐसे दुःख में ये दोनों वाक्य बेहद खोखले लगते हैं, अपनी सारी सामर्थ्य खो बैठते हैं. फिर भी अनुराग हम तुम्हारे साथ हैं.

वीरेन डंगवाल की ये कवितायेँ अनुराग के लिए-

रुग्ण पिताजी 

रात नहीं कटती? लम्बी यह बेहद लम्बी लगती है?
इसी रात में दस-दस बारी मरना है जीना है
इसी रात में खोना-पाना-सोना-सीना है.
ज़ख्म इसी में फिर-फिर कितने खुलते जाने हैं
कभी मिले थे औचक जो सुख वे भी तो पाने हैं

पिता डरें मत, डरें नहीं, वरना मैं भी डर जाऊंगा
तीन दवाईयां, दो इंजेक्शन अभी मुझे लाने हैं.

शव पिताजी 

चार दिन की दाढी बड़ी हुई है
उस निष्प्राण चेहरे पर
कुछ देर में वह भी जल जायेगी.
पता नहीं क्यों और किसने लगा दिए हैं
नथुनों पर रुई के फाहे
मेरा दम घुट रहा है.

बर्फ की सिल्ली से बहते पानी से लतपथ है दरी
फर्श लतफथ है
मगर कमरा भी ठंढा हो गया है.
कर्मठ बन्धु-बांधव तो बाहर लू में ही
आगे के सरंजाम में लगे हैं
मैं बैठा हूँ या खड़ा हूँ या सोच रहा हूँ
या सोच नहीं रहा हूँ
य र ल व श
श व ल र य
ऐसी कठिन उलटबांसी जीवन और शव की.


ख़त्म पिताजी 

पिता आग थे कभी, धुवां थे कभी, कभी जल थे
कभी अँधेरे में रोती पछताती एक बिलारी
कभी नृसिंह कभी थे खाली शीशी एक दवा की
और कभी हंसते हंसते बेदम हो जाता पागल
शीश पटकता पेड़ों पर, सुनसान पहाड़ी वन में.

अभी आग हैं
अभी धुवां हैं
अभी ख़ाक हैं


स्मृति-पिता

एक शून्य की परछाईं के भीतर
घूमता है एक और शून्य
पहिये की तरह
मगर कहीं न जाता हुआ.

फिरकी के भीतर घूमती
एक और फिरकी
शैशव के किसी मेले की.


6/14/11

फिराक गोरखपुरी - बेगम अख्तर

आजकल मेरे एक दोस्त फ़िराक साहब को फिर से पढ़ रहे हैं.  कल उनसे फ़िराक की शायरी पर थोड़ी गुफ्तगू हो रही थी कि इसी सिलसिले में उन्होंने बताया कि फ़िराक साहब को किसी बड़े गायक ने नहीं गाया/ या कम से कम उन्होंने नहीं सुना.  तो कल से ही मैं अपनी याददाश्त की गठरी में ढूंढ रहा था, कि अचानक एक जबरदस्त ग़ज़ल याद आयी. न सिर्फ याद आयीं, बल्कि रिकार्ड भी खोजने पर हाथ लग गया. फिर क्या था! मैंने सोचा कि आप सबसे बांटा जाए.

ग़ज़ल ये रही-
सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं ...



6/9/11

एम एफ हुसैन नहीं रहे

हुसैन नहीं रहे. एक अद्भुत चित्रकार, जो बेहद सामान्य स्थितियों से आगे बढे. विवाद चाहे कितने चले हों, पर उनकी कला अप्रतिम है. श्रद्धांजलिस्वरुप उन्हीं की कुछ पंक्तियाँ उनकी हस्तलिपि में-


6/7/11

पुलिस दमन का विरोध- जन संस्कृति मंच


पुलिस दमन का विरोध

नई दिल्ली ,जून 6 , 2011 . 4 -5 जून की मध्यरात्रि में यू.पी.ए. सरकार द्वारा योगगुरु रामदेव के आह्वान पर भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम में दूर-दराज़ से आए लोगों पर रात के अँधेरे में उन्हें सोते में औचक ही सरकारी दमन का शिकार बनाना एक डरी हुई सरकार का कायराना कारनामा है. इस घटना से सरकार ने यह सन्देश भी दिया है कि वह कारपोरेट हितों के खिलाफ असली या नकली किसी भी प्रतिरोध को झेल नहीं सकती. भ्रष्टाचार का सवाल सीधे-सीधे निजीकरण-उदारीकरण और खगोलीकरण की अमीरपरस्त-साम्राज्यपरस्त नीतियों पर चोट करता है. तमाम सत्ता की पार्टियां इस दलाल अर्थतंत्र का हिस्सा हैं, लिहाजा मुख्यधारा की राजनीति में मुख्य प्रतिपक्ष ने जो जगह छोडी है, उसे नागरिक समाज की शक्तियां और दूसरे जन-आन्दोलन भर सकते हैं. इन आन्दोलनों की तमाम कमियों कमजोरियों के बावजूद लोगों का इनके आह्वान पर जुटना स्वाभाविक है. ऐसे में सरकार इन पर हर कहीं दमन पर उतारू है.

रामदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, उनके द्वारा संघ परिवार के नेटवर्क का इस्तेमाल और संघ द्वारा उनके इस्तेमाल का अवसरवाद , खुद रामदेव के ट्रस्ट की परिसंपत्तियों के विवादित स्रोतों के बारे में शायद ही किसी सजग व्यक्ति को भ्रम हो. दिल्ली आने से पहले से ही सरकार के साथ उनका मोल-तोल जारी था. उन्होंने लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री और जजों को जांच के दायरे में शामिल न किए जाने की मांग कर नागरिक समाज द्वारा प्रस्तावित विधेयक को कमज़ोर करने और सरकार को खुश करने की भी कोशिश की थी. हवाई अड्डे पर सरकार के कई मंत्रियों का उनसे मिलने पहुँचना, बालकृष्ण का आन्दोलन आगे न चलाने के वचन वाला पत्र, सभी कुछ सरकार और उनके बीच बहुविध लेन-देन और सौदेबाजी की तस्दीक करता है.

लेकिन इसके बावजूद पुलिसिया दमन और आतंक को कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. जंतर मंतर पर भी लोगों के जमावड़े पर प्रतिबन्ध लगाकर सरकार ने अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं. यह दमन राजधानी में सिर्फ रामदेव पर नहीं रुकेगा, बल्कि किसी भी आन्दोल, धरने और प्रदर्शन के दमन का रास्ता साफ़ हुआ है. शेष भारत में, आदिवासी इलाकों में, किसानों के आन्दोलनों पर, बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के दोहन के खिलाफ यह दमन जारी ही है. दिल्ली इसका अपवाद नहीं बनी रह सकती.
लिहाजा इस घटना को अघोषित आपातकाल की एक कड़ी के रूप में ही देखना चाहिए और इसके दमनकारी अभिप्राय को नागरिक समाज को कम करके नहीं आंकना चाहिए. हम इस घटना की और इसकी ज़िम्मेदार केंद्र सरकार की घोर भर्त्सना करते हैं और आम नागरिक और बुद्धिजीवियों से भी इसके पुरजोर विरोध की अपील करते हैं.


(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

6/5/11

डी वी पलुस्कर- तीन भजन


संगीत आचार्य विष्णु दिगंबर पलुस्कर के पुत्र और काबिल वारिस डी वी पलुस्कर का नाम उन संगीतज्ञों में शुमार किया जा सकता है, जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को राज-दरबारों से निकाल जन-दरबार तक पहुंचाया. उनके गाये छोटे-छोटे राग और भजन अद्भुत सृष्टि रचते हैं. उनको सुनते ही आपको राजा रवि वर्मा के चित्र की अगली कड़ी याद आ सकती है. पलुस्कर की कला स्वाधीनता आदोलन के साथ ही बढ़ी-विकसित हुई, सो आज हम वे सारी कमजोरियां और ताकत पलुस्कर के यहाँ भी देख सकते हैं, जो स्वाधीनता आन्दोलन के समय की भारतीय मनीषा में थी. पर इतिहास से गुजरना हमेशा ही हमें कुछ और समृद्ध कर देता है.

इसी सिलसिले में दूसरी बात यह कि छोटे-छोटे राग और भजनों व अन्य भी गीतों के लिए हमें आकाशवाणी का शुक्रगुजार होना चाहिए. एक पूरी पीढी का सौन्दर्याबोध इन से विकसित हुआ. आज भी ऐसी छोटी रिकार्डों की बेहद जरूरत है. इनसे श्रोता बढ़ते हैं.

सुनिए पंडित पलुस्कर से-

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...
ठुमुकि चलत रामचंद्र...
जब जानकी नाथ सहाय...