12/29/12

साँसों ने विराम ले लिया, लेकिन उसका संघर्ष अविराम है- प्रणय कृष्ण

द हिन्दू से साभार, छायाकार वी.वी. कृष्णन

16 दिसंबर को वह छः दरिंदों से अकेले ही 31 किलोमीटर तक दिल्ली की सडकों पर घूमती 'यादव ट्रैवेल' की व्हाईट-लाइन बस में लड़ती और जूझती रही. उसके दोस्त को वे पहले ही बुरी तरह घायल कर चुके थे. अगले 13 दिनों तक उसने अस्पताल में अपना बहादुराना संघर्ष जारी रखा. इन सारे दिनों में उसके इस बहादुराना संघर्ष ने भारत के लाखों-करोड़ों लड़कियों- लड़कों और आम लोगों को पहली बार औरतों के खिलाफ अन्याय और हिंसा के सभी रूपों के विरुद्ध इतने बड़े पैमाने पर सडकों पर उतार दिया. हुक्मरानों को जितना भय उसकी लड़ाकू ज़िंदगी से था, उससे भी ज़्यादा उसकी संभावित मौत से था. उन्होंने उसे गुपचुप इलाज के नाम पर वतन-बदर कर दिया, जहां आज सुबह 2.15 पर सिंगापुर के अस्पताल में उसकी साँसों ने विराम ले लिया, लेकिन उसका संघर्ष अविराम है.

21 वीं सदी के 12 वें साल के आखिरी महीने में इंडिया- गेट को तहरीर स्क्वायर में तब्दील करने को आतुर भारत की हज़ारों युवतियों-युवकों ने बैरिकेडों पर भीषण ठण्ड में लाठियों और पानी की बौछारों से लड़ते हुए एक नई लड़ाकू अस्मिता पाई, बिना यह जाने कि जिस बहादुर लड़की के बलात्कार के खिलाफ संघर्ष से वे प्रेरित हैं, उसका नाम क्या है, गाँव क्या है, जाति क्या है, धर्म क्या है. इस प्रक्रिया में वे खुद अपनी जाति, क्षेत्र, भाषा, धर्म के ऊपर उठ कर भारत में औरत की आज़ादी और इन्साफ के लिए एक अपराधिक सत्ता-व्यवस्था से टकरा गए. वे इतना ही जानते थे कि वह 21 वीं सदी के भारत की 23 साल की ऐसी युवती थी जिसने एक दुर्निवार सवाल के हल के लिए आर-पार की लड़ाई छेड़ रखी है.

गर्भ में भ्रूण के रूप में क़त्ल की जाती, जातीय और साम्प्रदायिक हिंसा में बलात्कार कर मौत के घाट उतारी जाती, घरों में पीटी जाती, रिश्तेदारी में ही यौन-उत्पीडन का शिकार होती, धर्म और जाति के ठेकेदारों के फरमानों से मौत की सज़ा पाती, दहेज के लिए जलाई जाती, अपहरण कर बाज़ार में बिकने को लाई जाती असंख्य, अनाम भारतीय औरतों के लिए न्याय के संघर्ष का प्रतीक बन गई 'एक जुझारू युवती '. पुलिस, क़ानून में आमूलचूल बदलाव और सता तथा समाज के स्त्री के प्रति नज़रिए में भारी परिवर्तन की अपरिहार्यता को वह अपनी लड़ाकू ज़िंदगी और मौत के ज़रिए बड़े-बड़े अक्षरों में लिख गई.

कश्मीर के शोपियां में हो, चाहे छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी अथवा मणिपुर की मनोरमा, पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा आए दिन होने वाले यौन-बर्बरताएं, घरों-खेतों-खलिहानों-दफ्तरों-बसों-सडकों-स्कूलों-कालेजों में हर दिन अपमान सहने को विवश की जाती भारत की स्त्री-शक्ति के सामंती और पूँजीवादी जघन्यताओं के खिलाफ संघर्ष ने नए रूप अख्तियार किए हैं, नया आवेग है यह अन्याय के खिलाफ.

शरीर के खत्म हो जाने के बाद भी वह इसी नई चेतना, नए संघर्ष और अथक संघर्ष की 'प्रेरणा' बनकर हम सबके दिलों में, युवा भारत की लोकतांत्रिक चेतना में सदा जीती रहेगी.

 जन संस्कृति मंच की ओर से राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा श्रद्धांजलि 

12/23/12

न्याय के साथ आजादी भी चाहिए : एपवा, आइसा, इनौस, एक्टू, जसम

आंदोलनकारियों का दमन सरकार और पुलिस के स्त्री विरोधी रवैये का नमूना है
महिला, छात्र-युवा, श्रमिक संगठनों और सांस्कृतिक संगठन ने मनाया राष्ट्रीय शर्म दिवस
एपवा, आइसा, इनौस, एक्टू, जसम ने इंडिया गेट पर किया प्रदर्शन

प्रेस विज्ञप्ति, नर्इ दिल्ली : 23 दिसंबर

एपवा, आइसा-इनौस, एक्टू और जन संस्कृति मंच ने आज बलात्कार और दमन के खिलाफ राष्ट्रीय शर्म दिवस मनाया। प्रदर्शनकारियों को इंडिया गेट न पहुंचने देने की तमाम कोशिशों के बावजूद निजामुददीन गोलंबर से जुलूस निकालकर वे बैरिकेट को तोड़ते हुए इंडिया गेट पहुंचे और वहां सभा की। यह प्रदर्शन बिल्कुल शांतिपूर्ण था और महिलाओं की आजादी और सुरक्षा की मांग कर रहा था। विवाह, परिवार, जाति, संप्रदाय की आड़ में किए जाने वाले बलात्कार और सुरक्षा बलों द्वारा किए जा रहे बलात्कार और इज्जत के नाम पर की जाने वाली हत्याओं के खिलाफ संसद का विशेष सत्र बुलाकर एक प्रभावी कानून बनाने की भी मांग की गर्इ। बलात्कार के मामलों में सजा की दर कम होने पर भी सवाल उठाया गया तथा सभी दोषियों की सजा सुनिशिचत करने की मांग की गर्इ। आदिवासी सोनी सोढ़ी के गुप्तांग में पत्थर भरने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवार्इ की मांग की गर्इ। देश में सामंती-जातिवादी और सांप्रदायिक शकितयों द्वारा किए जाने वाले बलात्कार के दोषियों को भी सजा की गारंटी हो, इस पर जोर दिया गया।

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर इंडिया गेट पर आज के प्रदर्शन को बर्बरता से कुचलने का आरोप लगाया है और कहा है कि सरकार ने एक तरह से अघोषित इमरजेंसी लागू कर दी है। लोग इंडिया गेट न पहुंच न पाएं, इसके लिए उसने हरसंभव कोशिश की। इसके बावजूद जो लोग वहां पहुंचकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, उनके खिलाफ पुलिस लगातार उकसावे की कार्रवार्इ करती रही। बिना किसी उग्र प्रदर्शन के उसने आंसू गैस छोड़ने की शुरुआत की। पुलिस ने जिस तरह उपद्रवियों का बहाना बनाकर महिलाओं और निहत्थे लोगों तक पर लाठियां बरसार्इ हैं, पानी की बौछार की है, लगातार आंसू गैस के गोले छोड़े हैं, वह सरकार के तानाशाहीपूर्ण और अलोकतांत्रिक रवैये का उदाहरण है। पुलिस ने साजिशपूर्ण तरीके से शांतिपूर्ण आंदोलन के दमन का बहाना बनाया है, जिसकी जांच होनी चाहिए। आज जिस तरह प्रदर्शनकारियों और आम जनता पर बर्बर हमला किया गया, जिस तरह पुलिस ने लड़कियों के साथ बदसलूकी की, पत्रकारों तक को नहीं बख्सा, वह बेहद शर्मनाक है। इससे स्त्री अधिकार से जुड़े सवालों और आम स्त्री के प्रति पुलिस और यूपीए सरकार की संवेदनहीनता का ही पता चलता है।

पुलिस का यह कहना कि हम गैंगरेप के आरोपियों के खिलाफ कार्रवार्इ कर रहे हैं, तो फिर आंदोलन क्यों किया जा रहा है, इस बात की ओर इशारा करता है कि सरकार और प्रशासन चाहती है कि मामला इसी घटना तक ही सीमित रहे। लेकिन लोगों का गुस्सा इसलिए भी उमड़ रहा है कि अभी भी लगातार बलात्कार, छेड़छाड़ और उत्पीड़न की घटनाएं जारी हैं। समाचार पत्र ऐसी खबरों से भरे पड़े हैं। एपवा, आइसा, इनौस, एक्टू और जसम का प्रदर्शन संपूर्ण स्त्री विरोधी तंत्र को बदलने की मांग को लेकर था, जिसमें सक्षम कानून बनाने से लेकर बलात्कार और हिंसा के मामले में न्यायपालिका, पुलिस, चिकित्सा तमाम क्षेत्रों में आमूल चूल बदलाव की मांग शामिल थी। यौन हिंसा की तमाम प्रवृतितयों को औचित्य प्रदान करने वाली प्रवृतितयों और संस्कृति के अंत की मांग भी प्रदर्शनकारी कर रहे थे।

प्रदर्शन के दौरान सभाओं को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि इस गैंगरेप और बलात्कार, यौन हिंसा, उत्पीड़न के तमाम मामलों में तो न्याय चाहिए ही, कहीं भी किसी वक्त आने-जाने, अपने पसंद के कपड़े पहनने, जीवन के तमाम क्षेत्रों में बराबरी के अवसर और जीवन साथी को चुनने की आजादी भी होनी चाहिए। एपवा की ओर से कविता कृष्णन और आइसा की ओर सुचेता डे ने सभा को संबोधित किया। जसम की ओर से कवि मदन कश्यप, पत्रकार आनंद प्रधान, आशुतोष, सुधीर सुमन, मार्तंड, रवि प्रकाश, कपिल शर्मा, अखिलेश, उदय शंकर, खालिद भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए। आइसा के ओम प्रसाद, अनमोल, फरहान, इनौस के असलम, एक्टू के संतोष राय, वीके एस गौतम, मथुरा पासवान समेत कर्इ नेताओं ने प्रदर्शन का नेतृत्व किया।

-Kavita 9560756628, Sucheta- 09868383692, Om Prasad 9013596196, Anmol Ratan 9013219020, Farhan Ahmed 9540124091, Akbar 9013898178, Sudhir suman 09868990959

12/21/12

यह स्त्री के अस्तित्व पर हमला है: प्रो. मैनेजर पांडेय

पूरी दुनिया में हमारे देश और समाज की बेहद शर्मनाक स्थिति होती जा रही है: 
प्रो. मैनेजर पांडेय

जन संस्कृति मंच, नई दिल्ली: 19 दिसंबर 2012


जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय ने दिल्ली में गैंगरेप की बर्बर घटना पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि सरकार और समाज दोनों को गंभीरता से यह सोचना होगा कि वे कैसे इस तरह के कुकृत्य को खत्म करेंगे. इस देश में स्त्रियों के विरुद्ध अत्याचार, हिंसा और बलात्कार की घटनाएं पहले से भी अधिक बढ़ती जा रही हैं। खुद सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में अत्याचार और बलात्कार की सबसे ज्यादा घटनाएं घट रही हैं। प्रशासन और सरकार उन्हें सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल हैं। समाज के हर तबके और हर वर्ग की स्त्रियों और बच्चों के प्रति ज्यादती और नृशंसता की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी हैं। जबकि किसी भी देश या समाज की सभ्यता का पैमाना यह है कि वहां स्त्रियों और बच्चों के साथ किस तरह का व्यवहार होता है, इस पैमाने पर पूरी दुनिया में हमारे समाज और देश की बेहद शर्मनाक स्थिति होती जा रही है।

उन्होंने कहा है कि गैंगरेप के दोषियों को तो सख्त सजा होनी ही चाहिए, लेकिन साथ ही बलात्कार, उत्पीड़न और हिंसा की तमाम घटनाओं के दोषी किस तरह दंडित किए जाएं, कानून और पुलिस प्रशासन की गड़बडि़यों या सामाजिक-राजनीतिक संरक्षण के कारण उनके बच निकलने की घटनाओं पर अंकुश कैसे लगाया जाए, इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, क्योंकि दोषियों के बच निकलने से भी इस तरह की मानसिकता वालों का मनोबल बढ़ता है।

रविवार 16 दिसंबर को फिजियोथेरपी की छात्रा के साथ उस प्राइवेट बस में जिस बर्बरता के साथ गैंगरेप किया गया और उसके यौनांगों में लोहे के रॉड से हमला किया गया, उसके विवरण काफी दिल दहलाने वाले और चिंतित करने वाले हैं। यह सिर्फ बलात्कार नहीं, बल्कि आजादी और बराबरी के साथ जीने की आकांक्षा रखने और अपने सम्मान के लिए प्रतिरोध करने वाली स्त्री के अस्तित्व पर ही वहशियाना हमला है। इसे किसी भी कीमत पर बर्दास्त नहीं किया जा सकता। इस वहशियाना कृत्य के बाद युवक-युवतियों, छात्र-छात्राओं, विभिन्न वर्गों और तबकों के लोगों का जो गुस्सा सड़कों पर उभरा है, उस गुस्से को उस बेहतर समाज के निर्माण की ओर मोड़ना होगा, जहां कोई भी स्त्री किसी भी वक्त अपनी इच्छा से किसी के साथ कहीं भी आ जा सके, जहां उसे मौजमस्ती का वस्तु समझकर कोई उत्पीडि़त या दमित न करे, जहां उसकी स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय और समानता के अधिकार पर कोई हमला न हो। जो पुलिस अधिकारी, नौकरशाह, राजनीतिक पार्टी, राजनेता या सरकार स्त्रियों की इन अधिकारों का समर्थन नहीं करते और उल्टे उन्हें ही सामंती-पूंजीवादी पितृसत्तात्मक समाज की कोढ़ से पैदा हो रहे अपराधियों से बच कर रहने की नसीहत दे रहे हैं, जो यह उपदेश दे रहे हैं कि वे किस तरह का कपड़ा पहने, किस वक्त कहां आएं-जाएं, उन्हें भी उनके पद से हटाया जाना चाहिए।

प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा है कि बलात्कार और उत्पीड़न को झेलने वाली स्त्री को ही जब गलत बताया जाता है, तो उससे बलात्कारियों का मनोबल बढ़ता है। एक बलत्कृत को क्यों अपनी इज्जत को लेकर अपराधबोध पालना चाहिए, बल्कि उस समाज को अपनी इज्जत के बारे में सोचना चाहिए कि क्या वह खुद किसी इज्जत लायक है, जहां इस तरह की घटनाएं घटती हैं। उस समाज को खुद को बदलने के बारे में सोचना ही होगा, जहां एक ओर खाप पंचायतें इज्जत के नाम पर अपना जीवनसाथी चुनने वाले लड़कियों और लड़कों की हत्या करती हैं और जहां दूसरी ओर देश की राजधानी दिल्ली में स्त्रियों के आखेट में घुमते लोग लगातार रेप, हिंसा और हत्या को अंजाम देते रहते हैं। प्रो. पांडेय ने कहा है कि पुलिस, न्यायपालिका और विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं में बैठे स्त्री विरोधी लोगों के विरुद्ध भी संघर्ष करना वक्त की जरूरत है। यह अजीब है कि बलात्कार की घटनाएं जिस दौर में बढ़ती जा रही है उसी दौर में न्यायालयों से इन मामलों में दोषियों को दंडित करने की दर पहले से लगभग आधी हो गई है। बलात्कार की परिभाषा में भी खोट है, लोहे के रॉड, बोतल या किसी अन्य वस्तु से यौनांगों पर किए गए प्रहार को बलात्कार नहीं माना जाता, जबकि इसके लिए तो और भी कठोर सजा होनी चाहिए। बलात्कार की परिभाषा में बदलाव, चिकित्सीय जांच के प्रति तत्परता और पुलिस की जवाबदेही को सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

प्रो. पांडेय ने कहा कि वे संसद में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज्य के इस कथन से कतई सहमत नहीं हैं कि जिस लड़की का गैंगरेप हुआ, अगर वह बच भी गई तो जीवन भर जिंदा लाश बनकर रह जाएगी। सवाल यह है कि क्यों वह जीवन भर जिंदा लाश बनकर रहेगी? उसका गुनाह क्या है? जीवन भर जिंदा लाश बनकर अपराधियों को क्यों नहीं रहना चाहिए? वह बहादुर लड़की है, उसने तो जान पर खेलकर वहशियों का प्रतिरोध किया है, इस तरह के प्रतिरोध और समाज में पूरी स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जीने के स्त्री के अधिकार का तो खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। उसके जीवन की रक्षा हो और पूरे स्वाभिमान के साथ वह इस समाज में रहे, इसकी हरसंभव कोशिश और कामना करनी चाहिए।


सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

12/15/12

जहरीली शराब कांड: पीने वाले दोषी हैं या बेचने वाले


(आज 15 दिसंबर को बिहार में अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा और  भाकपा-माले की ओर से शराबबंदी की मांग को लेकर चक्का जाम आंदोलन हो रहा है और शाहाबाद बंद का आह्वान किया गया है। हिंदकेशरी यादव, देवेन्द्र यादव सरीखे समाजवादी  धारा के कुछ नेता इस आन्दोलन में शामिल हैं. अन्य वामपंथी दलों ने भी इसका समर्थन किया है.  6 से 10 दिसंबर को शाहाबाद क्षेत्र के भोजपुर जिला मुख्यालय आरा में तीस से अधिक लोग जहरीली शराब से असमय मौत के शिकार हो गए। इसके पहले इसी साल के शुरू में शाहाबाद क्षेत्र के ही भाकपा-माले के रोहतास जिला सचिव भैयाराम यादव की हत्या सत्ता संरक्षित अपराधियों ने कर दी थी। उन्होंने शराब भट्ठियों के खिलाफ जनांदोलन का नेतृत्व किया था। पिछले कुछ महीनों में बिहार में विभिन्न जगहों से शराब की व्यापक बिक्र्री के खिलाफ जनप्रतिवाद की घटनाएं सामने आने लगी हैं। आरा के बाद गया में हुई जहरीली शराब से मौतों के बाद शराबबंदी को लेकर फिर से बहस शुरू हो गई है। लेकिन इस बीच मुख्यमंत्री का जो बयान आया उसमें मृतकों के प्रति शोक संवेदना के बजाए कारोबार के तर्क केंद्र में थे। कल मुझे पता चला कि जिला प्रशासन संस्कृतिकर्मियों को लेकर गरीबों के बीच शराब न पीने के लिए जागरूकता अभियान चला रहा है यानी गांव-गांव तक फैले शराब बिक्री के नेटवर्क को खत्म करने के बजाए ये सुधार कार्यक्रम के जरिए स्थिति पर काबू पाना चाहते हैं। यहां पेश है जनमत, दिसंबर में प्रकाशित हो रही एक लंबी टिप्पणी का अंश।)


न भोजपुर में यह पहली घटना है न बिहार में, जब जहरीली शराब पीने से गरीब मजदूर लोग मरे हैं। इसके पहले भी इसी साल अरवल, छपरा और मुजफ्फरपुर जिलों में इस तरह की मौतें हो चुकी हैं। ३-४ मौतों पर पर्दा डाल देना तो प्रशासन के लिए बहुत आसान होता है। कुछ लोग आरा की घटना को शराब के सरकारी डिपो के बंद होने से जोड़ रहे हैं कि इसी कारण अवैध शराब के कारोबारियों को मौका मिला। कुछ सुधारवादी लोग मृतकों को ही दोषी ठहरा रहे हैं कि उन्होंने शराब क्यों पीया। एक युवक ने बताया कि जो गरीब-मेहनतकशों के इलाके हैं वहीं शराब की भट्ठियां और दुकानें ज्यादा मौजूद हैं। उदाहरण के लिए उसने कुछ इलाकों का जिक्र भी किया। लेकिन असल मामला यह नहीं है कि सरकारी डिपो बंद होने के कारण अवैध कारोबारियों को आरा में मौका मिल गया, बल्कि जिस तरह नितीश कुमार की सरकार और प्रशासन ने शराब बेचने की खुली छूट दे रखी है, उससे बिक्री के बहुत बड़े हिस्से पर अवैध कारोबारियों का कब्जा बना है। जाहिर है इस कमाई में सबका अपना अपना हिस्सा होता होगा। बिहार में शराब की खपत इसलिए नहीं बढ़ी कि अचानक उसकी मांग बढ़ गई थी, बल्कि उसे सर्वसुलभ बनाकर दैनिक जरूरत की तरह बनाया गया है। उसे एक ऐसे जबर्दस्त मुनाफे के धंधे की तरह विकसित किया गया है, जिसमें गांव और मुहल्लों के जनप्रतिनिधि और दबंग तक शामिल हैं।

यह शासकवर्गीय ट्रैप है, जिसमें गरीब धनपिशाचों की स्वार्थलिप्सा की भेंट चढ़ रहे हैं। अखबारों में प्रकाशित आंकड़ों का यकीन करें तो जितनी सरकारी शराब की खपत है उससे 8 गुना अधिक शराब लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल है कि बाकी शराब की आपूर्ति कौन कर रहा है? कुछ साल पहले सरकार के ही एक मंत्री जमशेद अशरफ ने जब उत्पाद विभाग पर माफियाओं के कब्जे और राजस्व के भारी नुकसान की बात की थी, तो उन्हें अपने मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था। बिल्कुल साफ है कि अवैध शराब के कारोबार से जुड़े माफियाओं के हाथ कितने लंबे हैं। अभी हाल में एक बुजुर्ग नेता और पूर्व मंत्री हिंदकेशरी यादव पर इसी तरह जहरीली शराब से हुई दस लोगों की मौत और इस कारोबार को मिल रहे पुलिसिया संरक्षण के विरोध के कारण मुजफ्फरपुर के आयुक्त कार्यालय के हाते में शराब माफियाओं ने जानलेवा हमला किया था। यह सब उनके बढ़े हुए मनोबल को ही दर्शाता है।

शर्मनाक यह है कि एक ओर गरीब, महादलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं की मौत हो रही थी और दूसरी ओर सुशासन का दावेदार हुकूमत के नशे में डूबा हुआ था। छह दिसंबर की रात से नौ दिसंबर की रात तक लोग दम तोड़ते रहे, पर नीतीश कुमार चुप्पी साधे रहे। जब उनकी चुप्पी टूटी, तब भी उनकी जुबान पर मृतकों के प्र्रति शोक संवेदना के बजाए कारोबार के तर्क थे। वे बता रहे थे कि व्यक्तिगत तौर पर वे शराबबंदी के पक्षधर हैं, पर शराबबंदी व्यावहारिक नहीं है। वे शराबबंदी वाले राज्यों का हाल देखने का सुझाव दे रहे थे। गरीबों के प्रति उदासीनता, निर्ममता और माफियाओं के प्रति यारी के तौर पर इस बयान को क्यों न देखा जाए? जिस वाकये पर एक राज्य के मुखिया को शर्मिंदा होना चाहिए था, वह उसे नजरअंदाज करके यह दावे कर रहा था कि उसके शासन में शराब से कितना राजस्व बढ़ गया है। वे शान से कह रहे हैं कि पहले तीन सौ करोड़ राजस्व आता था और अब दो हजार करोड़ आता है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि पीने वालों की संख्या नहीं बढ़ी है। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि पहले से ही लोग शराब के आदी रहे हैं, वे उन तक ही शराब पहुंचा रहे हैं, क्या उपकार का भाव है! वे उपकार भी इसलिए कर रहे हैं कि उन्हें मालूम है कि पीने वाला पिएगा ही और चूंकि उनकी माने तो चैकसी के बाद भी अवैध शराब बनती ही है, तो बेहतर है लोग सरकारी शराब पीएं। इस तरह पूरी शातिरपन के साथ वे यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि शराब की जो खपत बढ़ी है, उसमें उनके शासन या नीति का कोई दोष नहीं है। यह सही है कि दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल और शराबबंदी वाले राज्य गुजरात में भी पिछले वर्षों में जहरीली शराब से मौतें हुई हैं। लेकिन किसी भी राज्य में शराब बेचने की वैसी वकालत नहीं की गई है, जैसी बिहार में नीतीश कुमार करते रहे हैं। अगर अवैध सरकार की बिक्री होती है और लोग उससे मरते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि इसे स्वाभाविक चीज मान लिया जाए। 

अभी कुछ माह पहले की ही बात है जब उन्होंने मंच से बोला कि शराब के पैसे से ही वे साइकिल बांट रहे हैं, हालांकि यह भी झूठ ही था, तब मुजफ्फपुर की लड़कियांे ने जिलाधिकारी के समक्ष प्रदर्शन किया था कि हमें शराब के पैसे से साइकिल नहीं चााहिए। सवाल यह है कि जिस राज्य का मुख्यमंत्री इस तरह शराब बेचने को जायज ठहराता हो, राजस्व बढ़ाने का तर्क देता हो, वहां शराब बेचने वालों का मनोबल क्यों नहीं बढ़ेगा! गंभीर सवाल यह भी है कि क्या अन्य दूूसरे नशीले पदार्थों को बेचने से राजस्व बढ़ेगा तो उसे भी कोई सरकार राजस्व बढ़ाने के तर्क से बेचेगी? तब तो हिरोइन, गांजा, ब्राउन सुगर, अफीम- सबकी बिक्री करवानी चाहिए और उनके निषेध के लिए एक विभाग भी बना देना चाहिए! आखिर उनका अवैध कारोबार भी तो बंद नहीं हुआ है। उनका सेवन करने वाले भी तो इस समाज में हैं। 

सच जो है वह साफ-साफ दिख रहा है कि शराब बिहार के शहरों में ही नहीं, गांवों में भी धड़ल्ले से बिक रही है। पहले से ज्यादा दूकानें खुल गई हैं। नीतीश कुमार के शासन में उसकी सहज उपलब्धता के कारण ही शराब का सेवन बढ़ा है। ठीक से पड़ताल की जाए तो जो वैध शराब के अड्डे बताए जा रहे हैं, वहीं से अवैध कारोबार भी चलता है। बात-बात में कानून के राज का जुमला इस्तेमाल करने वाले नीतीश कुमार को यह मालूम होना चाहिए कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में सुनाए गए एक फैसले में कहा था कि केंद्र और राज्यों की सरकारें संविधान के 47 वें अनुच्छेद पर अमल करें और जिसमें शराब की खपत को धीरे-धीरे घटाना सरकार का कर्तव्य बताया गया है। लेकिन नीतीश बाबू को सर्वोच्च न्यायालय के किसी फैसले की क्यों परवाह होगी? वे न्याय के साथ विकास जो कर रहे हैं!

कोई जरा पड़ताल तो करे कि समाज में वे कौन सी मानसिक और आर्थिक परिस्थितियां सरकारों ने पैदा की है, जिसके कारण लोग जानलेवा तरीके से शराब का सेवन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अपराध शराब पीने वाले कर रहे हैं या उन्हें शराब के आदी बनाने और उन्हें मौत की ओर धकेलने वाले? यह किससे राजस्व वसूल कर रहे हैं नीतीश कुमार? 200 एमएल के एक पाउच की कीमत सत्रह रुपये है, जो सरकारी आंकड़े के अनुसार सत्तर प्रतिशत भारतीयों के औसत दैनिक आय के आसपास है। यह तो एक तरह खून पसीने से कमाई गए पैसे को लूटने का खेल है, यह तो गरीबों के रक्त चूसने की तरह है। आज तो वे जहरीली शराब पीकर मर गए, पर अगर नहीं भी मरते तो धीरे-धीरे उनका रक्त तो चूसा ही जाता। सामान्य मौत से पहले तो वे मर ही रहे हैं, जिसका कोई आंकड़ा और सर्वेक्षण कहीं नहीं है, आंकड़ा है तो बढ़ते राजस्व का। 

दिलचस्प यह है कि अवैध शराब का बड़े कारोबारी जिनके वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन और दूसरी शासकवर्गीय पार्टियों से गहरे रिश्ते हैं, उन्होंने महादलित और दलित बस्तियों को ही अपने कारोबार का केंद्र बना रखा है। क्या महादलित या दलित बस्तियों को मदिरामुक्त करने का अभियान अंततः उन्हीं राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ नहीं होगा, जिनको कहा जा रहा है कि वे विकासवादी हो गई हैं और शराब की बिक्री जिनके विकास का बहुत बड़ा आधार बना हुआ है। भोजपुर के बगल के जिले रोहतास में भाकपा-माले के जिला सचिव भैयाराम यादव, जिनकी जद-यू से जुड़े अपराधियों ने इस साल के शुरू में हत्या कर दी थी, उन्होंने शराब भट्ठियों के खिलाफ आंदोलन का भी नेतृत्व किया था। हिंदकेशरी यादव पर हमला हाल का मामला है। 

आरा के बाद गया की दो भूंईटोलियों में भी 10 लोगों की जहरीली शराब से पीने की खबर आई। शराब भट्टियों के खिलाफ पिछले महीनों में धीरे-धीरे लोगों का आक्रोश सामने आने लगा है। कई जगह भट्ठियां तोड़ी गई हैं। महिलाओं की ओर से शराब के कारोबार का विरोध हो रहा है। 11 दिसंबर को आरा में महिला संगठन ऐपवा के बैनर तले महिलाओं ने जिलाधिकारी के समक्ष प्रदर्शन किया और जब उनके कर्मचारियों ने झूठ बोला कि जिलाधिकारी नहीं हैं, तो महिलाएं समाहरणालय का गेट तोड़कर उनके चंेबर तक पहुंच गईं और जिलाधिकारी प्रतिमा वर्मा को उनकी मांगों को सुनना पड़ा। आरा रेलवे स्टेशन के पास झोपड़पट्टी में भी महिलाओं के क्षोभ और गुस्से को महसूस करते हुए भी मुझे लगा था कि वे नीतीश बाबू के राजस्व बढ़ाने के तर्क से सहमत नहीं हैं, वे शराब की धड़ल्ले से हो रही बिक्री को बंद कराना चाहती हैं। 

भाकपा-माले पोलित ब्यूरो सदस्य स्वदेश भट्टाचार्य ने ठीक ही कहा कि बिहार की बर्बादी के आधार पर बिहार का राजस्व बढ़ाने की बात जनता के साथ धोखा और गरीबों के प्रति बेरूखीपन है। जनता को यह हक है कि वह जरूरी समझे तो सरकारी लाइसेंस वाली दूकानों को भी बंद करवा दे। इस सरकार में गांव-गांव में सामंती, माफिया, अपराधी और दबंग ताकतों को बढ़ावा दिया गया है, उन्हीं के जरिए शराब का कारोबार भी चल रहा है। कुछ भी करने का लाइसेंस तो सरकार ने शराब माफियाओं और भूमाफियाओं को ही दे रखा है। बिहार का विकास खेती और उद्योग के विकास से होगा, यहां के लोगों की मानसिक-शारीरिक क्षमता के उचित उपयोग से होगा, न कि शराब से।

जगदीश मास्टर की शहादत के चालीस साल

जननायक, जनांदोलन और साहित्य



दिल्ली देखे जरा

हम तुम्हारी कथा
ले जा रहे राजधानी
टूटे-फूटे साथियों के संग
नहीं कोई बेमिसाल ढंग।

जननायक,
हम तुम्हारे चारण
तुम्हारे उदास साथियों की
लड़ाकू जिजीविषा से खोज के
तुम्हारी आवाज के बीज
रोप देना चाहते हैं हर ओर।

देखे जरा 
यह बेरहम 
राजधानी भी।

सुनो दिल्ली

दिल्ली में बैठे तुम
नहीं जान पाओगे
सबकुछ खत्म करने का जोम
क्या होता है
और तुम
कभी फर्क नहीं कर पाओगे
हत्या और हत्या के बीच का फर्क।

यह नाटक बंद करो
अब भी है वक्त
सुनो जमीन की धमक
जो लगती है 
अविश्वसनीय तुम्हें

सुनो!
फिर-फिर सुनो।


9 अक्टूबर 1998 को ट्रेन में मैंने ये दो कविताएं लिखी थीं। उस रोज हम दिल्ली में जसम के सम्मेलन में ‘मास्टर साब’ का नाट्य मंचन करके लौट रहे थे। ज्ञानपीठ ने मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी के एक पुराने बांग्ला उपन्यास का अनुवाद ‘मास्टर साब’ छापा था। इसके पहले जनवरी में हमलोग आरा में इस उपन्यास का तीन दिवसीय मंचन कर चुके थे, जिसमें दर्शकों की भारी मौजूदगी थी। चित्रकार राकेश दिवाकर ने नाटक के प्रचार के लिए बड़ी-बड़ी वाल पेंटिंग बनाई थी। लगभग तीस कलाकारों ने उस नाटक को किसी आंदोलनात्मक अभियान की तरह तैयार किया था।

उन दिनों बिहार में सत्ता के संरक्षण में जातीय-सांप्रदायिक घृणा से भरी एक निजी सेना गरीब-मेहनतकशों का जनसंहार कर रही थी। उसका सरगना मासूम बच्चों और बेगुनाह औरतों की हत्या को भी जायज ठहरा रहा था और जिनका जातिवादी-सामंती व्यवस्था और सत्ता के साथ रिश्ता था, वे साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनीतिकर्मी, समाजसेवी और नागरिक लोग आंदोलन करने वाले गरीबों और उनकी पार्टी पर ही अत्याचार करने का आरोप लगा रहे थे। बथानी टोला में दलित-मुस्लिम महिलाओं और बच्चों का नृशंस जनसंहार हुए डेढ़ साल बीत चुके थे। हम देख रहे थे कि साहित्य में सतही मध्यवर्गीय स्त्री-दलित विमर्श चलाने वाले किस तरह उस सरकार से पुरस्कार ग्रहण कर रहे थे, जो हत्यारों को खुलेआम संरक्षण दे रही थी। हम यह भी महसूस कर रहे थे कि किस तरह गरीबों का आंदोलन किसी अंधहिंसात्मक प्रतिक्रिया में न चला जाए, इसकी सचेत कोशिशें उसके नेतृत्व द्वारा चलाई जा रही हैं।

‘मास्टर साब’ का मंचन उसी दौर में हुआ और वह अपने आप में मानो गरीबों के आंदोलन पर किए जा रहे हमले का एक मजबूत वैचारिक-सांस्कृतिक जवाब था। 

मास्टर साहब के बारे में कब मैंने पहली बार जाना आज याद नहीं है। शायद किशोर उम्र में पहली बार मेरे एक मामा ने बताया था कि मधुकर सिंह ने ‘अर्जुन जिंदा है’ नाम का जो उपन्यास लिखा है, वह जगदीश मास्टर की जिंदगी पर आधारित है, कि उस उपन्यास को छिपाकर रखा जाता है, कि मास्टर जगदीश नक्सलाइट थे, कि उन्होंने सामंती उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव और महिलाओं पर किए जाने वाले अत्याचार का विरोध किया था। बाद में मैंने जब मधुकर सिंह की कहानियां पढ़ीं, तो कई कहानियों में जगदीश मास्टर के जीवन की छवि दिखाई पड़ी। जगदीश मास्टर उनके साथ ही आरा के जैन स्कूल में साइंस के शिक्षक थे। मुझे जगदीश मास्टर के एकाध शिष्य जो मिले, उन्होंने बताया कि वे छात्रों में बहुत लोकप्रिय थे। 

मास्टर साहब एक ऐसे बुद्धिजीवी थे, जिनका अपना लिखा हुआ हमारे पास कुछ नहीं है, हालांकि मधुकर सिंह बताते हैं कि वे अपनी डायरी में कविताएं लिखा करते थे। उनके बारे में जो दूसरों ने लिखा, वही आज हमारे पास है। आखिर वह क्या बात है कि शहादत के चालीस साल बाद भी मास्टर जगदीश हमें याद आते हैं और उनके द्वारा शुरू किया गया आंदोलन हमें अपनी ओर आकर्षित करता है? क्या यह सच नहीं है कि विचार जब जीवन में उतरता है, तभी वह ऊर्जावान होता है? और कलम का भी रिश्ता उस जीवन से जब बनता है तब उसमें भी ताकत आती है?

यह एक अद्भुत संयोग है कि मास्टर साहब के जन्म और शहादत की तारीख एक ही है। 10 दिसंबर 1935 को उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिले के एक गांव एकवारी में हुआ था। उनकी उम्र जब बारह साल हुई तो कहा गया कि देश आजाद हो गया। लेकिन जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई, उन्हें लगा कि गरीब खेतिहर मजदूरों और मेहनतकश किसानों को तो कहीं कोई आजादी और बराबरी हासिल ही नहीं है। उस सामंती माहौल में संघर्ष करते हुए वे शिक्षक तो बन गए, पर उन्हें लग रहा था कि समाज में बहुत बदलाव नहीं हुआ है, शोषण-उत्पीड़न उसी तरह बरकरार है। उन्होंने उस दौर में कई चेतनशील युवाओं के साथ आरा शहर में दलितों को संगठित किया। उनके साथियों में विभिन्न जातियों के नौजवान थे। इन लोगों ने हरिजनिस्तान की मांग के साथ एक बड़ी रैली की। लेकिन उन्हें बहुत जल्दी यह लग गया कि सामंतवाद इस रास्ते से खत्म नहीं होगा। वे रास्ते की तलाश में थे। इस बीच कम्युनिस्ट नेता रामनरेश राम सामंतों के धनबल को चुनौती देते हुए एकवारी के मुखिया बन गए थे। 1967 में जब वे सीपीआई-एम के उम्मीदवार के बतौर सहार विधानसभा से चुनाव लड़े तो उनके चुनाव एजेंट की जिम्मेवारी मास्टर जगदीश ने संभाली और उसी चुनाव में अपने ही गांव में सामंती शक्तियों द्वारा फर्जी वोटिंग का विरोध करने पर उन पर जानलेवा हमला हुआ, सामंती शक्तियों ने अपने जानते उन्हें मार ही दिया, लेकिन कई माह तक जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष में जिंदगी की जीत हुई। समाज को बदलने के लिए वे गांव लौटे। इस बीच नक्सलबाड़ी विद्रोह हो चुका था और उसकी चिंगारी संघर्ष का रास्ता तलाश रहे इन नौजवानों तक पहुंची और फिर उसके बाद जो समर शुरू हुआ, वह देश का सामंतवादविरोधी किसान संघर्ष और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास का एक शानदार अध्याय बन गया। जगदीश मास्टर, रामनरेश राम और रामेश्वर यादव की त्रयी के नेतृत्व में जो संघर्ष शुरू हुआ, वह भोजपुर आंदोलन के रूप में चर्चित हुआ और जनकवि नागार्जुन समेत अनेक साहित्यकारों ने इसका आह्लाद के साथ स्वागत किया। सत्तर के दशक में शासकीय दमन में मास्टर जगदीश के कई साथी शहीद हुए, यहां तक पुनर्गठित कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा-माले के महासचिव सुब्रत दत्त उर्फ जौहर भी पुलिस की गोलियों से भोजपुर में ही शहीद हुए। मास्टर साहब के साथी रामनरेश राम भूमिगत होकर उस संघर्ष को चलाते रहे, आंदोलन विभिन्न परिस्थितियों में अपने संघर्ष के तौर-तरीके बदलता रहा, पर गरीबों की राजनीतिक-सामाजिक दावेदारी का संघर्ष कभी थमा नहीं, यहां तक कि उसी सहार से रामनरेश राम 28 साल बाद जनता के प्रतिनिधि बने और जब तक जीवित रहे, कभी पराजित नहीं हुए। 

महाश्वेता देवी का उपन्यास चूंकि मास्टर साहब की जिंदगी पर केंद्रित है, इस कारण उसमें बाद के संघर्षों का जिक्र नहीं है, लेकिन बाद के संघर्षों में वह किताब भी किसी न किसी रूप में शामिल है। इस किताब की जब भी मैंने कोई प्रति ली, कोई न कोई इसे हमेशा के लिए लेकर चला गया और मुझे इससे खुशी होती रही। दिनेश मिश्र उस वक्त ज्ञानपीठ के निदेशक थे। दिल्ली आया तो उनसे कई बार मुलाकात हुई। अचानक एक दिन किताब पलटते वक्त उनका नाम देखा और उन्हें मैंने उन्हें बधाई दी ज्ञानपीठ से इस किताब के प्रकाशन के लिए। कौन कहता है कि किताबों का प्रभाव नहीं होता? मेरे सारे साथी इस किताब से प्रभावित रहे हैं। इसका जब मंचन हुआ, तो मास्टर साहब की भूमिका मुझे ही निभाने का मौका मिला और इस नाते भी उनके आंदोलन के गहरे असर में आज भी हूं। मास्टर साहब तो अपने एक साथी रामायण राम के साथ 10 दिसंबर 1972 को ही शहीद हो गए। लेकिन वे संघर्षशील जनता के लिए हमेशा लीजेंड बने रहे, जनता ने उन्हें कभी विस्मृत नहीं किया। शासकीय हिंसा का प्रतिरोध और उसकी हर रणनीति का माकूल जवाब देने के लिए संघर्ष के उपयुक्त तरीके को अपनाना भोजपुर आंदोलन की खासियत रही है। 

‘मास्टर साहब’ और ‘अर्जुन जिंदा है’ ही नहीं, बल्कि कई अन्य उपन्यास और कहानियां जगदीश मास्टर की जिंदगी से प्रभावित रही हैं। हमने एक साल उनकी शहादत के मौके पर ‘साहित्य में जननायक’ विषय पर विचारगोष्ठी की थी, जिसमें इस तरह की कई रचनाओं की चर्चा हुई थी। बाद में उनके जीवन पर केंद्रित सुरेश कांटक का महाकाव्य ‘रक्तिम तारा’ प्रकाशित हुआ, तो उसके लोकार्पण के अवसर पर भी हमने साहित्य, जनांदोलन और जननायकों के रिश्ते पर बातचीत की। 

इस बार 10 दिसंबर 1972 को मास्टर साहब की शहादत की 41वीं वर्षगांठ के अवसर पर दो घटनाएं हुईं। एक तो आरा शहर में वर्षों से प्रतीक्षित मास्टर जगदीश स्मृति भवन के निर्माण का काम शुरू हुआ, जो भोजपुर आंदोलन से जुड़े इतिहास और दस्तावेजों का एक अर्काइव भी होगा, इसके निर्माण का काम जनसहयोग से ही आगे बढ़ रहा है, दूसरे भोजपुर जिला के बिहिया नामक प्रखंड के मुसहर समुदाय के उसी टोले में मास्टर जगदीश और रामायण राम के स्मारक का शिलान्यास किया गया, जहां गलतफहमी में गरीबों ने उनकी हत्या कर दी थी। हुआ यह था कि 40 साल पहले वे उस इलाके के एक जालिम सामंत का अंत करके लौट रहे थे और उस सामंत के हितैषी चोर और डाकू का शोर मचा रहे थे। पार्टी के उसूल के अनुसार गरीब जनता पर गोली चलाने का निर्देश नहीं था। रामायण राम ने मास्टर जगदीश को निकल जाने के लिए कहा, पर वे उन्हें अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए। मुसहर लोगों को अपना वे परिचय दे पाते, उसके पहले ही उनकी लाठियों से उनकी मौत हो गई। बाद में जब उन लोगों को पता चला तो वे गहरे शोक में डूब गए। हालांकि शासकीय दमन में बहुत सारे नेतृत्वकारियों की शहादत के बावजूद आंदोलन अगर फिर से उभरा, और बार-बार पुनर्नवा होता रहा, तो उसकी नींव में ये गरीब ही रहे। फिर भी एक कसक तो इस समुदाय के भीतर रहती ही थी कि उन्हीं के हाथों मास्टर साहब की हत्या हो गई थी। 
40 साल बाद उसी समुदाय के दिनेश मुसहर ने जैसे उस कलंक को मिटा दिया। उन्होंने अपनी जमीन उनके स्मारक के लिए दी। स्मारक के शिलान्यास के मौके पर दिनेश मुसहर और उनकी पत्नी का चेहरा गर्व से भरा हुआ था। लगभग डेढ़ दशक पहले भी स्मारक बनाने की कोशिश की गई थी, जिसे पुलिस ने कामयाब नहीं होने दिया था। लेकिन इस बार न केवल स्मारक का शिलान्यास हुआ, बल्कि वहां जनसभा भी हुई। 

महाश्वेता देवी के उपन्यास के अंत में बूढ़ी दादी जो कथा सुना रही है, उसका अंत नहीं हुआ है, वह दास्तान अभी जारी है। हालांकि मरघट की शांति कायम करने की कई बार कोशिश की गई, पर जीवन है कि कभी हार नहीं मानता; बराबरी, इंसाफ और आजादी के सपने हैं कि जो हर दमन, झांसे और प्रलोभन को पार कर अपना वजूद बनाए रखते हैं। 

12/14/12

पं. रविशंकर को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि



12 दिसंबर, 2012 के दिन सैन फ्रांसिस्को, अमरीका में महान सितारवादक पं. रविशंकर (मूल नाम रबिन्द्र शंकर चौधुरी) ने आखिरी साँसें लीं। 7 अप्रैल, 1920 को जन्मे रविशंकर ने 10 साल की उम्र से ही अपने बड़े भाई उदयशंकर की नृत्य-मंडली के साथ सारी दुनिया का भ्रमण शुरू कर दिया। 17 साल की उम्र में उन्होंने नृत्य कला से हटकर संगीत के प्रति पूरे तौर पर समर्पण का निर्णय लिया। 18 की उम्र से बाबा अलाउद्दीन खान से सितार की तालीम लेनी शुरू की।

 1941 में अन्नपूर्णा देवी से उनका विवाह हुआ। अन्नपूर्णा बाबा अलाउद्दीन खान की पुत्री तथा विख्यात सरोदवादक अली अकबर खान की बहन ही नहीं, बल्कि खुद एक महान सुरबहार वादक और संगीतकार हैं तथा प्रसिद्ध बांसुरी वादक हरिप्रसाद चैरसिया और सितारवादक निखिल चक्रवर्ती की गुरु भी। 1942 में दोनों के पुत्र शुभेंदु का जन्म हुआ, लेकिन दोनों का साथ अधिक दिन नहीं चल सका। 1940 के दशक में ही रविशंकर इप्टा के नजदीक आए। इन्हीं दिनों उन्होंने मैक्सिम गोर्की की कृति ‘लोवर डेफ्थ्स’ पर आधारित चेतन आनंद की हिंदी फिल्म ‘नीचा नगर’ का संगीत दिया। ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल’ में भी रविशंकर ने संगीत दिया। बाद को हिंदी फिल्मों में उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी की ‘अनुराधा’, त्रिलोक जेटली निर्देशित ‘गोदान’ और गुलजार की ‘मीरा’ का भी संगीत दिया, लेकिन फिल्म संगीत में उनकी शोहरत का आधार ‘अपू त्रयी’ के नाम से विख्यात सत्यजित राय की तीन फिल्मों-‘पथेर पांचाली (1955)’, ‘अपराजितो’ तथा ‘अपूर संसार’ में दिया गया संगीत ही है। 1982 में उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की ‘गाँधी’ के लिए भी संगीत दिया। 1949 से 1956 तक उन्होंने आकाशवाणी में बतौर संगीत निर्देशक काम किया। 1952 में रविशंकर की मुलाकात दूसरे विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों के सैनिकों की हौसला-अफजाई के लिए संगीत के कार्यक्रम देनेवाले विश्विख्यात वायलिनवादक तथा आर्केस्ट्रा कंडक्टर यहूदी मेनुहिन से हुई जिनके बुलावे पर 1955 में न्यूयार्क में उन्होंने अपना कार्यक्रम दिया। दोनों का साझा अल्बम ‘वेस्ट मीट्स ईस्ट’ नाम से बाद को निकला जिसे 1967 में ग्रैमी अवार्ड मिला। 1964 से 1966 के बीच रविशंकर अमरीका में 60 के दशक के तमान व्यवस्था-विरोधी युवाओं की पीढ़ी से जुड़े राक और जैज संगीत के नामचीन प्रतिनिधियों जार्ज हैरिसन, जॉन काल्तरें, जिमी हेंड्रिक्स आदि के साथ भी संगीत कार्यक्रम देते देखे जाते रहे। पश्चिम और पूरब की संगीत परम्पराओं के सम्मिश्रण के जिस ‘फ्यूजन म्यूजिक’ के आगाज का श्रेय पं. रविशंकर को जाता है, उसमें पूरब और पश्चिम के भीतर भी अनेक अंतर्धाराओं का शुमार है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में वे बड़े आराम से कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों का उत्कृष्ट सम्मिश्रण उसी तरह कर सकते थे जिस तरह पश्चिम के क्लासिकीय और लोक संगीत का भारतीय संगीत के साथ। 

भारतीय संगीत के विश्व-प्रसार, संगीत की मार्फत दुनिया भर के इंसानों के बीच खडी सरहदों के अतिक्रमण के साथ ही साथ इप्टा से आरंभिक दिनों में जुड़ाव, बांग्लादेश के रिफ्यूजियों के सहायतार्थ 1971 में न्यूयार्क में बाब डिलन, एरिक क्लैपटन, जार्ज हैरिसन आदि के साथ मिलकर रॉक कंसर्ट आयोजित कर करोड़ों डालर इकट्ठा करने की पहल तथा भारत में 1990-92 में बाबरी-मस्जिद ढहाए जाने के बाद कलाकारों के सांप्रदायिकता-विरोधी मोर्चे में शिरकत करके उसे मजबूती देने तक, उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम थे। भारत की और भारतीय संगीत की जिस गंगा-जमुनी तहजीब के वाहक उनके गुरु बाबा अलाउद्दीन खान जैसे महान संगीतज्ञ थे, उसकी नुमाइंदगी वे विश्व-स्तर पर ताजिन्दगी करते रहे। विगत 4 नवंबर को उन्होंने आक्सीजन मास्क लगाकर अपनी आखिरी प्रस्तुति दी थी।

1967 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1986 में वे राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुए तथा 1999 में भारतरत्न सम्मान से नवाजे गए। वे ऐसे संगीतकार रहे, जिन्हें जीवन में तीन बार ग्रैमी पुरस्कार मिला। मरणोपरांत उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी अवार्ड देने की घोषणा हुई है। 

मानवीय संस्कृति अत्यंत प्राचीन काल से ही मिश्रित रही है, संकरता संस्कृति का प्राण है, उसकी गति है, जबकि विशुद्धता पर अधिक जोर उसे गतिरुद्ध करता है। पं. रविशंकर का 92 साल का अद्वितीय कलात्मक जीवन इसी सत्य को प्रखरता से स्थापित करता है। विश्व-संगीत के तसव्वुर को व्यावहारिक स्तर पर चरितार्थ करने में उनका महान प्रयास सदैव स्मरणीय रहेगा। 

उन्हें जन संस्कृति मंच की विनम्र श्रद्धांजलि! 


-सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, 
जन संस्कृति मंच की ओर से जारी

11/20/12

शाहीन और रेनू की गिरफ्तारी की निंदा- जन संस्कृति मंच


20 नवम्बर। शाहीन और रेनू, मुंबई की इन दो छात्राओं को मुंबई पुलिस ने कल इसलिए गिरफ्तार किया कि फेसबुक पर शाहीन ने यह सवाल उठाया कि बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद और अंतिम संस्कार के दिन मुंबई क्यों बंद रही। फेसबुक पर इस पोस्ट को रेनू ने 'लाइक' किया था। इसके बाद शिव-सैनिकों ने शाहीन के चाचा की क्लीनिक को ध्वस्त किया। 

बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार से लेकर फेसबुक पर एक बिलकुल ही सामान्य टिप्पणी पर की गई गिरफ्तारी तक, ऐसा लग रहा है मानो सरकार खुद शिवसेना ही चला रही है। पुलिस बल के भीतर शिवसेना की घुसपैठ पहले से ही एक जाना माना तथ्य है। लेकिन पृथ्वीराज चौहान की सरकार ने इस प्रकरण में अब तक जो कुछ भी किया है, वह भी एक जाना-माना तथ्य है। यह तथ्य और कुछ नहीं, बल्कि 1970 के दशक में वामपंथी ट्रेड यूनियनों को ख़त्म करने के लिए शिवसेना को खड़ा करने में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका से लेकर , लगातार उसकी कारगुजारियों को बर्दाश्त करने, अल्पसंख्यकों पर लगातार पुलिस दमन के सिलसिले को जारी रखने और कुल मिलाकर देश भर में तमाम नाज़ुक मौकों पर साम्प्रदायिक ताकतों के साथ सांठ- गाँठ है जो कि कांगेसी सरकारों के चरित्र का हिस्सा है। इस मौके पर शिव-सेना के सामने पृथ्वीराज चौहान की सरकार का दंडवत समर्पण न केवल शर्मनाक , बल्कि खतरनाक भी है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। 

जन संस्कृति मंच शाहीन और रेनू की असंवैधानिक गिरफ्तारी के लिए ज़िम्मेदार पुलिस-कर्मियों को दण्डित किए जाने की मांग करता है। शाहीन के चाचा अब्दुल धाढा के क्लीनिक को ध्वस्त किये जाने की घटना के लिए ज़िम्मेदार न केवल उपद्रवी शिवसैनिकों पर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, बल्कि इन दोनों छात्राओं के परिवारों को पुलिसिया कार्रवाई करके सरकार ने जिस तरह असुरक्षित बनाया है, उसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए सरकार को अब्दुल धाढा के क्लीनिक को हुए नुक्सान की भरपाई करनी चाहिए। नागरिक समाज से हम अपील करेंगे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस तरह के सरकार समर्थित हमलों के खिलाफ पुरजोर आवाज़ बुलंद करे।
(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

11/7/12

अकारी जी की याद-2

वे गोरख पाण्डेय, रमता जी, विजेन्द्र अनिल की धारा की एक कड़ी थे-  बलभद्र 


भोजपुरी के जनकवि दुर्गेन्द्र अकारी नहीं रहे। ये इन दिनों में अस्वस्थ चल रहे थे। 05 नवम्बर 2012 को इनका निधन हुआ। ये बिहार के भोजपुरी जिला के अकिलनगर एड़ौरा गाँव के थे। अकारी जी का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ नाम से प्रकाशित है। इनके गीतों में भोजपुर और बिहार के क्रांतिकारी किसान संघर्षों की अनुगूँजें हैं। ये अत्यंत गरीब परिवार के थे और जीवन-यापन के लिए इन्होंने कुछ दिनों तक गाँव में ‘बनिहारी’ (मजदूरी) भी की थी। दो सेर अनाज उस समय मजदूरी के रुप में मिलता था। दो सेर सवा किलो के बराबर होता है। अपने उन अनुभवों को अकारी जी ने अपने कई गीतों में आकार दिया है। अपने अनुभवों को सहज-सशक्त आकार देने के चलते ही इन्हें ‘अकारी’ नाम से लोग पुकारने लगे। इस नाम के पीछे एक रोचक प्रसंग भी है, जिसकी चर्चा बाद में की जाएगी। अकारी जी अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं-‘मत करऽ भाई बनिहारी तू सपन में’ (सपने में भी बनिहारी मत करो)। कवि ने फरियादी स्वर में एक गीत लिखा है-‘चढ़ते अषाढ़वा हरवा चलवलीं,/चउरा के बन हम कबहूँ ना पवलीं/जउवे आ खेंसारी से पिरीतिया ए हाकिम/कतना ले कहीं हम बिपतिया ए हाकिम।’ (अषाढ़ के शुरू होते ही हल चलाया। मेहनताना के रुप में चावल कभी नहीं पाया। जौ और खेंसारी ही मयस्सर हुआ। कहाँ तक अपनी विपत्तियाँ सुनाएँ।) अकारी जी का एक लोकप्रिय गीत है-‘बढ़ई लोहार धोबी रोपले बा आलू कोबी/ पेड़-पाता खड़ा ओकर फलवे नापाता/बतावऽ काका कहँवा के चोर घुसि जाता।’ (बढई, लोहार, धोबी ने आलू-गोभी की खेती की। ये गांव के अत्यन्त गरीब, पिछड़े व अल्पसंख्यक हैं। खेतों में पेड़-पत्ते तो ख़ड़े हैं पर फल गायब हैं। इन खेतों में कहाँ के चोर घुस जाते हैं।)
यह गीत इतना लोकप्रिय रहा कि गांवों में नाच-नौटंकी वाले भी इसे गाते थे और कई नाटक टीम के कलाकारों ने भी इसे अपने-अपने ढंग से जरूरत के मुताबिक गाया। देश में जो लूट-खसोट है बड़े पैमाने पर, सत्ता-प्रतिष्ठानों में जो भ्रष्टाचार है और शासक वर्ग द्वारा बार-बार यह झूठ प्रचारित किया जा रहा है निरंतर, कि सब सुरक्षित है, यह गीत इस लूट-खसोट, भ्रष्टाचार और झूठ को उजागर करता है। साथ ही साथ भारत की जो जटित जाति-संरचना है, जातियों के जो चरित्र और अंतर्विरोध हैं, उसकी भी इसमे शिनाख्त है और इस सिस्टम पर करारा व्यंग्य है।

अकारी जी का सम्बन्ध राजनीतिक रूप से भाकपा (माले) से रहा है। ये उसके सांस्कृतिक योद्धा थे। भोजपुर और बिहार के किसान- आन्दोलन के विभिन्न पड़ावों, प्रसंगों, घटनाओं और चरित्रों पर इनके गीत हैं। इनके गीतों में किसान-संघर्षों का इतिहास दर्ज है। इन्हें जेल भी जाना पड़ा है और जेल जीवन के अनुभवों को भी इन्होंने गीतों में उतारा है। इस तरह कि लोग बार- बार उनके मुँह से सुनना चाहते थे।
अक्षर-ज्ञान भर ही शिक्षा थी। गीतों में देखने में आता है कि हिन्दी और भोजपुरी के शब्दों और वाक्यों के प्रयोग से ये कहीं परहेज नहीं करते। भिखारी ठाकुर की तरह किसी-किसी गीत में दो लाइन हिन्दी में है और पूरा गीत भोजपुरी में। यह नौटंकी का शिल्प है। अकारी जी का संघर्ष समझौताहीन संघर्ष रहा। इनको और इनके संघर्ष को सलाम।

मैंने उनको बार-बार गाते हुए देखा- सुना था। वे ‘आत्म-आलोचना’ में विश्वास करते थे। पार्टी की बैठकों में ‘आत्म-आलोचना’ की जगह रहती है। साहित्य की विधा ‘आलोचना’ से परिचित होते हुए भी इन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उनके गीतों पर कौन क्या सोचता-कहता है ? उन्हें तो जन संघर्षों के लिए जीना था और उसी के लिए गीत रचने थे।

जन संस्कृति मंच का तेरहवाँ राष्ट्रीय सम्मेलन 03-04 नवम्बर 2012 को गोरखपुर में चल रहा था। यहाँ ‘जनभाषा- समूह’ के प्रारूप और कार्य-योजना पेश करते हुए मैंने आरा में अकारी जी पर एक कार्यक्रम करने और उन्हें सम्मानित करने का प्रस्ताव रखा था। यह कार्यक्रम हमलोग शीघ्र करते। पर अफसोस कि अकारी जी हमारे बीच से चले गए। हम उन्हें याद करते हैं और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। प्रो. बलराज पाण्डेय, प्रो. सदानन्द शाही, प्रकाश उदय, बलभद्र, आसिफ रोहतासवी, संतोष कुमार चतुर्वेदी, कृपाशंकर प्रसाद, राजकुमार, सुरेश काँटक, राधा, सुमन कुमार सिंह, जितेन्द्र कुमार, सुधीर सुमन, दुर्गा प्रसाद सिंह, आस्था सिंह आदि ने श्रद्धांजलि दी। 

11/6/12

बतावऽ काका, कहवाँ से चोर घुसल जाता... के कवि की स्मृति

जन-कवि श्री दुर्गेंद्र अकारी को जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि 

जनकवि को लाल सलाम !
6 नवम्बर, 20112, कल 05 नवंबर तड़के 6 बजे भोजपुर के किसान संघर्षों से निकले, उत्तर और मध्य बिहार की गरीब, भूमिहीन और दलित जनता के अत्यंत लोकप्रिय और जुझारू कवि दुर्गेंद्र अकारी ने अंतिम साँसें लीं. वे खुद इसी तबके से आते थे. जनता उनका अंतिम दर्शन कर सके, इसके लिए उनके शरीर को कल दोपहर भाकपा (माले) के आरा आफिस पर लाया गया, जहां अच्छी-खासी तादाद में लोगों ने इकट्टा होकर अकारी जी को अंतिम विदाई दी. 

मुक्तिबोध की कवि-जीवन के आरम्भ से ही यह चिंता थी कि, "मैं उनका ही होता/ जिनसे रूप भाव पाए हैं". नागार्जुन लगातार उनके ही होते चले गए जिनसे जनता का कोई कवि रूप और भाव पाता है. भोजपुर के नाभिकेंद्र से उत्पन्न और पूरे मध्य बिहार में 1970 के बाद भभक कर फैले जिस क्रांतिकारी किसान संघर्ष ने का. जीउत, सहतो, मास्टर साहेब और पारस जी (का. रामनरेश राम) जैसे समाज के निम्नतम समझे जानेवाले तबकों से उन्नततम विचार के क्रांतिकारियों को पैदा किया, उसी ने अपने जनकवि रमता जी, विजेंद्र अनिल और अकारी जी जैसों की कविता को भी पैदा किया. भोजपुर की इसी धरती को केंद्र करके नागार्जुन ने लिखा था, 'देखो जनकवि भाग न जाना/ तुम्हे कसम है इस माटी की'. जन संस्कृति मंच के संस्थापक महासचिव जनकवि गोरख पाण्डेय की जिद थी कि हम कवि-लेखक जिन किसान-मजदूर तबकों के लिए लिखते हैं, उन्हें ही हमारे लिखे का प्राथमिक श्रोता/ पाठक होना चाहिए. इसे गोरख ने खुद चरितार्थ किया. इस निकष पर भोजपुर के जो साहित्यकार सौ फीसदी खरे उतरे, उनमें अकारी जी का नाम अमिट है. 

अकारी जी का जन्म 1943 में हुआ. वे भोजपुर जिले के गांव एड़ौरा के रहनेवाले थे. बचपन से ही पितृ-विहीन अकारी ने हलवाही और मजदूरी की. गीतों के कारण पुलिस और गुंडों के कठिन आघात झेले और जेल भी काटी. फिर भी वह संघर्ष की अगली कतार में ही रहे. दिए गए प्रलोभनों को उन्होंने सदा ही ठुकराया और गरीबी से उबरने की कोशिश न करके गरीबों को उबारने की कोशिश करते रहे .

अकारी जी 74 के आंदोलन के साथ रहे, लेकिन '74 आन्दोलन की जन-आकांक्षाओं से दगा करने वालों को अपने गीतों में बक्शा नहीं. '74 के आन्दोलन के कई नामचीन नेताओं और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से व्यक्तिगत स्तर पर मित्रता होने के बावजूद अकारी जी ने उसका कभी कोई लाभ नहीं उठाया. उलटे सामंती ताकतों और सत्ता के खिलाफ उनके अपार लोकप्रिय गीतों की रचना की राह से उनको भटकाने के जो भी प्रलोभन सत्ता द्वारा दिए गए, उन्हें हिकारत के साथ उन्होंने ठुकराया. 

नक्सलबाड़ी की चिंगारी भोजपुर में गिरी और उससे जुड़े सवाल और संघर्ष के मुद्दे इनके गीतों में आने लगे. वे सामंतों और सरकार के खिलाफ गीत लिखने लगे. उन्होंने चंवरी, बहुआरा, सोना टोला आदि गांवों में पुलिस-सीआरपीएफ से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बहादुराना प्रतिरोधों और उनकी शहादतों की घटना को अपने गीतों में पिरोया. अपने गीतों में उन्होंने बिहार के धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान को दर्ज किया. किसान संग्रामियों का शौर्य, जनता के प्रति अगाध विशवास और ममता, सामंती उत्पीडन के प्रति रोष तथा सत्ताधारियों का पर्दाफाश, इन विषयों को अपनी मातृभाषा भोजपुरी में उन्होंने लगातार गीत लिखे जो जनता को उद्वेलित करते थे, साहस देते थे, उनके सुख-दुःख में साथ देते थे. उनके गीतों में भोजपुरी के कई दुर्लभ शब्द हैं पिछले साल ही सुधीर सुमन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बनारस में एक रैली में 1800 की किताबें बिक जाने को अपने जीवन की किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह याद किया . जहां पैसा और सुविधएं ही जीवन की श्रेष्ठता का पैमाना बनती जा रही हों, वहां इस 1800 की कीमत जो समझेगा, शायद वही इसके प्रतिरोध में नए जीवन मूल्य गढ़ पाएगा.

हां, बेशक अकारी जी धारा के विरुद्ध चलते रहे, जब लालू चालीसा लिखा जा रहा था तो उन्होंने' लालू चार सौ बीसा' लिखा. लुटेरों और शोषकों को पहचानने में कभी नहीं चूके. गांव में विभिन्न जातियों के यहां चोरी की घटना पर ‘बताव काका कहवां के चोर घुस जाता’ से लेकर बोफोर्स घोटाले पर ‘चोर राजीव गांधी, घूसखोर राजीव गांधी’ जैसे गीत लिखे. जब छोटी रेलवे लाइन बंद हुई, तो उस पर बड़े प्यार से जो गीत उन्होंने लिखा- 'हमार छोटको देलू बड़ा दिकदारी तू', वह जनजीवन के प्रति गहरे लगाव का सूचक है. उनके गीतों में इंकलाब के प्रति एक धैर्य भरी उम्मीद है. उनके गीतों में जो लड़ने की जिद है, चाहे जान जाए, पर चोर को साध् कहने और साध् को चोर कहने वाली इस व्यवस्था को हटा देने का उनका संकल्प है. समय समय पर उनकी गीत पुस्तिकाओं के अलावा जसम की ओर से 1997 में उनके चुनिंदा गीतों का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ प्रकाशित हुआ था .

अकारी जी का जाना किसानों-मजूरों के संघर्ष की भारी क्षति है, भोजपुरी भाषा और साहित्य की भारी क्षति है.

हम जन संस्कृति मंच की ओर से अकारी जी की स्मृति को लाल सलाम पेश करते हैं!

प्रणय कृष्ण, 
महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी 

जनता के कवि दुर्गेंद्र अकारी की स्मृति में

(कवि, साथी दुर्गेंद्र अकारी नहीं रहे। कविता के लिए जिन्होंने सब कुछ किया, पूरी जिन्दगी उसे दी, जनता ने उसे पाला पोसा, अपना बनाया और सर आँखों पर रखा। अविश्वसनीय लगती इस बात के प्रमाण थे दुर्गेन्द्र अकारी। उनकी जिंदगी और कविता हिन्दी कविता को लोकतांत्रिक और बराबरी वाली जगह में बदलती है बल्कि समाज में कवि के हस्तक्षेप का रास्ता भी बनाती है। अकारी जी को याद करते हुए इसी ब्लॉग की एक पुरानी पोस्ट- ) 

पिछली गर्मियों में आरा पहुँचने पर मालूम हुआ कि जनकवि दुर्गेंद्र अकारी जी की तबीयत आजकल कुछ ठीक नहीं रह रही है। साथी सुनील से बात की, तो वे झट बोले कि उनके गांव चला जाए। उनकी बाइक से हम जून माह की बेहद तीखी धूप में अकारी जी के गांव पहुंचे। लोगों से पूछकर झोपड़ीनुमा दलान में हम पहुंचे, जिसकी दीवारें मिट्टी की थीं और छप्पर बांस-पुआल और फूस से बना था। एक हिस्से में दो भैंसे बंधी हुई थीं। दूसरे हिस्से में एक खूंटी पर अकारी जी का झोला टंगा था। एक रस्सी पर मच्छरदानी और कुछ कपड़े झूल रहे थे। दीवार से लगकर दो साइकिलें खड़ी थीं और बीच में एक खाली खाट, लेकिन अकारी जी गायब। हम थोड़े निराश हुए कि लगता है कहीं चले गए। फिर एक बुजर्ग शख्स आए। मालूम हुआ कि वे उनके भाई हैं। उन्होंने बताया कि अकारी गांव में ही हैं। खैर, तब तक एक नौजवान उन्हें पड़ोस से बुलाकर ले आया। उसके बाद उनसे हमने एक लंबी बातचीत की, जिसके दौरान हमें भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की झलक तो नजर आई ही, एक सीधे स्वाभिमानी गरीब नौजवान का संघर्षशील जनता का कवि बनने की दास्तान से भी हम रूबरू हुए।

जसम की ओर से 1997 में उनके चुनिंदा गीतों का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ प्रकाशित हुआ था। उसकी भूमिका सुप्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी, कम्युनिस्ट और जनकवि रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ ने लिखा था कि बचपन के पितृ-विहीन अकारी ने हलवाही और मजदूरी की है, गीतों के कारण पुलिस और गुंडों के कठिन आघात झेले हैं और जेल भी काटी है। फिर भी वह संघर्ष की अगली कतार में ही हैं। प्रलोभनों को उन्होंने सदा ही ठुकराया है और गरीबी से उबरने की कोशिश न करके गरीबों को उबारने की कोशिश करते रहे हैं। सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान धोती कुर्ता पहने, कंधे में झोला टांगे ठेठ मेहनतकश किसान लगने वाले अकारी जी को गीत गाते तो हमने कई बार सुना-देखा : उनके गीतों की खास लय, जिसमें मौजूद करुणा, आह्वान और धैर्य के मिले-जुले भाव के हम कायल रहे.

‘मत कर भाई, तू बनिहारी सपन में’- इस गीत से उन्होंने अपने बारे में बताने की शुरुआत की। इस गीत को उन्होंने अपने ही गांव में एक रूपक की तरह मंच से प्रस्तुत किया था, जिसे सुनने के बाद हलवाहों ने हल जोतने से मना कर दिया था। चूंकि बनिहारों की पीड़ा को उस गीत में उन्होंने बड़ी प्रभावशाली तरीके से आकार दिया था, इसी कारण उनके नाम के साथ अकारी शब्द जुड़ गया। गीत का असर देखकर नौजवान अकारी का मन उसी में रमने लगा। इसी बीच नक्सलबाड़ी की चिंगारी भोजपुर में गिरी और उससे जुड़े सवाल और संघर्ष के मुद्दे इनके गीतों में आने लगे। वे सामंतों और सरकार के खिलाफ गीत लिखने लगे। उन्होंने चंवरी, बहुआरा, सोना टोला आदि गांवों में पुलिस-सीआरपीएफ से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बहादुराना प्रतिरोधों और उनकी शहादतों की घटना को अपने गीतों में पिरोया। उनकी पहली किताब का नाम था - जनजागरण। यह बताते हुए वे गर्व से भर उठे कि उनके गीतों को सुनकर लोगों का उत्साह बढ़ता था। जिस समय नक्सल का नाम सुनकर कोई अपने ओरी, छप्पर के किनारे भी नहीं ठहरने देता था, वैसी हालत में उन पर उन्होंने गीत लिखा।

हमने सवाल किया कि गीत लिखने के अलावा और क्या करते थे? उन्होंने कहा कि उनके लिए भी बड़ा गंभीर सवाल था कि जीविका के लिए क्या करें। किसी का नौकर बनके रहना उन्हें मंजूर न था। उसी दौरान उन्हें एक विचार आया कि मड़ई कवि की तरह किताब छपवाकर वे भी बेच सकते हैं। लेकिन मड़ई कवि से उन्होंने सिर्फ तरीका ही लिया, विषय नहीं लिया। मड़ई कवि सरकारी योजनाओं के प्रचार में गीत गाकर सुनाते थे, जबकि अकारी गीतों के जरिए सरकार की पोल खोलने लगे।

अकारी जी 74 के आंदोलन के साथ रहे। उन्होंने बताया- ‘जब इमरजेंसी लगा तो सब नेता करीब-करीब अलोपित हो गए। कुछ नेपाल की तराई में चले गए। हमको लगा कि इस तरह तो कहां क्या हो रहा है, इस बारे में कोई बातचीत ही नहीं हो पाएगी। तो उसी दौर में किताब छपवा के बेचने लगे ट्रेन में।’ उस वक्त का इनका एक मशहूर गीत था- 'बे बछरू के गइया भोंकरे, ओइसे भोंकरे मइया, बिहार तू त सून कइलू इंदिरा'। अपने गीतों के जरिए जनता पार्टी को वोट देने की अपील भी उन्होंने की और 74 के आंदोलन की जनभावना से गद्दारी करने वालों पर व्यंग्य भी किया-

'जनता जनता शोर भइल, जनता ह गोल भंटा हो
हाथ ही से तूरी ल, ना मारे पड़ी डंटा हो।'

अपनी पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर अकारी जी ने बताया कि वे स्कूल नहीं गए। बुढ़वा पाठशाला में गए, पर वहां कुछ सीख नहीं पाए। एक दिन दलान पर लड़के पढ़ रहे थे तो उन्हीं से कहा कि भाई हमें भी कुछ पढ़ा दो। उन सबों ने एक टूटी स्लेट दी और उस दिन उन्होंने 'क' वर्ग के सारे अक्षर रात भर मे याद किए। इस तरह पांच-छह दिन में सारे अक्षरों को लिखना सीख गए। हमने पूछा कि अब तो किताब धड़ल्ले से पढ़ लेते होंगे, तो हंसते हुए बोले- पढ़ लेता हूं, पर ह्रस्व-इ और दीर्घ-ई अब भी समझ में नहीं आता।

शिक्षा के अभाव या शब्दों और भाषा के स्कूली ज्ञान के अभाव का जो सच था उसे भी उन्होंने एक तरह का ढाल बना लिया और अपने नाम के साथ एल एल पी पी लिखने लगे-दुर्गेंद्र अकारी, एल एल पी पी। उनके गीतों के पुराने संग्रहों में आज भी यही लिखा मिलता है। तो इस एल एल पी पी से जुड़ा एक किस्सा उन्होंने सुनाया कि एक बार जीआरपी वालों ने उन्हें पकड़ लिया। एक ने पूछा कि एल एल पी पी किसने लिखा है? अकारी बोले- हमने। उसने सवाल किया- इसका मतलब? अकारी- आप लोग पढ़े लिखे आदमी हैं अब हम क्या सिखाएं आपलोगों को। तो उसने कहा- इसका मतलब तो लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर होता है। अकारी बोले - वही है सर। उसने पूछा- गीत कैसे लिखते हो? अकारी के पास जवाब तैयार- क ख ग किसी तरह जोड़ के। फेयर किसी दूसरे से कराते हैं। उसमें से किसी ने कहा कि सिर्फ क ख ग के ज्ञान से इतना लिख पाना संभव नहीं है। उनमें एक बड़ा बाबू था, कुछ समझदार, उसने इनके इंदिरा विरोधी कुछ गीतों को सुना और कहा- समुद्र में बांध् बनाया जा सकता है, लेकिन कवियों के विचारों को बांध नहीं जा सकता। उसने यह भी कहा कि गीत तो आपका अच्छा है, पर यहां हमलोगों की जिम्मेवारी है। हमलोगों की बदनामी होगी। यहां मत गाइए-बजाइए। तो अकारी बोले- कहां जाएं, भाई? कचहरी पर जाते हैं, तो आप ही लोग हैं। बाजार में जाते हैं तो आप ही लोग हैं। यहां स्टेशन पर आते हैं, तो आप ही लोग हैं। हम मैदान में गाने के लिए गीत तो बनाए नहीं है। बड़ा बाबू बोला- नहीं मानिएगा, तो विदाउट टिकट में आपको पकड़ लेंगे।
विदाउट टिकट में तो अकारी जी नहीं पकड़े गए। लेकिन प्रलोभन और धमकी के जरिए उन्हें गीत लिखने से रोकने की कोशिश जरूर की गए। एक दिन वे आरा रेलवे स्टेशन पर किताब लेके पहुंचे तो वहां असनी गांव के कामेश्वर सिंह से मुलाकात हुई। अकारी ने बताया कि कामेश्वर सिंह उस तपेश्वर सिंह के भाई थे, जिन्हें सत्ता और प्रशासन के लोग बिहार के सहकारिता आंदोलन का नायक बताते हैं और आम लोग को-आपरेटिव माफिया। कामेश्वर सिंह ने अकारी से कहा कि वे किताब बेचना छोड़ दें। वे उनको नौकरी दिला देंगे। अकारी बोले- नौकरी तो नौकरी ही होती है। नौकर की तरह ही रहना होगा। लेकिन हमने जो किताब छपवाई है वह नौकर बनकर नहीं छपवाई है। इससे कम या ज्यादा पैसा भी आ रहा है। कामेश्वर सिंह ने कहा कि कुछ हो जाएगा तब? कोई घटना घट जाएगी तब? अकारी के पास सटीक जवाब था- होगा तो होगा, किसी भी काम में कुछ हो सकता है। कामेश्वर सिंह चिढ़कर बोले- तुम चंदबरदाई नहीं हो न! अकारी कहां चुप रहने वाले थे,पलट कर जवाब दिया- एक चंदबरदाई हुए तो आप गिन रहे हैं, यहां इस धरती ने आदमी आदमी को चंदबरदाई बनाके पैदा किया है। कामेश्वर सिंह थोड़े सख्त हुए- इसका मतलब कि तुम किताब बेचना नहीं छोड़ोगे? तो इसका परिणाम तुम्हें पता चलेगा? अकारी- ठीक है हम जान-समझ लेंगे।

उसके दो चार दिन बाद ही जब आरा स्टेशन पर एक चाय की दूकान के पास लोगों की फरमाइश पर अकारी 'चंवरी कांड' पर लिखा अपना गीत सुना रहे थे, तभी कामेश्वर सिंह का भेजा हुआ एक बदमाश साइकिल से वहां पहुंचा। वह दारु पिए हुए था। आते ही बोला- भागो यहां से। अकारी बोले- क्या बात है भाई। बदमाश उन पर चढ़ बैठा- पूछता है कि क्या बात है? यहां से जाओ। अकारी ने शांति से काम लिया- हम ठहरने के लिए नहीं आए हैं, दो-चार मिनट में हम खुद ही चले जाएंगे। तब तक वह उनके बगल में आ गया। अकारी ने चौकी पर से उतर कर उससे पूछा कि यह रोड आपका है? उसने कहा- हां, है। अकारी बोले- नहीं, जितना आपका हक़ है, उतना ही हमारा भी हक़ है, उतना ही सबका है। इस पर उसने उन्हें धकेल दिया। वे पीछे रखी साइकिलों पर गिरे। इस बीच वह जनसंघ समर्थक एक गुमटी वाले से हंटर मांगने गया, उसने हंटर के बदले फरसा दे दिया। फरसा लेकर वह आया और सीधे अकारी पर वार कर दिया। अपना सर बचाने की कोशिश में उन्होंने अपने हाथ उठाए। इसी बीच उसी चौकी पर बैठा एक साधु अचानक उठा और उसने अपनी कुल्हाड़ी पर फरसे के वार को रोक लिया। तब तक दूसरे लोग भी बीच बचाव में आ गए। जनता ने कहा कि कवि जी आप यहां से हट जाइए, वह गुंडा है। इस पर अकारी गरम हो गए, बोले कि वह गुंडा नहीं है, यही उसका रोजगार है, जिसका खाया है उसकी ड्यूटी में आया है। खैर, गुंडा गुंडई कर रहा हो, इंसान बेइज्जत हो रहा हो, पब्लिक देख रही हो, तो गलती किसकी है? यह सुनना था कि लोग उसे पकड़ने के लिए उठ खड़े हुए। लोगों का मूड बदलता देख, वह साइकिल पर सवार होके वहां से भाग गया। अकारी उसके बाद लगातार एक माह तक वहां जाते रहे, ताकि उसे यह न लगे कि वे डर गए, लेकिन वह फिर उन्हें नजर नहीं आया।

अकारी जी ने बताया कि वे नक्सल आंदोलन के पक्ष में गीत लिखते थे, कार्यकर्ता उनको पहचानते थे, लेकिन उनसे अपना राज खोलना नहीं चाहते थे। एक कारण यह भी था कि वे लोकदल के एक स्थानीय नेता राम अवधेश सिंह के साथ थे। राम अवधेश सिंह के साथ होमगार्ड, दफादार-चैकीदार के आंदोलन में जेल भी गए। लेकिन बाद में लोकदल उन्होंने छोड़ दिया। हुआ यह कि सेमेरांव नामक एक गांव में लड़कों का एक मैच हो रहा था। अकारी जी वहां पहुंचे तो लड़कों ने किताब के लिए भीड़ लगा दी। वहीं एक पुलिस कैंप था। वहां से एक सिपाही आया और एक किताब मांगकर चलता बना। इन्होंने पैसा मांगा तो उसने कहा- आके ले जाओ। ये पुलिस कैंप में गए तो सिपाहियों ने कहा- एक और किताब दो। इन्होंने एक और किताब दे दी। उसके बाद उन सबों ने कहा- जाओ भागो। इन्होंने कहा- क्यों भाई, पइसा दीजिए या किताब लौटाइए। एक सिपाही ने कहा कि भागोगे कि करोगे बदमाशी। नहीं माने तो पुलिस ने मारकर इनका पैर तोड़ दिया। उस वक्त इनकी उम्र करीब 25-30 के आसपास थी। चूंकि राम अवधेश सिंह को चुनाव में जिताने के लिए इन्होंने बहुत काम किया था इसलिए उनको खबर भेजी ,लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। राम अवधेश सिंह का तर्क था कि इन्होंने बयान नहीं लिखवाया इसीलिए कुछ नहीं हुआ। अकारी जी का कवि अपनी जिद पर अड़ा रहा कि बयान क्या होता है, उस पर एक गीत लिखा था - 'टूटल टंगरी अकारी देखावे, ई तोड़ी निदर्दी आरक्षी कहावे', कहा वही बयान है। उसके बाद रामअवधेश सिंह ने कहा कि वे कर्पूरी ठाकुर से इस बारे में बात करेंगे। अकारी ने मना कर दिया कि कर्पूरी ठाकुर के पास उनके लिए वे न जाएं, वे खुद चले जाएंगे। खैर, कर्पूरी ठाकुर से जब मिले तो उन्होंने पूछा कि क्या हुआ कवि जी? कवि जी ने अपने ऊपर जुल्म की दास्तान कह सुनाई और उलाहना दे डाला कि आपकी सरकार में पुलिस ने पैर तोड़ दिया, केस नहीं हुआ तो क्या उसे कोई सजा नहीं होगी? आखिरकार कार्रवाई हुई और दो पुलिसकर्मी मुअत्तल हुए। लेकिन अकारी लोकदल में नहीं लौटे। रामअवधेश सिंह ने भी नौकरी का प्रलोभन भी दिया। लेकिन अब तो वे अपने गीतों के नायकों की राजनीतिक राह पर खुद ही चल पड़े थे।

लोकदल छोड़कर वे एक माह घर बैठे रहे। उसी दौरान भाकपा माले के कामरेडों ने उनसे संपर्क किया। इसके बारे में भी उन्होंने एक रोचक घटना सुनाई कि कामरेडों का आना-जाना मुखिया और सामंतों की निगाह से छुपा न रहा। मुखिया ने दलपति को समझाने भेजा कि यह खराब काम हो रहा है। दलपति से इन्होंने सवाल किया कि क्या खराब काम हो रहा है? उसने कहा- नक्सलाइट आ रहे हैं। अकारी बोले- तुम्हारे यहां कोई आता है कि नहीं? दलपति ने कहा- आते हैं, पर वे दूसरे आदमी होते हैं। अकारी कहां चुप रहने वाले थे, बोले- बताओ उनलोगों ने कौन सा खराब काम किया है, मुझे भी तो जरा पता चले? इसपर दलपति चीढ़कर बोला- तो भाई नहीं मानिएगा, तो हम गिरफ्तार करवा देंगे। अकारी ने चुनौती दे दी कि उसको गिरफ्तार कराना है, करा ले, लेकिन यह जान ले कि उसके साथ उन्हें भी जो करना होगा, कर देंगे। यह चेतावनी मुखिया तक पहुंची और मुखिया से थाना के दारोगा तक। दारोगा ने एक पट्टीदार से जमीन के एक मामले में एक केस करवा दिया और चैकीदार से इनको थाने पर बुलवाया। बाद में दारोगा खुद आया और उसने लोगों से कहा- हम इसको बुलाते हैं तो यह मुझे ही बुलाता है। अकारी निर्भीकता के साथ बोले- आपको जरूरत है तो आपको आना ही चाहिए। खैर, केस गलत था, सो थाने से ही मामला खत्म हो गया।

वैसे आंदोलनों में तो थाना, केस, जेल का चक्कर लगा ही रहता है। लेकिन 2009 में तो अकारी जी को 43 दिन बिना केस के जेल में रहना पड़ा। कारण यह था कि पुलिस गांव में किसी और को पकड़ने आई थीं। इनसे दरवाजा खोलवाने लगी। इन्होंने चोर-चोर का हल्ला मचा दिया। हल्ला से हुआ यह कि जिन लोगों को पकड़ने पुलिस आई थी वे भाग गए। उसके बाद गुस्से में पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। इन्हें समझ में नहीं आया कि किस केस में जेल में डाला गया है। कोई वारंट और बेलटूटी भी नहीं थी। आखिरकार 43 दिन बाद जज ने रिलीज भेजा। जेलर बेल बांड मांगने लगा। अकारी जी बोले- जब केस ही नहीं पता तो बेल कैसे फाइल करते। बाद में जज के रिलीज आर्डर पर इन्हें छोड़ा गया। हमने यहीं उनसे जेल जीवन की कठिनाइयों पर लिखे गए उनके लोकप्रिय गीत को सुनाने का आग्रह किया। उन्होंने सुनाया-

हितवा दाल रोटी प हमनी के भरमवले बा
आगे डेट बढ़वले बा ना।

जाने कब तक ले बिलमायी, हितवा देवे ना बिदाई
बिदा रोक रोक के नाहक में बुढ़ववले बा। आगे डेट...

बीते चाहता जवानी, हितवा एको बात ना मानी
बहुते कहे सुने से गेट प भेट करवले बा। आगे डेट...

बात करहु ना पाई देता तुरूते हटाई
माया मोह देखा के डहकवले बा। आगे डेट...

देवे नास्ता में गुड़ चना, जरल कच्चा रोटी खाना
बोरा टाट बिछाके धरती प सुतवले बा। आगे डेट...

गिनती बार बार मिलवावे, ओसहीं मच्छड़ से कटवावे
भोरे भरल बंद पैखाना प बैठवले बा। आगे डेट...

एको वस्त्रा ना देवे साबुन, कउनो बात के बा ना लागुन
नाई धोबी के बिना भूत के रूप बनवले बा। आगे डेट...

कवि दुर्गेंद्र अकारी, गइलें हितवा के दुआरी
हितवा बहुत दिन प महल माठा खिअइले बा। आगे डेट....

हमने उनसे पूछा कि इतने लंबे अरसे से वे जनता के लिए गीत लिखते रहे, अब उम्र के इस मुकाम पर क्या महसूस होता है? उन्होंने इसे लेकर फ़िक्र जाहिर की कि आंदोलन हुए, उससे लोग लाभान्वित भी हुए, संघर्ष किए, कुछ मिला। लेकिन फिर उन्हें परेशानी होने लगी। परेशानी से बचने के लिए लोग किसी तरह जीने-खाने की कोशिश करने लगे हैं। यही जीने का ढंग बनने लगा है। जो ठीक नहीं है। हमने कहा कि संघर्ष भी तो हमेशा एक गति से और एक तरीके से नहीं चलता। आज जनता का आंदोलन कैसे मजबूत होगा, संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले क्या करें? संस्कृति में तो ऊर्जा आंदोलन से ही मिलती है। आंदोलन जितना जनहित में होगा, उतनी संस्कृति भी जनहित में बढ़ेगी, क्रांतिकारी रूप में बढ़ेगी। हमने सवाल किया कि कवि भी तो कई बार आंदोलन को ऊर्जा देते हैं। जब आंदोलन में उभार न हो, उस वक्त कवि क्या करे, क्या आंदोलन का इंतजार करे? अकारी बोले- नहीं, कवि कभी-कभी माहौल को देखते हुए कुछ ऐसा निकालता है कि जिससे माहौल बदल जाता है।

हमने पूछा कि उनके राजनीतिक-सांस्कृतिक सफर में कौन से ऐसे साथी थे, जिनकी उन्हें बहुत याद आती है। इस पर उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। कहा कि जितने साथी लगे थे या आज भी लगे हैं सब अपनी ऊर्जा लेके लगे हैं, जिनसे जितना हुआ उसने जनता के लिए उतना काम किया और आज भी कर रहे हैं। हमने कहा कि सारी पार्टियां अपने को गरीबों का हितैषी कहती हैं, लेकिन गरीबों की ताकत को बांटने की साजिश में ही लगी रहती हैं। आज के दौर में गरीब के पक्ष में कोई राजनीति या संस्कृति किस तरह काम करे कि उसकी एकजुटता बढ़े। उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें तो यही समझ में आया कि सारी पार्टियां वर्ग की पार्टी होती हैं। वे अपने अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। गरीब के पक्ष में बोलने वाली बाकी पार्टी सिर्फ अपना मतलब साधने के लए गरीब का नाम लेती है। सिर्फ माले है जिसके लिए गरीब मतलब साधने की चीज नहीं, बल्कि गरीबों की पक्षधरता उसका सिद्धांत ही है। जबकि कांग्रेस सामंत-पूंजीपति की पार्टी है और भाजपा इस मामले में उससे भी आगे है, ज्यादा उद्दंड है।

उस वक्त बिहार में चुनाव हुए नहीं थे। हमने उनसे नीतीश के सरकार के बारे में पूछा और सड़कों की हालत में सुधार के दावे पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही। उन्होंने बड़ी दिलचस्प प्रतिक्रिया दी- गरीब आदमी के हित में सड़क थोड़े है। गरीब आदमी को कभी कभार कहीं जाना होता है, तो वह गाड़ी से जाए या पैदल जाए, उसके लिए बहुत फर्क तो पड़ता नहीं। हां, बड़ा-बड़ा पूंजीपति का कारोबार चले, इसके लिए तो सड़कें जरूरी हैं ही। बंटाईदारी के बारे में पूछने पर बोले कि यह भूमि सुधर से जुड़ा सवाल है। हमने कहा कि इसे लेकर बहुत कन्फ्यूजन फैलाया गया है, एकदम छोटे किसानों को भी शासकवर्गीय पार्टियां डरा रही हैं कि उनकी जमीन छीन जाएगी। हमने पूछा कि इस मुद्दे पर आंदोलन की कोई संभावना लगती है आपको? अकारी बोले कि भूमि सुधार तो तभी पूरी तरह से हो पाएगा, जब बिहार में वामपंथ का शासन आएगा। क्या यह संभव है? क्या जीवन का लंबा समय गरीबों की मुक्ति और गरीबों का राज कायम करने के संघर्षों में लगा देने के बाद उम्र के आखिरी दौर में कोई उम्मीद लगती है या निराश हैं कुछ- यह सवाल करने पर अकारी थोड़ी देर चुप रहे और बड़ी गंभीरता से बोले कि अभी दो-चार चुनाव और लगेगा। हमने फिर सवाल दागा कि क्या फिर लालू, रामविलास या नीतीश जैसे लोग नहीं आ जाएंगे? इस पर अकारी बोले- आएंगे, लेकिन विक्षोभ पैदा हो रहा है। इनमें कोई भी जनहित में काम करने वाला नहीं है, ये सब अंततः सामंत और पूंजीपति का हित ही साधेंगे।

वापस लौटते वक्त सुनील की बाइक का टायर पंक्चर हो गया था। सुनील टायर ठीक करवाने आगे बढ़ गए थे। झुलसाती धूप में मैं उस राह पर चल रहा था, अकारी जी के बारे में सोचते हुए। उन्होंने बताया कि उनकी किताबें खूब बिकती थीं। बनारस में एक रैली में 1800 की किताबें बिक जाने को वे अपने जीवन की किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह याद रखे हुए हैं। जहां पैसा और सुविधएं ही जीवन की श्रेष्ठता का पैमाना बनती जा रही हों, वहां इस 1800 की कीमत जो समझेगा, शायद वही इसके प्रतिरोध में नए जीवन मूल्य गढ़ पाएगा। हां, बेशक अकारी जी धरा के खिलाफ चलते रहे हैं, जब लालू चालीसा लिखा जा रहा था तो उन्होंने लालू चार सौ बीसा लिखा। प्रलोभनों को ठुकराया और लुटेरों और शोषकों को पहचानने में कभी नहीं चूके। गांव में विभिन्न जातियों के यहां चोरी की घटना पर ‘बताव काका कहवां के चोर घुस जाता’ से लेकर बोफोर्स घोटाले पर ‘चोर राजीव गांधी, घूसखोर राजीव गांधी’ जैसे गीत लिखे। जब छोटी रेलवे लाइन बंद हुई, तो उस पर बड़े प्यार से जो गीत उन्होंने लिखा- 'हमार छोटको देलू बड़ा दिकदारी तू' वह जनजीवन के प्रति गहरे लगाव का सूचक है। उनके गीत कहत ‘अकारी बिहार मजदूर पर, सहत बाड़ ए भइया कवना कसूर पर’ की गूंज तो देश के बाहर भी गई। अकारी जी हमारे बीच हैं, यह बड़ी बात है। उनके गीतों में भोजपुरी के कई दुलर्भ शब्द हैं और इंकलाब के प्रति एक धैर्य भरी उम्मीद है। उनके गीतों में जो लड़ने की जिद है, चाहे जान जाए, पर चोर को साध् कहने और साध् को चोर कहने वाली इस व्यवस्था को बदल देने का जो उनका संकल्प है, उसे सलाम!



(सुधीर सुमन, युवा आलोचक, कथा आलोचना में गहरी दिलचस्पी, समकालीन जनमत के सम्पादक मंडल में, फिलहाल में दिल्ली में रहते हैं.)

11/2/12

जसम का 13 वां राष्ट्रीय सम्मेलन गोरखपुर में

साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट है सम्मेलन का विषय 
कवि सम्मेलन और फिल्म प्रदर्शन का आयोजन


नई दिल्ली, 2 अक्टूबर 2012 

जन संस्कृति मंच का 13 वां राष्ट्रीय सम्मेलन 3 और 4 नवम्बर को सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि भवन में होगा। सम्मेलन में ‘साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट’ पर गहन विचार-विमर्श होगा और अगले दो वर्ष के लिए संगठन की नई कार्यकारिणी व राष्ट्रीय परिषद का गठन होगा। सम्मेलन का उद्घाटन प्रो रविभूषण करेंगे।

सम्मेलन की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, जिसका उद्घाटन करने के लिए प्रसिद्ध आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय आज गोरखपुर के लिए रवाना हो रहे हैं। सम्मेलन का उद्घाटन 3 अक्टूबर को अपराह्न 4 बजे होगा। सम्मेलन में एक दर्जन से अधिक राज्यों के 300 प्रतिनिधि भाग लेंगे। दिल्ली से जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के नौजवान साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के अतिरिक्त प्रो. राजेंद्र कुमार, प्रो. रविभूषण, कवि मंगलेश डबराल, मदन कश्यप, चित्रकार अशोक भौमिक, कवि रंजीत वर्मा, युवा आलोचक आशुतोष कुमार, गोपाल प्रधान, अवधेश, रंगकर्मी कपिल शर्मा, छायाकार विजय समेत जसम के तमाम राष्ट्रीय पार्षद तथा संगवारी नाट्य गु्रप के सदस्य आज गोरखपुर के लिए प्रस्थान कर रहे हैं। जसम के इस सम्मेलन में कविता, कहानी, नाटक, चित्रकला और फिल्म आदि विधाओं में सक्रिय समूहों के निर्माण की योजना को भी ठोस आकार मिलेगा। हिंदी-उर्दू के बीच के रिश्ते तथा लोकभाषाओं और लोककलाओं के लेकर भी जन संस्कृति मंच की जो योजनाएं हैं, उन पर भी विचार विमर्श होगा।
  
सम्मेलन में जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ‘साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट’ पर पर्चा प्रस्तुत करेंगे। उद्घाटन सत्र के बाद शाम छह बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारम्भ होंगे जिसमें गोरखपुर की संस्था अलख कला मंच, पटना की हिरावल, बलिया की संकल्प द्वारा जनगीत व भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति की जाएगी। झारखण्ड की जन संस्कृति मंच की इकाई द्वारा झारखण्डी नृत्य व गीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाएगा। शाम सात बजे से कवि सम्मेलन होगा जिसमें विभिन्न स्थानों से आए कवियों, कवयित्रियों के अलावा स्थानीय कवि व शायर अपनी रचनाओं का पाठ करेंगे। 

सम्मेलन के दूसरे दिन सुबह दस बजे से चार बजे तक सांगठनिक सत्र चलेगा। इसमें महासचिव द्वारा प्रस्तुत किए गए पर्चे पर विचार-विमर्श होगा। इसके अलावा जसम के पिछले दो वर्षों के गतिविधियों की रिपोर्ट रखी जाएगी और उस पर चर्चा होगी। इसके बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी व राष्ट्रीय परिषद का चुनाव होेगा। शाम पांच बजे से फिल्म शो का आयोजन किया गया है। इसमें गोरखपुर-महराजगंज जिले के जंगलों में रहने वाले वनटांगिया लोगों के संघर्ष पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘बिटवीन द ट्रीज’ का प्रदर्शन होगा। इस मौके पर इस डाक्यूमेंटरी के निर्माता आशीष कुमार सिंह भी उपस्थित रहेंगे। इसके बाद प्रसिद्ध फिल्मकार आनंद पटवर्धन की बहुचर्चित फिल्म ‘जय भीम कामरेड’ दिखाई जाएगी। हिंदी सिनेमा के 100 साल तथा जिन कवियों की जन्मशताब्दी है, उनकी कविताओं पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी भी सम्मेलन का आकर्षण होगी। सम्मेलन स्थल पर पुस्तकों का स्टाल भी होगा।


सुधीर सुमन
राष्ट्रीय कार्यकारिणी, 
जन संस्कृति मंच की ओर से

11/1/12

भानु भारती का तुगलक़: नाटक के पीछे का नाटक


बिल्कुल इरादा नहीं था दिल्ली सरकार द्वारा सवा तीन करोड़ की खैरात से तैयार किए गए तुगलक नाटक की भव्य प्रस्तुति देखने का। आधी रात में दिल्ली लौटा था। दिन में आफिस में कई अधूरे काम निबटा रहा था, तभी एक लेखक मित्र का फोन आया- ‘चले जाओ तुगलक देखने, मेरे पास एक टिकट है, कुछ जरूरी काम है जिसके कारण मैं नहीं जा रहा हूं।’ तो अपन भी गए तुगलक देखने। गेट पर ही टिकट रख लिया गया कि किसने टिकट जारी किया है, जरा चेक करना है। खैर, मेहरबानी उनकी कि मुझे ससम्मान अंदर जाने दिया। अंदर जिस तरह के दर्शक वर्ग से टकराया, उन्हें देखकर यही लगा कि इन्हें कंटेंट से कम मतलब है, भव्य तमाशे का इन्हें ज्यादा इंतजार है। बगल में बैठे एक बुजुर्ग दर्शक ने दिलचस्पी से ब्रोशर में मुझे झांकते देख, उसे मुझे दे दिया। काफी कीमती और चमकदार ब्रोशर है, जिसमें दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का संदेश छपा है कि कामनवेल्थ की आशातीत सफलता के बाद चारों ओर से यह मांग थी कि दिल्ली के नागरिकों और आगंतुकों-अतिथियों के लिए दिल्ली उत्सव की परिकल्पना को जारी रखा जाए। 

मेरे सामने मुख्यतः तीन हिस्से में बंटा भव्य रंगमंच था, जिसे देखकर 1989 में आरा में मंचित 20 दिनों में तैयार और इससे कई-कई गुना कम लागत से तैयार नाटक ‘कामरेड का कोट’ का याद हो आई। बेशक ‘कामरेड का कोट’ की प्रस्तुति में इतनी लाइटें, कास्ट्यूम और साउंड सिस्टम का इस्तेमाल संभव न था। जितना धन दिल्ली सरकार ने एक नाटक के लिए दिया है, उतने में हमारी टीमें कई साल तक नाटक कर सकती हैं। खैर, इतने पैसे में भानु भारती ने जो चमत्कार दिखाया, मुझे नहीं लगता कि चमत्कार देखने गए लोग अगर किसी और के निर्देशन में भी इसे देखते तो उन्हें निराशा होती। बहुत सारे नौजवान निर्देशक हैं, जो कुछ ज्यादा ही चमत्कार दिखा सकते थे। 

निर्देशक ने जिसे ‘अतीत की वर्तमानता’ कहा है, अगर उसे इस तरीके से समझें कि तुगलक के सारे घोषित आदर्श और उसकी क्रूरताएं- दोनों राजसत्ता की रक्षा के लिए हैं, तो क्या आज के तुगलकों की भी इसमें तस्वीर नहीं है? मुझे तो इसमें हमारे देश के भविष्य का भी एक सुल्तान तुगलक बार-बार प्रतिबिंबित होता नजर आ रहा था। खैर, मेरे लिए अहम सवाल यह है कि जो वर्तमान के तुगलक हैं, वे ‘तुगलक’ के मंचन के लिए सवा तीन करोड़ रुपये देने की मेहरबानी क्यों कर रहे हैं? इतना ही नहीं, आरटीआई की जरिए इस पूरी प्रक्रिया की बारे में जानकारी की मांग करने वाले मेरे एक रंगकर्मी मित्र ने बताया कि इस सवा तीन करोड़ के अतिरिक्त प्रचार और बाहर से आने वाले कुछ दूसरे कलाकारों पर भी काफी धन खर्च किया गया है। यह सब तब है, जब कि इस देश में अब छोटे से छोटे कस्बे में एक नाटक मंचित कर पाना कलाकारों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। हाल और तमाम संसाधनों की कीमत बढ़ गई है। बेशक नाटक में एकाध जगह पर निर्देशक ने कलाकार के प्रतिरोध के लिए भी जगह निकाली है, बल्कि इसे उनकी अपनी पोजिशन का जस्टिफिकेशन भी कहा जा सकता है, इसके उपयुक्त पात्र अजीज धोबी हैं, जो धन और सत्ता को हासिल करने के लिए तरह-तरह का वेश बनाते हैं, डकैती और कत्ल भी करते हैं। उनके मुंह से यह सुनकर दर्शक तालियां भी बजाते हैं कि ‘खुल्लम खुल्ला लूट करो और लोग कहें कि हुकूमत है।’ 

क्या हम तुगलकों के प्रति संवेदनशील हो जाएं कि वे तो आदर्श राज्य ही कायम करना चाहते हैं, पर राजसत्ता की मजबूरियां उन्हें क्रूर या आज के संदर्भ में कहें कि भ्रष्ट बनाती हैं? क्या तुगलक जिस तरह अपने विरोधियों को सत्ता में हिस्सेदार बनाकर या उन्हें मारने के बाद उन्हें शहीद बनाकर जिस तरह अपनी छवि बनाने की कोशिश करता है, तुगलक का मंचन भी उसी तरह की एक कोशिश का परिणाम नहीं है? कहिए खुल्लम खुल्ला लूट करने वालों को हुकूमत, यही हुकूमत तो यह कहने के लिए अवसर दे रही है। ‘उत्सव की बेला है यह!’- मेरे शब्द नहीं हैं ये, शीला दीक्षित के संदेश की आखिरी पंक्ति हैं यह।


फिरोजशाह कोटला मैदान से बाहर निकलते ही यहां से हजार मील दूर बैठे एक रंगकर्मी से बातचीत होती है, जो जनता के लिए नाटक कैसे किया जाए, कैसे एक ऐसी रिपेटरी बने, जो सरकारी खैरातों के बल पर चलने को विवश न हो, इसके बारे में सोच रहे हैं। बस से जिस चौराहे पर उतरता हूं, वहां एक बच्चा और मजदूर से दिखने वाले दंपत्ति अचानक मेरे करीब याचक की मुद्रा में आ खड़े होते हैं। पुरुष बताता है कि पुणे से आया है, आनंदविहार के किसी ठेकदार ने बुलाया था, पर वह मिला ही नहीं, धोखा दे दिया, खाने के लिए पैसे नहीं हैं, मुझे लग रहा है कि यह जाल भी हो सकता है, पर उन्हें पैसे दे देता हूं। कहां सवा तीन करोड़ कहां सौ रुपये! कमरे में पहुंचता हूं, किसी टीवी चैनल से आवाज आ रही है, देश के सबसे बड़े बैंक ने फिर से आर्थिक स्थिति खराब होने को लेकर चिंता जाहिर की है। 

क्या तुगलक सिर्फ एक नाटक है, क्या तुगलकों की कोई कमी है, क्या अपनी अपनी दिल्ली से दौलताबादों की ओर आज भी जनता को नहीं हांका जा रहा है?









(सुधीर सुमन, युवा आलोचक, संपादक समकालीन जनमत)

10/26/12

कुबेर दत्त स्मृति समारोह की रपट


 कुबेर दत्त मीडियाकर्मी और लेखक की भूमिकाओं को  अलग-अलग नहीं मानते थे   


गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में 20 अक्टूबर को कवि, चित्रकार और दूरदर्शन के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की याद में जन संस्कृति मंच की ओर से एक आयोजन किया गया। पिछले साल 2 अक्टूबर को कुबेर दत्त का आकस्मिक निधन हो गया था। काल काल आपात, कविता की रंगशाला, केरल प्रवास, धरती ने कहा फिर..., अंतिम शीर्षक उनके प्रकाशित कविता संग्रह हैं। जीवन के आखिरी दस वर्षों में उन्होंने अनेक पेंटिंग भी बनाए, जिनमें से कई पत्रिकाओं और किताबों के कवर पर भी छपीं। कुबेर दत्त ने दूरदर्शन के माध्यम से आम अवाम को न केवल अपने देश के श्रेष्ठ जनपक्षीय साहित्य और कलात्मक सृजन से अवगत कराया, बल्कि दुनिया के महान साहित्यकारों और कलाकारों से भी परिचित कराया।

आयोजन की शुरुआत कुबेर जी की जीवनसाथी कमलिनी दत्त द्वारा उनके   जीवन और रचनाकर्म पर केंद्रित वीडियो की प्रस्तुति से हुई। कुबेर दत्त और कमलिनी दत्त की जोड़ी साहित्य, कला और प्रसारण की दुनिया की मशहूर जोड़ी रही है। कुबेर दत्त ने तो कमलिनी जी के बारे में कई जगह लिखा है, पर कमलिनी जी ने पहली बार इस आयोजन में कुबेर जी के बारे में अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि कुबेर के बारे में बोलना मेरे लिए सबसे ज्यादा मुश्किल है, उतना ही जितना एक तूफान को मुट्ठी में बंद करना। कुबेर मेरे लिए क्या थे, मैं क्या बताऊं, जीवनसाथी, अंतरंग सखा, आपत् स्तंभ, एक सच्चा कामरेड! कुबेर मितभाषी थे- रूपवान थे- लेकिन जिस गुण ने मुझे प्रभावित किया वह था उनका जीवन और सृष्टि के प्रति समरसता का बोध। जीवन और जीव में फरक न करना, इनसान चाहे परिचित हो, अपरिचित हो, चपरासी हो, पानवाला, चायवाला, कार्यालय के साथी, कलाकार, साहित्यकर्मी, सबसे एक जैसा मधुर व्यवहार। अपने उच्चाधिकारी के प्रति सम्मान रखते हुए भी सीधा स्पष्ट दो टूक व्यवहार उन्हें कभी-कभी अप्रिय भी बनाता था। कार्यक्षेत्र में सामंतवाद किस कदर व्याप्त है आप सब जानते हैं। मैं  अपने शुरू के कार्यकाल में अत्यंत भीरु थी। कुबेर ने धीरे-धीरे मुझे निडर बनाया। मेरी नववर्ष की डायरी में लिखा- संघर्ष ही जीवन है, विवशताओं से घबराना कायरता है। यह मेरे जीवन का सूत्र वाक्य बन गया। कुबेर की विचारधारा के प्रति निष्ठा उनके सभी कार्यकलापों का दिशानिर्देश करती थी। वे इस हद तक निडर थे जिस हद तक किसी सरकारी कर्मचारी के लिए होना संभव नहीं था। आपातकाल के दौरान सरकारी नीतियों के विरुद्ध अपने कार्यक्रमों में लिखते थे और स्वयं बोलते भी थे। वरवर राव, गदर जैसे क्रांतिकारियों के साथ बातचीत प्रसारित करने से भी कुबेर डरे नहीं। वे इस संबंध में स्पष्ट विचार रखते थे कि कार्यक्रम दर्शकों के लिए बनता है, सरकार या अधिकारियों के लिए नहीं। 

कमलिनी दत्त द्वारा प्रस्तुत वीडियो में अपने गांव से कुबेर दत्त का लगाव, उनका बिल्ली प्रेम, उनके जीवन के कई दुर्लभ फोटोग्राफ्स और प्रेमचंद, महादेवी, किशोरीदास वाजपेयी पर बनाए गए कार्यक्रमों के अंश दर्शकों को देखने को मिले। कुबेर दत्त चित्र बनाते और कविताएं पढ़ते हुए भी नजर आए। 

जन संस्कृति मंच ने कुबेर दत्त के निधन के बाद आयोजित शोकसभा में उनकी स्मृति में हर साल साहित्य, संस्कृति और मीडिया से संबंधित विषय पर व्याख्यान आयोजित करने का निर्णय लिया था। इसी सिलसिले में साहित्य और जनमाध्यमविषय पर प्रथम कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि आज मीडिया का भूमंडलीकरण हो गया है, इसने अमेरिकीकरण को अच्छा मान लिया है। आज जैसा बड़ा मध्यवर्ग भारत में पहले कभी नहीं था। पश्चिम को संबोधित इस मध्यवर्ग का अपने समाज से कोई संबंध नहीं रह गया है। आज सूचनाओं की बमबारी ज्यादा हो रही है, संवाद कम हो रहा है। दैनिक अखबार भी उत्पाद में बदल गए हैं और टीवी की नकल कर रहे हैं। टीवी का मूल स्वभाव मनोरंजन हो गया है। राजनीति भी यहां मनोरंजन बन जाती है। मीडिया ने उपभोक्तावाद के आगे समर्पण कर दिया है। अब गरीबी हटाओ की जगह अमीरी बढ़ाओ उसका नया नारा हो गया है। मंगलेश डबराल ने कहा कि अभी भी भारतीय साहित्य का लेखक ज्यादातर निम्नमध्यवर्ग से आता है, उसकी टीवी चैनल में मौजूदगी नहीं है, अखबार में अब साहित्य हाशिए पर है। भावपूर्ण भाषा और विचारों की जगह विज्ञापनों की भाषा का जोर है। जिस तरह दिनमान जैसी पत्रिकाओं ने अच्छी फिल्म, कला और साहित्य के संस्कार दिए, आज वैसा नहीं है। भूमंडलीकरण से साहित्य और पत्रकारिता के बीच दूरी बढ़ी है। आज मास मीडिया क्षणिक शोहरत का एक उद्योग बन चुका है। ऐसे में सिर्फ साहित्य को समर्पित कोई चैनल हो, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। कुबेर दत्त द्वारा दूरदर्शन में साहित्य को लेकर किए गए काम को उन्होंने बेमिसाल बताया।

आयोजन के तीसरे खंड में कुबेर की दुनियापर बोलते हुए प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हिंदी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हमें कुबेर दत्त और कमलिनी दत्त दोनों की कला साधना पर विचार करना चाहिए। उनके जीवन के संकटों और संघर्षों पर भी ध्यान देना चाहिए। संस्कृति की दुनिया में ऐसा कोई दूसरा दंपत्ति दिखाई नहीं देता। कुबेर केवल चमचमाते हुए स्टार राइटरों के ही आत्मीय नहीं थे, बल्कि त्रिलोकपुरी और सादतपुर के साहित्यकारों से भी उनके गहरे आत्मीय संपर्क थे। कुबेर ने अपने काम के जरिए यह दिखाया कि एक प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी के लिए काम करने का स्पेस हर जगह है। 

जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि कुबेर दत्त दूरदर्शन मेे केवल वेतनभोगी कर्मचारी की तरह काम नहीं कर रहे थे। दूरदर्शन को उन्होंने जनवादी विचार और साहित्य-संस्कृति का माध्यम बनाया। केदारनाथ अग्रवाल की कविता पंक्तियों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मैंने उसको जब-जब देखा, गोली जैसा चलता देखा। उन्होंने खास तौर पर दो प्रसंगों को याद किया, कि किस तरह जब उन्होंने एक सभा में यह कहा कि लेखक जनता की आजादी के लिए लड़ता है, लेखक अगर किसानों की स्वतंत्रता के लिए नहीं लड़ता तो वह लेखक नहीं, तो भाषण के बाद कुबेर ने उन्हें गले से लगा लिया। इसी तरह जनाधिकार पर लिखी गईं कविताओं के एक कार्यक्रम में इमरजेंसी और इंदिरा गांधी के खिलाफ जो भी उन्होंने बोला, कुबेर ने उन्हें ज्यों का त्यों प्रसारित किया। उन्होंने कहा कि कुबेर कई कला विधाओं के संगम भी थे। 

अपने पिता को अत्यंत मर्मस्पर्शी ढंग से याद करते हुए युवा नृत्यांगना पुरवा धनश्री ने कहा कि उन्होंने सिखाया कि हर इंसान चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, प्रांत, भाषा, संस्कृति से हो, यूनिक है और इंसानियत, प्यार, श्रद्धा सबसे बड़ा धर्म है। बाकी अन्य पिताओं की तरह वे नार्मलपिता नहीं थे। उन्होंने अपनी कला के जरिए ही अपनी बेटी से ज्यादा संपर्क किया। यही उनका तरीका था। मैं उनका हाथ पकड़ना चाहती थी, उनके कंधे पर सर रखना चाहती थी, पर इसका स्पेस मुझे कम मिला। अक्सर मैंने उन्हें रातों में रोते हुए देखा। वे कहते थे कि मैं बुरा आदमी नहीं हूं, मुझे समझो। शायद उनके घाव मेरे घावों से ज्यादा गहरे थे। हर शाम वे घर आकर चंद लम्हें हमारे संग बांटते और फिर अपने कविखाने में चले जाते। फिर थोड़ी देर बाद अपनी कृति सुनाते या कोई चित्र दिखाते। उन शब्दों में मैं अपने पिता को ढूंढती और थक जाती ढूंढते-ढूंढते। पर आज मैं उन्हें महसूस करती हूं खुद में। 

अलाव पत्रिका के संपादक कवि राम कुमार कृषक ने कहा कि कुबेर दत्त का काम बहुआयामी है। वे प्रगतिशील जनवादी मूल्यों के समर्थक थे। कबीर से लेकर भगतसिंह तक भारतीयता की जो परंपरा बनती है, वे खुद को उससे जोड़ते थे। उपेक्षित और अभावग्रस्त लोगों की तकलीफों को लेकर वे बेहद संवेदित रहते थे। वे एक बड़े और जरूरी इंसान थे। 

कवि मदन कश्यप ने कहा कि कुबेर की दुनिया एक बड़ी दुनिया थी, वह एक साथ सृजन, विचार और प्रसारण की दुनिया थी। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह प्रतिरोध की दुनिया थी। सिर्फ अपनी ही नहीं, बल्कि सामूहिक सृजनात्मकता और विचार के लिए उन्होंने कैरियर को हमेशा दांव पर रखा। उनकी चिंताएं बड़ी थीं। एक वक्त में जब जनप्रतिरोध के विरुद्ध लोग एकताबद्ध हो रहे थे, तब कुबेर दत्त उन थोड़े लोगों में थे, जिन्होंने शासकवर्ग की अनुकूल धारा में बहने से इनकार किया, सरकारी माध्यम में रहते हुए भी प्रतिरोध की परंपरा के साथ खड़े रहे। मदन कश्यप ने जोर देकर कहा कि बहुत सारे ऐसे कवि लेखक हैं, जो कुबेर जी के कारण ही दूरदर्शन पर आ पाए, उनके वहां से जाने के बाद वे कभी नहीं बुलाए गए और भविष्य में भी उन्हें बुलाए जाने की कोई गारंटी नहीं है। 


चित्रकार हरिपाल त्यागी ने उनसे अपने लंबे जुड़ाव का जिक्र करते हुए कहा कि किसी को याद करना दरअसल उसे दुबारा खोजना होता है। जिस उम्र में लोग चित्रकला बंद कर देते हैं, उस उम्र में कुबेर ने चित्रकला शुरू किया। उन्होंने कहा कि कुबेर शहराती कभी नहीं बन पाए, गांव को वे कभी नहीं भूले, शायद यह भी एक कारण था जो उन्हें सादतपुर के साहित्यकारों से जोड़ता था। हरिपाल त्यागी ने यह भी बताया कि उन्हें राजनैतिक गतिविधियों के सिलसिले मंे कुबेर के गांव जाने का भी अवसर मिला था। 

कवि चंद्रभूषण ने नौजवानों से सहजता के साथ घुल जाने वाले उनके स्वभाव को याद करते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व तरल पारे की तरह था। उनको पकड़ना आसान नहीं है। वे नौजवानों की तरह निश्छल और निष्कवच थे। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है, जैसे कोई बहुत ही गहरी बात है, जिसे वे कहना चाहते हैं। उन्हीं की कविता के हवाले से कहा जाए तो भारत का जो जनसमुद्र है, उसकी सांस हैं उनकी कविताएं, जो उसकी तकलीफ को झेलते हुए लिखी गई हैं। 

कवि श्याम सुशील ने कहा कि कुबेर दत्त मीडियाकर्मी और लेखक की भूमिकाओं को अलग-अलग नहीं मानते थे। दोनों ही भूमिकाओं में उन्हें सृजन का आनंद मिलता था। उन्होंने हजारों चित्र बनाए और कविताएं लिखीं, जो कुछ सामने रहा, उसी पर चित्र बना डाला या कविताएं लिख दी। एक कागज के टुकड़े पर लिखी गई एक छोटी सी कविता को उन्होंने सुनाया-

पत्थर पत्थर मेरा
दिल है
पानी पानी तेरा दिल
पानी-पत्थर
जैसे मिलते
ऐसे ही तू मुझसे मिल।

श्याम सुशील ने कहा कि इस तरह की तमन्ना रखने वाले निश्छल हृदय कुबेर जी की कविताओं को पढ़ना, उनकी पेंटिंग और अन्य रचनाओं के बारे में सोचना या चर्चा करना उन्हें अपने आसपास महसूस करने जैसा है- इसलिए वे आज भी हमारे साथ हैं और अपनी रचनाओं के माध्यम से हमेशा रहेंगे। श्याम सुशील ने रमेश आजाद द्वारा कुबेर दत्त पर लिखित कविता- कुबेर दत्त की रंगशाला सेका पाठ भी किया। 

कुबेर दत्त के छोटे भाई सोमदत्त शर्मा ने उन पर केंद्रित अपनी कविता के जरिए उन्हें बड़े भावविह्वल अंदाज में याद किया। 

आयोजन के संचालक सुधीर सुमन ने कहा कि कुबेर स्मृति व्याख्यान का सिलसिला हर वर्ष जारी रहेगा। कुबेर दत्त हमारे लिए इस बात की मिसाल हैं कि जनपक्षधर होने की लड़ाई हर स्तर से लड़ी जानी चाहिए। वे अंधेरे के भीतर जिस रोशनी की आहट सुनने की बात करते थे, उन आहटों को सुनना, उन्हें अपनी रचनाओं में दर्ज करना और बेहिचक दमनकारी शासक संस्कृति व राजनीति के खिलाफ खड़ा होना आज भी बेहद जरूरी है। आज हत्याएं बहुत अनदेखे और अदृश्य तरीके से भी हो रही हैं, पर जैसा कि कुबेर जी ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में एक कविता में लिखा था- ....मेरे दिमाग में सुरक्षित विचारों ने मुझे मरने नहीं दिया था/ हत्यारा मेरे विचारों को नहीं मार पाया था, तो उन विचारों को मजबूत बनाने का संघर्ष और उसके प्रति यकीन बनाए रखना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनकी अप्रकाशित कविताओं और उनके रचनाकर्म के मूल्यांकन और उनसे संबंधित संस्मरणों पर आधारित पुस्तकों के प्रकाशन की भी योजना है, जिनके लिए लेख और टिप्पणियां   kamalinidutt@yahoo.com  पर भेजी जा सकती हैं।
सभागार में कुबेर दत्त की कविता और पेंटिंग से बनाए गए पोस्टर भी लगाए गए थे। ग्राफिक डिजाइनर रामनिवास द्वारा डिजाइन किए गए ये पोस्टर कुबेर दत्त की खूबसूरत लिखावट, कविता में मौजूद वैचारिक फिक्र और प्रभावपूर्ण चित्रकारी की बानगी थे।
प्रो. चमनलाल, रेखा अवस्थी, बलदेव वंशी, अशोक भौमिक, अचला शर्मा, प्रणय कृष्ण, आशुतोष, रंजीत वर्मा, शैलेंद्र चैहान, भगवानदास मोरवाल, सतीश सागर, भूपेन, रोहित जोशी, रमेश आजाद, कुमार मुकुल, स्वतंत्र मिश्र, प्रभात कुमार, मीरा जी, अवधेश, क्वीनी ठाकुर, पुरुषोत्तम नारायण सिंह, ब्रजमोहन शर्मा, गोपाल गुप्ता, रामनरेश राम, अशोक प्रियदर्शी, मार्तण्ड, कमला श्रीनिवासन, वासुदेवन अयंगार, रोहित कौशिक, सुरुचि, रविप्रकाश, सौरभ, दिनेश और नीरज आदि कई साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, मीडियाकर्मी, राजनैतिक कार्यकर्ता और छात्र इस आयोजन में मौजूद थे।




                                                                        
   
-श्याम सुशील
ए-13, दैनिक जनयुग अपार्टमेंट्स,
वसुंधरा एनक्लेव, दिल्ली- 110096