3/31/13

कॉ. चंद्रशेखर : प्रतिलिपियों से भरी दुनिया में मौलिक होने की जिद


आज कॉ. चंद्रशेखर का शहादत दिवस है। 31 मार्च 1997 को सिवान में आरजेडी सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के गुंडो ने चंद्रशेखर और उनके एक साथी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। चंद्रशेखर की हत्या ने कई सवाल खड़े किए। हत्या के बाद दलालों ने उस राजनीति को भी भावनात्मक स्तर पर तोड़ने की कोशिश की जिसे चंद्रशेखर जनता के बीच ले जाते हुए शहीद हो गए। पेश है चंद्रशेखऱ पर प्रणय कृष्ण का लेख जो चंदू को समझने के लिहाज से बेहद प्रासंगिक है।

प्रतिलिपियों से भरी इस दुनिया में चंदू मौलिक होने की जिद के साथ अड़े रहे। प्रथमा कहती थी, ” वह रेयर आदमी हैं।” 91-92 में जेएनयू में हमारी तिकड़ी बन गई थी। राजनीति, कविता, संगीत, आवेग और रहन-सहन- सभी में हम एक से थे। हमारा नारा था,” पोयट्री, पैशन एंड पालिटिक्स”। चंदू इस नारे के सबसे ज्यादा करीब थे। समय, परिस्थिति और मौत ने हम तीनों को अलग-अलग ठिकाने लगाया, लेकिन तब तक हम एक-दूसरे के भीतर जीने लगे थे। चंदू कुछ इस तरह जिये कि हमारी कसौटी बनते चले गये। बहुत कुछ स्वाभिमान, ईमान, हिम्मत और मौलिकता और कल्पना- जिसे हम जिंदगी की राह में खोते जाते हैं, चंदू उन सारी खोई चीजों को हमें वापस दिलाते रहे।

इलाहाबाद, फ़रवरी 1997 की एक सुबह। कॉलबेल सुनकर दरवाजा खोला तो देखा कि चंदू सामने खड़े हैं। वही चौकाने वाली हरकत। बिना बताये चले जाना और बिना बताये, सूचना दिये अचानक सामने खड़े हो जाना। शहीद हो जाने के बाद भी चंदू ने अपनी आदत छोड़ी नहीं है। चंदू हर रोज हमारी चेतना के थकने का इंतजार करते हैं और अवचेतन में खिड़की से दाखिल हो जाते हैं। हमारा अवचेतन जाने कितने लोगों की मौत हमें बारी-बारी दिखाता है और चंदू को जिंदा रखता है। चेतना का दबाव है कि चंदू अब नहीं हैं, अवचेतन नहीं मानता और दूसरों की मौत से उसकी क्षतिपूर्ति कर देता है। यह सपना है या यथार्थ पता नहीं चलता, जब तक कि चेतन-अवचेतन की इस लड़ाई में नींद की दीवार भरभराकर गिर नहीं जाती।

हमारी तिकड़ी में राजनीति, कविता और प्रेम के सबसे कठिनतम समयों में अनेक समयों पर अनेक परीक्षाओं में से गुजरते हुये अपनी अस्मिता पाई थी, चंदू जिसमें सबसे पवित्र लेकिन सबसे निष्कवच होकर निकले थे।
चंदू का व्यक्तित्व गहरी पीड़ा और आंतरिक ओज से बना था जिसमें एक नायकत्व था। उनकी सबसे गहरी पहचान दो तरह के लोग ही कर सकते थे- एक वे जो राजनीतिक अंतर्दृष्टि रखते हैं और दूसरे वह स्त्री जो उन्हें प्यार कर सकती थी।

खूबसूरत तो वे थे ही, लेकिन आंखे सबसे ज्यादा संवाद करती थीं। जिस तरह कोई शिशु किसी रंगीन वस्तु को देखता है और उसकी चेतना की सारी तहों में वह रंग घुलता चला जाता है, चंदू उसी तरह किसी व्यक्तित्व को अपने भीतर तक आने देते थे, इतना कि वह उसमें कैद हो जाये। कहते हैं कि मौत के बाद भी वे खूबसूरत आंखें खुली थीं। वे सोते भी थे तो आंखें आधी-खुली रहती थीं जिनमें जिंदगी की प्यास चमकती थी। फ़िल्में देखते थे तो लंबे समय तक उसमें डूबकर बातें करके रहते, उपन्यास पढ़ते तो कई दिनों तक उसकी चर्चा करते।

जिस दिन उन्होंने जेएनयू छोड़ा, उसी दिन आंध्रप्रदेश के टी. श्रीनिवास राव ने मुझे एक पत्र में लिखा,” आज चंद्रशेखर भी चले गये। कैंपस में मैं नितांत अकेला पड़ गया हूं।” श्रीनिवास राव एक दलित भूमिहीन परिवार से आते हैं। चंद्रशेखर के नेतृत्व में हमने उनके संदर्भ में एकेडमिक काउंसिल में एक ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। राव का एम.ए. में 55 प्रतिशत अंक नहीं आ पाया था जबकि एम.फिल., पी.एच.डी. में उनका रिकार्ड शानदार था। उनका कहना था कि पारिवारिक परिवेश के चलते एम.ए. में 55 प्रतिशत अंक नहीं पा सके जो यूजीसी की परीक्षा और प्राध्यापन के लिये आवश्यक शर्त है अत: पीएचडी में होते हुये भी उन्हें एम.ए. का कोर्स फिर से करने दिया जाए।

नियमों से छूट देते हुये और प्रशासन की तमाम हठधर्मिता के बावजूद यह लडा़ई हम जीत गये। मुझे याद है कि जब बिहार की स्थिति के मद्देनजर जे.एन.यू. की प्रवेश परीक्षा के केंद्र को बिहार से हटा देने का मुद्दा एकेडमिक कौंसिल में आया तो वे फ़ट पड़े और मजबूरन यह प्रस्ताव प्रशासन को वापस लेना पड़ा। निजीकरण के खिलाफ़ जे.एन.यू के कैंपस में तबका सबसे बड़ा और जीत हासिल करने वाला आंदोलन उनके नेतृत्व में छेड़ा गया। यह पूरे मुल्क में शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ़ पहला बड़ा और सफ़ल आंदोलन था। शासक वर्गों की चाल थी कि यदि जे.एन.यू का निजीकरण कर दिया जाये तो उसे मॉडल के रूप में पेश करके पूरे भारत के सभी विश्वविद्यालयों का निजीकरण कर दिया जाये। चंद्र्शेखर छात्रसंघ में अकेले पड़ गये थे। तमाम तरह की शाक्तियां इस आसन्न आंदोलन को रोकने के लिये जुट पड़ीं थीं। लेकिन अप्रैल-मई 1995 में उनका नायकत्व चमक उठा था। इस आंदोलन के दौरान अगर उनके भाषणों को अगर रिकार्ड किया गया होता तो वह हमारी धरोहर होते। मुझे नहीं लगता कि क्लासिकीय ज्ञान, सामान्य जनता के अनुभवों, अचूक मारक क्षमता और उदबोधनात्मक आदर्शवाद से युक्त भाषण जिंदगी में फिर कभी सुन पाउंगा। वे जब फ़ार्म में होते तो अंतर्भाव की गहराइयों से बोलते थे। अंग्रेजी में वे सबसे अच्छा बोलते और लिखते थे, हालांकि हिंदी और भोजपुरी में उनका अधिकार किसी से कम नहीं था।

जे.एन.यू. के भीतर गरीब, पिछड़े इलाकों से आने वाले उत्पीड़ित वर्गों के छात्र-छात्रायें कैसे अधिकाधिक संख्या में पढ़ने आ सकें, यह उनकी चिंता का मुख्य विषय था। 1993-94 की हमारी यूनियन ने पिछड़े इलाकों, पिछड़े छात्रों और छात्रों के प्रवेश के लिये अतिरिक्त डेप्रिवेशन प्वाइंट्स पाने की मुहिम चलाई। इसका ड्राफ़्ट चंद्रशेखर और प्रथमा ने तैयार किया था, मेरा काम था बस उसी ड्राफ़्ट के आधार पर हरेक फोरम में बहस करना। 94-95  में जब चंद्रशेखर अध्यक्ष बने तो डेप्रिवेशन पाइंटस 10 साल बाद फिर से जे.एन.यू. में लागू हुआ।

चंद्र्शेखर बेहद धीरज के साथ स्थितियों को देखते, लेकिन पानी नाक के ऊपर जाते देख वे बारूद की तरह फ़ट पड़्ते। अनेक ऐसे अवसरों की याद हमारे पास सुरक्षित है। साथ-साथ काम करते हुये चंद्रशेखर और हमारे बीच काम का बंटवारा इतना सहज और स्वाभाविक था कि हमें एक-दूसरे से राय नहीं करनी पड़ती थी। हमारे बीच बहुत ही खामोश बातचीत चला करती। ऐसी आपसी समझदारी जीवन में किसी और के साथ शायद ही विकसित कर पाऊं।

रात में चुपचाप अपनी चादर सोते हुये दूसरे साथी को ओढ़ा देना, पैसा न होने पर मेस से अपना खाना लाकर मेहमान को खिला देना, खाना न खाये होने पर भी भूख सहन कर जाना और किसी से कुछ न कहना उनकी ऐसी आदतें थीं जिनके कारण उनकों मेरी निर्मम आलोचना का शिकार भी होना पड़ता था। दूसरों के स्वाभिमान के लिये पूरी भीड़ में अकेले लड़ने के लिये तैयार हो जाने के कई मंजर मैंने अपनी आंखों से देखे हैं। एक बार एक बूढ़ा आदमी दौड़कर बस पकड़ना चाह रहा था और कंडक्टर ने बस नहीं रोकी। चंदू कंडक्टर से लड़ पड़े। कंडक्टर और ड्राइवर ने लोहे की छड़ें निकाल लीं और सांसदों के बंगले पर खड़े सुरक्षाकर्मियों को बुला लिया। तभी बस में चढ़े जे.एन.यू. के छात्र भी उतर पड़े और कंडक्टर, ड्राइवर और सुरक्षा कर्मियों को पीछे हटना पड़ा। चंदू सब कुछ दांव पर लगा देने वाले व्यक्ति थे। जीवन का चाहे कोई भी क्षेत्र हो- प्रेम हो, राजनीति हो या युद्ध हो। उन्होंने अपने लिये कुछ बचाकर नहीं रखा। वे निष्कवच थे, इसीलिये मेरे जैसों को उन्हें लेकर बहुत चिंता रहती।

चंदू के भीतर एक क्रांतिकारी जिद्दीपन था। जब किसी जुलूस में कम लोग जुटते तो मैं हताश होकर बैठ जाता। लेकिन चंदू अड़ जाते। उनका तर्क रहता,” चाहे जितने कम लोग हों, जुलूस निकलेगा।” और अपने तेज बेधक नारों से वे माहौल गुंजा देते। सीवान जाने को लेकर मेरा उनसे मतभेद था। मेरा मानना था कि वे पटना में रहकर युवा मोर्चा संभाले रखें। वे प्राय: मेरी बात का प्रतिवाद नहीं करते थे। लेकिन अगर वे चुप रह जाते तो मैं समझ लेता यह चुप्पी लोहे जैसी है और इस इस्पाती जिद्द को डिगा पाना असंभव है।

दिल्ली के बुद्धिजीवियों, नागरिक अधिकार मंचों, अध्यापकों और छात्रों, पत्रकारों के साथ उनका गहरा रिश्ता रहता आया। वे बड़े से बड़े बुद्धिजीवी से लेकर रिक्शावाले, डीटीसी के कर्मचारियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को समान रूप से अपनी राजनीति समझा ले जाते थे। महिलाऒं में वे प्राय: लोकप्रिय थे क्योंकि जहां भी जाते खाना बनाने से लेकर, सफ़ाई करने तक और बतरस में उनके साथ घुलमिल जाते। छोटे बच्चों के साथ उनका संवाद सीधा और गहरा था।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लगातार तीन साल तक छात्रसंघ में चुने जाकर उन्होंने कीर्तिमान बनाया था, लेकिन साथ ही उन्होंने वहां के कर्मचारियों और शिक्षकों के साझे मोर्चे को भी बेहद पुख्ता किया। छात्रसंघ में काम करने वाले टाइपिस्ट रावत जी बताते हैं कि जे.एन.यू. से वे जिस दिन सीवान गये, उससे पहले की पूरी रात उन्होंने रावतजी के घर बिताई।

फिल्म संस्थान, पुणे के छात्रसंघ के अध्यक्ष शम्मी नंदा चंद्रशेखर के गहरे दोस्त थे। उनके साथ युवा फ़िल्मकारों का एक पूरा दस्ता अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह के अवसर पर चंद्रशेखर के कमरे में आकर टिका हुआ था। रात-रात भर फ़िल्मों के बारे में चर्चा होती, फिल्म संस्थान के व्यवसायीकरण के खिलाफ़ पर्चे लिखे जाते और दिन में चंद्रशेखर इन युवा फिल्मकारों के साथ सेमिनारों में हस्तक्षेप करते। फिल्म संस्थान के युवा साथी चंद्रशेखर के की इस शहादत पर मर्माहत थे और सीवान जाकर उन पर फ़िल्म बनाकर अपने साथी को श्रद्धांजलि देना चाहते थे। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के छात्र जब 11 अप्रैल के संसद मार्च में आये तो उन्होंने याद किया कि चंद्रशेखर ने किस तरह ए.एम.यू. के छात्रों पर गोली चलने के बाद उनके आंदोलन का राजधानी में नेतृत्व किया। जे.एन.यू. छात्रसंघ को उन्होंने देशभर यहां तक कि देश से बाहर चलने वाले जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ दिया। चाहे वर्मा का लोकतंत्र बहाली आंदोलन हो, चाहे पूर्वोत्तर राज्यों में जातीय हिंसा के खिलाफ़ बना शांति कमेटियां या टाडा विरोधी समितियां, नर्मदा आंदोलन हो या सुन्दर लाल बहुगुणा का टेहरी आंदोलन हो- चंदशेखर उन सारे आंदोलनों के अनिवार्य अंग थे। उन्होंने बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर-पूर्व प्रांत के सुदूर क्षेत्रों की यात्रायें भी कीं। मुजफ़्फ़रनगर में पहाड़ी महिलाऒं पर नृशंस अत्याचार के खिलाफ़ चंदू ने तथ्यान्वेषण समिति का नेतृत्व किया।

निजीकरण को अपने विश्वविद्यालय में शिकस्त देने के बाद उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय में हजारों छात्रों की सभा को संबोधित किया। बीएचयू में उन्होंने इसे मुद्दा बनाया और छात्रों को आगाह किया और फिल्म संस्थान, पुणे में तो एक पूरा आंदोलन ही खड़ा करवा देने में सफ़लता पाई। आजाद हिंदुस्तान के किसी एक छात्र नेता ने छात्र आदोलन को ही सारे जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ने का इतना व्यापक कार्यभार अगर किया तो सिर्फ़ चंद्रशेखर ने।

यह अतिशयोक्ति नहीं, सच है। 1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ़ राजनीतिक प्रस्ताव लाये तो उन्हें यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया। समय की कमी का बहाना बनाया गया। चंद्रेशेखर ने वहीं आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांगलादेश और दूसरे तीसरी दुनिया के देशों के प्रतिनिधियों का एक ब्लाक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ चल रहे जबर्दस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताऒं से मिले और सियोल में बीस हजार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया। यह एक खतरनाक काम था जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिये जाने का खतरा उठाकर भी अंजाम दिया।

चंद्रशेखर एक विराट, आधुनिक छात्र आंदोलन की नींव तैयार करने के बाद इन सारे अनुभवों की पूंजी लेकर सीवान गये। उनका सपना था कि उत्तर-पश्चिम बिहार में चल रहे किसान आंदोलन को पूर्वी उत्तर-प्रदेश में भी फ़ैलाया जाये और शहरी मध्यवर्ग, बुद्धिजीवी, छात्रों और मजदूरों की व्यापक गोलबंदी करते हुये नागरिक समाज के शक्ति संतुलन को निर्णायक क्रांतिकारी मोड़ दिया जाये। पट्ना, दिल्ली और दूसरे तमाम जगहों के प्रबुद्ध लोगों को उन्होंने सीवान आने का न्योता दे रखा था। वे इस पूरे क्षेत्र में क्रांतिकारी जनवाद का एक माड्ल विकसित करना चाहते थे जिसे भारत के दूसरे हिस्सों में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

चंद्रशेखर ने उत्कृष्ट कवितायें और कहानियां भी लिखीं। उनके अंग्रेजी में लिखे अनेक पत्र साहित्य की धरोहर हैं। वे फिल्मों में गहरी दिलचस्पी रखते थे। कुरोसावा, ब्रेसो, सत्यजित राय और न जाने कितने ही फिल्मकारों की वे च्रर्चा करते जिनके बारे में हम बहुत ही कम जानते थे। वे बिहार के किसान आंदोलन पर एक फिल्म बनाना चाहते थे जिसको उनकी अनुपस्थिति में उनके मित्र अरविन्द दास को अंजाम देना था। भिखारी ठाकुर पर पायनियर में उन्होंने अपना अंतिम लेख लिखा था जिसे प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय इस विषय पर लिखा गया अब तक का सर्वश्रेष्ठ बताते हैं।

उनकी डायरी में निश्चय ही उनकी कोमल संवेदनाओं के अनेक चित्र सुरक्षित होंगे। एक मित्र को लिखे अपने पत्र में वे पार्टी से निकाले गये एक साथी के बारे में बड़ी ममता से लिखते हैं कि उन्हें संभालकर रखने, उन्हें भौतिक और मानसिक सहारा देने की जरूरत है। इस साथी के गौरवपूर्ण संघर्षों की याद दिलाते हुये वे कहते हैं कि’ बनने में बहुत समय लगता है, टूटने में बहुत कम’। इस एक पत्र में साथियों के प्रति उनकी मर्मस्पर्शी चिंता छलक पड़ती है।

मैंने कई बार चंद्रशेखर को विचलित और बेहद दुखी देखा है। ऐसा ही एक समय था 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस। खुद बुरी तरह हिल जाने के बाद भी वे दिन रात उन छात्रों के कमरों में जाते जिनके घर दंगा पीड़ित इलाकों में पड़ते थे। उन्हें हिम्मत देते और फिर राजनीतिक लड़ाई में जुट जाते। कहा जाये तो जब तक वे रहे उनके नेतृत्व में धर्मनिरेपेक्षता का झंडा लहराता रहा। सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताकतों को जे.एन.यू. में उन्होंने बुरी तरह हराया और देश भर में इसके खिलाफ़ लामबंदी करते रहे। छात्रसंघ में न रहने के बावजूद इसी साल आडवाणी को उन्होंने जे.एन.यू. में घुसने नहीं दिया।

चंदू का हास्टल का कमरा अनेक ऐसे समाज छात्रों और समाज से विद्रोह करने वाले, विरल संवेदनाओं वाले लोगों की आश्रयस्थली था जो कहीं और एड्जस्ट नहीं कर पाते थे। मेस बिल न चुका पाने के कारण छात्रसंघ का अध्यक्ष होने के बावजूद उनके कमरे में प्रशासन का ताला लग जाता। उनके लिये तो जे.एन.यू. का हर कमरा खुलता रहता लेकिन अपने आश्रितों के लिये वे विशेष चिंतित रहते। एक बार मेस बिल जमा करने के लिये उन्हें 1600 रुपये इकट्ठा करके दिये गये। अगले दिन पता चला कि कमरा अभी नहीं खुला। चंदू ने बड़ी मासूमियत से बताया कि 800 रुपये उन्होंने किसी दूसरे लड़के को दे दिये क्योंकि उसे ज्यादा जरूरत थी।

चंदू को उनकी मां से अलग समझा ही नहीं जा सकता। सैनिक स्कूल, तिलैया और फ़िर नेशनल डिफ़ेन्स एकेडमी, पुणे, फिर पटना और फिर जे.एन.यू.। इस लंबे सफ़र में पिछले 15-16 सालों से मां-बेटे एक दूसरे को खोजते रहे और अंतत: मां की गोद चंदू को शहादत के साथ ही मिली। मां जब कभी 360, झेलम ए.एन.यू.में आकर रहतीं तो पूरे फ़्लोर के सभी लड़कों की मां की तरह रहतीं। चंदू से गुस्सा हुयीं तो अयूब या विनय गुप्ता के कमरे में जाकर सो गयीं। फिर संदू उन्हें मनाते और वे भी डांटने-फ़टकारने के बाद बेटे की लापरवाही माफ़ कर देंतीं। एक बार उसी फ़्लोर पर दो छात्रों में जमकर लड़ाई हो गयी। मां ने तुरन्त हस्तक्षेप किया। बच्चों को डांट-फटकार और सांत्वना की घुट्टी पिलाकर झगड़ा खतम करा दिया।

1992 की ही बात है। सीवान से खबर आयी कि मां को कुत्ते ने काट लिया है। चंद्रशेखर बुरी तरह विचलित हो गये। मैं उन्हें सीवान के लिये गाड़ी पकड़ाने दिल्ली रेलवे स्टेशन गया लेकिन उनकी हालत देखकर मुझसे रहा नहीं गया और मैं उनके साथ गाड़ी में सवार हो गया। मैं गोरखपुर उतरा और उनसे कहा कि वे सीवान जाकर तुरन्त फोन करें। शाम को उनका फोन आया कि मां ठीक-ठाक हैं तब जान में जान आई।

चंद्रशेखर की सबसे प्रिय किताब थी लेनिन की पुस्तक ‘क्या करें’। नेरुदा के संस्मरण भी उन्हें बेहद प्रिय थे। अकसर अपने भाषणों में वे पाश की प्रसिद्ध पंक्ति दोहराते थे- ‘सबसे खतरनाक है हमारे सपनों का मर जाना।’ 1993 में जब हम जे.एन.यू. छात्रसंघ का चुनाव लड़ रहे थे तो सवाल-जवाब के सत्र में किसी ने उनसे पूछा,” क्या आप किसी व्यक्तिगत मह्त्वाकांक्षा के लिये चुनाव लड़ रहे हैं?” उनका जवाब भूलता नहीं। उन्होंने कहा,” हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगतसिंह की तरह जीवन, चेग्वेआरा की तरह मौत”। चंदू ने अपना वायदा पूरा किया।

चंदू की शहादत का मूल्यांकल अभी बाकी है। उसके निहितार्थों की समीक्षा अभी बाकी है। पीढ़ियां इस शहादत का मूल्यांकन करेंगी। लेकिन आज जो बात तय है वह यह कि हमारे युग की एक बड़ी घटना है यह। इस एक शहादत ने कितने नये रास्ते खोल दिये अभी तक इसका मूल्यांकन नहीं हुआ है। लेकिन दिल्ली नौजवानों के नारों से गूंज रही है- चंद्रशेखर, भगतसिंह! वी शैल फ़ाइट, वी शैल विन।

3/13/13

बाजार के दबावों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद थे गणेश पाइन


बाजार के दबावों और उसकी शर्तों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद की तरह सृजनरत रहने वाले मशहूर चित्रकार गणेश पाइन का मंगलवार 12 मार्च को कोलकाता के एक अस्पताल में दिल के दौरे से निधन हो गया, सीने में दर्द के कारण उन्हें सोमवार को वहां भर्ती किया गया था।
1937 में जन्मे गणेश पाइन आजादी के बाद की दूसरी पीढ़ी के कलाकार थे और कई मामले में अपने समकालीनों में सर्वथा अलग थे। अपनी कला के प्रचार के प्रति प्रायः उदासीन रहने वाले गणेश पाइन लोकस्मृतियों, परंपरा और जनजीवन को एक कलाकार की कल्पना से जोड़कर पेश करने के लिए चर्चित रहे। उन्होंने इसका जिक्र कई बार किया कि कैसे उन्हांेने एक बूढ़े मोची का चित्र बनाया, तो पूरा होने पर ध्यान में डूबे किसी दार्शनिक की तरह लगने लगा, कि कैसे किसी सफाई मजदूर का चित्र उन्होंने बनाया, तो उसका चेहरा कवि की तरह नजर आने लगा। अपने चित्रों में वस्तु या यथार्थ को हुबहू पेश करने की बजाय उसे अपनी मनःस्थितियों के अनुरूप पेश करना उन्हें ज्यादा भाता था। और यह मन मानो दादी मां की कथाओं में मग्न बच्चे का मन था, जहां ‘हत्यारा’ अचानक कहीं से नहीं टपक पड़ता था, बल्कि अतीत से निकलकर आता था, लोककथाओं से निकले किसी पुराने योद्धा की वेशभूषा में पुराने किस्म की ही तलवार लेकर। वे बताते थे कि बचपन में दादी मां के मुंह से सुनी कहानियों का भी असर उनके चित्रों पर था। ‘हत्यारा’ शीर्षक चित्र मानो आज के हत्यारों की वंश परंपरा का दस्तावेज है। राजा, रानी, सौदागर, रथ आदि उनके चित्रों में नजर आते हैं- एक पूरा अतीत है, जिसे आजादी के बाद की पीढ़ी ने प्रत्यक्ष नहीं देखा, लेकिन जो विभिन्न रूपों में उसके अवचेतन का हिस्सा बने हुए हैं। यहां यह गौर करने लायक है कि अन्य भारतीय कलाकारों की तरह मिथकीय देवी-देवता, महापुरुष या ऐतिहासिक राजा-रानी को उन्होंने अपने चित्रों का विषय नहीं बनाया, बल्कि वे नामहीन हैं, किसी ऐतिहासिक या मिथकीय संदर्भ से उनका नाता नहीं है। गणेश पाइन के एक चित्र का शीर्षक ही है- ‘एक प्राचीन पुरुष की मृत्यु’। वे प्राचीन दुनिया की कल्पनाओं में हमेशा खोए रहने वाले व्यक्ति नहीं थे, भविष्य की कल्पनाएं उन्हें भाती थी, उन्हें टीवी पर साइंस फिक्शन वाले सीरियल देखना पसंद था। कविताओं में उनकी दिलचस्पी थी और जीवनानंद दास उनके प्रिय कवि थे।


उन्हें पेंटर आफ डार्कनेस यानी अंधेरे का चित्रकार भी कहा गया, क्योंकि मौत की छाया उनके कई चित्रों में दिखती है। इसका कारण वे बताते थे कि नौ साल की उम्र में ही 1946 में उन्होंने दंगे में मारे गए लोगों को करीब से देखा था, जिसका प्रभाव उनके चित्रों पर पड़ा तथा इसके अलावा कई प्रियजनों के बिछड़ने का भी असर पड़ा। कोलकाता गवर्नमेंट काॅलेज के स्नातक गणेश पाइन ने लंबे समय तक एनिमेटर का काम किया। वे अपने चित्रों पर वाल्ट डिजनी के कार्टूनों का प्रभाव भी मानते थे। अपने बेहतरीन रेखांकन के लिए भी उन्हंे जाना गया। लेकिन इससे भी ज्यादा वे अपने चित्रों की खास शैली के लिए मशहूर रहे। टेंपरा माध्यम में काम करना उन्हें पसंद था।

गणेश पाइन की जिंदगी भी अपने समकालीन आधुनिक चित्रकारों से सर्वथा अलग थी। करीब पांच दशक के अपने कैरियर में उनका ज्यादा समय कोलकाता में ही गुजरा, वे आयोजनों और समारोहों से प्रायः बचते रहे। यद्यपि पश्चिम की तमाम आधुनिक कला शैलियों से वे परिचित थे। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन पर अवनींद्रनाथ टैगोर के अतिरिक्त हाल्स रेम्ब्रांडिट व पाल क्ली का ज्यादा असर है। पाइन भारत के उन गिने चुने कलाकारों में थे, जो पश्चिम की आधुनिक कला और उसके बाजार से कभी आतंकित नहीं हुए। भारत के अतिरिक्त पेरिस, लंदन, वाशिंगटन और जर्मनी सहित दुनिया भर में उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनियां लगाई र्गइं। एमएफ हुसैन गणेश पाइन के प्रशंसकों में थे। कुछ लोगों की राय है कि इसने भी उनके चित्रों की कीमत बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा की, लेकिन खुद वे बाजार के पीछे कभी नहीं भागे, बल्कि उनके चित्रों का दुर्लभ होना ही उनको मूल्यवान बनाता था।
गणेश पाइन ने बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में कला पर बाजारवाद के बढ़ते दबाव के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि ‘‘पहले के चित्रकारों के लिए कला जीवन का एक मकसद थी। अब कला की बिक्री बढ़ने से जहां चित्रकारों को लाभ हुआ है वहीं इसने कुछ कलाकारों की कुछ नया कर दिखाने की क्षमता को नष्ट कर दिया है। लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको इससे एक नया उत्साह मिला है।’’ हालांकि कला को अपने जीवन का मकसद बताते हुए उन्होंने दो टूक कहा था कि ‘रोजगार का कोई वैकल्पिक साधन नहीं होने के कारण इसी से मेरी रोजी-रोटी भी चलती है। जहां तक चित्रों के लिए विषय का सवाल है, मैं अपने अंतर्मन से ही इसे तलाशता हूं।’ उनका मानना था कि ‘‘कला समाज का सौंदर्य है। अगर कला की उपेक्षा हुई तो समाज का सौंदर्य और संतुलन नष्ट हो जाएगा।’

अपनी ही शर्तों पर खामोशी से अपना काम करने वाले, बाजार की शर्तों को नामंजूर करते हुए कला और स्मृति की अपनी पंरपरा के साथ अविचल सृजनरत रहने वाले इस विलक्षण भारतीय चित्रकार को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि। 

3/12/13

अपने हक के लिए बिहार के कैदियों ने छेड़ा आन्दोलन


दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी राम सिंह ने आत्महत्या की है या उसकी हत्या की गई है, इसे लेकर बहस शुरू हो गई है. लेकिन इस घटना ने फिर एक बार भारतीय जेलों में मौजूद अमानवीय माहौल को उजागर कर दिया है. जेलों में समय-समय पर कैदी अपने मानवीय अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहते है. खासकर बिहार में कई बार बंदियों द्वारा अपने हक के लिए आन्दोलन किया जाता रहा है. ऐसा ही एक आन्दोलन बिहार की राजधानी पटना में मौजूद बेउर आदर्श कारा के कैदियों ने शुरू किया, जो कई जेलों में फ़ैल गया. बंदियों का ज्ञापन और इस आन्दोलन पर एक टिप्पणी 'समकालीन लोकयुद्ध' (वर्ष२२, अंक १२) में प्रकाशित की गई है, जिसे हम यहाँ दे रहे हैं. 

बिहार में कारागारों की दुर्दशा की कहानियां समय-समय पर सामने आती रहती हैं और वामपंथी व जनवादी शक्तियों तथा मानवाधिकार संगठनों की ओर से इसके खिलाफ आवाज भी उठाई जाती रही है। कोई भी कारागार ऐसा नहीं जहां निर्धारित संख्या से दुगुने-तिगुने कैदी न हों. कानून की निगाह में अपराधी माने जाने वाले लोगों के अलावा खेत-खलिहानों व सड़कों पर अपने हक-हकूक के लिए आन्दोलन करनेवाले कार्यकर्ताओं की भी बड़ी तादाद इसमें शामिल है, जिन्हें राजनीतिक बंदियों का दर्जा व सुविधा मयस्सर नहीं होता. कैदियों की बड़ी संख्या ऐसी है जिनपर लगे मुकदमों की सुनवाई नहीं हो रही है अथवा काफी लंबे समय से सुनवाई चल रही है. एक तो जेल मैनुअल ही अंग्रेज जमाने के बने कायदे-कानूनों के अनुसार चल रहा है और फिर इसमें वर्णित बुनियादी सुविधाओं का भी घोर अभाव देखा जा रहा है- यहां तक कि शौचालयों व साफ-सफाई का भी उचित प्रबंध नहीं होता. कारागारों में कैदियों के साथ मारपीट व अन्य किस्म के दुर्व्यवहार तो रोजमर्रा के प्रचलन बन गए हैं. वृद्ध कैदी भी ये उत्पीड़न झेलने को विवश होते हैं. कुछ दिनों पहले भाकपा (माले) के वरिष्ठ व लोकप्रिय कार्यकर्ता शाह चांद, जिन्हें ‘टाडा’ के तहत आजीवन कारावास की सजा दी गई है, के नेतृत्व में बेउर आदर्श कारा के बंदियों ने जेल की प्रमुख समस्याओं को उठाते हुए चरणबद्ध आन्दोलन चलाया. शीघ्र ही यह आन्दोलन फुलवारीशरीफ, गया, जहानाबाद, सासाराम, मोतिहारी, औरंगाबाद, छपरा, सीतामढ़ी और बेगूसराय की जेलों में भी फैल गया. कैदियों ने 11 से 15 फरवरी तक जत्थेवार धरना, 16 से 20 फरवरी तक 12 घंटे का उपवास और 21-22 फरवरी को 48 घंटे का उपवास कार्यक्रम संचालित किया. आन्दोलन शुरू करने के पहले उन्होंने कैदियों का एक हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन भारत के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, भारत सरकार के गृह सचिव, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, बिहार के राज्यपाल, मुख्य मंत्री, गृह सचिव तथा राज्य मानवाधिकार आयोग के अलावा विभिन्न जनवादी संगठनों के पास भेजा था. उनके द्वारा प्रेषित ज्ञापन (भाषाई संशोधनों के साथ) इस प्रकार है, जो अपने आपमें कारागारों की दुर्दशाग्रस्त अमानवीय स्थितियों को उजागर करता है.

बेऊर जेल के बंदियों द्वारा भेजा गया ज्ञापन

अत्यंत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि राज्य के एकमात्र आदर्श केंद्रीय कारा बेऊर (पटना) में 24 मांगों के सवाल पर सहायक कारा महानिरीक्षक द्वारा कुछ समय के भीतर मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिए जाने के बावजूद आज तक प्रमुख समस्याएं यथावत बनी हुई हैं. कुछ सुधार होने के बाद स्थिति पुनः बिगड़ती जा रही है

कारागृह को सुधारगृह का पर्याय माना जाता है तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था के शुभचिंतक यह अपेक्षा रखते हैं कि कारा में बंद विचाराधीन बंदी का विवेक और सुसंस्कार विकसित हो. किंतु यहां कमजोर बंदियों को दमन-उत्पीड़न का शिकार बनाया जा रहा है. उन्हें स्वास्थ्यप्रद भोजन, समुचित इलाज और शौचालय सहित पूर्ण सफाई की बुनियादी सुविधा से भी वंचित रखा गया है. आज सबसे खराब स्थिति कारा अस्पताल की है. कारा प्रशासन की लापरवाही तथा डाक्टरों की गैर-जिम्मेदाराना भूमिका व उनकी अकुशलता के कारण बंदियों को प्रताडि़त किए जाने, डाक्टरों द्वारा सही इलाज न करने, गंभीर स्थिति आने से पहले ही मरीज को रेफर करने व जीवन रक्षक दवा तक उपलब्ध न हो पाने के कारण हर महीने बंदी मौत के शिकार हो रहे हैं. पूरे बिहार के सभी जेलों की तुलना में मरनेवालों की संख्या यहां सबसे ज्यादा है. सितंबर से अक्टूबर महीने में लगातार पांच बंदियों की मौत हो चुकी है. हालाँकि इस मौत के लिए न्यायिक विभाग व कार्यपालिका विभाग भी जिम्मेवार है. भ्रष्टाचार में लिप्त पूर्व चीफ मेडिकल ऑफिसर जेबी सिंह के खिलाफ लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं. जांच-पड़ताल में पकड़े जाने के बाद सजा के तौर पर केवल ट्रांसफर किया गया. प्रत्येक सप्ताह एक विशेषज्ञ डाक्टर का कारा अस्पताल में आना अनिवार्य था, पर अब इसमें भी विराम लग चुका है तथा उनकी मर्जी पर निर्भर करता है कि वे आएंगे या नहीं. प्रशिक्षित कंपाउंडर होने के बावजूद खून, पेशाब व एक्स-रे जांच के लिए बाहर से ठेके पर रखे गए व्यक्ति को सप्ताह में एक दिन कुछ घंटों के लिए बुलाया जाता है, तथा दूसरे सप्ताह में उसका रिपोर्ट प्राप्त होता है. इसमें भी सही जांच की गारंटी नहीं होती, ऐसा व्यवहार में साबित हो चुका है. इसमें भी भ्रष्टाचार का मामला है तथा इन सारी चीजों में कमीशन का मामला जुड़ा हुआ है. स्वास्थ्यप्रद भोजन (जेल मैनुअल के अनुसार) व स्वच्छ पेयजल का अभाव तथा शौचालय सहित पूर्ण साफ-सफाई में कमी रहने के कारण स्वस्थ बंदी भी बीमारियों का शिकार हो जाते हैं तथा बीमार बंदियों में तपेदिक (टीबी) के मरीज ज्यादा (80 प्रतिशत) पाए जाते हैं व अधिकतर मौत तपेदिक मरीजों की होती है. इसका खुलासा किसी और ने नहीं बल्कि खुद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने ही किया है. 2010 में रोटरी क्लब इंटरनेशनल, पटना (एनजीओ) द्वारा आइसीयू (गंभीर स्थिति में मरीजों के लिए आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था) के


निर्माण के लिए 2010 में पूर्व काराधीक्षक ओम प्रकाश गुप्ता व पूर्व मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी कांति मोहन सिंह की उपस्थिति में 55 लाख रुपये का अनुदान दिया गया था. लेकिन आज तक इसका निर्माण पूरा नहीं हुआ. यह भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है. ऐसी स्थिति रहने पर बाहर से कोई भी संस्था या एनजीओ मदद के लिए आगे नहीं आएंगे. कोई बंदी यदि गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए तथा चलने व खड़ा होने में भी वह असमर्थ हो, तब भी कोर्ट उपस्थापन में उन्हें जाना ही पड़ेगा, क्योंकि अब कोई डाक्टर व्यक्तिगत रूप से ‘सिक’ (बीमार होने की रिपोर्ट) नहीं दे सकता. ऐसी रिपोर्ट देने के लिए मेडिकल बोर्ड बैठाकर निर्णय लिया जाएगा- ऐसा कारा प्रशासन द्वारा अव्यवहारिक निर्णय लिया गया है. कारा प्रशासन, न्यायिक विभाग व डाक्टर की उपस्थिति में बंदी दरबार में छोटी-छोटी समस्याओं को हल करने का कार्य शुरू हुआ था, वह भी कारा प्रशासन की कमी व बेरुखी की वजह से बंद हो चुका है. किसी भी मामले में बंदियों के साथ बुरी तरह मार-पीट करना आम बात बन चुकी है. इस कुव्यवस्था व भ्रष्टाचार से बंदी त्रस्त हैं और अब उद्वेलित हैं. दोषी को सजा देने की बात तो कानूनन जायज है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को संदेह के आधार पर पकड़ना व उस पर बलपूर्वक दोष मढ़ना और कानून के समक्ष किसी मामले से मुक्ति पाने पर भी बार-बार दोष लगाकर कारा से मुक्त न होने देने की साजिश करना क्या कानूनन अधिकार है? झूठे केस में फंसाकर आजीवन जेल में रखने तथा जमानत पर जेल से बाहर निकलते ही पुलिस द्वारा पुनः झूठे आरोप लगाकर दुबारा जेल भेजने का अनैतिक व असंवैधानिक तरीका अपनाया जा रहा है. शोषण, लूट, अन्याय, अत्याचार के खिलाफ प्रतिवाद व संघर्ष करने वाली प्रगतिशील व क्रांतिकारी शक्तियों के साथ ऐसी घटनाएं बिहार सहित देश के विभिन्न राज्यों में हो रही हैं. बहुराष्ट्रीय व कारपोरेट घरानों के स्वार्थ में आर्थिक सुधार के नाम पर देश को गिरवी रखने, देश को खोखला करने, देश की संप्रभुता को खत्म करने, देश की खनिज संपदा को लूटने तथा शोषण-जुल्म के खिलाफ संघर्ष करने वाले प्रगतिशील, बुद्धिजीवियों व क्रांतिकारियों के साथ जेल में अपराधियों की तरह बर्ताव करने का हम विरोध करते हैं. हमारी मांग है कि राजनीतिक बंदियों के जो अधिकार हैं उससे उन्हें वंचित न रखकर उन्हें राजनीतिक बंदी का दर्जा दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का खुला उल्लंघन करते हुए निचली अदालत में पुलिस द्वारा हाथ में हथकड़ी व कई जगह कमर में रस्सी बांधकर उन्हें कोर्ट में पेश किया जा रहा है. अंग्रेजी हुकूमत द्वारा शोषण व लूट को अबाध रूप से जारी रखने तथा इसके खिलाफ आवाज उठाने व लड़ने वाले सच्चे देशभक्तों व क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए जन विरोधी व काला कानून बना कर फांसी पर चढ़ाने व आजीवन जेल में बंद रखने के उद्देश्य से 1860 में आइपीसी का निर्माण किया गया था. हम समझते हैं ये सभी काले कानून व जेल मैन्युअल जनविरोधी हैं तथा आज की स्थिति में गैरजनवादी व अप्रासंगिक भी हैं, तथा इन्हें अविलंब बदलना चाहिए. लोकतांत्रिक रूप से कानून के दायरे में रहकर हम निम्नलिखित 26 मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं जिन पर तत्काल विचार करने और यथाशीघ्र कार्रवाई करने की आवश्यकता है:

1. कोई भी व्यक्ति, जो किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य हो, अपराधी हो या सामान्य जन हो, गिरफ्तारी के बाद पुलिस हिरासत में या न्यायिक हिरासत में उसकी मृत्यु होती है, तो ऐसी स्थिति में गिरफ्तार करने वाले या जेल में रखने वाले जिम्मेवार पदाधिकारी अथवा न्यायिक अधिकारी को उसकी मौत का जिम्मेवार समझा जाना चाहिए तथा इससे जुड़े पदाधिकारियों पर विचार के लिए अदालत में मुकदमा अनिवार्यतः चलाया जाए.

2. कारागार में हुई मृत्यु को कारा-प्रशासन की लापरवाही एवं डाक्टर की गैर-जिम्मेदार भूमिका का नतीजा मानकर कारा प्रशासन व डाक्टर के खिलाफ हत्या का मुकदमा बनाया जाए.

3. जेलों में बंदी के जीवन की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य की रक्षा के लिए स्वास्थ्यप्रद भोजन, शुद्ध पेयजल, शौचालय सहित पूर्ण साफ-सफाई, मच्छरों से बचाव, आपरेशन सेवा व जीवन रक्षक दवाओं का समुचित प्रबंध किया जाए और इसके साथ ही मेडिकल विशेषज्ञ, व्यवहार कुशल डाक्टर, कंपाउंडर और नर्स की व्यवस्था अनिवार्य करें.

4. गिरफ्तार व्यक्ति की समुचित मेडिकल जांच कराकर ही उन्हें जेल भेजा जाए. अगर कोई बंदी गंभीर व जटिल बीमारी से ग्रस्त हो तो उसे कारागृह में न रखकर हॉस्पिटल भेजा जाए.

5. गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ लंबित सारे ( संज्ञेय-असंज्ञेय) मुकदमें एक निर्धारित समय सीमा के भीतर (60 दिन या 90 दिन) तय हो जाना चाहिए और तमाम मुकदमों में उपस्थापन भी इसी समय सीमा के अंदर हो जाना चाहिए, ताकि बंदी अपना पक्ष न्यायालय के सामने प्रस्तुत कर सके और विचारण की प्रक्रिया भी यथाशीघ्र पूरा करवा सके. इससे अधिक समय के बाद लगाए गए तमाम मुकदमों को पुलिस द्वारा पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानसिकता से बंदी को हैरान-परेशान व तबाह करने के लिये की गई कार्यवाही मानकर निरस्त किया जाना चाहिए.

6. जेल में या पुलिस हिरासत में मरने वाले व्यक्तियों के परिवार को दस लाख रुपये का मुआवजा अनिवार्य किया जाए.

7. 65 वर्ष की उम्र पार कर चुके तमाम सजायाफ्ता कैदियों को बिना शर्त रिहा किया जाए.

8. किसी बंदी द्वारा कारा में वास्तविक संसीमन की अवधि 14 वर्ष तथा परिहार सहित संसीमन की अवधि 20 वर्ष पूरी की जा चुकी है, उसके बावजूद अगर उसे किसी बहाने जेल में रखा जा रहा है तो अतिरिक्त समय के लिए प्रतिदिन 300 रु. के हिसाब से क्षतिपूर्ति जोड़कर मुआवजा दिलाने तथा उन्हें अविलंब कारा से मुक्त करने का प्रबंध किया जाए.

9. अगर किसी व्यक्ति को ट्रायल के नाम पर तीन साल से अधिक समय तक कारा में रखा गया है और न्याय प्रक्रिया तथा प्रशासनिक लापरवाही के कारण उसका विचारण पूरा नहीं हो सका हो, तो उसे अनिवार्य रूप से जमानत पर छोड़े जाने की गारंटी की जानी चाहिए.

10. जिन मुकदमों में सजा की अवधि पूरी हो जाती है और उस अवधि के भीतर उनका विचारण प्रशासनिक या न्यायिक लापरवाही से संपन्न नहीं किया जा सका हो, उन्हें प्रतिदिन तीन सौ रुपये की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था के साथ सम्मानपूर्वक दोष मुक्त किया जाए.

11. परिहार परिषद की बैठकों को सार्वजनिक किया जाए.

12. सरकार की जन-विरोधी नीतियों व काले कानून के खिलाफ आवाज उठानेवाले व संघर्ष करने वाले प्रगतिशील व राजनीतिक लोगों को राजनीतिक बंदी का दर्जा दिया जाए.

13. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो तथा बंदी के हाथ में हथकड़ी व कमर में रस्सी बांधकर कोर्ट में पेशी की अमानवीय प्रक्रिया को बंद किया जाए.

14. रिमांड के नाम पर बंदी को मानसिक व शारीरिक यातनाएं देने पर रोक लगाई जाए तथा कारा के अंदर बंदियों के साथ किसी भी मामले पर बुरी तरह पिटाई करने के अन्यायपूर्ण तरीके को अविलंब बंद किया जाए.

15. महीने में एक बार न्यायिक विभाग की उपस्थिति में बंदी दरबार के आयोजन को अनिवार्य किया जाए.

16. बंदी अपने मुकदमें से जुड़े मामलों पर वकील के साथ परामर्श व अपने व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने के लिए परिवार के साथ संपर्क बनाए रख सकें, इसके लिए जेलों में एसटीडी बूथ की सुविधा उपलब्ध कराई जाए.

17. बंदियों का आवेदन पत्र काराधीक्षक द्वारा गंतव्य स्थान पर सही समय पर भेजा जा सके, इसकी गारंटी की जाए व पावती रसीद आवेदक को देना सुनिश्चित किया जाए.

18. गंभीर रूप से बीमार व पीडि़त बंदियों को, और अचानक किसी के बीमार पड़ जाने अथवा चलने-फिरने में असमर्थता की स्थिति में उस बंदी को, मेडिकल बोर्ड की बैठक का इंतजार न करते हुए 'सिक' दिया जाए.

19. बंदियों के तमाम मुकदमों में उपस्थापन को आसान व सुलभ बनाने वाली 'वीडियो-कॉन्फ्रेसिंग' की प्रणाली को राज्य के भीतर व राज्य के बाहर अविलंब लागू किया जाए.

20. बंदी पंचायत चुनाव प्रत्येक माह या अधिक से अधिक तीन माह पर किया जाए.

21. जेल में जांच के लिए आने वाले पदाधिकारी द्वारा जेल प्रशासन की गैरमौजूदगी में बंदियों से प्रत्यक्ष मिलने और उनके पास शिकायत दर्ज कराने की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित किया जाए.

22. विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा लिखी गई दवाओं को जेल प्रबंधन द्वारा मनमाने ढंग से बदल दिए जाने या अपने मन की दवा दिए जाने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए और सही दवा को उसी दिन तत्काल मुहैया कराया जाए.

23. मुलाकाती पुर्जा सभी वार्डो में सही तरीके से ही भेजा जाए.

24. पोटा कानून में समीक्षा का जो प्रावधान है, उसी तरह टाडा कानून के आरोपी, सजाप्राप्त व विचाराधीन बंदी के ऊपर लगे आरोपों की समीक्षा का प्रावधान किया जाए.

25. जन विरोधी कानून पोटा व यूएपीए को निरस्त किया जाए तथा जेल मैन्युअल बदला जाए.

26. इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान एवं एम्स समेत सभी अस्पतालों में बंदियों का इलाज सुनिश्चित किया जाए. उपरोक्त मांगे, यों तो हम बिहार के आदर्श केंद्रीय कारा बेऊर से भेज रहे हैं. लेकिन यह समस्या न सिर्फ बेऊर जेल की है बल्कि प्रायः भारत के समस्त जेल बंदियों की यही समस्या है. अतएव यह मामला संविधान, दंडविधान, राजनीति, कानून और सामाजिक व्यवहार से जुड़ा हुआ है और पूरे देश में एक उत्तेजक स्थिति का सृजन कर रहा है. इसलिए ऐसे गंभीर मामले पर देश का कोई भी विवेकशील व्यक्ति चुपचाप नहीं बैठ सकता. ऐसी परिस्थिति में आपके द्वारा निर्मित व गठित तंत्रों द्वारा प्राप्त रिपोर्ट एकतरफा और सब कुछ अच्छा भी हो, तो भी हम बंदीगण ने आपके समक्ष जो स्थिति स्पष्ट की है और जो मागें रखी हैं, आशा ही नहीं बल्कि हमें यह पूर्ण विश्वास है कि आप उपरोक्त लोकतांत्रिक अधिकारों को सुनिश्चित कराने और न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बहाल कराने का पूर्ण प्रयास करेंगे. आपके द्वारा उपेक्षित किए जाने पर या आवेदन पत्र की निर्गत तिथि के 60 दिन बाद तक कोई आश्वासन सुनिश्चित न किए जाने की स्थिति में बंदीगण चरणबद्ध आंदोलन के लिए बाध्य होंगे इसके बारे में हम समयोपरांत सुनियोजित रूपरेखा तैयार करेंगे.

(खबर है कि धारावाहिक आन्दोलनों के बाद राज्य के जेल प्रशासन ने बंदियों की समस्याओं के समाधान के लिए कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं).

3/7/13

ह्यूगो शावेज लाल सलाम ! जन संस्कृति मंच

महान साम्राज्यवाद-विरोधी योद्धा ह्यूगो शावेज को जसम की श्रद्धांजलि


21 वीं सदी के समाजवाद के स्वप्नद्रष्टा और अनुपम प्रयोगकर्ता तथा भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की नई विश्व-व्यवस्था की अजेयता के मिथक को ध्वस्त करनेवाले महान जन-नायक और क्रांतिकारी, वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने 05 मार्च 2013 के दिन दुनिया को अलविदा कहा. पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद से वे कैंसर से जूझते हुए अब तक पद की शपथ नहीं ले सके थे. दुनिया ने 21 वीं सदी का अब तक का महानतम साम्राज्यवाद-विरोधी योद्धा खो दिया. यह क्षति जितनी वेनेजुएला और लैटिन अमरीका की जनता की है, उतनी ही विश्व के तमाम शोषितों की है, जिन्हें शोक को शक्ति में बदलना है, उनके प्रयोगों को अंतिम जीत तक जारी रखना है. 

शावेज ने 21 वीं सदी में लैटिन अमरीका के साम्राज्यवाद-विरोधी उभार को 18 वीं- 19 वीं सदी के लैटिन अमरीका की स्पैनिश दासता से मुक्ति (साइमन बोलिवार द्वारा की गई क्रान्ति) की अगली कड़ी के रूप में परिभाषित किया. सैन्य अधिकारी रहे शावेज ने 1992 में अमरीका समर्थित वेनेजुएला के वहाँ नव-उदारवादी निजाम के खिलाफ नागरिक तख्तापलट की असफल कोशिश की और दो साल जेल में रहे. 1998 में साम्राज्यवाद-विरोधी ऐसे गठबंधन के प्रतिनिधि के बतौर वे चुनाव जीते जिसने देश के नए जनतांत्रिक संविधान का वायदा किया. नया संविधान एक साल के भीतर बना जो स्त्री-पुरुष समानता पर आधारित था, जिसमें स्त्रियों और मूल निवासियों को तमाम नए अधिकार दिए गए, राष्ट्रपति सहित सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को प्राप्त हुए, शिक्षा और स्वास्थ्य नागरिकों के मौलिक अधिकार बना दिए गए. 1998 से लेकर 2012 का चुनाव जीतने तक वे लगातार वेनेजुएला के राष्ट्रपति चुने जाते रहे. अमरीकी षड्यंत्र से जब अप्रैल में उनके तख्ता-पलट की कोशिश की गई तो जनता ने सडकों पर उतर कर उसे नाकाम कर दिया. शावेज ने न केवल तेल कंपनियों का बल्कि टेलिकॉम सहित कुछ अन्य महत्वपूर्ण कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया, बड़ी कंपनियों पर शिकंजा कसा और उन पर टैक्स बढाए, विश्व-बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का क़र्ज़ चुका कर इनसे संबंध खत्म किया तथा 'बैंक आफ साउथ' नाम से दक्षिण अमरीकी देशों के अपने केन्द्रीय बैंक का में निर्माण किया. फिदेल कास्त्रो के साथ मिलकर शावेज ने अमरीकी वर्चस्व के विरुद्ध, उसके विकल्प के बतौर लैटिन अमरीकी देशों बोलीविया, क्यूबा, डोमोनिका, होंडूरास, निकारागुआ और वेनेजुएला का व्यापार संघ 'बोलीवारियन आल्टरनेटिव फॉर पीपुल्स ऑफ आवर अमेरिकाज़' (अल्बा) का निर्माण किया.

जब दिसंबर 2002 में बड़ी कंपनियों ने तालाबंदी करके अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने की कोशिश की, तो शावेज ने पूँजीपतियों द्वारा बंद किए गए कारोबारों को राज्य की भागीदारी के साथ श्रमिकों की समिति के हवाले कर दिया. विकास के ढाँचे, स्वशासन के तमाम मुद्दे और बजट के एक हिस्से को कैसे खर्च किया जाए, ये सार निर्णय हजारों सामुदायिक नागरिक समितियों (प्रत्येक समिति 200-400 परिवारों की है) के हवाले किए गए. 2004 से 2011 के बीच शावेज के नेतृत्व में वेनेजुएला की गरीबी घट कर आधी हो गई, बेरोजगारी बीस फीसदी से घट कर सात फीसदी हो गई, निरक्षरता समाप्त हो गई, वेनेजुएला की खेती योग्य ज़मीन का पचहत्तर फीसदी हिस्सा जो पहले महज पांच फीसदी लोगों के हाथ में था, उसके एक अच्छे-खासे हिस्से को सरकार ने अपने हाथों में लेकर सहकारी खेती कराना शुरू किया और लाखों परिवारों का पुनर्वास किया. शावेज ने अपने लाए संविधान में निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाए जाने के अधिकार की पहली अग्नि-परीक्षा खुद दी. २००४ में उन्हें राष्ट्रपति पद से हटाने के लिए हुए जनमत संग्रह में वे विजयी हुए. 20 सितंबर 2006 के दिन संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनरल असेम्बली में बोलते हुए शावेज ने अमरीकी साम्राज्यवाद को ललकारते हुए कहा था, "ओ विश्व के तानाशाह! मुझे महसूस होता है कि तुम्हारे जीवन के बाकी के दिन दु:स्वप्न की तरह बीतेंगे"। सचमुच वे जीवन के अंत तक साम्राज्यवादियों और फासीवादी ताकतों के लिए दु:स्वप्न बने रहे और उनके हमले झेलते रहे.

शावेज के नेतृत्व में वेनेजुएला तमाम लैटिन अमरीकी देशों को खुले हाथों हर तरह की मदद करता रहा. 2008 में तबाही और अन्न के लिए दंगे झेल रहे हैती को शावेज ने अपने देश से 364 टन गोश्त, सब्जियां और अनाज भिजवाए. अमरीकी राजसता के भीषण विरोधी शावेज वहाँ की गरीब जनता को बेहद प्यार करते थे जिसका प्रमाण उन्होंने बारम्बार दिया, खासतौर पर कैटरीना समुद्री तूफ़ान के समय राहत की पेशकश करके.

वे लैटिन अमरीका ही नहीं, बल्कि इरान, ईराक, फिलिस्तीन, लेबनान -यानी हर वो देश जो अमरीकी साम्राज्यवाद का सताया हुआ थ, उसके हितों के सर्वोत्तम विश्व प्रवक्ता थे.

शावेज अब शरीर से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन मानवीय-मुक्ति के इतिहास में वे अमर रहेंगे. उनकी स्मृति को हमारा सलाम!

सुधीर सुमन
राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी