8/20/11

अन्ना और संसद- प्रणय कृष्ण



अन्ना और संसद 

(जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उठी बहसों पर एक श्रृंखला लिख रहे हैं. प्रस्तुत है इस लेखमाला की पहली कड़ी)

“जिसे आप ”पार्लियामेंटों की माता” कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है. ये दोनों शब्द बहुत कडे हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं. मैंने उसे बांझ कहा, क्योंकि अब तक उस पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया. अगर उस पर जोर-दबाव डालनेवाला कोई न हो, तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती है. आज उसका मालिक  एसिक्वथ है, तो कल वालफर होगा तो परसों कोई तीसरा."
"हिंद स्वराज" (1909) में गांधी

गांधी के उपरोक्त उद्धरण को यहां रखते हुए इसे न तो  मैं सार्वकालिक सत्य की तरह उद्धृत कर रहा हूं, न अपनी और से कुछ कहने के लिए, बल्कि इंगलैंड की तब की बुर्जुआ पार्लियामेंट के  बारे में गांधी के विचारों को ही आज के, बिलकुल अभी के  हालात को समझने के  लिए रख रहा हूं.

अभी भी प्रधानमंत्री इस बात पर डटे हुए हैं कि अन्ना का आन्दोलन संसद की अवमानना करता है और इसीलिए अलोकतांत्रिक है. दर- असल लोकरहित संसद महज तंत्र है और इस तंत्र को चलानेवाले (मंत्रिमंडल) के सदस्य तब से लोक को गाली दे रहे हैं, जब से अन्ना का पहला अनशन जंतर-मंतर पर शुरू  हुआ. लोकतंत्र और संविधान की चिंता में दुबले हो रहे कुछ अन्य दल जैसे कि राजद और  सपा ने भी अपने सांसदों रघुवंश प्रसाद और मोहन सिंह के ज़रिए तब यही रुख अख्तियार कर रखा था. संसद की  रक्षा में तब कुछ वाम नेताओं के लेख भी आए थे, जबकि संसद को जनांदोलन से ऊपर रखने को मार्क्सवादी शब्दावली में  "संसदीय बौनापन” कहा जाता है. यदि भाकपा (माले) जैसे वामदल और उससे जुडे संगठनों को छोड़ दें जिन्होंने जंतर-मंतर वाले अन्ना के अनशन के  साथ ही इस मुद्दे पर आन्दोलन का रुख अख्तियार कर लिया. तो अन्य वामदलों ने जिनकी संसद में अभी भी अच्छी संख्या है, "वेट एंड वाच” का रुख अपनाया. कर्नाटक और अन्यत्र तथा केंद्र में अपने पिछले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों में फंसी भाजपा ने अन्ना के आन्दोलन के समानांतर रामदेव को खड़ाकर जनाक्रोश को अपने फायदे में भुनाने की भरपूर कोशिश की. संघ का नेटवर्क रामदेव के लिए लगा. लेकिन कांग्रेसियों ने खेले-खाए रामदेव को उन्हीं के जाल में फंसा दिया. योग के नाम पर सत्ताधारी दल से जमीन और तमाम दूसरे फायदे उठाने वाले रामदेव का हश्र होना भी यही था.

बहरहाल आज स्थिति बदली हुई है. लोकपाल बिल पर सिविल सोसाईटी से किये हर वादे से मुकरने के बाद सरकार ने पूरी मुहिम चलाई क़ि अन्ना हठधर्मी हैं, संविधान और संसद को नहीं मानते. टीआरपी केन्द्रित मीडिया भले ही इस उभार को परिलक्षित कर रहा हो लेकिन अगर बड़े अंगरेजी अखबारों के हाल-हाल तक के सम्पादकीय पढ़िए तो लगभग सभी ने कांग्रेसी लाइन का समर्थन किया. किसी ने पलटकर यह पूछना गवारा न किया क़ि क्या जनता का एकमात्र अधिकार वोट देना है? जनता के अंतर्विरोधों को साधकर तमाम करोडपति भ्रष्ट और कारपोरेट दलाल मनमोहन सिंह, चिदंबरम, सिब्बल, शौरी, प्रमोद महाजन, मोंटेक आदि विश्व बैंक और अमरीका निर्देशित विश्व व्यवस्था के हिमायती अगर संसद को छा लें तो जनता को क्या करना चाहिए?
क्या वोट पाने के बाद सांसदों को कुछ भी करने का अधिकार है? क्या संसद में उनके कारनामों पर जनता का कोई नियंत्रण होना चाहिए या नहीं? यदि होना चाहिए तो उसके तरीके क्या हों? क्यों न जनादेश की अवहेलना करने वालों को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता के पास हो? यदि यह अधिकार कम्युनिस्ट शासन द्वारा वेनेजुएला की जनता के लिए लाये गए संवैधानिक सुधारों में शामिल है, तो भारत जैसे कथित रूप से 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र' में जनता को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्यों 'किसी को भी वोट न देने' या 'विरोध में वोट देने' का विकल्प मतपत्र में नहीं दिया जा सकता? लेकिन मीडिया बैरनों को ये सारे सवाल सत्ताधारियों से पूछना गवारा न था.

एक मोर्चा यह खोला गया क़ि जैसे जेपी आन्दोलन से संघ को फ़ायदा हुआ, वैसे ही अन्ना के आन्दोलन से भी होगा. अब मुश्किल यह है क़ि जिस बौद्धिक वर्ग में यह सब ग्राह्य हो सकता था, उसके पास नेहरू-गोविंदबल्लभ पन्त से लेकर राजीव गांधी तक कांग्रेस और संघ परिवार के बीच तमाम आपसी दुरभिसंधियों का डाक्युमेंटेड  इतिहास है. जेपी आन्दोलन से संघ को जो वैधता मिली हो, लेकिन आज़ादी के बाद संघ को समय-समय पर जितनी मजबूती प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कांग्रेस ने पहुंचाई है, उतनी किसी और ने नहीं. उसके पूरे इतिहास के खुलासे की न यहां जगह है और न जरूरत. बहरहाल शबनम हाशमी और अरुणा राय जैसे सिविल सोसाईटीबाज़, जिनका एक्टिविज्म कांग्रेसी सहायता के बगैर एक कदम भी नहीं चलता, "संघ के हव्वे" पर खेल गए. मुंहफट कांग्रेसियों ने अन्ना के आन्दोलन को संघ से लेकर माओवाद तक से जोड़ा, लेकिन उन्हें इतनी बड़ी जनता नहीं दिखी, जो इतनी सारी वैचारिक बातें नहीं जानती. वह एक बात जानती है क़ि सरकार पूरी तरह भ्रष्ट है और अन्ना पूरी तरह उससे मुक्त.

अभी कल तक कुछ चैनलों के संवाददाता अन्ना के समर्थन में आये सामान्य लोगों से पूछ रहे थे क़ि वे जन लोकपाल बिल और सरकारी बिल में क्या अंतर जानते हैं? बहुत से लोगों को नहीं पता था, लेकिन उन्हें इतना पता था क़ि अन्ना सही हैं और सरकार भ्रष्ट. जनता का जनरल नालेज टेस्ट कर रहे इन संवाददाताओं के जनरल नालेज की हालत यह थी क़ि वे यहां तक कह रहे थे क़ि आन्दोलन अभी तक मेट्रो केन्द्रों तक ही सीमित है. उन्हें सिर्फ प्रादेशिक राजधानियों में ही अन्ना का समर्थन दिख रहा था. देवरिया, बलिया, आरा, गोरखपुर, ग्वालियर, बस्ती, सीवान, हजारीबाग, मदुरै, कटक, बर्दमान, गीरिडीह, सोनभद्र से लेकर लेह-लद्दाख और हज़ारों कस्बों और छोटे कस्बों में निम्न मध्यवर्ग के बहुलांश में इनको परिवर्तन की तड़प नहीं दिख रही.

जबसे नयी आर्थिक नीतियाँ शुरू हुईं, तबसे भारत की शासक पार्टियों ने विभाजनकारी, भावनात्मक और उन्मादी मुद्दों को सामने लाकर बुनियादी सवालों को दबा दिया. इस आन्दोलन में भी जाति और धर्मं के आधार पर लोगों को आन्दोलन से दूर रखने की कोशिशे तेज हैं. बहुतेरी जातियों के कथित नेता और बुद्धिजीवी चैनलों में बिठाये जा रहे हैं ताकि वे अपनी जाति और समुदाय को इस आन्दोलन से अलग कर सकें .राशिद अल्वी का बयान खास तौर पर बेहूदा है क्योंकि वह साम्राज्यवाद विरोधी ज़ज्बे को साम्प्रदायिक नज़र से समझता है. अल्वी, जो कभी बसपा में थे और ज़ातीतौर पर शायद उतने बुरे आदमी नहीं समझे जाते, उन्हें कांग्रेसियों ने यह समझाकर रणभूमि में भेजा कि अमेरिका से  अगर किसी तरह इस आन्दोलन का संबंध जोड़ दिया जाए तो मुसलमान तो जरूर ही भड़क जायेंगें. अमेरिका जो हर मुल्क की अंदरूनी हालत पर टिप्पणी करके अपने वर्चस्व और हितों की हिफाजत करता है, उसने अन्ना के आन्दोलन पर सकारात्मक टिप्पणी करके इसका आधार भी मुहैय्या करा दिया. जबकि अमेरिका से बेहतर कोई नही जानता कि यह आन्दोलन महज़ लोकतंत्र के किसी बाहरी आवरण तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें एक साम्राज्यवाद विरोधी संभावना है.

आईडेंटिटी पालिटिक्स के दूसरे भी कई अलंबरदार इस आन्दोलन को ख़ास जाति समूहों का आन्दोलन बता रहे हैं. पहले अनशन के समय रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कुछ पत्रकार इसे वाणी दे रहे थे. अभी कल हमारे मित्र चंद्रभान प्रसाद इसे सवर्ण आन्दोलन बता रहे थे एक चैनल पर. यह वही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने आज की बसपाई राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करते हुए काफी पहले ही यह प्रतिपादित किया था कि पिछड़ा वर्ग आक्रामक है, लिहाजा रक्षात्मक हो रहे सवर्णों के साथ दलितों की एकता स्वाभाविक है. यह यही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने गुजरात जनसंहार में पिछड़ों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताते हुए इन्हें हूणों का वंशज बताया था. अब सवर्णों के साथ दलित एकता के इस 'महान' प्रवर्तक को यह आन्दोलन कैसे नकारात्मक अर्थों में महज सवर्ण दिख रहा है?  वफ़ा सरकार और कांग्रेस के प्रति जरूर निभाएं चंद्रभान, लेकिन इस विडम्बना का क्या करेंगें कि मायावती ने अन्ना का समर्थन कर डाला है. अगर किसी दलित को भ्रमित भी होना होगा तो वह मायावती से भ्रमित होगा या चंद्रभान जी से ?

आज का मध्यवर्ग और खासकर निम्न मध्य वर्ग आज़ादी के पहले वाला महज सवर्ण मध्यवर्ग नहीं रह गया है. अगर यह आन्दोलन आशीष नंदी जैसे अत्तरवादियों की निगाह में महज मध्यवर्गीय है, तो इसमें पिछड़े और दलित समुदाय का मध्यवर्गीय हिस्सा भी अवश्य शामिल है. पिछले अनशन में मुझे इसीलिये रिपब्लिकन पार्टी, वाल्मीकि समाज आदि के बैनर और मंच जंतर-मंतर पर देख ज़रा भी अचरज नहीं हुआ था. अब जबकि लालू, मुलायम और मायावती भी अन्ना की गिरफ्तारी के बाद लोकतांत्रिक हो उठे हैं, तो इस आन्दोलन को तोड़ने के जातीय कार्ड की भी सीमाएं स्पष्ट हो गई हैं.

बे अंदाज़ कांग्रेसियों ने अन्ना को अपशब्द और भ्रष्ट तक कहा. हत्या का मंसूबा रखने वाले जब देख लेते हैं कि वे हत्या नहीं कर पा रहे, तो 'चरित्र हत्या' पर उतरते हैं. शैला मसूद की भाजपाई सरकार के अधीन हत्या की जा सकती थी, तो उनकी हत्या कर दी गई. अन्ना की हत्या नहीं की जा सकती थी, सो उनकी चरित्र हत्या की कोशिश की गई. अब राशिद अल्वी जैसे कांग्रेसियों को न्ना के आन्दोलन के पीछे अमेरिकी हाथ दिखाई दे रहा है. कभी इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस अपने हर विरोधी को 'सीआईए एजेंट' की पदवी से नवाज़ा करती थी. राशिद अल्वी भूल गए हैं कि अमेरिकी हाथ वाला नुस्खा पुराना है, और अब दुनिया ही नहीं बदल गई है, बल्कि उनकी पूरी सरकार ही देश में अमेरिकी हितों की सबसे बड़ी रखवाल है. तवलीन सिंह आदि दक्षिणपंथी इस चिंता में परेशान हैं कि अन्ना खुद और उनके सहयोगी क्यों भ्रष्टाचार को साम्राज्य्परस्त आर्थिक नीतियों से जोड़ रहे हैं?

गांधी ने हिंद स्वराज में लिखा था- "अगर पार्लियामेंट बाँझ न हो तो इस तरह होना चाहिए. लोग उसमें अच्छे से अच्छे मेंबर चुन कर भेजते हैं... ऐसी पार्लियामेंट को अर्जी की जरूरत नहीं होनी चाहिए, न दबाव की. उस पार्लियामेंट का काम इतना सरल होना चाहिए कि दिन ब दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए. लेकिन इसके उलटे इतना तो सब कबूल करते हैं कि पार्लियामेंट के मेंबर दिखावटी और स्वार्थी पाए जाते हैं. सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं. सिर्फ डर के कारण ही पार्लियामेंट कुछ काम करती है. जो काम आज किया उसे कल रद्द करना पड़ता है. आज तक एक ही चीज को पार्लियामेंट ने ठिकाने लगाया हो ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती. बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेंट में चलती है तब उसके मेंबर पैर फैला कर लेटते हैं, या बैठे बैठे झपकियाँ लेते हैं. उस पार के मेंबर इतने जोरों से चिल्लाते है कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं. उसके एक महान लेखक ने उसे 'दुनिया की बातूनी' जैसा नाम दिया है.... अगर कोई मेंबर इसमें अपवादस्वरूप निकल आये तो उसकी कमबख्ती ही समझिये. जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए. ब्रिटिश पार्लियामेंट महज प्रजा का खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है. यह विचार मेरे खुद के हैं, ऐसा आप न माने.... एक मेंबर ने तो यहां तक कहा है कि पार्लियामेंट धर्मनिष्ठ आदमी के लायक नहीं रही..... आज सात सौ बरस के बाद भी पार्लियामेंट बच्चा ही हो तब वह बड़ी कब होगी." 


...जारी 

7 comments:

ankur said...

सरकार की नीति का तो सही पिटारा खोला है ...
मीडिया एक साथ लोगो से IQ test लेना शुरू की जो सजाया हुआ लगता है पर ये आन्दोलन कहा तक जायेगा ..

आनंद प्रधान said...

behatarin aalekh..tarkik aur bahas ke star ko aage le jaanewala...agali kist kii pratiksha hai..
Prany ji ka shukriya..

rakesh shukla said...

dada....badi dino bad is aandolan ke sandarbh me behtareen kuch padha...likhte rahiyega...vaikalpik media rukna nahi chaahiyen.

rakesh shukla said...

dada....badi dino bad is aandolan ke sandarbh me behtareen kuch padha...likhte rahiyega...vaikalpik media rukna nahi chaahiyen.

Omprakash pal said...

behtareen article....shukriya pranay ji

वीरेन्द्र यादव said...

प्रणय जी इस खाकसार ने भी एक लेख लिखा है इसी विषय पर.जनसंदेश टाइम्स 21 अगस्त पृष्ठ 17 पर नेट पर है. आपकी प्रतिक्रिया चाहूंगां.

Manwendra Tripathy said...

jabardast lekh hai... ise mai apne page PATNA THEATRE par daal raha hu... maaf karenge baat door tak jaani chahiye.....